रविवार, 21 जून 2020

कथावार्ता : ललित निबन्ध : सूर्यग्रहण और हमारे मिथक

सूर्य ग्रहण और महाभारत से संबंधित ललित लेख पढ़िए हमारे ब्लॉग, कथावार्ता पर!


आज सूर्यग्रहण निश्चित है। 

वैसे तो यह एक खगोलीय घटना है लेकिन इसका मिथकीय स्वरूप बहुत दिलचस्प है। वह समुद्र मंथन और देवासुर संग्राम से सम्बद्ध है। राहु-केतु से जुड़ा हुआ। राहु सूर्य को और केतु चंद्रमा को जब तब ग्रसने के लिए उद्धत होते हैं। गाँव में तो ग्रहण को सूर्य भगवान और चन्द्र देव पर संकट की तरह माना जाता है और मैंने देखा है कि कई धर्मपरायण लोग ऐसी अवधि में एक पैर पर खड़ा होकर ‘उग्रह’ होने के लिए तपस्या करते हैं, पानी के परात में उनपर आए संकट को देखा जाता है और उसके कटने तक धार्मिक कथाओं का श्रवण किया जाता है। इस अवधि में भोजन आदि ग्रहण नहीं किया जाता और कोई ऐसा खाद्य पदार्थ है तो उसमें तुलसीदल डालकर शुद्ध रखने का प्रयास किया जाता है।

          महाभारत युद्ध की एक घटना को मैं इसी सूर्यग्रहण से जोड़कर देखता हूँ। अभिमन्यु के वीरगति के बाद अर्जुन शपथ लेते हैं कि अगले दिन के सूर्यास्त से पहले वह इस हत्या के जिम्मेदार जयद्रथ को यमपुरी पहुँचा देंगे। ऐसा न कर सके तो अग्नि समाधि ले लेंगे।

          यह एक कठिन शपथ है। अत्यन्त आवेश में लिया गया। पुत्रशोक में अर्जुन ने सबके समक्ष इसे दुहराया। कौरव पक्ष के लिए यह अवसर है। आपदा में अवसर। कुटिल लोगों के लिए आपदा में अवसर इसी तरह का होता है। सहज सामान्य लोगों के लिए ऐसे में जीवन को मजबूत करने का उपाय खोजना/नये अनुसंधान करना, समय का सदुपयोग करना अवसर है तो कुटिल, खल और कामी जन के लिए इसमें अपने लिए "अवसर" है। अवसर एक लचीला शब्द है। इसका मनमाना उपयोग किया जा सकता है। स्वाति नक्षत्र में वर्षा की बूँद केले के पत्ते पर गिरकर कपूर बनती है, सीप के मुख में पड़कर मोती और साँप के पास जाकर विष! यह पात्र पर निरभर करता है कि वह अवसर को कैसे लेता है। खैर,

          कौरव पक्ष के पास यह अवसर है कि अगर जयद्रथ को बचा लिया गया तो अर्जुन स्वतः जल मरेगा। जिस काम को बड़े बड़े योद्धा बड़ी कोशिश के बाद भी नहीं कर पा रहे हैं, वह निमिष मात्र में हो जायेगा। बस रणनीति बनानी है। आपदा में अपने लिए जगह बनाना है। कौरव पक्ष ने पिछले दिन सुशर्मा को इसके लिए राजी किया था कि वह अर्जुन को प्रातः काल ही युद्ध के लिए ललकारेगा और युद्ध भूमि से इतनी दूर ले जायेगा कि सूर्यास्त तक अर्जुन कुरुक्षेत्र में चक्रव्यूह तक ही न पहुँच सके। चक्रव्यूह में ही अभिमन्यु को मारा गया है।

  फिर जयद्रथ विशेष गुण सम्पन्न योद्धा है। उसे मारना एक अलग ही कौशल की अपेक्षा रखता है। उसके पिता ने अपने बेटे के लिए विशेष आयुष कवच बनाया है। जो मारेगा, जिसके हाथ से उसका सिर धराशायी होगा, वह तत्क्षण भस्म हो जायेगा। अर्जुन की चुनौती बड़ी है। उसे इसका ध्यान भी रखना है कि विषाणु का उन्मूलन करते हुए स्वयं संक्रमित न हो जाए।     

