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| शिविका : मानस शब्द संस्कृति |
सिबिका सुभग न जाहिं बखानी।
चढ़ि चढ़ि चलत भईं सब रानी॥
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| शिविका : मानस शब्द संस्कृति |
सिबिका सुभग न जाहिं बखानी।
चढ़ि चढ़ि चलत भईं सब रानी॥
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
मोबाइल- कमेंट box में पूछें।
E-mail- royramakantrk@gmail.com
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| ययाति : मानस शब्द संस्कृति |
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ।
पितु अग्यां अघ अजसु न भयऊ।।
इक्ष्वाकुवंश में महाराजा नहुष के पुत्र #ययाति हुए। उनके जीवन से त्याग और भोग की प्रेरणादायी कहानी जुड़ी है। सुखोपभोग हेतु उन्होंने अपने पुत्र पुरु से से यौवन मांगा था और भोग करने के बाद "त्याग में सुख है", सिद्धांत प्रतिपादित किया। इस नाम से एक सिंड्रोम है जो वृद्धावस्था में यौवन की तीव्र कामना से संबंधित है।
ययाति की पत्नी राक्षसकुल के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी थीं। देवयानी की सखी शर्मिष्ठा ने भी ययाति से विवाह किया।
इस कहानी को केंद्र में रखकर मराठी के प्रसिद्ध नाटककार गिरीश कर्नाड ने ययाति नाम से एक नाटक लिखा है।
#मानस_शब्द #संस्कृति
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
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| कर्णधार : मानस शब्द संस्कृति |
करनधार तुम अवध जहाजू।
चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू।।
धीरजु धरिअ त पाइअ पारू।
नाहिं त बूड़िहि सब परिवारू।।
नौका/जहाज को पानी में यत्र तत्र के जाने के लिए जो चप्पू प्रयुक्त होता है, वह भी कर्ण है। उसे धारण करने वाला, नौका को दिशा देने वाला #कर्णधार। उसका ही दायित्व रहता है कि वह नौका को जहां चाहे ले जाए। पार उतारे या डुबोए, उसका कौशल है।
#मानस_शब्द #संस्कृति
प्रसंगवश कौशल्या कहती हैं कि राम के वियोग रूपी समुद्र में अयोध्या रूपी जहाज के कर्णधार राजा दशरथ हैं।
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
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बुलडोजर न्याय कोई न्याय नहीं है। यह खासा हिंसक है और दूरगामी प्रभाव डालता है। इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन पत्थरबाजी जैसे बर्बर और अमानुषिक कृत्य का कोई दूसरा इलाज भी नहीं है।
आइए पत्थरबाजी और बुलडोजर न्याय को समझने का प्रयास करते हैं।
#एक_धागा
#बुलडोजर #पत्थरबाज
पत्थर आदिम मानव का अस्त्र था। मानव सभ्यता के इतिहास में नियंडरथल किस्मों ने पत्थर का बढ़िया उपयोग किया था। इतिहास और नृतत्त्वशास्त्र के विद्यार्थी अच्छी तरह जानते हैं कि पत्थरों का कैसा और कितना सुघड़ उपयोग आदिममानव ने किया था। फिर तांबे, कांसे और लोहे का युग आया।
सभ्यताएं प्रगति करती रहीं। उसके अस्त्र शस्त्र आधुनिक होते गए। आज हम मिसाइल और परमाणु बम के युग से भी संक्रमण कर रहे हैं। चीन ने जैविक अस्त्र का परीक्षण दुनिया भर में किया जिसे #COVID19 का नाम दिया गया।
समाज आज पत्थरयुग से लगभग बाहर निकल आया है। लाठी मनुष्य का सहारा बना।
यदि आग्नेयास्त्रों को छोड़ दें तो अन्य सभी अस्त्रों में (और शस्त्र में भी) तकनीक काम करती है लेकिन पत्थर वाला पारंपरिक अस्त्र अभी भी उसी आदिम तरीके से चलाया जा रहा है। हालांकि दिल्ली में बीते दिनों हुए दंगे में #पत्थरबाजी करने के लिए गुलेल की तकनीक भी अपनाई गई थी। अस्तु,
अरब समाज में आज भी यह सबसे प्रमुख अस्त्र/शस्त्र है। मक्का में शैतान को पत्थर मारते हैं और यह एक बहुत प्रसिद्ध "फंक्शन" है, जिसमें दुनिया भर के मुसलमान एकत्रित होते हैं और पत्थर फेंकने की रस्म अदायगी करते हैं। शरिया वाले समाज में #संगसार करना न्याय का तरीका है।
कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को..
