मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

रस आखेटक : ललित निबन्ध का रम्य दारुण स्वर



          निबंध को आचार्य शुक्ल ने ‘गद्य की कसौटी’ कहा है। हिन्दी में निबंध लेखन भारतेंदु युग से शुरू हो गया था। गद्य के आरंभिक प्रयोगों की दृष्टि से यही उपयुक्त भी था। अपने आरंभिक समय में जो निबंध लिखे गए उनमें मनमौजीपन और वैचारिकता का अद्भुत संयोग दिखता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निबंधों को एक मानक रूप दिया। प्रसिद्ध निबंध संग्रह चिन्तामणि में उन्होंने अपने निबंधों कोअंतर्यात्रा में पड़ने वाले प्रदेश’ कहा है और बुद्धि तथा हृदय का मणिकांचन योग बनाया है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसके इतर लालित्य को प्रमुखता दी। द्विवेदी जी के समय तक निबंध के स्वरुप और आंतरिक बुनावट कुछ इस तरह प्रतिमानीकृत हो चुके थे कि उनमें ज्यादा प्रयोग की गुंजाईश नहीं के बराबर रही। लेकिन ललित निबंधों के इस ठस हो चुके स्वरुप के बावजूद बीते दशक में निबंध को अपने लेखन की मुख्य विधा बनाने वाले कुबेरनाथ राय के निबंधों को मुक्त कंठ से सराहा गया है। उनके निबंधों में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का सा लालित्य और स्वअर्जित पाण्डित्य एक साथ आया है। यद्यपि कुबेरनाथ राय के निबंधों को पाण्डित्य के आतंक से भरपूर कहा गया है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने पण्डिताई को एक बोझ कहा है। लेकिन द्विवेदी जी यह भी कहते हैं कि ‘जब यह जीवन का अंग हो जाती है तो सहज हो जाती है।’ कुबेरनाथ राय के निबंधों में पाण्डित्य कुछ प्रयत्न मात्र से सहज हो जाता है। यहाँ मैं कुबेरनाथ राय के एक निबंध संग्रह ‘रस-आखेटक’ के बहाने अपनी कुछ बातें रखने की कोशिश करूंगा।
कुबेरनाथ राय ने अपने निबंधों को क्रुद्ध-ललित स्वभाव वाला निबंध कहा है। वे स्वयं को तमोगुणी वैष्णव कहते हैं और उनके मत में “मेरा सम्पूर्ण साहित्य या तो क्रोध हैनहीं तो अन्तर का हाहाकार।” उन्होंने अपने क्रोध को सारे हिन्दुस्तान के क्रोध से जोड़ने की हिमायत की है। क्रोध वैसे तो सुनने में आक्रान्त करता हैलेकिन रस दृष्टि से यह वीरता का अनुषंगी है। और इस तरह से यह व्यापक सरोकार वाला साहित्य बन जाता है। उन्होंने स्वयं को वैष्णव कहा है। तमोगुणी वैष्णव। उनका मानना है- “तुलसीदास और समर्थ गुरु रामदास को छोड़कर और किसी वैष्णव के मन में यह बात नहीं आई कि विनयअभिमानहीनता और समर्पण भाव के साथ-साथ वीरता भी जरूरी है। बिना वीरता के विनय दीनता का प्रतीक है। और इसी विनय ने चाटुकारिता कोइसी शुद्धता ने मानव निरपेक्ष व्यक्तिवाद कोइसी सात्विकता ने अज्ञान को हमारे नैतिक और व्यावहारिक जीवन में प्रवेश कराया है। भारतीय जाति का चरित्र दूषित हो गया है।” (तमोगुणीपृष्ठ- १३८) ऐसे में जब वे अपने साहित्य को क्रोध कहते हैं तो उनके सरोकार को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। वे भारतीय चरित्र में शुचिता-पवित्रता के समर्थक हैं लेकिन गौरव के साथ। उनके इस इसरार को तुलसीदास और निराला की परंपरा में देखा जाना चाहिए।