  उस दिन सभी कुरुवीर जयद्रथ की रक्षा में सन्नद्ध हो गए थे। जयद्रथ के आगे कई छोटी छोटी चुनौतियाँ भी थीं। आप एक बड़ा काम करने चलते हैं तो राह में छोटी-छोटी बाधाएँ उपस्थित हो ही जाती हैं। विद्वान कहते हैं कि उससे किनारा कर लेना ही उचित है लेकिन कूटनीति और राजनीति के विद्वान कौटिल्य/चाणक्य कुछ दूसरा ही सोचते थे। कहते हैं कि चाणक्य विवाह करने जा रहे थे। दूल्हा बने थे। जामा जोड़ा पहनकर सज धज कर जा रहे थे। राह में एक कुश की नोक उनके पैर में चुभ गयी। यह उनके लिए पीड़ादायी था। कहाँ सुख के लिए दल बल चला है, बारात सजी है और कहाँ पैरों में कांटा चुभ रहा है! चाणक्य ने माथे पर सजा मौर उतारा और कुश उन्मूलन में लग गया। कुश की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। उसकी नोक भी बहुत तीक्ष्ण होती है। एक जमाने में कुश लाने वाले लोग प्रशिक्षित होते थे। उन्हें 'कुशल' कहा जाता था। अब तो कोई भी व्यक्ति जो अपने काम में निष्णात है, कुशल कहा जाता है और उसके 'कौशल' की चर्चा की जाती है। कुशल शब्द का खूब अर्थ विस्तार हुआ है।

          तो चाणक्य ने कुश उन्मूलन शुरू किया। जब हाथ से, उपकरणों से वह सफल न हुआ तो उसकी जड़ों में मट्ठा डालने लगा। उसने बारात स्थगित कर दी। पहले यह कर लेगा तभी बियाह करेगा। वह दूसरे ही तरीके का ब्राह्मण था। उसकी प्राथमिकतायें सुस्पष्ट थीं। तभी वह मगध के महाप्रतापी राजा महापद्मनंद का राज एक सामान्य लड़के चंद्रगुप्त की मदद से मिटा सका।

          आज के युद्ध के प्रारम्भ में ही कृष्ण ने बताया था कि आपका लक्ष्य क्या है? कृष्ण ने शुरू में सलाह दी कि आज तुमने कुछ शपथ ली है लेकिन बाद में वह अपने रथी की आज्ञा का अनुपालन करने लगे। एक सारथि का यही कर्तव्य है। उसे शल्य बनने से बचना चाहिए। शल्य कर्ण का सारथी बने तो हर बात पर उसे कहते रहते कि तुम्हें ऐसा नहीं, बल्कि वैसा करना चाहिए। कर्ण शल्य को रथ पूर्व दिशा में ले चलने को कहता तो वह बताने लगते कि उधर जाने में क्या हानि होगी। कहते हैं कि अंग्रेज राजा अपने मंत्रियों से कहते थे कि वह गलत नहीं हो सकता। अब राजा के विश्वस्त लोगों का काम है कि वह राजा के काम के औचित्य को सिद्ध करें और उसे ही न्यायसंगत बतायें। ताकत यही करती है। वह अपना इतिहास इसी तरह बनवाती है। कृष्ण ने एक बार बलराम से कहा था कि अगर कौरव युद्ध जीत जाते तो वह द्यूत क्रीड़ा और द्रोपदी के चीर हरण को भी तार्किक और विधि सम्मत सिद्ध कर देते।

          कृष्ण रथ बढ़ाते गये और अ अर्जुन के इस गति से कौरव अत्यन्त प्रसन्न हैं। जश्न मनने लगता है। सभी वीर अर्जुन के पास आ जाते हैं। उसे याद दिलाने लगते हैं कि उसने कल प्रतिज्ञा की थी। अर्जुन भी गान्डीव रख चुका है। थक कर बैठ गया है। एक तरफ कौरव दल ने चिता सजा दी है। सब तमाशा देखने एकत्र हैं। जयद्रथ सबसे आगे खड़ा है। उसकी वजह से कौरव लगातार दूसरे दिन युद्ध में आगे हैं। आज तो एक शानदार 'अवसर' है। तभी सूर्य उदित हो जाते हैं। दिन निकल आता है। सब स्पष्ट हो जाता है। कृष्ण कहते हैं- 'अर्जुन! उठो। देखो, सूर्य आसमान में चमक रहे हैं, अभी दिन नहीं ढला है। जयद्रथ ठीक तुम्हारे सामने ही है। तुम्हारे पास प्रतिज्ञा पूरी करने का यह "अवसर" है। ध्यान रखना- शत्रु विशेष प्रकृति वाला है। इसका नाश करने के लिए विशेष पीपीई किट चाहिए।'

          क्या हुआ होगा उस समय? मैं जब इस प्रसंग के बारे में सोचता हूँ तो मुझे सूर्यग्रहण की याद आती है। उस दिन पूर्ण सूर्यग्रहण रहा होगा। कुछ घड़ी के लिए ऐसी ही खगोलीय घटना हुई होगी। पिछला सूर्यग्रहण इतना जबरदस्त था कि पक्षी अपने नीड़ की ओर चल पड़े थे। सूरजमुखी के फूलों ने अपना पट बन्द कर लिया था। एक विशेष अन्धकार हर तरफ व्याप्त हो गया था। उस काल में यह ग्रहण बहुत विकट रहा होगा। सभी योद्धा इस खगोलीय घटना के प्रति उदासीन रहे होंगे। लेकिन फिर सोचता हूँ कि क्या वाकई? उन उद्भट विद्वानों को यह पता नहीं रहा होगा? जरुर रहा होगा! तो क्या वाकई श्री कृष्ण ने अपना चक्र चलाया था? वह सूर्य के प्रकाश को आच्छादित कर सकता था?