तथाकथित पापियों को संगसार करके सजा देना शरिया का हिस्सा है। तो जब किसी प्रदर्शन/दंगा/लूट आदि में पत्थर चलता है तो इसका केवल यह अर्थ नहीं है कि पत्थर सर्वसुलभ है, घातक है, पहचान छिपाता है इसलिए चलता है; बल्कि इसका एक सांस्कृतिक पक्ष है।
पत्थरबाजी करने में एक लाभ है कि आप कभी भी अस्त्र/शस्त्र हीन/युक्त हो सकते हैं। इसकी कोई विशेष तैयारी नहीं है। अभी खाली हाथ थे, अभी पत्थर युक्त हो गए। निशाने पर फेंका और हाथ झाड़कर मासूम बन गए। कोई सबूत नहीं बचा। विकासशील समाजों में पत्थर मिलने की संभावना बहुत अधिक रहती है।
अब यह सब जानते हैं कि हमारे देश में शरिया क़ानून व्यवस्था नहीं है। लेकिन दंगा, उपद्रव, सामूहिक हिंसा तो आम है। अभी कुछ साल पहले तक लाठी चलाने वाले लोगों का एक समूह यदि विपक्षी को सबक सिखाना रहता था तो धावा बोलता था और विपक्षी भी लाठियों से सुसज्जित होकर भिड़ता था।
लेकिन सामंती समाज के विघटन के बाद शत्रु अदृश्य हो गए। कोई किसी को कभी भी बिना बताए नुकसान पहुंचा सकता है। यदि आपको #आधा_गांव उपन्यास की याद हो तो उसमें फुन्नन मियां और कुंवरपाल सिंह एक दूसरे को सावधान कर लाठी चलाते हैं। यही तरीका था। बचने/प्रत्युत्तर के लिए स्पेस मिलता था।पूंजीवादी व्यवस्था ने नैतिकता नष्ट कर दी।
लेकिन हम पत्थरबाजी और दंगे की बात कर रहे थे।
आधुनिक प्रदर्शनों में दंगाई पत्थर का इसलिए भी प्रयोग करते हैं कि इससे लैस होना और मुक्त होना बहुत क्षिप्र गति से संभव है। जब तक फेंकते नहीं, यह हथियार नहीं है। अरब समाज में यह नैपकिन है।
पत्थर फेंकने का कोई प्रमाण नहीं रहता। यह दंगाइयों के लिए सबसे #आदर्श स्थिति है। मारो और भीड़ में छिप जाओ। यदि वीडियो न बने तो पता नहीं चल सकता कि वास्तव में पत्थर किसी को आहत करने के लिए चलाया गया है। वीडियो बने भी तो वह सिर्फ यह बता सकता है कि #पत्थर फेंका गया है।
इसलिए बीते दिनों में अराजकता वादी समूहों ने #पत्थरबाजी को एक फेवरेट टूल की तरह अपनाया है। पत्थरबाजी में और वह भी समूह द्वारा की गई पत्थरबाजी में अनुशासन का अभाव होता है इसलिए इसमें प्रहार और बचाव का कोई नियम नहीं है। सब अंधाधुंध है। यह सुरक्षाबलों के लिए चुनौती हो जाती है।
जब आपके हाथ बंधे हों, बचाव करना एकमात्र रास्ता हो तो पत्थरबाजी एक चक्रव्यूह है और आप अभिमन्यु हैं। जहां क्षत विक्षत होना ही अंतिम परिणति है। जहां क्रूरता है, अट्टहास है और नंगानाच।
सुरक्षा बलों को दंगाइयों का इसी तरह सामना करना पड़ता है। मारना नहीं है। संभव भी नहीं।
ऐसे में, पत्थरबाजी चुनकर दंगाइयों ने मौके का खूब फायदा उठाया है। बीते कुछ समय से इस वृत्ति ने म्लेच्छों में अपार लोकप्रियता हासिल कर ली है। शासन एक तो सॉफ्टकॉर्नर रखता था और फिर यह लूपहोल उसे नख दंत विहीन कर देता था।
अब शासन ने काट खोज ली है। यह उपाय है #बुल्डोजर तकनीक ने शासन के #बुलडोजर अभियान को अपेक्षाकृत न्यायशील बनाया है। दंगा, उपद्रव, अराजकता, बलात्कार, गंभीर अपराध में संलिप्तता का प्राथमिक साक्ष्य मिलते ही कार्रवाई के लिए अनुमति मिल जाती है।
चूंकि न्यायिक प्रणाली धीमी है और बहुत लंबी खिंच जाती है, इसलिए यह न्याय आया है।
