-पीयूष
कान्त राय
वैचारिक निरपेक्षता के साथ
अपने आप को किसी कालखंड विशेष में रखकर इतिहास लेखन करना दुरूह कार्य है। यह काम तब
और कठिन हो जाता है जब हमारे पास बहुस्तरीय सामग्री मौजूद हो। हालांकि इस किताब की
प्रस्तावना में लेखक खुद को किसी विचारधारा से न जोड़कर तथा व्यक्ति विशेष से
प्रेरित हुए बिना आज़ादी मिलने के बाद के भारत का इतिहास लिखने की पुष्टि करते हैं
लेकिन प्रस्तावना का शीर्षक ही 'एक अस्वाभाविक राष्ट्र" रखकर वैचारिक
पृष्ठभूमि पर सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। एक अस्वाभाविक राष्ट्र के पक्ष में
यूरोपीय विद्वानों एवं राजनीतिज्ञों के कथनों को रखा गया है। यूरोपीय लोगों के
कथनों के साथ समस्या यह है कि पूर्वी यूरोप से पश्चिमी यूरोप तक सम्पूर्ण क्षेत्र
में शायद उतनी विविधता नहीं है जितनी अकेले भारत देश में है। भारत की विविधता को
उसकी अस्वाभाविकता मानने से पहले 1857 की महान क्रांति के एक
पक्ष को समझना जरूरी है, जहाँ अलग-अलग जगहों के
क्रांतिकारियों ने एकमत में दिल्ली में बैठे मुगल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र को अपना
शासक माना। यह एकमात्र तथ्य भी इसका संकेतक हो सकता है कि हमारा देश एक स्वाभाविक
राष्ट्र है। हम पेंगुइन बुक्स से छपी, जाने माने इतिहासकार
रामचंद्र गुहा की किताब 'भारत : गांधी के बाद' की चर्चा कर रहे हैं।
यह पुस्तक "आज़ादी और
राष्ट्रपिता की हत्या" अध्याय के साथ शुरू होती है और बड़े ही रोचक एवं
व्यवस्थित ढंग से घटनाओं एवं तथ्यों की जाँच करते हुए आगे बढ़ती है। उसके बाद देश
के विभाजन का विश्लेषण "विभाजन का तर्क'' नामक अध्याय
में करती हुई रियासतों एवं रजवाड़ों के एकीकरण का विवरण "टोकरी में सेब"
शीर्षक में होता है। इसके बाद कश्मीर समस्या पर लिखे अध्याय "एक रक्तरंजित
हसीन वादी" और शरणार्थी समस्या पर "शरणार्थी समस्या और गणराज्य"
नामक शीर्षकों वाले अध्याय को गहन शोध के बाद लिखा गया है । हालांकि सभी घटनाओं
एवं तथ्यों को तात्कालिक प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के संदर्भ में परखा जाना इस
पुस्तक को इतिहास की जगह इतिवृत्तात्मक उपन्यास की शक्ल में बदल देता है जहाँ एक
केंद्रीय पात्र के इर्दगिर्द सभी घटनाएं घूम रही हैं एवं उसके मरणोपरांत सब खत्म
हो गया है।
इस पुस्तक में रामचंद्र गुहा ने देश के बंटवारे के बाद के
दर्द को तथ्यात्मक रूप से बखूबी उल्लिखित किया है, बंटवारे के बाद पलायन कर रहे
लाखों लोगों को मुख्य धारा में जोड़ने के प्रयासों के राजनैतिक संघर्ष को भी लेखक
ने बेहद खूबसूरत एवं व्यवस्थित तरीके से सामने रखा है जो पाठक को बांधे रखता है।
तात्कालिक परिस्थितियों में राजनैतिक संघर्षों के उस दौर में भिन्न-भिन्न मुद्दों
पर नियमित रूप से चल रहे हड़ताल एवं उग्र आंदोलनों का पूरा विवरण इस पुस्तक में
मिलता है जिनमें मुख्य रूप से भाषायी आधार पर राज्यों का बंटवारा, उत्तर-पूर्वी भारत में अलग देश को लेकर चल रहा आंदोलन एवं कश्मीर मुद्दे
शामिल हैं। इस पुस्तक में आज़ादी मिलने के तुरंत बाद के भारत में जहाँ एक तरफ