          एकादश रुद्रावतार हनुमान के बारे में भी यह कथा है कि उन्होंने सूर्य को निगल लिया था। मुझे लगता है कि यह भी सूर्यग्रहण का ही समय रहा होगा जिसकी कल्पना कवि ने उनके पराक्रम का वर्णन करने के लिए किया है। कवि की कल्पना मानस का निर्माण करने में सक्षम है। इसीलिए कवि की भूमिका बहुत मायने रखती है। लेकिन यूनानी विचारक प्लेटो तो कवियों से बहुत चिढ़ता है। उन्हें राज्य से बाहर फेंक देने के लिए राजा को उकसाता है लेकिन भारतीय परम्परा में वह परिभू: स्वयंभू कहे गये हैं! नयी सृष्टि के रचनाकार।

          लेकिन मेरा उद्देश्य यह सब विवेचन करना नहीं। मैं तो आज के सूर्यग्रहण के मिथकीय काव्य प्रयोग पर अपनी उधेड़बुन आपके समक्ष रख रहा था। आप बताइये तो!


असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी

राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय,

इटावा, उ०प्र०

9838952426, royramakantrk@gmail.com



रविवार, 7 जून 2020

कथावार्ता : अकाल केन्द्रित तीन आधुनिक कवितायें

अकाल और उसके बाद
-नागार्जुन

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

(1955)

अकाल
-रघुवीर सहाय

फूटकर चलते फिरते छेद
भूमि की पर्त गयी है सूख
औरतें बाँधे हुए उरोज
पोटली के अन्दर है भूख
आसमानी चट्टानी बोझ
ढो रही है पत्थर की पीठ।
लाल मिट्टी लकड़ी ललछौर
दाँत मटमैले इकटक दीठ
कटोरे के पेंदे में भात
गोद में लेकर बैठा बाप
फ़र्श पर रखकर अपना पुत्र
खा रहा है उसको चुपचाप।
पीटकर कृष्णा के तटबन्ध
लौटकर पानी जाता डूब
रात होते उठती है धुन्ध
ऊपरी आमदनी की ऊब।
जोड़कर हाथ काढ़कर ख़ीस
खड़ा है बूढ़ा रामगुलाम
सामने आकर के हो गये
प्रतिष्ठित पंडित राजाराम।
मारते वही जिलाते वही
वही दुर्भिक्ष वही अनुदान
विधायक वही, वही जनसभा
सचिव वह, वही पुलिस कप्तान।
दया से देख रहे हैं दृश्य
गुसलखा़ने की खिड़की खोल
मुक्ति के दिन भी ऐसी भूल !
रह गया कुछ कम ईसपगोल!


(1967)

अकाल में दूब

-केदारनाथ सिंह

भयानक सूखा है
पक्षी छोड़कर चले गए हैं
पेड़ों को
बिलों को छोड़कर चले गए हैं चींटे
चींटियाँ
देहरी और चौखट
पता नहीं कहाँ-किधर चले गए हैं
घरों को छोड़कर

भयानक सूखा है
मवेशी खड़े हैं
एक-दूसरे का मुँह ताकते हुए

 

कहते हैं पिता
ऐसा अकाल कभी नहीं देखा
ऐसा अकाल कि बस्ती में
दूब तक झुलस जाए
सुना नहीं कभी
दूब मगर मरती नहीं -
कहते हैं वे
और हो जाते हैं चुप

निकलता हूँ मैं
दूब की तलाश में
खोजता हूँ परती-पराठ
झाँकता हूँ कुँओं में
छान डालता हूँ गली-चौराहे
मिलती नहीं दूब
मुझे मिलते हैं मुँह बाए घड़े
बाल्टियाँ लोटे परात
झाँकता हूँ घड़ों में
लोगों की आँखों की कटोरियों में
झाँकता हूँ मैं
मिलती नहीं
मिलती नहीं दूब