शासन ने दंगाइयों, उपद्रवी और अराजक लोगों की संपत्ति नष्ट करने का एक तरह से संकल्प लिया है। न्याय होगा, पहले आपको इसका फल चखा दिया जाए। सम्पत्ति किसी भी व्यक्ति के शक्ति का आधार है। शासन आरोपी के अचल सम्पत्ति को ध्वस्त करती है और चल को जब्त। इससे उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है।
चूंकि शासन कोई कार्य द्वेषवश, विभेदकारी तरीके से और अन्याय करते हुए नहीं कर सकती तो इसके लिए उसने अवैध निर्माण और अतिक्रमण का एक ऐसा मार्ग चुना है जिसमें अपार संभावनाएं हैं। अवैध निर्माण बताना तो इतना आसान है कि इसकी कोई काट नहीं। न्यायालय भी इसके आगे विवश रहेगा।
#पत्थरबाजी में जितनी अराजकता और स्वच्छंदता है, #बुल्डोजर में भी वही है। शासन के हाथ यह विशिष्ट तरीका लगा है। इसमें अच्छी बात यह है कि #बुलडोजर_बाबा चलते हैं तो लोग प्रसन्न होते हैं क्योंकि यह आततायी, अत्याचारी, गुण्डा, माफिया आदि को पंगु करता है, लोगों को निर्भय बनाता है।
लोग मुझसे पूछते हैं कि यह न्याय कहां तक जाएगा? मुझे भस्मासुर की कथा याद आ जाती है। उसे वरदान मिला था कि वह जिसके सिर पर हाथ रख देगा, वह भस्म हो जाएगा। उसे वरदान का सदुपयोग करना था। उसकी तपस्या का यह फल मजेदार होना था किन्तु उसने बहकावे में आकर गलत पंगा ले लिया। भस्म हुआ।
तो #बुलडोजर शासन को प्राप्त एक अपरिमित शक्ति से युक्त वरदान है। शासन इसका वरदान की तरह प्रयोग करे तो वह सुशासन बनाए रखने में सहायक होगा। दुरुपयोग करेगा, जैसा महाराष्ट्र में कंगना राणावत के साथ किया तो भस्मासुरी अन्त होगा।
वरदान रूप में मैं बुलडोजर के साथ हूं और आप?
#कथा #वार्ता #कथावार्ता
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
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| मानस शब्द संस्कृति: कहानी |
श्रीराम वनवास काल में "बड़ा" होने का दायित्व बहुत अच्छी तरह निभा रहे हैं। राजघराने के अभ्यस्त लक्ष्मण और सीता को नई परिस्थिति में जो रुचिकर लगे, सुख मिले, वह सब उपक्रम वह करते हैं। वह कथाएं सुनाते हैं। यह सब चरित्र को उज्ज्वल बनाने वाले वृत्त हैं। राम इसी नाते आदर्श हैं।
#मानस_शब्द #संस्कृति
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
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प्रेमचंद स्मृति कथा-सम्मान
वक्तव्य : ज्ञानरंजन
(बांदा : 04 फरवरी-24)
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| प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद |
प्रेमचंद स्मृति सम्मान के सदस्यों, मंच पर आसीन मित्रों और साथियों :
प्रेमचंद के बारे में कुछ तितरी बितरी, तिनका तिनका बातें शुरूआत में रखूँगा, इसलिए भी कि मेरे सम्मान के साथ इस महान कथाकार का नाम जुड़ा है।
000
सबसे पहले आपका ध्यान आकर्षित करूँगा कि मुंशी जी 1936 में दिवंगत हुए और संयोग से 1936 मेरा जन्म हुआ। हमारे पूर्वज बनारस के थे और मेरे स्व. पिता श्री रामनाथ सुमन की जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद से निकटता थी। मेरे पिता ने प्रेमचंद पर यत्र तत्र लिखा है, अपने संस्मरण में। जब मैं किशोर हुआ तो पिता की लाइब्रेरी में भटकते हुए मुझे उसमें प्रेमचंद का उपन्यास रंगभूमि मिला, जिसके भीतरी पृष्ठ पर लाल सियाही से प्रेमचंद का हस्ताक्षर था। बाद में शिवरानी देवी की किताब पढ़ने को मिली।