कुबेरनाथ राय के निबंधों में पण्डिताई कूट-कूट कर भरी हुई है। उनके अध्ययन का दायरा बहुत व्यापक है। उनके निबंधों में भारतीय और पाश्चात्यदोनों सन्दर्भ खूब आते हैं। भारतीय पौराणिकता का पूरा सम्मान करते हुए अपने बहाव में वे वेदउपनिषद्पुराण और लौकिक साहित्य से उद्धरण और उदाहरण देते चलते हैं। उनकी प्रस्तुति इस उदाहरणों में उदात्तता से भरपूर होती है। वे भारतीय संस्कृति के उन मौलिक तत्त्वों की ओर लगातार संकेत करते चलते हैंजिन्हें हमने अपने क्षुद्र स्वार्थों और जीवन की जटिलताओं से घबराकर सरलीकृत कर लिया है। वे अपने सभी निबंधों में उस तंतु को छूने की कोशिश करते हैंजिसका एक सिरा व्यापक मानवीयता से जुड़ा हुआ है। कई बार उनके भारतीय साहित्य के ज्ञान पर आश्चर्य हो उठता है। वे एक साथ ही प्राचीन और नवीन को एक जगह ले आकर प्रतिष्ठित कर देते हैं। उनके सभी निबंधों में इसे देखा जा सकता है। वे कई बार अपने बहाव में विदेशी साहित्य के उद्धरण भी ले आते हैं। हरी हरी दूब और लाचार क्रोध में इसे देखा जा सकता हैजब वे संस्कृत के एक श्लोक के साथ तुलसीकबीर और वाल्ट व्हिटमैन की कवितायेँ भी उद्धृत करते हैं। वे इसी के साथ असमिया लोकगीत को भी ले आते हैं। यह उनके निबंधों में विविधता का परिचायक भी है।
कुबेरनाथ राय बहुपठित और बहुश्रुत व्यक्तित्व के धनी हैं। रस-आखेटक में ही उन्होंने होमरवर्जिल और शेक्सपियर के मोनोलॉग रखे हैं। कुछ अन्य के विषय में लिखने की सूचना भी दी है। पाश्चात्य साहित्य पर उनका आधिपत्य इसलिए भी संभव हुआ कि वे अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर थे। भारतीय वांगमय पर उनका अधिकार है ही। वे असमिया संस्कृति से भी गहरे प्रभावित हैं। कोलकिरात और आदिवासी जीवन में उनकी गहरी रुचि है। असमिया संस्कृति से उनका लगाव अक्सर निबंधों में परिलक्षित होता है। वे वहां के लोकगीतोंलोक परम्पराओं से न सिर्फ परिचित हैंअपितु गहरे अनुरक्त हैं। उनकी यह अनुरक्ति भूपेन हजारिका के स्वर में गाये एक गीत को मार्मिक अंदाज में परोसने से देखी जा सकती है। प्राकृत और अपभ्रंश के साहित्य से वे न सिर्फ उद्धरण देते चलते हैंअपितु उनकी सूक्ष्म व्याख्या करते हुए अपनी बात को पुष्ट करते हैं। उनका सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन भी व्यापक है। वे अपने एक निबंध जम्बुक में यामिनी राय के हवाले से एक कथन रखते हैं- “यामिनी राय की इस उक्ति में बहुत कुछ सार है कि संस्कृति के हिसाब से ‘विश्व को मात्र दो भागों में बांटा जा सकता है : भारतीय और अभारतीय।” (जम्बुकपृष्ठ- १३१) वे अक्सर अपनी बात को पुष्ट करने के लिए सुनीति कुमार चाटुर्ज्यायामिनी रायनिहाररंजन रेताराशंकर बनर्जी आदि का उल्लेख करते चलते हैं। उनके निबंध न सिर्फ साहित्यिक अपितु सांस्कृतिक दृष्टि से भी मूल्यवान बन पड़े हैं।
कुबेरनाथ राय के निबंधों में यह पाण्डित्य न सिर्फ उद्धरणों में दीखता है बल्कि विचारों की प्रस्तुति में भी झलकता है। जब वे अपनी बात मनवाने के लिए लगातार सरणियाँ देते रहते हैं तो उन्हें समझने के लिए ठहरना पड़ता है। उनके विचार-प्रवाह में एक अजीब तीव्रता है। वह कई बार बहा ले जाता है। हम बहते चले जाते हैं। फिर उसे ठीक से समझने के लिए किंचित अवकाश मांगते हैं। यह किंचित अवकाश ही सम्भवतः पण्डिताई के बोझ बनने से उबरने का अवकाश है। यद्यपि कुबेरनाथ राय लगातार इस कोशिश में रहते हैं कि चीजों को बहुत सहजता से परोसा जाय। जब वे इसकी कोशिश करते हैंतब उनकी भाषा बहुत सहज और लहजा एकदम नरम हो जाता है। हमें उनकी बाते सहजता से समझ में आती भी हैं। फिर उनका विद्वान मानस हुंकार भरता निकलता है और वे तीव्रता के आवेग में तत्समबहुल शब्दों को ठेलते हुए बढ़ते जाते हैं। कुबेरनाथ राय के यहाँ प्राचीन को नए अर्थों में सहेजने की कोशिश झलकती है। वे पुराकथाओं को नए संदर्भो में समझने की वकालत करते हैं। रसोपनिषद के सभी उपांगों में इसी पर जोर है। कर्म पारिजात में वे अपने ही अंदाज में व्याख्या करते हैं। उनके ही शब्द