अंत में
सारी बस्ती छानकर
लौटता हूँ निराश
लाँघता हूँ कुएँ के पास की
सूखी नाली
कि अचानक मुझे दिख जाती है
शीशे के बिखरे हुए टुकड़ों के बीच
एक हरी पत्ती
दूब है
हाँ-हाँ दूब है -
पहचानता हूँ मैं

लौटकर यह खबर
देता हूँ पिता को
अँधेरे में भी
दमक उठता है उनका चेहरा
'है - अभी बहुत कुछ है
अगर बची है दूब...'
बुदबुदाते हैं वे

फिर गहरे विचार में
खो जाते हैं पिता।

(1988)


शुक्रवार, 5 जून 2020

कथावार्ता : कुबेरनाथ राय के साहित्य का भारतवादी पक्ष


कुबेरनाथ राय : पुण्यतिथि विशेष - 02

-ऋषिकेश कुमार


"अकेला निर्माण ?
वह भी है,
अगर उसकी चाह
सभी के कल्याण के हित
छोड़ी गई हो।” 
-‘अज्ञेय’
आधुनिक काल के प्रसिद्ध आर्ष-मनीषा के अन्वीक्षक आख्याता, सारस्वत साधना के साधक, ललित निबंध लेखक, ‘देशी’ क़िस्म के ग्रामीण बुद्धिजीवी, चिंतक, आचार्य कुबेरनाथ राय हिन्दी साहित्य में अपने ढंग से अकेला निर्माण करने वाले लेखक हैं, जिनके यहाँ सभी के कल्याण की भावना निहित है। कुबेरनाथ राय ने बदलते समय और परिवेश को ध्यान में रखते हुए, भारतीय चिंतन परंपरा में जहां सुधार कि गुंजाइश दिखाई दी वहाँ सुधार हेतु सुझाव दिए और जहां व्याख्या की आवश्यकता थी, वहां संदर्भ सहित व्याख्या की। “नीलकंठ की नगरी वाराणसी और प्राग-भारती का प्रभामय प्रांगण कामरूप दोनों कुबेरनाथ राय के स्वाध्याय और वांग्मय तपस्या का केंद्र हैं। प्रसन्न पुण्य सलिला भगवती भागीरथी ने कुबेरनाथ को ‘रस’ प्रदान किया तो असम की आत्मीयता ने उनको ‘तत्त्वबोध’ कराया । दोनों का मंजुल सामंजस्य श्री कुबेरनाथ राय की लेखनी में विद्यमान है ।”[1] जिसका आनंद पाठक ले सकते हैं लेकिन हाँ,  शर्त यह है की पाठक को सजग रहना होगा अन्यथा कुछ खास प्राप्त नहीं होने वाला है । जिस लेखक को “अपनी भाषिक संस्कृति का आदर्श तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ से मिला है ।”[2] जो यह साफ शब्दों में लिखता हों कि “ मेरा उद्देश्य रहा है पाठक के चित्त को परिमार्जित भव्यता देना और साथ ही उसकी चित्त-ऋद्धि का विस्तार करना ।”[3] उनके प्रति सतर्क तो रहना ही पड़ेगा अन्यथा कुछ हाथ नहीं आने वाला है, ‘परिमार्जित भव्यता, चित्त-ऋद्धि का विस्तार’ तो दूर की बात है । कुबेरनाथ राय के साहित्य के मर्मज्ञ और गांधीवादी विचारक डॉ मनोज राय अपने आलेख ‘लॉकडाउन में श्री कुबेरनाथ राय को पढ़ते हुए’ में लिखते हैं कि “श्री कुबेरनाथ का चिन्तन इतना बहुआयामी है कि उसे समग्रता में प्रस्तुत करना आसान नहीं है। उनके निबंध पाठक से उसके अध्ययन-चिंतन की मांग करते हैं। कहानी-उपन्यास की तरह सिरहाने रखने से श्री राय पकड़ में नहीं आते हैं। श्री राय ने कला-साहित्य-दर्शन-गणित-भूगोल आदि का तलस्पर्शी अवगाहन किया है । यह लगभग असामान्य घटना है । उनके समकालीनों में शायद ही किसी का बूता हो जिसने इस गहराई से विविध विषयों का अध्ययन किया हो और उसे ललित शैली में प्रस्तुत किया हो ।”[4] 