000
अभी लगभग तीन चार वर्ष पूर्व जापान से मेरे सहपाठी और अभिन्न मित्र का फ़ोन आया और उन्होंने अपने पास कवि रत्न मीर की (मेरे पिता द्वारा लिखी) एक अंतिम दुर्लभ प्रति होने की सूचना दी, जो मेरे पास नहीं थी और जिसे उन्होंने मुझे डाक से भेज दी। यह पुस्तक, पुस्तक-भण्डार लहेरिया सराय, बिहार से प्रकाशित थी, जो काफ़ी दिनों पहले बंद हो चुका है। दुर्भाग्य से हमारे इस संवाद के बाद लक्ष्मीधर का जापान में निधन हुआ। इस सजिल्द पुस्तक की भूमिका प्रेमचंद ने लिखी है और लगभग 75 वर्ष बाद कवि रत्न मीर का नया संस्करण ज्ञानपीठ ने छापा।
000
सोवियत लैण्ड पुरस्कार से जुड़ी सोवियत रूस की यात्रा में मुझसे कई बार यह सवाल पूछा गया कि आप की कहानियाँ किस तरह प्रेमचंद की परम्परा से जु़ड़ी हैं। मैंने इसका विस्तार से जवाब दिया है।
000
प्रेमचंद हमारे जीवन में कितने भीतर तक प्रवेश कर चुके हैं इसका एक रोचक किस्सा सुनिये। मेरी दादी सुखदेवी ने प्रेमचंद को समग्र कई कई बार पढ़ा था। उन्होंने किसी स्कूल या विद्यापीठ में पढ़ाई नहीं की थी पर प्रेमचंद की रचनाओं से वे दिलचस्प उद्धरण देती थीं। वे मेरी प्रिय थीं और हमारा परस्पर विनोदपूर्ण रिश्ता था। मैं उन्हें बूढ़ी काकी कहता था। वे भूख लगने पर तड़प उठती थीं, अपनी बहू यानी मेरी माँ पर शब्दबाण फेंकने लगती थीं। मेरे बाबा भोजपुरी बोलते थे और फारसी गणित के ज्ञाता थे। वे घर के बाहरी हिस्से में रहते थे और केवल भोजन के लिए आते थे। उनका जीवन ‘पूस की रात’ के हल्कू जैसा था। एक दिन वे ठिठुर ठिठुर के जाड़ों की रात में जलते हुए दिवंगत हो गये। वे सूखे पत्तों को इकट्ठा करके तापते थे।
000
प्रेमचंद प्रसंग अभी समाप्त नहीं है। कई दिलचस्प संयोग हैं। इसलिए भी कि हम सभी प्रेमचंद की रचनाकार संतानें हैं। प्रेमचंद ने कहानियाँ लिखीं; हमने भी उनकी परम्परा में कुछ कहानियों को जोड़ा। प्रेमचंद ने प्रगतिशील संगठन की मशाल जलाई, हमने कई दशक तक प्रलेसं के पदाधिकारी के रूप में संगठन को मजबूत बनाने का काम किया। प्रेमचंद ने सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘हंस’ का अविस्मरणीय संपादन किया; हमने भी ‘पहल’ को चालीस वर्ष सम्पादित किया। जब ज्ञानपीठ ने मुझे हरिशंकर परसाई की रचनाओं का संकलन संपादन करने का दायित्व सौंपा तो मैंने उसका शीर्षक ‘प्रेमचंद के फटे जूते’ दिया। उसके अनेक संस्करण हुए हैं।
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साथियों, उपरोक्त उदाहरण इसलिए ध्यान आकर्षित करने के योग्य हैं कि मैं एक लुम्पेन किशोर था। अपनी नौजवानी तक। और मैंने ‘तारामण्डल के नीचे एक आवारागर्द’ संस्मरण में इस बात को लिखा भी है। पर विचारधारा ने मुझे एक छोटे मोटे पर विश्वसनीय लेखक के रूप में स्वीकृति दी। पुरस्कार, सम्मान के मौक़े हमें यदा कदा छोटे मोटे जश्न करने की अनुमति देते हैं। मैं बांदा में अपने साथियों के इस जश्न में शामिल होकर ख़ुश हूँ। पश्चिमी भाषाओं की तरह हिन्दी में अपने लेखकों को सेलिब्रेट करने की प्रथा कुछ कम है। केवल पुरस्कारों से नहीं, हम दूसरे बहुत अन्य शानदार तरीक़ों से यह आयोजन अपने दूसरे अप्रतिम युवा लेखकों के लिए कर सकते हैं। यह मेरा सुझाव है।
