बुधवार, 4 मई 2022

बौद्ध धर्म को संकुचित करते आधुनिक बौद्ध

-पीयूष कान्त राय

संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सर्विसेज एक्जाम 2016 बैच की टॉपर टीना डाबी ने हाल ही में सीनियर आईएएस अधिकारी प्रदीप गवांडे के साथ शादी कर ली । यह उनका दूसरा विवाह है। उनकी शादी कई कारणों से चर्चा में रही और आए दिन ट्विटर एवं अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए इसका प्रचार भी हुआ। अब उनके विवाह की तस्वीरें सुर्खियां बनी हुई है। बौद्ध भिक्षु कश्यप आनंद द्वारा बौद्ध पद्धति से शादी समारोह संपन्न कराया गया जिसके साक्षी के रूप में भगवान बुद्ध की छोटी सी मूर्ति के साथ बाबा साहब अंबेडकर की बड़ी तस्वीर रखी गई थी।

इसमें कोई शक नहीं है कि भगवान बुद्ध ने अपने जीवन काल में तपोबल और ज्ञान से जो दर्शन दिया वह संपूर्ण रूप से ग्राह्य है। बौद्ध धर्म के प्रचार में महान सम्राट अशोक ने जिस  दूरदर्शी दृष्टि का परिचय दिया उसने आगे चलकर बौद्ध धर्म  को अपने मूल रूप से जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । अशोक के अलावा भी कई शासकों एवं दार्शनिकों ने बौद्ध धर्म के विषय में सकारात्मक रुख अपनाए। लेकिन आज के दौर में महात्मा बुद्ध के बाद बौद्ध धर्म में अंबेडकर का स्थान हो गया है। अंबेडकर आजीवन हिंदू रहे। उन्होंने हिंदू रहते हुए इसकी कुरीतियों को दूर करने का हरसंभव प्रयत्न किया। जीवन की संपूर्ण कृतियां उन्होंने हिंदू रहते ही उद्धेलित की थी। अपनी मृत्यु से केवल कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपने समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म को अंगीकार किया था। देखा जाए तो बौद्ध दर्शन, चिंतन एवं इसके प्रचार-प्रसार में अंबेडकर का कोई योगदान नहीं रहा है। इसके बावजूद आज एक प्रतिक्रियावादी समूह अंबेडकर को बौद्ध दर्शन के प्रणेता के रूप में स्थापित करने में अपना सामर्थ्य झोंक दिया है। यह दृष्टि बौद्ध दर्शन जैसे महान मूल्यों के प्रति संकुचित दृष्टि पैदा करता है, जो हिंदुओं में एक खास वर्ग को लक्षित करके प्रचारित किया जाता है। अंबेडकर ने एक बार कहा था कि "मैं पैदा तो हिंदू हुआ हूँ लेकिन मैं हिंदू मरूँगा नहीं।" इस बात में उन्होंने कहीं भी बौद्ध धर्म का जिक्र नहीं किया है। 

यह जानना आवश्यक है कि अपने जीवन काल में गांधी और अंबेडकर दोनों को इस्लाम और ईसाई मत में दीक्षित करने के कई प्रयास हुए। गांधी ने तो गीता के "स्वधर्मे निधनं श्रेय" कहकर सच्चा हिंदू बने रहने का संकल्प किया किंतु भीम राव अम्बेडकर ने हिंदू न रहने के संकल्प का पालन किया। हालांकि यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने ईसाई अथवा इस्लाम स्वीकार नहीं किया।

वास्तव में धर्म के मसले पर अंबेडकर स्वयं ही अस्पष्ट थे। उन्होंने इस्लाम और ईसाई समुदाय की तीखी आलोचना की है। हालाँकि मृत्यु के कुछ दिन पहले उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया ,लेकिन वह सिर्फ उनकी हिंदू धर्म के प्रति कुंठा का प्रतिक्रियावादी स्वरूप था । आज भी उनके कट्टर समर्थकों में वही प्रतिक्रियावादी विचारधारा का समावेश झलकता है। यह पूरा मामला अपने आप में विचारणीय है।