कुबेरनाथ राय विषय के अनुसार, उसकी स्वभाविक अभिव्यक्ति के अनुरूप शैली ग्रहण करते हुए अपने चिंतन प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों पर ललित निबंध लिखा आत्मकथात्मक शैली में, गांधी जी के विचारों को केंद्र में रखकर निबंध लिखा पत्रात्मक शैली में, असम के प्रकृति को केंद्र में रखकर निबंध लिखा संस्मरणात्मक शैली में। कुबेरनाथ जी का उदेश्य साफ था, सोचने समझने वाला पाठक तैयार करना है न कि ‘आधुनिक चरण’ रखने वाला पाठक । अपने निबंध संग्रह ‘किरात नदी में चन्द्र मधु’ में कुबेरनाथ राय लिखते हैं- “पुस्तक का प्रथम उद्देश्य है ‘भारतीय संस्कृति के अन्दर आर्येतर तत्वों की महिमा का उद्घाटन। द्वितीय उदेश्य है किरात तन्मात्राओं (रूप-रस-गंध-स्पर्श-शब्द) का स्वाद हिंदी पाठक के लिए सुलभ करना ।”[5]  ताकि वह उन महानुभावों के सामने सीना तान कर खड़े हो कर उन्हें बता सके, जब वे कहते हों की भारत को ‘भारत’ हमने बनाया है। जब तक समाज के लोगों को पता नहीं होगा कि भारत जिसमें हम रहते हैं, इसमें मेरा क्या है? मेरे पूर्वजों का क्या योगदान है? जब तक वह जान नहीं लेगा तब तक वह बस, रेल आदि को जलाता ही रहने वाला है। क्योंकि उसे पता ही नहीं है कि जिसे वह जला रहा है वह तो उसकी अपनी, अपने पूर्वजो की धरोहर है। उसे तो यह बताया गया है कि तुम अल्पसंख्यक हो, तुम शोषित हो, तुम्हें सुविधाओं से जान बूझकर वंचित रखा गया है। किन्तु कुबेरनाथ अपने चिंतन मनन के बाद उन्हें बताते है- “मैं सत्त्ताईस-अट्ठाईस वर्ष हिन्दी क्षेत्रों से बाहर रहा और मैंने पग-पग पर अनुभव किया कि भारतवर्ष को ‘भारतवर्ष’ बनाने की प्रक्रिया में पिछड़े से पिछड़े वर्ग का भी सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषिक योगदान रहा है। सबने मिल जुलकर इसके इतिहास, इसकी भाषा और इसकी संस्कृति की रचना की है और सहस्राब्दियों से इसका लोक-जीवन दर्शन और रस-बोध की दृष्टि से सबने मिलजुलकर हमारी एक अलग ‘पहचान’ बनायी है”।[6] पर आज की विडम्बना यह है कि इस ‘पहचान’ को पहचानने वाले कम हैं और जो उनको भारत की पहचान कराने की क्षमता रखते भी हैं, उन पर आरोप लगाया जाता है कि उनके निबंध के विषय और उसमें उपयोग किए गए शब्दों के कारण पाठक को पढ़ने समझने में कष्ट होता है! यह बात किसी और लेखक के बारे में नहीं कुबेरनाथ राय के बारे में वे लोग कहते हैं जो न तो कुबेरनाथ राय जी को पढ़ते हैं न उनपर कार्य करने वाले लोगों को। युवा आलोचक डॉ. रमाकांत राय, कुबेरनाथ राय के लेखन के सम्बन्ध में लिखते हैं कि “कुबेरनाथ राय के निबंधों में पण्डिताई कूट-कूट कर भरी हुई है। उनके अध्ययन का दायरा बहुत व्यापक है। उनके निबंधों में भारतीय और पाश्चात्य, दोनों सन्दर्भ खूब आते हैं। भारतीय पौराणिकता का पूरा सम्मान करते हुए अपने बहाव में वे वेद, उपनिषद्, पुराण और लौकिक साहित्य से उद्धरण और उदाहरण देते चलते हैं। उनकी प्रस्तुति इस उदाहरणों में उदात्तता से भरपूर होती है। वे भारतीय संस्कृति के उन मौलिक तत्त्वों की ओर लगातार संकेत करते चलते हैं, जिन्हें हमने अपने क्षुद्र स्वार्थों और जीवन की जटिलताओं से घबराकर सरलीकृत कर लिया है”।[7] और जो हर क्षेत्र में ‘सरलीकृत’ विचार-दृष्टि अपनाता है वह सत्य से दूर, बहुत दूर रह जाता है। निबंधकार के कुछ अपने महत्वपूर्ण दायित्व हैं। कुबेरनाथ राय के शब्दों में- “निबंधकार का एक मुख्य कर्तव्य होता है पाठक की मानसिक ऋद्धि और बौद्धिक क्षितिज का विस्तार करना। यदि वह पाठक के बौद्धिक स्तर को ही लक्ष्मण रेखा मानकर चलेगा तो यह संभव नहीं है ।”[8] 