स्वाभाविक व्याकुलता,अराजकता एवं झुंझलाहट को दर्शाया गया है, वहीं उस कालखंड की प्रमुख उपलब्धियों पर भी विशेष रूप से बल दिया गया है
जैसे देश को एकता के सूत्र में बंधना हो या उत्तर-पूर्वी राज्यों के आंदोलनों को
शांत करना, भारत की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा हो अथवा
आत्मनिर्भर बनने के प्रयासों पर अमल करना इन सभी मुद्दों पर लेखक ने बड़ी बेबाकी से
अपना मत दिया है। हालांकि इसके बावजूद लेखक कई मुद्दों से बचता नजर आया है, जैसे कश्मीर एवं तात्कालिक भारतीय गुटनिरपेक्षता की वास्तविकता को ऊपर-
ऊपर ही विश्लेषित किया गया है।
भारत से तात्कालिक अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों के सांस्कृतिक, आर्थिक
एवं सामाजिक आयामों को "राष्ट्र और विश्व" अध्याय में व्यवस्थित एवं गहन
शोध के बाद रखा गया है। जिसमें अमेरिका, रूस, ब्रिटेन के साथ रिश्तों को तर्कों की कसौटी पर कसा है एवं भारत के पड़ोसी
देश चीन के साथ ऐतिहासिक रिश्ते को पूर्ण रूप से निरपेक्षता के साथ दर्शाया गया
है।
भारतीय आर्थिक नीतियों के व्यवहार पर भी यह पुस्तक एक गहन
विश्लेषण प्रस्तुत करती है, जैसे पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत, कल कारखानों की
तरफ आकर्षण एवं ब्रिटेन, रूस तथा अमेरिका जैसे परस्पर विरोधी
स्वभाव के आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों वाले देशों के साथ आर्थिक सहयोग पर
विवेचना मिलती है।
"एक नए भारत की परिकल्पना" नाम से लिखे एक अध्याय में
संविधान सभा के गठन, उसके स्वरूप, भिन्न-भिन्न
समुदाय से आने वाले लोगों का चित्रण एवं संविधान सभा के विषय में विद्वानों के
व्यक्तव्यों को बड़े ही रोचक ढंग से दिखाया गया है, जिसे पढ़ते
वक्त पाठक को अपने सामने घटनाओं के सजीव चित्रण का आभास होता है। वहीं
"इतिहास का सबसे बड़ा दाँव" अध्याय में भारत में हुए पहले आम चुनावों में
तथ्यों और घटनाओं का दिलचस्प वर्णन मिलता है। जहाँ एक तरफ इस पुस्तक में चुनाव
कराने में सरकार की दिक्कतों का जिक्र है तो दूसरी तरफ लोगों का देश के पहले आम
चुनाव में बढ़- चढ़कर भागीदारी करने का काफी मनोरंजक दृश्य प्रस्तुत किया गया है। "देश
का पुनर्गठन" अध्याय में भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की गंभीरता को
दर्शाया गया है जिसके तुरंत बाद "प्रकृति पर विजय" में भारतीय
अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि का वर्णन मिलता है। भारतीय
संविधान के कुछ विवादास्पद एवं चटपटे विषय जैसे समान नागरिक संहिता एवं हिन्दू कोड
बिल के संदर्भ में जानकारी "कानून और इसके निर्माता" अध्याय में मिलती
है। कश्मीर समस्या पर लिखे एक और अध्याय "कश्मीर की रक्षा में” लेखक ने मुख्य
रूप से शेख अब्दुल्ला की लोकप्रियता तथा डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कश्मीर
अभियान का जिक्र किया है। "आदिवासी समस्या"
अध्याय में आदिवासियों की समस्याओं पर भी एक विस्तृत जानकारी दी गयी है।
अपनी पुस्तक के तीसरे एवं अंतिम भाग में लेखक
ने चार महत्वपूर्ण अध्यायों को रखा है जिनमें पहले "दक्षिण से चुनौती"