हैं- “तब सबको सुव्यवस्थित करके नारदजी का साहित्यिक हिन्दी में भाषण हुआ- ‘यादवोंपारिजात नकली नहींअसली ही है। परन्तु इस धरती पर आकर इसका प्राण-धर्म बदल गया है। धरती की माया हैजन्मप्रणय और मृत्यु। सो इस माया का प्रवेश इस स्वर्ग पारिजात में भी धरती की जलवायु में आते-आते हो गया।..... धरती कर्मभूमि है और देवलोक भोगभूमि। भोगभूमि में कल्पवृक्ष बिना किसी विशेष प्रयत्न के अपने आप बढ़ता हैफूलता है और मुरझाता नहीं। परन्तु धरती पर तो इसे आलबाल बनाकर पानी देना होगासमय समय पर गोड़ना होगा। तब यह हरा-भरा रहेगा। इसे गहगहा कुसुमित और हराभरा रखना है तो करमजल से इसे सिंचित करो-धरती के धर्म का निर्वाह करो। यहाँ पर आकर पारिजात अपने स्वभाव के अनुरूप ढाल चुका है। विष्णु भी जब धरती पर अवतार लेते हैं तो यहाँ के स्वभाव के अनुरूप अपने को ढाल लेते हैंतो यह तो महज एक पुष्प वृक्ष है। वे भगवान भी जन्म लेते हैंतो प्रणय करते हैंराज-काज करते हैंअपनी खेती-बारीमर-मुकदमालड़ाई-झगड़ा सँभालते हैं।”(रसोपनिषदपृष्ठ- २९-३०) यह उनका अपना ही मनमौजीपन वाला अंदाज है। हिन्दी निबंधों में यह अंदाज अनूठा है। यह सिर्फ और सिर्फ कुबेरनाथ राय की विशिष्टता है।
उनके निबंधों में मनमौजीपन का आलम यह है कि निबंध कहीं से भी शुरू हो सकता है। एक बेहद रोचक प्रसंग से जैसा कि रस-आखेटक का हुआ हैअथवा तृषा-तृषा! अमृत तृषा! का। रस-आखेटक में यह एक बचपन के प्रसंग से शुरू होता है। “पिताजी ने बचपन में मुझसे एक बार पूछा था : “आगे चलकर क्या बनना चाहते हो?” मैंने कह दिया, “मैं संन्यासी बनना चाहता हूँ।” (रस-आखेटकपृष्ठ- ३१) तृषा-तृषा! अमृत तृषा! में भी बचपन का ही एक प्रसंग है। देह वल्कल में यह ग्रामीण संस्कारों से शुरू होता है। जन्मान्तर के धूम्र सोपान में यह एक भावपूर्ण कथन से खुलता है। कुबेरनाथ राय के निबंध ललित निबंधों की उस प्रवृत्ति के संवाहक हैंजिसमें यह कहा गया है कि निबंधों का शीर्षक तो एक बहाना मात्र है। असली मकसद तो अपनी उन्मुक्त भावनाओं को अपने ही अंदाज में प्रस्तुत करना है। अपने विचारों को व्यवस्थित तरीके से रखते जाना है। कुबेरनाथ राय यह बखूबी करते जाते हैं। वे गंभीर से गंभीर प्रसंगों में अपने मनमौजीपन से ऐसा ह्यूमर पैदा करते हैं कि समूचा प्रसंग मिश्री की तरह गल जाता है। सारी कठोरता एक मधुर अहसास से रससिक्त हो जाती है। देह वल्कल में उनके सूक्ष्म पर्यवेक्षण और विवेचन के बीच-बीच में खिलंदड़ापन उनके मनमौजीपन को बखूबी व्यक्त करता है।
कुबेरनाथ राय के निबंधों में मनमौजीपन तो झलकता ही हैहास्य-व्यंग्य की छटा भी मिलती है। वे खुद को समेट कर व्यंग्यवाण छोड़ते हैं। वे अपनी वस्तुस्थिति को यत्र-तत्र बताते चलते हैं। अपने एक निबंध ‘जम्बुक’ में वे खुद को रवीन्द्रनाथ ठाकुर का डोम संस्करण कहते हैं। वे लिखते हैं- “वे मुझे रवीन्द्रनाथ का डोम संस्करण कहते हैं। मुझे जम्बुकनाद में रम्य दारुण स्वाद मिलता हैतो इसलिए नहीं कि मैं एक ‘एबनॉर्मल’ प्राणी हूँबल्कि इसलिए कि उदास-दारुण-क्रूर के भीतर भी रस की कोई बूँद विधाता ने भूले-भटके छोड़ दी हैनिरर्थक के भीतर भी एक बूँद अर्थ-विधि की भूल चूक से छूट गया है और मैं उस बूँद को निचोड़कर पा जाना चाहता हूँऔर इस रूप-रस-गंध की सृष्टि में अन्त्यज होने की वजह से मुसहर-डोम या ब्याध के देश में विचरण कर रहा हूँ।” (जम्बुक- पृष्ठ- १२९) वे इसी निबंध में द्विवेदीयुगीन साहित्य और छायावाद के साहित्य पर भी एक टीप लगाते हुए आगे बढ़ते हैं- “जो भूधर हैं-द्विवेदीयुगीन हैं अथवा जो नाजुक हैं,- ‘पल्लव’ छाप हैंवे इस रस को क्या जानेंगे कि अमावस्या रुपी भैरवी के आवरण में पूर्णिमा रूपिणी त्रिपुरसुंदरी ही कृष्णाभिसारिका बनती है।” (पृष्ठ- १२९) कुबेरनाथ राय के निबंधों में यह हास्य-व्यंग्य का पुट उनके पण्डिताई वाले आक्रांत को कम करता है और सहज बनाता है। हास्य का आलम यह है कि कई बार यह स्मित मुस्कान में तो कभी अट्टहास में प्रकट होता है।