कुबेरनाथ राय अपने और लेखक के दायित्वबोध को जानने और समझने वाले रचनाकर हैं। अपने दायित्वों के सम्बन्ध में वह लिखते हैं- “मैं शुद्धतः ललित निबंधकार हूँ और लालित्य के साथ बौद्धिक रस का सम्प्रेषण एवं इसके द्वारा पाठक के मानसिक क्षितिज का विस्तार, यही मेरा उद्देश्य रहा है ।”[9] उनके यहाँ कोई लाग लपेट नहीं। बहुत साफ शब्दों में बता देते हैं कि मेरा उद्देश्य क्या है । असल में कुबेरनाथ राय के लेखन का आरंभ ही चुनौती से होता है। उन्हीं के शब्दों में- “बचपन में कभी लिखता था– ‘माधुरी’, ‘विशाल भारत’ आदि अच्छे पत्रों में। बीच में मौन रहा। सन् 1962 में प्रोफेसर हिमायूँ कबीर की इतिहास सम्बन्धी ऊलजलूल  मान्यताओं पर मेरा एक तर्कपूर्ण और क्रोधपूर्ण निबंध को पढ़कर पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी ने मुझे घसीट कर मैदान में खड़ा कर दिया और हाथ में धनुष बाण पकड़ा दिया। अब मैं अपने राष्ट्रीय और साहित्यिक-उत्तरदायित्व के प्रति सजग था। मैं सरस्वती में लगातार लिखने लगा।”[10] ‘बीच में मौन’ अकारण नहीं था, सकारण था। जब चीजें अपने वश में नहीं रहतीं, तब हमें अपनी जीवनचर्या पर रूक कर विचार करना चाहिए। कुछ समय के लिए रूकना भी पड़े तो रुक जाना चाहिए। रुकना भी एक तरह का बदलाव है। हम रुकते हैं, चिंतन मनन करने के लिए, नई योजना बनाने के लिए। बदलते समय और समाज में अपने को क़ायम रखने के लिए, परिवर्तित काल में अपने को लगातार परिष्कृत और परिमार्जित करने के लिए। हमें अपने को समय के साथ बदलना बहुत जरुरी है। सकारात्मक मौन परिष्कृत और परिमार्जित रूप में ‘प्रिया नीलकंठी, रस आखेटक, गंधमादन, निषाद बांसुरी, विषाद योग, पर्ण मुकुट , महाकवि की तर्जनी, पत्र मणिपुतुल के नाम, मन पवन की नौका, किरात नदी में चन्द्रमधु, दृष्टि अभिसार, त्रेता का वृहत्साम, कामधेनु, मराल , उत्तरकुरु, चिन्मय भारत, वाणी का क्षीरसागर, कंथामणि, अंधकार में अग्निशिखा, रामायण महातीर्थम और आगम की नाव’ लेकर उपस्थित होते हैं। जिसमें “भारतीयता का प्रत्यभिज्ञान, अर्थात भारत की सही ‘आइडेन्टिटी’ का पुनराविष्कार, जिससे वे जो कई हज़ार वर्षों से आत्महीनता की तमसा में आबद्ध रहे हैं, इस बात को जाने कि यह भारत और भारतीयता का उत्तराधिकार उनके ही ‘महिदास’ जैसे पूर्वजों की रचना है और इस तथ्य को जानकर वे अपने खोए आत्म-विश्वास को प्राप्त करें, उनका सुप्त आत्मबल पुनः जागे”।[11]
कुबेरनाथ राय ने रामायण और राम को केंद्र में रखकर  जितने भी निबंध लिखे उन सब के उदेश्य उनके सामने साफ थे। उन्होंने अपने ‘त्रेता का बृहत्साम’ निबंध संग्रह में लिखा कि “पुस्तक का उदेश्य राम भक्ति का प्रचार नहीं है, बल्कि ‘रामत्व’ की कुछ विशिष्टताओं का उद्घाटन है। ... रामत्व के उस सौन्दर्य का उद्धाटन जो तप, संकल्प, पुरुषार्थ, त्याग, ज्ञान और तेज से जुड़ा है।”[12] ‘तप, संकल्प, पुरुषार्थ, त्याग, ज्ञान और तेज कुबेरनाथ राय का व्यक्तित्व है जिसे राम के समान ही तिरस्कृत किया गया है। उस समय के प्रसिद्ध आलोचक साहित्यकार आदि में कुछ को छोड़ कर सब ने उनके साथ, राम, गाँधी और भारतीय जनता के साथ अन्याय किया, पाप कर्म किया। पर कौन सोचता करता है इस ओर? साहित्य जगत में आज तो ‘हम सुन्दरी हमार पिया सुन्दर और गऊंआ के लोग बनरा बनरी’ यही देखने को मिलता है। आज भी उनका ही बोलबाला है जिन्होंने देह का साहित्य में सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया । जब तक, वे थे; देह का आनंद लेते रहे!! अब जो तब उनके सहयोगी थे देह विमर्श पर चर्चा करते नहीं थकते!! इसओर, इस चिंतन की ओर कितनों ने ध्यान दिया जो आत्मा को उन्नयन की ओर ले जाए, जिससे हमें यह ज्ञान प्राप्त होता है कि “हमें सदैव यह मान कर चलना है कि मनुष्य की सार्थकता उसकी ‘देह’ में नहीं, उसके ‘चित्त’ में है। उसके चित्त-गुण को, उसकी सोचने-समझने और अनुभव करने की क्षमता को विस्तीर्ण करते चलना ही ‘मानविकी’ के शास्त्रों का विशेषतः साहित्य का मूलधर्म है ।”[13]  किन्तु उपभोक्तावादी दृष्टिकोण  वाले लोगों को देह से फुर्सत ही कहाँ है जो ‘चित्त’ की ओर दृष्टि डालें!! टॉलस्टॉय ने लिखा- “कला का लक्ष्य है नैतिक परिपूर्णता।”[14] कुबेरनाथ राय भी लिखते हैं “साहित्य की नींव है ‘शील’, इसके गर्भगृह की प्रतिमा है ‘रस’ पर, शिखर कलश है; एक ‘आत्मिक निरुजता और मुक्ति’ जिसे पुरानी भाषा में कहा गया है । सौन्दर्यबोध मध्य की कड़ी- ‘हीर’ या ह्रदय होते हुए भी आदि और अन्त के संकेतों से रिक्त होने पर त्याज्य है।”[15] किन्तु तथाकथित लोगों ने कुबेरनाथ के लेखन को ही उपेक्षित कर दिया !! क्योंकि कुबेरनाथ राय ने जितना लिखा, जहाँ बोले, जिस किसी को भी जबाब दिया दो टूक जबाब दिया। मिसाल के तौर पर उनके निबंध ‘मराल’ की भूमिका में वह लिखते हैं- “निबंधकार फ़िल्म-निर्माता नहीं है। उसका कर्तव्य है कि वह फ़िल्म-निर्माता से भिन्न हो कर सोचे। वह तो अंतिम विश्लेषण में अध्यापक है। उसका काम है मन बुद्धि के आयामों को विस्तार देना- शब्दों और संदर्भों के माध्यम से।...मैंने अपनी क्षुद्र सामर्थ्य में जो कुछ किया है वह पाठक के भाषिक क्षमता को समृद्ध करने और उसे अपनी देशी भाषिक संस्कृति से मूल-संलग्न करने की दृष्टि से किया है।”[16]  बदलते समय और परिवेश के साथ गौरवशाली चिंतन परंपरा को आगे बढ़ाना एक चुनौती भरा कार्य रहा है। इस मंगल चिंतन परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य इस देश के चिंतक, समाज-सुधारक, साहित्यकार आरम्भ काल से करते चले आ रहे हैं। इस चिंतन परंपरा में कुबेरनाथ राय का योगदान भी स्तुत्य है । उन्होंने अपने ललित निबंधों में पुरातन और नवीनतम के समन्वय के साथ युगबोध के चिंतन, संस्कृति की परिवर्तनशीलता, लोकसंस्कृति की झांकी, मानव मूल्यों के बनते-बिगड़ते संबंधों और तिथि पर्वो को अपने निबंधों में स्थान देकर भारतीय चिंतन परंपरा को सुदृढ़ किया है । कुबेरनाथ राय के निबंधों को पढ़ने के बाद जो ज्ञान प्राप्त होता है वह यह कि ‘भद्र मनुष्य अपने मांगलिक कोष से मंगलमय वस्तुओं को प्रस्तुत करता है’।

