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सोमवार, 14 सितंबर 2026

आंसू खण्ड काव्य से!

जयशंकर प्रसाद विरचित आंसू खण्ड काव्य से यह अंश बी ए प्रथम सेमेस्टर के विद्यार्थियों की सुविधा के लिए यहाँ प्रस्तुत है. यह अंश जयशंकर प्रसाद की काव्यात्मक प्रतिभा और उनकी छायावादी वृत्ति का परिचय देता है.

आँसू

इस करुणा कलित हृदय में
अब विकल रागिनी बजती
क्यों हाहाकार स्वरों में
वेदना असीम गरजती ? 

मानस-सागर के तट पर
क्यों लोल लहर की घातें
कल-कल ध्वनि से हैं कहती
कुछ विस्मृत बीती बातें ? 

आती है शून्य क्षितिज से 
क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी 
टकराती बिलखाती-सी 
पगली-सी देती फेरी ? 

क्यों व्यथित व्योम-गंगा-सी 
छिटकाकर दोनों छोरें 
चेतना-तरंगिनि मेरी 
लेती है मृदुल हिलोरें।

बस गई एक बस्ती है 
स्मृतियों की इसी हृदय में 
नक्षत्र-लोक फैला है 
जैसे इस नील निलय में।


यह आँसू खण्ड काव्य का आरंभिक अंश है। इसमें कवि जयशंकर प्रसाद जी ने करुणा और वेदना से भरे हृदय में उठने वाली स्मृतियों और भाव-तरंगों का चित्रण किया है। 

प्रस्तुत है इस अंश की प्रसंग सहित व्याख्या। हमने इसका  भावार्थ और कठिन शब्दार्थ क्रम से दे दिया है।

1. सप्रसंग व्याख्या

प्रसंग

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध काव्य-कृति ‘आँसू’ से उद्धृत हैं। यह खंडकाव्य है। ‘आँसू’ में कवि ने अपने हृदय की व्यक्तिगत वेदना, विरह और अतीत की मधुर-कटु स्मृतियों को काव्यात्मक रूप में व्यक्त किया है। प्रस्तुत अंश में कवि के मन में उठ रही पीड़ा और पुरानी स्मृतियों के कारण उत्पन्न भाव-तरंगों का अत्यंत मार्मिक चित्रण हुआ है।

व्याख्या

कवि कहता है कि उसका हृदय करुणा से भरा हुआ है। इस करुणामय हृदय में अब ऐसी विकल रागिनी बज रही है, जो उसके भीतर की गहरी व्यथा को व्यक्त कर रही है। उसके मन में उठने वाली वेदना इतनी तीव्र और असीम है कि वह सामान्य स्वर में व्यक्त न होकर हाहाकार के रूप में गरज रही है। कवि स्वयं आश्चर्य करता है कि उसके हृदय में इतनी गहरी पीड़ा क्यों उमड़ रही है।

कवि अपने मन की तुलना मानस-सागर से करता है। जैसे समुद्र के तट पर लहरें बार-बार आकर टकराती हैं और अपनी कल-कल ध्वनि से कुछ कहती हुई प्रतीत होती हैं, वैसे ही उसके मन में भावों की लहरें उठ रही हैं। ये भाव-तरंगें उसके अतीत की कुछ विस्मृत अर्थात् भुला दी गई पुरानी बातों को फिर से स्मरण करा रही हैं। इस प्रकार कवि के भीतर दबे हुए अतीत की स्मृतियाँ पुनः जाग उठती हैं।

कवि के मन की यह वेदना केवल भीतर तक सीमित नहीं रहती। वह कहता है कि उसकी अपनी ही प्रतिध्वनि शून्य आकाश से लौटकर फिर उसी के पास आती है। वह प्रतिध्वनि भी मानो उसके दुःख से व्याकुल होकर बिलखती हुई लौटती है। उसे ऐसा लगता है जैसे कोई पगली-सी प्रतिध्वनि बार-बार चक्कर काटती हुई उसके हृदय की पीड़ा को और अधिक तीव्र कर रही हो।