पण्डिताई के इस समूचे आयोजन में कुबेरनाथ राय के निबंधों की एक विशेषता लोक के प्रति उनके गहरे लगाव में भी परिलक्षित होती है।उनके सभी निबंधों में यह लोक मौजूद है। अपने शुद्ध गवईं रूप में। वे ग्रामीण जीवन के अद्भुत चितेरे हैं। उनका वैष्णव मानस ग्रामीण संस्कृति में खूब रमता है। ग्रामीण संस्कृति में भी वे दलित-उपेक्षितों के साथ एक विशिष्ट आभिजात्यता के साथ मौजूद हैं। वे अपने निबंधों में ग्रामीण जीवन को आंकते चलते हैं। रस-आखेटक में वे एक जगह लिखते हैं- “इस स्थल पर रस-आखेटक को अपने गाँव के चमारों का ग्रीष्मकालीन भोजन याद आ जाता है। लोग शायद विश्वास न करें। चैत में खलिहान में दांय (दँवरी) करते समय पशुओं के गोबर में उनके निरंतर अन्न खाते रहने से कुछ अन्न अनपचा रह जाता है। यह अन्न ये चमार गोबर में से बीन लेते हैं और इसे धोकर-सुखाकर गर्मी के बेकारी के दिनों में इसे खाते रहते हैं। समस्त पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह होता है। रस-आखेटक जब यह सोचता है तो उसकी आत्मा में घाव हो जाता हैउसका घोड़ा तनकर खड़ा हो जाता हैउसके मन में क्रोध के पवित्र फूल फूटने लगते हैं।” (रस-आखेटकपृष्ठ- ३७)। लोक संस्कृति के इन विवरणों में जब वे ग्रामीण जीवन के कई लोकाचारोंमौसमफसलोंरूपरसगंध की चर्चा करते हैं तो उनका रागात्मक लगाव देखते बनता है। वे निषादोंमल्लाहोंदलित-शोषित जातियों के लोगों में रमे-घुमे दिखते हैं। उनके जीवन से रस उलीचते दिखते हैं। गाँव की चौपाल परकौड़ा तापते हुएअर्धरात्रि में तारों और निचाट अँधेरे को तलाशते हुएदुपहरी के हंकड़ते सूरज के प्रसंगों में उन्होंने मन लगाकर लिखा है। ग्रामीण जीवन के ऐसे प्रसंगों में उनका वैष्णव मन खूब रमा है। यह उनका सबसे प्रिय क्षेत्र है। उनके सभी निबंधों में लोक के प्रति यह जुड़ाव देखा जा सकता है। वे इन प्रसंगों की पुनर्रचना करते हुए न सिर्फ रस-आखेटक रहते हैं अपितु रस के उद्भावक भी बनते हैं। लोक उनका सबसे प्रिय विषय है। वे शास्त्रीय चिंतन के दौरान भी इस लोक को साथ रखते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी में लोक को लेकर जो राग हैकुबेरनाथ राय के यहाँ वह और भी प्रगाढ़ होकर आया है। कहा यह भी जाना चाहिए कि यह बीस बनकर आया है।
कुबेरनाथ राय के निबंधों की एक अन्य विशेषता इसके काव्यात्मक होने से है। कुबेरनाथ राय के निबंध काव्यात्मक आस्वाद से युक्त हैं। इन्हें पढ़ते हुए काव्य की सूक्ष्मताएँ देखी जा सकती हैं। इन निबंधों में भावों की उदात्तता यत्र-तत्र झलकती है। हिन्दी निबंधों में इस तरह की भावात्मक उपस्थिति अन्यत्र दुर्लभ है। प्रकृति के बारे में वे लिखते हुए जिस तरह से रमते हैंवह काव्य का सा है। ‘मृगशिरा’ के इस अंश को देखा जा सकता है- “जेठ में धरती अकेले-अकेले तपती हैपेड़-पौधे अकेले-अकेले धूप पीते हैं और पेड़ों पर आम अकेले-अकेले पकता है। दुकेले रहने पर भी मारे गर्मी के एकांत कक्ष भी तपोवन बन जाता है। आकाश में रूद्र का वृषभ हँकड़ रहा है तो सृष्टि में काम का प्रवेश कैसे होगादूध का जला मट्ठा भी फूंक-फूंककर पीता है।” (मृगशिरा – पृष्ठ- ६६) यहाँ प्रचण्ड गर्मी के वातावरण को किस भावात्मक उदात्तता से