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मेरी यह समझ है कि लेखक या किसी भी अन्य व्यक्ति के लिए उसका पिछला समय, उसका वर्तमान समय और उसका भावी समय बहुत अहमियत रखता है। इसमें हमारा परिवार, फिर शहर, फिर देश, फिर विश्व का समय शामिल है। समय की कोख से ही हमारी रचनाएँ जन्म लेती हैं। समय ही हमारी रचनात्मक बेचैनियों का सबब है। वह कभी हमें प्रफुल्ल करता है, कभी अधमरा। कभी वह हमारी ख़रीद फ़रोख़्त भी करता है। आज हमारा समय ख़रीद फ़रोख़्त से भरा है। इसी को हम बाज़ार भी कहते हैं। दुर्योग से मेरा प्रसव काल ख़त्म हो गया है, पर मैं समय का पीछा तो कर ही रहा हूँ। सरसरी तौर पर इसकी चर्चा करता हूँ। यह निरक्षरता का समय है। अगर रोग मानें तो इसे डिमेन्शिया और अलज़ाइमर का विस्फोटक समय भी कह सकते हैं।
000
मोटी मोटी बातें देखिये। देखिये कि रोज़ जो लिखा जा रहा है, बोला जा रहा है, उसमें झूठ का प्रतिशत कितना है। असंख्य झूठ आपके देखते-देखते सच्चाइयों में तब्दील हो रहे हैं, या हो चुके हैं। सबसे ख़तरनाक दो शब्द लगते हैं - नया और विकास। ये शब्द धूर्तता से भरे हैं। निरंतर धूल झोंकी जा रही है। नया शब्दकोश, नये संग्रहालय, नया पाठ्यक्रम, नई शिक्षा, नई सड़कें, नये शहर, नया यातायात। यह सूची अनंत है। पहले ज़मीनों पर कब्ज़ा होता था अब धर्म पर कब्ज़ा है। अतीतवादी लोग ही अतीत पर प्रहार कर रहे हैं। आलोचना देशद्रोह है। कड़वी चीज़ें बर्दाश्त नहीं। लड्डू और दीये हमारे सबसे बड़े चित्र हैं। कथा कहानी के घीसू माधव विकराल रूप में पुनर्जीवित हो गये हैं। जनता सियारों के झुण्ड में बदल चुकी है। कुछ अलग आवाज़ें अगर हैं तो यू ट्यूब में घुसड़ गई हैं या फ़ेस बुक में। फिराक़ साहब का मशहूर शेर जीवित हो गया है – ‘हमीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात’। मज़ा ये है कि हम इसमें ख़ुश हैं, सफ़ल हैं। मध्यवर्ग ने वास्तविक जनता को अदृश्य बना दिया है। जबकि मोटा मोटी यह समय की एक आउटर लाइन मात्र है। उसका कैरीकेचर। यह बालकृष्ण मुख का ब्रह्माण्ड नहीं है। मित्रों, इसीलिए मैं आग्रह करता हूँ आप सबसे, जो लिखते हैं, या पढ़ते हैं, या कुछ भी नहीं करते; उन्हें अपने समय के उजले-अंधेरे झरोखों में झाँकना चाहिए। इससे परिवर्तन हो या न हो तसल्ली मिलती है और आत्मरक्षा होती है। अगर हमारा समय हमें होशियार, चौकन्ना, बनावटी और काइयाँ बना रहा है तो हमें सावधान हो जाना चाहिए।
देवीप्रसाद मिश्र की एक ताज़ा कविता का नया जुमला है : कि दो गुजराती देश को बेच रहे हैं और दो गुजराती देश को ख़रीद रहे हैं। दोस्तों यह केवल दो चार व्यक्तियों का प्रसंग नहीं है, इसके निहितार्थ गहरे और भयानक हैं। इसे व्यंग्य भी न समझें।
000