इसके बाद कवि अपनी चेतना को व्योम-गंगा के समान मानता है। जिस प्रकार आकाश में फैली हुई आकाशगंगा दूर-दूर तक अपने दोनों छोर फैलाए रहती है, उसी प्रकार उसकी चेतना भी अपनी पीड़ा और स्मृतियों को चारों ओर फैला रही है। उसकी चेतना की तरंगें व्यथा से व्यथित होकर भी अत्यंत कोमल ढंग से हिलोरें ले रही हैं। यहाँ कवि ने अपनी मानसिक स्थिति को प्रकृति के अत्यंत सुंदर बिंबों के माध्यम से व्यक्त किया है।

अंत में कवि बताता है कि उसके हृदय में स्मृतियों की एक पूरी बस्ती बस गई है। उसके अतीत की घटनाएँ, अनुभव और उनसे जुड़े भाव उसके हृदय में स्थायी रूप से निवास करने लगे हैं। उसका हृदय मानो एक नीला आकाश है और उसमें स्मृतियों के असंख्य तारों से बना हुआ एक पूरा नक्षत्र-लोक फैला हुआ है। अर्थात् उसके हृदय में पुरानी स्मृतियाँ असंख्य तारों की तरह चमक रही हैं। यही स्मृतियाँ उसकी वर्तमान वेदना का मूल कारण हैं।


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2. भावार्थ

कवि का हृदय करुणा और पीड़ा से भरा हुआ है। उसके भीतर अतीत की भूली-बिसरी स्मृतियाँ जाग उठी हैं। ये स्मृतियाँ उसके मन में समुद्र की लहरों की तरह बार-बार उठती हैं और उसे व्यथित करती हैं। उसकी अपनी चेतना और उसकी प्रतिध्वनि भी जैसे उसके दुःख को बार-बार दोहराती हैं। उसका मन स्मृतियों का संसार बन गया है, जिसमें अतीत की घटनाएँ नक्षत्रों की तरह बिखरी हुई हैं। इस प्रकार कवि ने स्मृति, विरह और वेदना के परस्पर संबंध को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।


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3. कठिन शब्दार्थ

शब्द अर्थ

करुणा-कलित - करुणा से भरा हुआ
विकल - व्याकुल, बेचैन
रागिनी - मधुर संगीत/राग; (यहाँ भावों की अभिव्यक्ति)
हाहाकार - अत्यधिक दुःख की चीख-पुकार
वेदना- पीड़ा, दुःख
मानस-सागर -- मनरूपी समुद्र
लोल-  चंचल, अस्थिर
घात - प्रहार, बार-बार आकर टकराना
विस्मृत-  भुलाया हुआ
क्षितिज - जहाँ आकाश और पृथ्वी मिले हुए दिखाई देते हैं
प्रतिध्वनि- किसी ध्वनि के टकराकर पुनः सुनाई देने की ध्वनि
बिलखती - दुःख से रोती हुई
व्योम - आकाश
व्योम-गंगा-  आकाशगंगा
छिटकाकर- फैलाकर
चेतना-तरंगिनि- चेतना रूपी नदी/तरंगों वाली चेतना
हिलोर- लहर का उठना-गिरना
निलय - निवास, घर
नक्षत्र-लोक-- तारों का संसार


काव्य-सौंदर्य

इस अंश की विशेषता मानवीकरण, रूपक और उपमा का सुंदर प्रयोग है। कवि ने हृदय को सागर, चेतना को तरंगिणी, आकाश को निलय और स्मृतियों को बस्ती तथा नक्षत्र-लोक के रूप में चित्रित किया है। ‘मानस-सागर’, ‘व्योम-गंगा’, ‘चेतना-तरंगिनि’ जैसे रूपक कवि की मानसिक स्थिति को दृश्य और मूर्त बना देते हैं। पूरे अंश में करुण रस की प्रधानता है और भाषा अत्यंत संगीतात्मक एवं चित्रात्मक है।

श्रद्धा सर्ग (कामायनी ) - जयशंकर प्रसाद


(कामायनी में कुल 15 सर्ग हैं-    1. चिन्ता   2. आशा 3. श्रद्धा   4. काम   5. वासना  6. लज्जा   7. कर्म   8. ईर्ष्या   9. इड़ा   10. स्वप्न   11. संघर्ष   12. निर्वेद  13. दर्शन  14. रहस्य  15. आनन्द. 