रख दिया गया हैद्रष्टव्य है। कविता ही तो है। बस संरचना गद्य की है। ललित निबंधों के ‘आचार्य’ हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध एक अन्य तरह की भाव-भंगिमा वाले हैं। वहां हम लोक और शास्त्र के द्वंद्व में जूझते रहते हैंजबकि कुबेरनाथ राय के यहाँ पाण्डित्य लोक को और भी रमणीक बनाने के लिए आता है। इस अर्थ में यह विशिष्ट है। कुबेरनाथ राय की सी प्रवाहमयता और शास्त्र और लोक में डूबने-तिरने का अनुभव अन्यत्र नहीं है। उनके यहाँ शास्त्र में गहरे डूबकर लोक के किनारे ही पहुँचना है। कई बार डूबने का भय रहता है लेकिन अगले ही क्षण निबंधकार हमें बाहर निकाल लेता है। कुबेरनाथ राय इसी कारण बड़े और अनूठे निबंधकार हैं।
कुबेरनाथ राय के निबंधों की भाषा अत्यंत सुष्ठु है। वे तत्सम शब्दों के प्रवाह में ऐसे देशज शब्द लाते हैं कि अर्थवत्ता चमक उठती है। हमारा बोझिल मन ऐसे देशज शब्द के संपर्क में आकर हरियर हो जाता है। वे गुरु-गंभीर शब्दों के बीच इसे ऐसे लाते हैं कि कलात्मकता और बढ़ जाती है। उनके तत्सम शब्द खासे कठिन और पारिभाषिक भी होते हैं। ऐसे में जो गंभीरता बनती हैवह डूबोने वाली होती है। पण्डिताई का आतंक खड़ा करती है। तब देशज शब्दों का प्रयोग न सिर्फ चमत्कृत करता है बल्कि हमें गवईं जीवन से जोड़ता है। इस स्थिति में पण्डिताई का आतंक ख़तम हो जाता है और हम रस से सिक्त महसूस करने लगते हैं। कुबेरनाथ के निबंधों की यह विशिष्टता किसी अन्य निबंधकार में नहीं। ऊपर मैंने मृगशिरा निबंध से जो उद्धरण दिया है उसमें उनके शब्द चयन को देखा जाना चाहिए- एक वाक्य है- “आकाश में रूद्र का वृषभ हँकड़ रहा है।”- रूद्र का वृषभ जैसे तत्सम पद के बाद हँकड़ना जैसी क्रिया शुद्ध देशज है। खांटी भोजपुरिया। यहाँ यह बता देना जरूरी है कि कुबेरनाथ राय के यहाँ प्रयुक्त होने वाले अधिकांश देशज शब्द भोजपुरी के हैं। पूर्वी उत्तरप्रदेश के जनमानस के शब्द। वे अंग्रेजीहिन्दीसंस्कृतअसमियाबांग्ला आदि के शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं। हाँजिस तरह से तत्समबहुल पदावली के बीच खांटी भोजपुरिया शब्दों को रखते हैंवह चमत्कार उत्पन्न करता है। कई बार यह पूरबिया संस्कृति से अपरिचित लोगों के लिए बोझिल लगता हैलेकिन वे इसे ख़ारिज करते चलते हैं। उनका यह प्रयोग उनके असाधारण शब्द सम्पदा की तरफ संकेत करता है। वे पण्डित होते हुए भी लोक के लोभ का संवरण नहीं करतेबल्कि उसे गहरे आत्मविश्वास से पेश करते हैं। यह भाषा के प्रति उनके दृष्टिकोण का भी परिचायक है।
कुबेरनाथ राय अपने निबंधों में जिस प्रवाहमयता से अपनी बात रखते हैंउसमें मुहावरेलोकोक्तियाँ और चुलबुली किन्तु गंभीर पदावली खासा सहयोग करते चलते हैं। वे कई बार अपने वाक्य बहुत छोटे-छोटे रखते हैं तो कई बार सामासिक पदों से वाक्य को लम्बा भी बना देते हैं। उनके इस छोटे-बड़े वाक्यों का संयोजन उनके लेखन के विनयी और वीर दोनों स्वभाव का निदर्शन करते हैं। लम्बे वाक्य उनके गहन चिंतन के समय में भी निकलते हैं और व्यंग्यात्मक टीप के समय भी। छोटे वाक्य तब ज्यादा आये हैंजब कथन की प्रवाहमयता तीव्र होती है। छोटे-छोटे वाक्य इस तीव्रता को और भी क्षिप्र बनाते हैं।
कुबेरनाथ राय के निबंध अपनी संरचना में बड़े हैं। इन्हें पढ़ने के लिए धैर्य चाहिए लेकिन एक बार पाठक जब उनके निबंधों के भावसागर में उतरता है तो उनकी गहराई और आनंदमयता का अहसास करता जाता है। उनके निबंध उच्च कोटि के साहित्यिक निबंध हैंजिनमें भारतीय संस्कृति रची-बसी है। वे आधुनिक युग के सबसे प्रतिभाशाली निबंधकार हैं।