 








[1] कुबेरनाथ राय, मराल, पृष्ठ संख्या –4 
[2] कुबेरनाथ राय, मराल, पृष्ठ संख्या –8
[3] कुबेरनाथ राय, मराल, पृष्ठ संख्या –8
[4] डॉ. मनोज राय,  लॉकडाउन में श्री कुबेरनाथ राय को पढ़ते हुए- मेरा गाँव मेरा देश, सांस्कृतिक पाठ का गवाक्ष
[5]  कुबेरनाथ राय, किरात नदी में चन्द्रमधु - 155
[6]  कुबेरनाथ राय, उत्तरकुरु, पृष्ठ संख्या- 9
[7]  डॉ. रमाकांत राय, रस आखेटक : ललित निबन्ध का रम्य दारुण स्वर- मेरा गाँव मेरा देश, सांस्कृतिक पाठ का गवाक्ष    
[8]  कुबेरनाथ राय, रामायण महातीर्थम, पृष्ठ संख्या-  348,49
[9]  कुबेरनाथ राय,  रामायण महातीर्थम, पृष्ठ संख्या- 338
[10] कुबेरनाथ राय, प्रिया नीलकंठी, पृष्ठ संख्या- 126
[11] कुबेरनाथ राय, निषाद बांसुरी, पृष्ठ संख्या-  262
[12] कुबेरनाथ राय, त्रेता का बृहत्साम, पृष्ठ संख्या-  7
[13]  कुबेरनाथ राय, कामधेनु, पृष्ठ संख्या-  8
[14]  तोलस्तोय- कला क्या है,  55
[15]  कुबेरनाथ राय, पर्ण–मुकुट, पृष्ठ संख्या-  216    
[16]  कुबेरनाथ राय, मराल, पृष्ठ संख्या- 8  