इसके तीसरे सर्ग 'श्रद्धा' में जल प्रलय से हताश और निराश मनु और श्रद्धा की भेंट का वर्णन है। श्रद्धा मनु को निराशा से उबारकर कर्म, प्रेम और सकारात्मकता का संदेश देती है तथा उनके जीवन में नई आशा का संचार करती है। श्रद्धा के इस प्रेरणास्पद सहयोग से मनु एक नई सृष्टि के आरंभ के लिए तैयार होते हैं। इस सर्ग में श्रद्धा के सौंदर्य का बहुत उत्कृष्ट वर्णन किया है.)


“कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर

तरंगों से फेंकी मणि एक,

कर रहे निर्जन का चुपचाप

प्रभा की धारा से अभिषेक!


मधुर विश्रांत और एकांत—

जगत का सुलझा हुआ रहस्य,

एक करुणामय सुंदर मौन

और चंचल मन का आलस्य!”


सुना यह मनु ने मधु-गुंजार

मधुकरी का-सा जब सानंद,

किए मुख नीचा कमल समान

प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद;


एक झिटका-सा लगा सहर्ष,

निरखने लगे लुटे-से, कौन—

गा रहा यह सुंदर संगीत?

कुतूहल रह न सका फिर मौन!


और देखा वह सुंदर दृश्य

नयन का इंद्रजाल अभिराम;

कुसुम-वैभव में लता समान

चंद्रिका से लिपटा घन श्याम।


हृदय की अनुकृति बाह्य उदार

एक लंबी काया, उन्मुक्त;

मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल

सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।


मसृण गांधार देश के, नील

रोम वाले मेघों के चर्म,

ढँक रहे थे उसका वपु कांत

बन रहा था वह कोम वर्म।


नील परिधान बीच सुकुमार

खुल रहा मृदुल अधखुला अंग;

खिला हो ज्यों बिजली का फूल

मेघ-बन बीच गुलाबी रंग।


आह! वह मुख! पश्चिम के व्योम—

बीच जब घिरते हों घन श्याम;

अरुण रवि-मंडल उनको भेद

दिखाई देता हो छविधाम।


या कि, नव इंद्र नील लघु शृंग

फोड़ कर धधक रही हो कांत;

एक लघु ज्वालामुखी अचेत

माधवी रजनी में अश्रांत।


घिर रहे थे घुँघराले बाल

अंस अवलंबित मुख के पास;

नील घन-शावक से सुकुमार

सुधा भरने को विधु के पास।


और उस मुख पर वह मुस्क्यान!

रक्त किसलय पर ले विश्राम

अरुण की एक किरण अम्लान

अधिक अलसाई हो अभिराम।


नित्य यौवन छवि से ही दीप्त

विश्व की करुण कामना मूर्ति;

स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण

प्रकट करती ज्यों जड़ से स्फूर्ति।


उषा की पहिली लेखा कांत,

माधुरी से भींगी भर मोद;

मद भरी जैसे उठे सलज्ज

भोर की तारक द्युति की गोद।


कुसुम कानन-अंचल में मंद

पवन प्रेरित सौरभ साकार,

रचित परमाणु पराग शरीर

खड़ा हो ले मधु का आधार।


और पड़ती हो उस पर शुभ्र

नवल मधु-राका मन की साध;

हँसी का मद विह्वल प्रतिबिंब

मधुरिमा खेला सदृश अबाध।


कहा मनु ने, “नभ धरणी बीच

बना जीवन रहस्य निरुपाय;

एक उल्का-सा जलता भ्रांत,

शून्य में फिरता हूँ असहाय।


शैल निर्झर न बना हतभाग्य

गल नहीं सका जो कि हिम-खंड,

दौड़कर मिला न जलनिधि अंक

आह वैसा ही हूँ पाषंड।


पहेली-सा जीवन है व्यस्त

उसे सुलझाने का अभिमान,

बताता है विस्मृति का मार्ग

चल रहा हूँ बन कर अनजान।


भूलता ही जाता दिन-रात

सजल अभिलाषा कलित अतीत;

बढ़ रहा तिमिर गर्भ में नित्य,

दीन जीवन का यह संगीत।


क्या कहूँ, क्या कहूँ मैं उद्भ्रांत?