दोस्तों, मैं बार-बार ‘समय’ शब्द को रिपीट कर रहा हूँ। इसलिए कि समय विशाल, विकराल और जटिल है। मैं उसे एक दो उदाहरणों से कैसै परिभाषित करूँ...? पर, मुझे समय की शिला को चूर चूर करना है। जो भी चाहे शिला-लेख बना लेता है और उसे बदल देता है। इसलिए पहले मैं उसके टुकड़े करूँगा और फिर आगे बढ़ूँगा। एक टुकड़ा उदाहरण है हमारे समय का, जिसे राष्ट्रीयकरण बनाम निजीकरण कहते हैं। यह मामूली जुमला नहीं है। इसी में सारी दुनिया उलट-पलट हो रही है। यह संगीन यात्रा समय है। आप से आग्रह है मेरी यात्रा कहानी पढ़ें। आज का दृश्य देखें - गेट मीटिंग हो रही है... काली पट्टी पहनी जा रही है... पुराने नारों को शोर है…, क्रमशः ये शस्त्र बेकार हो चुके हैं। ये पाषाण-कालीन लगते हैं। पर मूर्ख राजनीति इसकी व्यर्थता को बता नहीं पा रही है। यही समय है; दुभाग्यपूर्ण समय; सुनहरा समय नहीं। हरिशंकर परसाई की शैली में अगर मैं कहानी बनाऊँ वे वह ऐसी होगी :
आप कहते हैं कि हमारा यह सामान, हमारी यह सम्पत्ति ले लेंगे। वो कहते हैं कि नहीं लेंगे। ख़रीदने की उनकी शर्तें हैं। उनका कहना है कि पहले ढाँचे को उन्नत करो, या पुराना ढाँचा गिराओ और नया बनाओ। नई मशीनें लगाओ, बाहर से बुलाओ। श्रमिकों की छटनी करो; इनकी जनसंख्या ज़रूरत से अधिक है। ज़मीनें अधिग्रहीत करो। प्लेटफॉर्म बढ़ाओ, पटरियाँ बिछाओ, रेलगाड़ी के डब्बों को सुखद और शानदार करो, हर ओर वंदे वंदे चलाओ, ड्रेस कोड सुन्दर करो, प्लेटफॉर्म पर लिफ्ट और एक्सलेरेटर लगाओ, उसे मॉल की तरह सजाओ, जहाँ यात्री आराम से परफ्यूम, पेस्ट्री, फ़ोटोफ्रेम और मदिरा ख़रीद सकें। सामान के बोझ के लिए ट्रालियाँ लगाओ, कुलियों को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। वे सभ्यता पर बदनुमा दाग़ हैं। उसके बाद हमारे संतुष्ट होने पर हस्तांतरण होगा।
एक भव्य समारोह में, एक देश प्रमुख और तमाम सी.ई.ओ. की हाज़िरी में सजे हुए मंच पर आपके घर की एक विशाल काल्पनिक चाभी उन्हें सौंपी जायेगी और आपको घर के बाहर कर दिया जायेगा। आपका काम है ताली बजाना और ठुमरी गाना। यही है साथियों, राष्ट्रीयकरण और निजीकरण का समय।
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बहुत सारे विविध उदाहरण दिये जा सकते हैं, मेरे साथियों; पर ऐसा करते जाने से समय असमय हो जायेगा।
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हमारे समय की सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि हमने अस्वीकार करना बंद कर दिया है। हमारी गोद स्वीकृतियों, उपहारों, फूल-फलों से भरी है। अभी मैं आपको कुछ उदाहरण दूँगा, लेखकों का, जिन्होंने अस्वीकृतियों के प्रतिमान बनाए।
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अमेरिका के बारे में लोर्का कहते हैं कि यह डरावना और शैतान है। यहाँ खो जाना लाज़िम है। यह देश संसार का सबसे बड़ा झूठ है। अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने लिखा है - साहित्यिक न्यूयार्क टेपवर्म से भरी बोतल है जिसमें वे एक-दूसरे को खाते रहते हैं। मार्क ट्वेन लिखते हैं कि बोस्टन में पूछा जाता है - आप कितने ज्ञानवान हैं? न्यूयार्क में पूछा जाता है कि - आपकी कूबत, क़ीमत क्या है?