(नोट- सभी उद्धरण भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कुबेरनाथ राय के संग्रह रस-आखेटक से लिए गए हैं। रस-आखेटक-कुबेरनाथ रायपहला पेपरबैक संस्करण : १९९९भारतीय ज्ञानपीठ१८ इंस्टीट्यूशनल एरियालोदी रोडनयी दिल्ली।)



बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

बासन कब धोया जाए?

      बासन कब धोया जाए?

     दुनिया के कई कठिन सवालों में से एक बड़ा सवाल है। क्या भोजनोपरांत बर्तन धो दिया जाए अथवा अगला आहार पकाने से पहले? आप क्या सोचते हैं?

 
  हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय को बासन धोने का अनुभव था। एक कविता में लिखते हैं- "कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।" लेकिन वह यह नहीं बताते कि इसे कब धोना चाहिए। अज्ञेय की एक कहानी है- रोज। पहले यह कहानी 'गैंग्रीन' के नाम से छपी थी। बहुत चर्चित हुई थी। उसमें जो लड़की है, मालती; वह प्रमुख चरित्र है कहानी में- उसने बासन माँज दिए हैं लेकिन नल का पानी चला गया है। वह अपने सहपाठी के साथ बैठी है। सहपाठी लंबे समय के बाद मिलने ही आया है। एक जमाने में घनिष्ठ रहे मित्र की उपस्थिति में भी वह बरतन धोने के विषय में सोचती रहती है। जब बूंद बूंद पानी आने लगता है, वह धोने जाती है। मुझे नहीं लगता कि हिन्दी में किसी अन्य कथाकार ने इस बुनियादी पहलू पर इतने व्यवस्थित और तफसील से कलम चलाई है।
         मेरे बचपन के दिनों में एक सीनियर मिले। वह कुछ रहस्यमयी तरीके से कहानी के अंत में स्थापना रखते थे कि खाने के बाद बर्तन धोने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। उन्होंने बताया था कि 'मैं तो ठोकर मार देता हूँ।' मेरे बालपन की वह बात मुझे अक्षरशः याद है। लेकिन मैं यह कभी नहीं कर पाया। मुझे यह कभी खयाल भी नहीं आया। मैं शायद उनकी रहस्यमयी वाणी का मर्म न जान सका। उनकी बात वैसी ही थी जैसी धर्मवीर भारती के उपन्यास 'सूरज का सातवां घोड़ा' उपन्यास में माणिक मुल्ला स्थापनाएं करता है। जब मैंने यह उपन्यास पढ़ा था तो मुझे उन सीनियर की बहुत याद आयी थी। खैर, तो बासन कब धोया जाए? मेरे घर में भी यह सवाल उठता रहता है।
       महाभारत में पांडव जब वनवास कर रहे थे तो उन्हें सूर्य द्वारा एक अक्षय पात्र मिला था।  यह ताँबे का था। कहानी में आता है कि वह पात्र खाली नहीं होता था। द्रोपदी सबको भरपेट भोजन कराने के बाद स्वयं खाती थीं। द्रोपदी के खाने के बाद वह पात्र खाली हो जाता था और अगले जून फिर से भर जाया करता। एक दिन ऋषि दुर्वासा अपने समूह सहित उधर से गुजरे। वह भूखे थे। अक्षय पात्र खाली हो चुका था। घर में राशन नहीं था। उतने बड़े समूह के लिए सुस्वादु भोजन पकाने की व्यवस्था कठिन थी। दुर्वासा बहुत क्रोधी स्वभाव के ऋषि थे। पांडव इससे परिचित थे। वह शक्ति संचयन कर रहे थे। दुर्वासा के शाप का अर्थ था- भविष्य की योजनाओं पर तुषारापात!
       कृष्ण को याद किया गया। आते ही उन्होंने ऋषि समूह को स्नानादि के लिए भेजा और अक्षय पात्र मंगवाया। द्रोपदी बहुत पहले ही भोजन कर चुकी थीं। उस पात्र में अन्न का एक कण बचा था। तो सवाल वही उठा कि वह अक्षय पात्र कब माँजा जाता था? अगर भोजनोपरांत ही माँजा जाता तो उसमें अन्न का कण न रहता। अतः दृष्टांत बन सकता है कि द्रोपदी भी भोजनोपरांत बासन नहीं धोती थीं। लेकिन वाशवेशिन में जूठन अच्छा भी तो नहीं लगता!
       तो सवाल फिर से वहीं आकर गले पड़ता है किबासन कब माँजा जाए।