विवर में नील गगन के आज,

वायु की झटकी एक तरंग,

शून्यता का उजड़ा-सा राज।


एक विस्मृति का स्तूप अचेत,

ज्योति का धुँधला-सा प्रतिबिंब;

और जड़ता की जीवन राशि

सफलता का संकलित विलंब।


“कौन हो तुम वसंत के दूत?

विरस पतझड़ में अति सुकुमार!

घन तिमिर में चपला की रेख,

तपन में शीतल मंद बयार।


नखत की आशा किरण समान,

हृदय की कोमल कवि की कांत—

कल्पना की लघु लहरी दिव्य

कर रही मानस हलचल शांत!”


लगा कहने आगंतुक व्यक्ति

मिटाता उत्कंठा सविशेष;

दे रहा हो कोकिल सानंद

सुमन को ज्यों मधुमय संदेश:


“भरा था मन में नव उत्साह

सीख लूँ ललित कला का ज्ञान

इधर रह गंधर्वों के देश

पिता की हूँ प्यारी संतान।


घूमने का मेरा अभ्यास,

बढ़ा था मुक्त व्योम-तल नित्य;

कुतूहल खोज रहा था व्यस्त

हृदय सत्ता का सुंदर सत्य।


दृष्टि जब जाती हिम-गिरि ओर

प्रश्न करता मन अधिक अधीर,

धरा की यह सिकुड़न भयभीत

आह कैसी है? क्या है पीर?


मधुरिमा में अपनी ही मौन,

एक सोया संदेश महान,

सजग हो करता था संकेत;

चेतना मचल उठी अनजान।


बढ़ा मन और चले ये पैर,

शैल मालाओं का शृंगार;

आँख की भूख मिटी यह देख

आह कितना सुंदर संभार!



एक दिन सहसा सुंधु अपार

लगा टकराने नग तल क्षुब्ध;

अकेला यह जीवन निरुपाय

आज तक घूम रहा विश्रब्ध।


यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न,

भूत-हित-रत किसका यह दान!

इधर कोई है अभी सजीव

हुआ ऐसा मन में अनुमान।


तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत?

वेदना का यह कैसा वेग?

आह! तुम कितने अधिक हताश

बताओ यह कैसा उद्वेग!


हृदय में क्या है नहीं अधीर,

लालसा जीवन की निश्शेष?

कर रहा वंचित कहीं न त्याग

तुम्हें, मन में धर सुंदर वेश!


दु:ख के डर से तुम अज्ञात

जटिलताओं का कर अनुमान,

काम से झिझक रहे हो आज,

भविष्यत् से बन कर अनजान।


कर रही लीलामय आनंद,

महा चिति सजग हुई सी व्यक्त,

विश्व का उन्मीलन अभिराम

इसी में सब होते अनुरक्त।


काम मंगल से मंडित श्रेय

स्वर्ग, इच्छा का है परिणाम;

तिरस्कृत कर उसको तुम भूल

बनाते हो असफल भवधाम।


“दु:ख की पिछली रजनी बीच

विकसता सुख का नवल प्रभात;

एक परदा यह झीना नील

छिपाए है जिसमें सुख गात।


जिसे तुम समझे हो अभिशाप,

जगत की ज्वालाओं का मूल;

ईश का वह रहस्य वरदान,

कभी मत इसको जाओ भूल।


विषमता की पीड़ा से व्यस्त

हो रहा स्पंदित विश्व महान;

यही दु:ख सुख विकास का सत्य

यही भूमा का मधुमय दान।


नित्य समरसता का अधिकार,

उमड़ता कारण जलधि समान;

व्यथा से नीली लहरों बीच

बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!”