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एक अमरीकी लेखक लिखता है कि 6 करोड़ लोगों का यह शहर न्यूयार्क कौतूहल और संदिग्धता से भरा हुआ; यहाँ कोई लैण्डस्केप नहीं; सभी लैण्डमार्क हैं। इस शहर में कोई बूढ़ा नहीं होता। बूढ़े भी जवान हैं। यहाँ विपन्न को अतीत के डस्टबिन में डाल दिया जाता है।
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एनरैण्ड के फाउंटेन हेड में मैंने जो पढ़ा था, आपको यथावत् कोट कर रहा हूँ : -
‘‘न्यूयार्क के डिटेल्स एकत्र करना असंभव है। वे इतने गडमड हैं कि उन्हें एकबारगी स्वतंत्र नहीं देखा जा सकता। न्यूयार्क की विवरणिका नहीं बनाई जा सकती। यह दुनिया भगवान से टकरा रही है। न्यूयार्क के आसमान पर मनुष्य निर्मित इच्छाएँ हैं। हमें और किस धर्म की ज़रूरत है।’’
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मैंने लगभग एक दर्जन बड़े लेखकों के वाक्यों को एकत्र किया है जो शहरों के बारे
में हैं। प्रसिद्ध शिल्पी जिसने चंडीगढ़ की परिकल्पना की थी, ने कहा कि स्काई क्रीपर्स धनोपार्जन की मशीनें हैं।
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क्या हमारे यहाँ रचनाकारों, शिल्पियों और वास्तुकारों ने छोटे-बड़े, नये-पुराने किसी ने भी शहरों के बारे में - यानी विकास के ऐसे छायाचित्र और नक्शों के बारे में टिप्पणी की है? हमने घीसू-माधव द्वारा भेजी गई स्मार्ट योजनाओं का जम कर स्वागत किया और ठुमरी गाई। अब सब बदरंग हो चुका है और भ्रष्टाचार का सबब है। इसने वास्तविक जनता को देश से दूर ठेल दिया है। शहरीकरण की आंधी में कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्राकृतिक सौन्दर्य के असंख्य चित्र लुप्त हो गये हैं। यह पहले से हो रहा था; मद्धम...मद्धम...! पर अब यह बुलेट की तेज़ी से हो रहा है।
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हमारी राजधानी दिल्ली जो दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नगरी है, राजसत्ता की मनमानी रोशनियों से धधक रही है। मुझे याद आता है मिर्ज़ा ग़ालिब और रामधारीसिंह दिनकर की कविता ने ही दिल्ली पर सवाल उठाए; पर यह सूची बहुत संक्षिप्त है। ग़ालिब के अशआर अभी भी धूमिल नहीं हुए और दिनकर की लम्बी कविता दिल्ली को लोग भूल गये। ये सब मैं आपको इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि ये हमारे समय के सवाल हैं। और शुरू में मैंने कहा था कि एक लेखक को अपने समय की पड़ताल करनी चाहिए। अपने गुज़श्ता, वर्तमान और भावी समय की पहचान करनी चाहिए। यह हमारे लेखन का एक अनिवार्य हिस्सा है। क्या हम चौकन्नापन, काइयाँपन और कृत्रिमताओं को देख रहे हैं। शास्ता के मुक़ाबिले शासित जनता ज़ादा अपराधी है।
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पुरस्कृत व्यक्ति थोड़ा वाचाल हो जाता है; इसलिए मैंने कुछ अधिक कहा। मैं इतना बड़ा लेखक नहीं हूँ कि पुरस्कार को आलू का बोरा कह कर इतिश्री कर सकूँ।