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सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

उदात्त अवधारणा का पतनशील रूप - गिरीश कर्नाड का नाटक ययाति


        गिरीश कर्नाड का नाटक 'ययाति' पढ़कर उद्विग्न हूँ। बसंत पंचमी के दिन पौराणिक आख्यान पर केंद्रित इस नाटक को पढ़ने के लिए लिया था। दो अंक पढ़कर आगे पढ़ने की इच्छा नहीं हुई थी। कल रविवार को पुनः लिया और पढ़ ही लिया। देर शाम पढ़कर जैसी उद्विग्नता ने अपना पाँव पसारा, वह देर रात तक प्रभावी रहा और आज भी यदा कदा छा जाता था। 
      गिरीश कर्नाड का नाटक 'हयवदन' इससे पहले पढ़ चुका था और उसमें जो प्रयोग किया गया था, उससे परिचित था। यद्यपि उस बेहतरीन नाटक में गिरीश कर्नाड ने विवादित बनाने के लिए मसाला डाला है लेकिन उसे भी अभिनव प्रयोग माना मैंने। जैसे अच्छे खासे पौराणिक आख्यान लगने वाले हयवदन में राष्ट्रगीत, देश प्रेम आदि को लेकर चुभने वाली बातें की गयी हैं।


ययाति पढ़ते हुए मेरे मनोमस्तिष्क में ययाति की कथा थी। ययाति होना एक मानसिक सिंड्रोम है। वृद्धावस्था से सब भयभीत होते हैं और युवा बने रहना चाहते हैं। ययाति की कथा में आता है कि लंबे समय तक भोग विलास में लिप्त रहने के बाद भी सुखोपभोग की उनकी कामना तृप्त नहीं हुई थी। उन्होंने अपनी पत्नी देवयानीजो राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य की बेटी थींकी सखी शर्मिष्ठा को अपनी वासना का शिकार बनाया। एक शर्त के अनुसार शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बनकर रहना था। ययाति ने शर्मिष्ठा की सुंदरता पर मोहित होकर याचना की थी। शर्मिष्ठा के साथ वह कुछ वर्षों तक क्रीड़ामग्न रहे। जब देवयानी को पता चला तो उन्होंने शुक्राचार्य को बताया। शुक्राचार्य से ययाति को शाप दिया था कि यदि वह देवयानी के अतिरिक्त किसी के साथ संभोग करेंगे तो वह वृद्ध हो जाएंगे। शर्मिष्ठा से संबंध बनाने के क्रम में ययाति वृद्ध हो गए। लेकिन उनकी क्षुधा शमित नहीं हुई थी। अतः उन्होंने अपने पुत्रों से याचना की कि उनमें से कोई अपनी जवानी उन्हें दान कर दे और बदले में उनका बुढापा ले ले। उनके छोटे पुत्र पुरु ने ऐसा ही किया। कथा में है कि एक सहस्त्र वर्ष तक सुखोपभोग करने के बाद ययाति को ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा-

"भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव याताः तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥"

अर्थात, 'हमने भोग नहीं भुगतेबल्कि भोगों ने ही हमें भुगता हैहमने तप नहीं कियाबल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैंकाल समाप्त नहीं हुआ हम ही समाप्त हो गयेतृष्णा जीर्ण नहीं हुईपर हम ही जीर्ण हुए हैं!इस ज्ञानप्राप्ति के बाद उन्होंने पुरु को उनका वय लौटा दिया और स्वयं वैरागी हो गए।
      ययाति की चर्चा इसी परिप्रेक्ष्य में होती है कि भोग और तृष्णा कभी नहीं मरती। हमें इस सार्वभौमिक सत्य को ध्यान में रखना चाहिए। ययाति का चरित्र इस ज्ञानप्रकाश की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
  