लगे कहने मनु सहित विषाद:-

“मधुर मारुत से ये उच्छ्वास

अधिक उत्साह तरंग अबाध

उठाते मानस में सविलास।


किंतु जीवन कितना निरुपाय!

लिया है देख नहीं संदेह

निराशा है जिसका परिणाम

सफलता का वह कल्पित गेह।“


कहा आगंतुक ने सस्नेह:-

“अरे तुम इतने हुए अधीर!

हार बैठे जीवन का दाँव,

जीतते मर कर जिसको वीर।


तप नहीं केवल जीवन सत्य

करुण यह क्षणिक दीन अवसाद;

तरल आकांक्षा से है भरा

सो रहा आशा का आह्लाद।


प्रकृति के यौवन का शृंगार

करेंगे कभी न बासी फूल;

मिलेंगे वे जाकर अति शीघ्र

आह उत्सुक है उनकी धूल।


पुरातनता का यह निर्मोक

सहन करती न प्रकृति पल एक;

नित्य नूतनता का आनंद

किए हैं परिवर्तन में टेक।


युगों की चट्टानों पर सृष्टि

डाल पद-चिह्न चली गंभीर;

देव, गंधर्व, असुर की पंक्ति

अनुसरण करती उसे अधीर।


“एक तुम, यह विस्तृत भू-खंड

प्रकृति वैभव से भरा अमंद;

कर्म का भोग, भोग का कर्म

यही जड़ का चेतन आनंद।


अकेले तुम कैसे असहाय

यजन कर सकते? तुच्छ विचार!

तपस्वी! आकर्षण से हीन

कर सके नहीं आत्म विस्तार।


दब रहे हो अपने ही बोझ

खोजते भी न कहीं अवलंब;

तुम्हारा सहचर बन कर क्या न

उऋण होऊँ मैं बिना विलंब?


समर्पण लो सेवा का सार

सजल संसृति का यह पतवार,

आज से यह जीवन उत्सर्ग

इसी पद तल में विगत विकार।


दया, माया, ममता लो आज,

मधुरिमा लो, अगाध विश्वास;

हमारा हृदय रत्न निधि स्वच्छ

तुम्हारे लिए खुला है पास।


बनो संसृति के मूल रहस्य

तुम्हीं से फैलेगी वह बेल;

विश्व भर सौरभ से भर जाए

सुमन खेलो सुंदर खेल।


“और यह क्या तुम सुनते नहीं

विधाता का मंगल वरदान—

‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो,

विश्व में गूँज रहा जय गान।


“डरो मत अरे अमृत संतान

अग्रसर है मंगलमय वृद्धि;

पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र

खिंची आवेगी सकल समृद्धि।


देव-असफलताओं का ध्वंस

प्रचुर उपकरण जुटाकर आज;

पड़ा है बन मानव संपत्ति

पूर्ण हो मन का चेतन राज।


चेतना का सुंदर इतिहास

अखिल मानव भावों का सत्य;

विश्व के हृदय-पटल पर दिव्य

अक्षरों से अंकित हो नित्य।


विधाता की कल्याणी सृष्टि

सफल हो इस भूतल पर पूर्ण;

पटें सागर, बिखरें ग्रह-पुंज

और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।


उन्हें चिंगारी सदृश सदर्प

कुचलती रहे खड़ी सानंद;

आज से मानवता की कीर्ति

अनिल, भू, जल में रहे न बंद।


जलधि में फूटें कितने उत्स

द्वीप, कच्छप डूबें-उतराएँ;

किंतु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति

अभ्युदय का कर रही उपाय।


विश्व की दुर्बलता बल बने,

पराजय का बढ़ता व्यापार

हँसाता रहे उसे सविलास

शक्ति का क्रीड़ामय संचार।


शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त

विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;

समन्वय उसका करें समस्त

विजयिनी मानवता हो जाए।


सोमवार, 28 अगस्त 2023

जयशंकर प्रसाद की दो कविताएं (गीत)

1. हिमाद्रि तुंग शृंग से

हिमाद्रि तुंग शृंग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती–
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला
स्वतंत्रता पुकारती–

‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!’