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बहरहाल, जो व्यक्ति जिन शीर्षकों के अन्तर्गत पुरस्कृत हुआ है उसे आलोचक या अध्यापक की तरह नहीं बोलना चाहिए। उसका क्षेत्रफल ही अलग है। वह अपनी कहानियों से उत्पन्न दुनिया, जिसमें आप सब शामिल हैं, नये अन्वेषण करेगा। वह अपनी कहानियों में बार-बार लौट सकता है। क्योंकि कहानियाँ मरती या समाप्त नहीं हो जातीं। वे नये गलियारे बना सकती हैं। मुझे आपको एक उदाहरण देना है। इलाहाबाद कॉफ़ी हाउस में उन दिनों हमारा अड्डा था। अलग टेबुल पर बैठने वाले आलोचक विजयदेव नारायण साही याद आते हैं। संयोग से यह उनका जन्मशती वर्ष भी है। साही जी जबलपुर परसाई जी से मिलने आये थे। बारिश हो रही थी। हम एक रिक्शे पर बैठ कर बतिया रहे थे। कॉफ़ी हाउस में हम दोनों ने कभी एक टेबुल शेयर नहीं किया, पर यहाँ हम एक रिक्शे पर थे। साही जी ने कहा - ज्ञान तुम्हारी कहानी ‘बहिर्गमन’ अभी बची है, ख़त्म नहीं हुई है। मेरा सुझाव है कि जहाँ ‘बहिर्गमन’ समाप्त होती है, उसके आगे उसका दूसरा भाग लिखो। ‘मनोहर’ का परदेस में क्या हुआ, वह लौटा या मर गया। कुल मिला कर उसके बकाया जीवन का क्या हुआ। दूसरा भाग इस अंधकार को फाड़ने वाली कहानी हो सकती है। ‘बहिगर्मन’ का दूसरा हिस्सा मैंने लिखने की कोशिश की, पर बात बनी नहीं। मेरे पास मृत संजीवनी सुरा नहीं थी या हनुमान जी वाली बूटी, जो कहानी को फिर से जीवित कर पाती। मैं काहिल भी हूँ, संभवतः आलस्य इस काम में बाधा बना हो। जो भी हो अब मैं आपके सामने हूँ।
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लम्बे वक्तव्य से बचते हुए अंत में, दोस्तों, मेरा मानना है कि आपने मुझे पुरस्कृत किया, इससे साबित होता है कि आपको पुरानी दुनिया नापसंद नहीं है। संभव है कि आप यह भी मानते हों कि विकास की वर्तमान अवधारणा एक छद्म अवधारणा है। वाल्टर बैंजामिन भी अपनी समीक्षा में लगभग यही निष्कर्ष निकालते हैं। हमने पश्चिम की नक़ल करते हुए उसका आवरण सनातन बनाने का प्रयास किया है। अगर पुरानी दुनिया से हमें आगामी दुनिया में आना ही है तो हमारे स्वप्न, हमारे आग्रह, हमारी कामनाएँ भिन्न होंगी। पुराने से हमारा तात्पर्य यह नहीं है कि हम लालटेन की वापसी चाहते हैं।
- ज्ञानरंजन
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
मोबाइल- कमेंट box में पूछें।
E-mail- royramakantrk@gmail.com
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| जोहार |
करहिं जोहारु भेंट धरि आगे।
प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।।
चित्रलिखे जनु जंह तंह ठाढ़े।
पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।
वनवासी समुदायों में अभिवादन का प्रचलित तरीका #जोहार है। जब लोग आपस में संपर्क करते हैं तो प्रकृति को सर्वोपरि मानने वाला यह उद्घोष करते हैं। यह प्रणाम, नमस्ते की तरह का एक व्यवहार है। झारखंड में अभिवादन हेतु यही राजाज्ञा है।
जोहार में सेवा भावना प्रमुख है। इसका मोटे तौर पर अर्थ है कि हमारा अभिवादन स्वीकार करें और कहिए, क्या सेवा करें।
जब श्रीराम ने चित्रकूट में निवास हेतु कुटी बनाई तो कोल और किरात लोग उनसे मिलने आए, जोहार किया और अपने साथ लाए उपहार भेंट किया।
#मानस_शब्द #संस्कृति
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
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सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। इसका उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली की...