        जब गिरीश कर्नाड का नाटक 'ययाति' हाथ में आया तो मैं हयवदन के प्रयोगों से परिचित था। इसलिए मुझे कुछ चौंकाने वाले प्रसंगों की अपेक्षा थी। इस नाटक का आरम्भ भी देवयानी और शर्मिष्ठा के इसी तरह के लगभग झोंटा-झोंटव्वल से शुरू होता है। दो सखियों का संवाद- जो कालांतर में एक शर्तवश मालकिन और दासी की भूमिका में हैं- बहुत छिछले स्तर का है। हम राजघरानों या कुलीन परिवारों के विषय में ऐसी छवि के साथ रहते हैं कि यहां विवाद भी सभ्य शब्दावली में होते हैं लेकिन देवयानी और शर्मिष्ठा का संवाद सड़क छाप मवालियों जैसा है। यह कहीं से नहीं लगता कि यह मालिक और दास का संवाद है। फिर उनके पूर्व जीवन का प्रसंग ऐसा ध्वनित होता है जैसे दोनों में समलिंगी रिश्ता रहा हो। ययाति भी एक लुच्चे राजा की तरह चित्रित हुए हैं। शर्मिष्ठा छल से उन्हें आवेष्टित करती है। इसमें प्रसंग आया है कि देवयानी को शर्मिष्ठा ने ईर्ष्यावश कुंए में धकेल दिया था। वह कुंए में पड़ी कराह रही थी कि ययाति उधर से गुजरे। उन्होंने देवयानी का दाहिना हाथ पकड़ कर बाहर खींचा। देवयानी ने कहा कि दाहिना हाथ पकड़ने के प्रभाव से आप ने मुझे अंगीकृत किया है। ययाति देवयानी को ब्याह कर ले आये। शर्मिष्ठा भी आई। दासी बनकर। नाटक में शर्मिष्ठा वही जुगत लगाती है। वह जहर खाने का उपक्रम करती है और उसे बचाने में ययाति दाहिना हाथ पकड़कर रोकते हैं। वह इसी आधार पर उनसे प्रणय निवेदन करती है। ययाति उसके साथ आबद्ध हो जाते हैं। यह जानकर देवयानी अपने पिता शुक्राचार्य के साथ चली जाती है। शाप मिलता है। उसी दिन पुरु अपनी नवविवाहिता चित्रलेखा के साथ लौटता है। चित्रलेखा ने पुरु का वरण राजसी ठाठबाट के चक्कर में किया है। वह पुरु को हीन मानती है। सब घटनाएं इस तरह पिरोई गयी हैं कि सभी पात्र छुद्र दिखने लगते हैं। पुरु ययाति का शाप ओढ़ लेता है। चित्रलेखा विषपान कर लेती है। तब ययाति पुरु को उसकी जवानी वापस कर देते हैं।
         नाटक में समयावधि को तर्कसंगत बनाने के लिए यह सब एक ही दिन में घटित होते हुए दिखाया गया है।  और ययाति इसी क्रम में ज्ञान प्राप्त करता है। यह ज्ञान भोग की पराकाष्ठा पर पहुंचने से प्राप्त ज्ञान नहीं है- यह कलह से प्राप्त ज्ञान है। -"त्याग से डरकर भोग की ओर गया पर इस अकाल यौवन से वह भी प्राप्त नहीं हो सका।" 
        इस नाटक को पढ़ते हुए बारम्बार यही ध्यान बनता रहा कि क्षुद्र मानसिकता के साथ क्या महान विचार आ सकते हैं? कदापि नहीं।
गिरीश कर्नाड इसी न्यूनता का शिकार बन गए हैं।
      नाटक की भाषा भी गजब है। जहां वैचारिक स्तर पर क्षुद्रताओं का बोलबाला है, कोई सतही और स्तरहीन बात की जा रही है वहाँ भाषा श्लिष्ट और तत्सम प्रधान है। जहां वैचारिक रूप से कोई मूल्यवान अंकन किया जा रहा है वहाँ साधारण। नाटक के आखिर में ययाति कहते हैं- "अपने किए पापों को अरण्य में व्रत करके धोना है। यौवन इस नगर में बिताया है, बुढ़ापा अरण्य में बिताऊँगा।" मुझे यहां अरण्य शब्द का प्रयोग खटका। लेकिन यह तो एक बानगी है। समूचे नाटक में कई स्तरों पर कई ऐसे बिंदु मिलते हैं, जो खटकते हैं और विचार करने को उकसाते हैं कि आखिर इस नाटक को इस रूप में प्रस्तुत करने की क्या आवश्यकता थी!
       ययाति पढ़कर जैसी उद्विग्नता कल पूरे दिन रही- वैसा मैंने पिछले कुछ वर्षों में कभी अनुभूत न की थी।
       एक उदात्त अवधारणा का इतना पतनशील रूप - ओह!


सद्य: आलोकित!

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