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ
विकीर्ण दिव्यदाह-सी,
सपूत मातृभूमि के–
रुको न शूर साहसी!

अराति सैन्य–सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो, जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो!



2. अरुण यह मधुमय देश हमारा।


अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।।
लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।।
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा।।
हेम कुम्भ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मंदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनी भर तारा।।


#KathaVarta की प्रस्तुति, बी ए तृतीय सेमस्टर के पाठ्यक्रम में सम्मिलित.

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

विद्यापति के पाँच पद

राधा की वन्दना


देख-देख राधा रूप अपार।
अपुरूब के बिहि आनि मिलाओल, खिति-तल लावनि-सार॥
अंगहि अंग-अनंग मुरछायत, हेरए पडए अथीर॥
मनमथ कोटि-मथन करू जे जन, से हेरि महि-मधि गीर॥
कत कत लखिमी चरन-तल ने ओछ, रंगिन हेरि विभोरि॥
करू अभिलाख मनहि पद पंकज, अहनिसि कोर अगोरि॥


विद्यापति


श्रीकृष्ण प्रेम

जहं-जहं पग जुग धरई। तहिं-तहिं सरोरूह झरई।

जहं-जहं झलकत अंग। तहिं-तहिं बिजुरि तरंग।।

कि हेरल अपरुब गोरि। पैठलि हियमधि मोरि।।

जहं-जहं नयन बिकास। तहिं-तहिं कमल प्रकाश।।

जहं लहु हास संचार। तहिं-तहिं अमिय बिकार।।

जहं-जहं कुटिल कटाख। ततहिं मदन सर लाख।।

हेरइत से धनि थोर। अब तिन भुवन अगोर।।

पुनु किए दरसन पाब। अब मोहे इत दुख जाब।।

विद्यापति कह जानि। तुअ गुन देहब आनि।।


राधा का प्रेम


ए सखि पेखलि एक अपरूप। सुनइत मानबि सपन सरूप।।

कमल जुगल पर चांदक माला। तापर उपजत तरुन तमाला।।

तापर बेढ़लि बीजुरि लता। कालिंदी तट धीरे चलि जाता।।

साखा सिखर सुधाकर पाति। ताहि नब पल्लव अरुनक भांति।।

बिमल बिंबफल जुगल विकास। थापर कीर थीर करू बास॥

थापर चंचल खंजन-जोर।  तापर सांपिनी झापल मोर।।

ए सखि रंगिनि कहल निसान। हेरइत पुनि मोर हरल गेआन।।

कवि विद्यापति एह रस भान। सपुरुख मरम तुहुं भल जान।।



(4)


सैसव जौबन दुहु मिली गेल। स्रवन क पाठ दुः लोचन लेल॥

वचनक चातुरि लहु-लहु हास। धरनिए चाँद कएल परगास॥

मुकुर हाथ लए करए सिंगार। सखी पूछए कइसे सुरत-बिहार॥

निरजन उरज हेरए कत बेरि।बिहंसए अपन पयोधर हेरि॥
पहिलें बदरि समपुनि नवरंग। दिन-दिन अनंग अगोरल अंग॥
माधव पेखल अपरुब बाला। सईसव जौबन दुहु एक भेला॥
भनई विद्यापति हे अगेयानी। दुहु एक जोग के कह सेयानी॥
(5)

सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोए।
से पिरिति अनुराग बखानिअ, तिल-तिल नूतन होए॥
जनम अबधि हम रूप निहारल, नयन न तिरपित भेल॥
सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल, स्रुति पथ परसन गेल॥
कत मधु-जामिनि राभास गमाओलि, न बूझल कइसन केलि॥
लाख लाख जुगहिअ-हिअराखल, तइओहि अजर निन गेल॥
कत बिदगध जनरस अनुमोदए, अनुभव काहु न पेख॥
विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते, लाखे न मीलल एक॥




गुरुवार, 24 नवंबर 2022

त्रिलोचन की ग्यारह कविताएं

 (1)