पीयूष कान्त राय

(पीयूष कान्त राय मूलतः गाजीपुर, उत्तर प्रदेश के हैं। उनकी पाँखें अभी जम रही हैं। साहित्य और साहित्येतर पुस्तकें पढ़ने में रुचि रखते हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी में फ्रेंच साहित्य में परास्नातक के विद्यार्थी हैं। वह फ्रेंच भाषा, यात्रा और पर्यटन प्रबन्धन तथा प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व के अध्येता हैं और फ्रेंच-अङ्ग्रेज़ी-हिन्दी अनुवाद सीख रहे हैं। साहित्य और संस्कृति को देखने-समझने की उनकी विशेष दृष्टि है। टीना डाबी प्रकरण में नव बौद्ध वृत्ति पर समसामयिक घटनाक्रम पर उनकी यह विशेष टिप्पणी।)

रविवार, 1 मई 2022

हमारे खिलौने

     - डॉ रमाकान्त राय

    वसु और वैष्णवी के लिए खिलौने लेने का मन था । एक फुटपथिया दुकान पर खड़ा हुआ । प्लास्टिक और रबर की विविध वस्तुएं थीं । खेलने के लिए बनाई गयी । सर्वाधिक मात्रा शोर करने वाली खेल सामग्री की थी । सीटी, पिपिहरी, झुनझुने और चें-पें करने वाले बहुतायत थे । दूसरी बड़ी संख्या वाहनों की थी । कार, बस, हेलीकॉप्टर और विमान बहुत थे । आग्नेयास्त्र तीसरे स्थान पर बहुतायत में थे । बन्दूक, पिस्तौल और इसी तरह के खिलौने ।

        मैंने गेंद चुनी । स्पंज वाली गेंद का दोनों ने नुकीले दांतों से कुतर कर देख लिया था कि सब निस्सार है । इसलिए इस बार प्लास्टिक की गेंद चुना । पिछली बार एक गुब्बारा लाया था तो वह मात्र दस सेकेण्ड उनके साथ रहा और तेज आवाज के साथ फूट गया । बहरहाल, गेंद के बाद मेरी कामना थी कि किसी पशु, पक्षी, जीव आदि के प्रतिरूप वाले खिलौने हों तो अच्छा ! दूकानदार मेरा मुंह ताकने लगा ।

      एक बछड़ा कम कुत्ता ज्यादा जैसा कुछ मिला । ले आया । वह पहिये पर चलता है । मिट्टी के खिलौने बेच रहे एक अन्य के पास एक मुर्गा मिला । एक हिरण भी । गुल्लक भी था । जहां मिट्टी के खिलौने थे, वहाँ जमीन से जुड़े हुए पारम्परिक खिलौने थे ।  जहां प्लास्टिक वाले और यांत्रिक खिलौने थे वहाँ की दुनिया पृथक थी । कृत्रिम ।

      मैंने देखा कि पारम्परिक खिलौने जहां सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठा करने वाले और इको फ्रेंडली थे वहीं कारखाने में बने हुए प्लास्टिक और लोहा-लक्कड़ के बने हुए खिलौने हिंसक और क्रूरता भरने वाले । ऐसे खिलौने, जो ऐश, हिंसा और शोर का भाव भरने वाले हैं । मन में इच्छा, आकांक्षा और कुण्ठा भरने वाले । बाजार हमें ऐसा ही बनाना चाहता है । हम इसकी अंधी दौड़ में जाने अनजाने शामिल हैं ।

सद्य: आलोकित!

विद्यापति के पाँच पद

राधा की वन्दना देख-देख राधा रूप अपार। अपुरूब के बिहि आनि मिलाओल ,  खिति-तल लावनि-सार॥ अंगहि अंग-अनंग मुरछायत ,  हेरए पडए अथीर॥ मनमथ कोटि-मथन...

आपने जब देखा, तब की संख्या.