अध्याय में केरल में कम्युनिस्टों की जीत का राष्ट्रीय प्रभावों पर मुख्य रूप से
चर्चा की गई है। भारत-चीन युद्ध का विवरण "पराजय
का अनुभव" एवं उसके बाद शांति के लिए किए जा रहे प्रयासों पर "शांति का
प्रयास" नामक अध्याय में गहनता के साथ विवरण प्रस्तुत किया गया है। और अंत
में "अल्पसंख्यक और दलित" नामक अध्याय में बड़े ही रोचक और दिलचस्प
विवरणों सहित तात्कालिक भारत मे मुसलमान एवं दलित समाज का जिक्र मिलता है।
आज़ादी मिलने के बाद के भारत के इतिहास पर व्यवस्थित तरीके से
लिखित इतिहास कम ही मिलता है । ऐसे में इस पुस्तक के व्यवस्थित एवं सुसंगठित लेखनी
से यह कमी दूर होती दिखती है। हालाँकि यह पुस्तक बहुत हद तक नेहरूवाद
की तरफ झुकी हुई नजर आती है एवं पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि 20वीं सदी के दूसरे भाग में नेहरू के सम्मुख न सिर्फ भारत में बल्कि
सम्पूर्ण विश्व में कोई बड़ा नेता नहीं है। राष्ट्रीय,अन्तराष्ट्रीय
एवं व्यक्तिगत सभी तरह की घटनाओं को पंडित नेहरू के संदर्भ में विश्लेषण करने के
कारण यह पुस्तक एक खास मानसिकता का आईना हो गयी है जिसे पढ़ते हुए इसकी निरपेक्षता
के संदर्भ में किये जा रहे दावों पर शंका होने लगती है। नेहरूवाद की तरफ अत्यधिक
झुकाव के कारण इस पुस्तक के शीर्षक पर भी सवालिया निशान खड़ा होता है एवं
"भारत गांधी के बाद" के स्थान पर "नेहरू का भारत" शीर्षक
ज्यादा सार्थक लगता है। "इस पुस्तक में व्यक्त दिए गए
विचार लेखक के हैं और इसके लिए प्रकाशक जिम्मेदार नहीं है" इस कथन के साथ
प्रकाशक ने अपने आप को जिम्मेदारियों से अलग कर लिया है लेकिन मूल पुस्तक के
सुशांत झा द्वारा किये गए हिंदी अनुवाद में वर्तनी की अनगिनत अशुद्धियाँ हैं जो
इसे पढ़ते हुए हिंदी भाषी पाठक के मन में खीझ पैदा करती हैं। और तो और, इसकी जिम्मेदारी न तो अनुवादक ने और न ही प्रकाशक ने ली है।
हालांकि उपरोक्त खामियों के बावजूद 525 पृष्ठों की यह भारी-भरकम पुस्तक
भारत की आज़ादी के बाद के तात्कालिक राजनैतिक हालातों, सामाजिक
संघर्षों, जनसांखिकी एवं अर्थव्यवस्था के आधार को समझने का
एक उपयोगी माध्यम है। पुस्तक की मुख्य विशेषता घटनाचक्र को क्रमबद्ध करने के बजाए
मुद्दों को क्रमबद्ध किया जाना है जिससे एक आम पाठक भी अपने आप को इस किताब से
जुड़ा हुआ पाता है।
समीक्षित कृति- ‘भारत : गांधी के बाद’
लेखक- रामचन्द्र गुहा
अनुवाद- सुशांत झा
प्रकाशक- पैंगविन बुक्स
मूल्य- 450रु
(पीयूष कान्त राय मूलतः गाजीपुर, उत्तर प्रदेश
के हैं। उनकी पाँखें अभी जम रही हैं। वह साहित्य और साहित्येतर पुस्तकें पढ़ने में
रुचि रखते हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी में स्नातक
तृतीय वर्ष के विद्यार्थी हैं। वह फ्रेंच भाषा, यात्रा और पर्यटन
प्रबन्धन तथा प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व
के अध्येता हैं और फ्रेंच-अङ्ग्रेज़ी-हिन्दी अनुवाद सीख रहे हैं। उनका एक विशेष नजरिया
है। यहाँ उन्होंने हमारे अनुरोध पर यह उत्कृष्ट समीक्षा की है। आप पढ़कर अपनी
सम्मति दें और उनकी हौसला-अफजाई करें- संपादक)