ताप के ताए हुए दिन

 

ताप के ताए हुए दिन ये
क्षण के लघु मान से
मौन नपा किए ।

चौंध के अक्षर
पल्लव-पल्लव के उर में
चुपचाप छपा किए ।

कोमलता के सुकोमल प्राण
यहाँ उपताप में
नित्य तपा किए ।

क्या मिला-क्या मिला
जो भटके-अटके
फिर मंगल-मंत्र जपा किए ।

 

(2)

अन्तर

 

तुलसी और त्रिलोचन में अन्तर जो झलके

वे कालान्तर के कारण हैं । देश वही है,

लेकिन तुलसी ने जब-जब जो बात कही है,

उसे समझना होगा सन्दर्भों में कल के।

वह कल, कब का बीत चुका है .. आँखें मल के

ज़रा देखिए, इस घेरे से कहीं निकल के,

पहली स्वरधारा साँसों में कहाँ रही है;

धीरे-धीरे इधर से किधर आज बही है।

क्या इस घटना पर आँसू ही आँसू ही ढलके।


और त्रिलोचन के सन्दर्भों का पहनावा

युग ही समझे, तुलसी को भी नहीं सजेगा,

सुखद हास्यरस हो जाएगा। जीवन अब का

फुटकर मेल दिखाकर भी कुछ और बनावा

रखता है। अब बाज पुराना नहीं बजेगा

उसके मन का। मान चाहिए, सबको सबका।

 

(3)

फिर न हारा

 

मैं तुम्हारा

बन गया तो

फिर न हारा


आँख तक कर

फिरी थक कर

डाल का फल

गिरा पक कर

वर्ण दृग को

स्पर्श कर को

स्वाद मुख को

हुआ प्यारा ।


फूल फूला

मैं न भूला

गंध-वर्णों

का बगूला

उठा करता

गिरा करता

फिरा करता

नित्य न्यारा ।

 

(4)

जलरुद्ध दूब

 

मौन के सागर में

गहरे गहरे

निशिवासर डूब रहा हूँ


जीवन की

जो उपाधियाँ हैं

उनसे मन ही मन ऊब रहा हूँ


हो गया ख़ाना ख़राब कहीं

तो कहीं

कुछ में कुछ ख़ूब रहा हूँ


बाढ़ में जो

कहीं न जा सकी

जलरुद्ध रही वही दूब रहा हूँ ।

 

(5)

सहस्रदल कमल

 

जब तक यह पृथ्वी रसवती है

और

जब तक सूर्य की प्रदक्षिणा में लग्न है,

तब तक आकाश में

उमड़ते रहेंगे बादल मंडल बाँध कर;

जीवन ही जीवन

बरसा करेगा देशों में, दिशाओं में;

दौड़ेगा प्रवाह

इस ओर उस ओर चारों ओर;

नयन देखेंगे

जीवन के अंकुरों को

उठ कर अभिवादन करते प्रभात काल का ।

बाढ़ में

आँखो के आँसू बहा करेंगे,

किन्तु जल थिराने पर,

कमल भी खिलेंगे

सहस्रदल ।

 

(6)

पाहुन

बना बना कर चित्र सलौने
यह सूना आकाश सजाया
राग दिखाया
क्षण-क्षण छवि में चित्त चुराया
बादल चले गए वे

आसमान जब नीला-नीला
एक रंग रस श्याम सजीला
धरती पीली हरी रसीली
शिशिर -प्रभात समुज्ज्वल गीला
बादल चले गए वे

दो दिन दुःख का दो दिन सुख का
दुःख सुख दोनों संगी जग में
कभी हास है अभी अश्रु हैं
जीवन नवल तरंगी जग में
बादल चले गए वे
दो दिन पाहुन जैसे रह कर ।

 

(7)

यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमने


यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गाँठ लगा दी !

था पथ पर मैं भूला-भूला
फूल उपेक्षित कोई फूला
जाने कौन लहर थी उस दिन
तुमने अपनी याद जगा दी ।

कभी कभी यूँ हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूँज किसी उर में उठती है
तुमने वही धार उमगा दी ।

जड़ता है जीवन की पीड़ा
निस्-तरँग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने अन्जाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी ।

 

(8)

तुलसी बाबा

 

तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुमसे सीखी

मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो।कह सकते थे तुम सब कड़वी, मीठी तीखी।

प्रखर काल की धारा पर तुम जमे हुए हो।

और वृक्ष गिर गए मगर तुम थमे हुए हो।

कभी राम से अपना कुछ भी नहीं दुराया,

देखा, तुम उन के चरणों पर नमे हुए हो।

विश्व बदर था हाथ तुम्हारे उक्त फुराया,

तेज तुम्हारा था कि अमंगल वृक्ष झुराया,

मंगल का तरु उगा; देख कर उसकी छाया,

विघ्न विपद के घन सरके, मुँह नहीं चुराया।

आठों पहर राम के रहे, राम गुन गाया।

यज्ञ रहा, तप रहा तुम्हारा जीवन भू पर।

भक्त हुए, उठ गए राम से भी, यों ऊपर ।

 

(9)

भाषा की लहरें

 

भाषाओं के अगम समुद्रों का अवगाहन
मैंने किया। मुझे मानव–जीवन की माया
सदा मुग्ध करती है, अहोरात्र आवाहन

सुन सुनकर धाया–धूपा, मन में भर लाया
ध्यान एक से एक अनोखे। सबकुछ पाया
शब्दों में, देखा सबकुछ ध्वनि–रूप हो गया।
मेघों ने आकाश घेरकर जी भर गाया।
मुद्रा, चेष्टा, भाव, वेग, तत्काल खो गया,
जीवन की शैय्या पर आकर मरण सो गया।

सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ भाषा ।
भाषा की अंजुली से मानव हृदय टो गया
कवि मानव का, जगा नया नूतन अभिलाषा।

भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है,
ध्वनि में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है

 

(10)

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती

 

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं।

चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गाय भैंसे रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है

चम्पा अच्छी है
चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी कभी ऊधम करती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ - अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ

चम्पा कहती है:
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है

उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढूंगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ूँगी

मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!

चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा,
हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता में कभी न जाने दूँगी

कलकत्ते पर बजर गिरे।

 

 

(11)

सॉनेट पथ

 

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा;
सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट, सॉनेट; क्या कर डाला
यह उस ने भी अजब तमाशा। मन की माला
गले डाल ली। इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा

अधिक नहीं है, कसे कसाए भाव अनूठे
ऐसे आएँ जैसे क़िला आगरा में जो
नग है, दिखलाता है पूरे ताजमहल को;
गेय रहे, एकान्विति हो। उस ने तो झूठे
ठाटबाट बाँधे हैं। चीज़ किराए की है।
स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन की वाणी
वर्ड्सवर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी
स्वर-धारा है, उस ने नई चीज़ क्या दी है।

सॉनेट से मजाक़ भी उसने खूब किया है,

जहाँ तहाँ कुछ रंग व्यंग्य का छिड़क दिया है।


त्रिलोचन


(त्रिलोचन (1917-2007ई0) प्रगतिवादी कवियों की त्रयी के प्रधान कवि हैं। त्रयी के अन्य स्तम्भ हैं- नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल। त्रिलोचन शास्त्री का असली नाम वासुदेव सिंह था। वह हिन्दी कविता में सोनेट के जन्मदाता माने जाते हैं। उन्होने अपनी कविताओं में कई प्रयोग किए हैं। गुलाब और बुलबुल, ताप के ताए हुए दिन,  उस जनपद का कवि हूँ उनके चर्चित कविता संकलन हैं। यहाँ त्रिलोचन की ग्यारह कवितायें दी गयी हैं। इनमें से प्रारम्भिक पाँच कवितायें छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के बी ए तृतीय वर्ष के पाठ्यक्रम में भी हैं। शेष कवितायें त्रिलोचन के विविध रूप का निदर्शन कराती हैं। - सम्पादक)

सद्य: आलोकित!

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