ऋषिकेश कुमार

(ऋषिकेश कुमार युवा हैं, उत्साही किन्तु पर्याप्त संकोची। वह सुरुचि सम्पन्न पाठक हैं। मिथक, सौंदर्य और प्रेम के विषय उनके प्रिय क्षेत्र हैं। वह मूलतः औरंगाबाद, बिहार के हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक की पढ़ाई की है और वर्तमान में जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली में "कुबेरनाथ राय के निबंधों में मिथक और सौंदर्य का अध्ययन" विषय पर शोधरत हैं। मेरा गाँव मेरा देश ब्लॉग पर यह उनका पहला आलेख है।)

(आज कुबेरनाथ राय की पुण्यतिथि पर यह विशेष आलेख मेरा गाँव मेरा देश पर विशेष रूप से आपके लिए।)

कथावार्ता : भारतीयता की तलाश और कुबेरनाथ राय


कुबेरनाथ राय : पुण्यतिथि विशेष - 01

-डॉ मनोज राय

भारत और भारतीयता की बात को फैशन के तौर पर जहां-तहां खूब उठाया जाता रहा है। शिक्षाविद से लेकर राजनीतिक कार्यकर्ता तक सभी अपने-अपने हिसाब से सक्रिय हैं। पर सच तो यह है कि यह सिर्फ स्थापित पार्टी-राजनीति के लंबरदारों के कानों तक पहुंचाने की कोशिश भर ही है। तात्कालिक लाभ के लिए इसे एक हथकंडे (टूल) की तरह इस्तेमाल करना हम सब की आदत बन गई है। कोई नारे लगवाकर अपनी स्पृहा की संतुष्टि चाहता है तो कोई दूसरों से ज्यादा स्वयं को राष्ट्रभक्त साबित करना चाहता है। कुल मिलाकर कहें तो उसके तत्वों के विश्लेषण के गंभीर प्रयत्न नहीं हो रहे हैं। दरअसल भारतीयता को समझने के लिए ‘भारतीय मानस’ को समझना जरूरी है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें अनुसंधान और चिंतन बहुत कम हुआ है। आज जब देश में विघटनमूलक और विच्छिन्नतावादी राजनीति अपना रूप बदल-बदलकर सक्रिय है तब इस पर गहन चिंतन-मनन की आवश्यकता और बढ़ जाती है।



          भारतीयता पर विचार करते हुए  हिन्दी के प्रसिद्ध ललित निबंधकार और गांधीवादी चिंतक श्री कुबेरनाथ राय एक साथ अनेक प्रश्न उठाते हैं : ‘भारतीयता क्या है? इसका ढांचा कैसा है? इसकी परिभाषा क्या है? इसकी आवश्यकता क्या है? इसकी पहचान कैसे की जाय’? भारत से हम कैसे जुड़ सकते हैं? हम जानते हैं कि ये प्रश्न नए नहीं हैं। पर ये प्रश्न इसलिए जरूरी हैं कि इन प्रश्नों ने हमारी कई पीढ़ियों को उद्वेलित किया है और आज भी इस पर बहस जारी है किन्तु किसी निश्चयात्मक उत्तर तक हम नहीं पहुँच पाये हैं। शायद पहुंचा भी नहीं जा सकता है- “भारतीय संस्कृति या भारतीयता क्या है? यह एक ‘अति प्रश्न’ (चरम प्रश्न) है। ‘अति प्रश्न’ का उत्तर परिभाषित करना संभव नहीं। जहां परिभाषा संभव नहीं वहाँ एक मात्र समाधान है ‘पहचान’ बनाना।” (मराल,पृ.160)  इस उद्घोष के साथ ही श्री कुबेरनाथ राय लेखन क्षेत्र में उतरते हैं और न केवल उतरते हैं अपितु इसकी पहचान की तलाश में गंगातीरी/भोजपुरी इलाके से लगायत ईशानकोण से प्रवहमान ब्रह्मपुत्र और काजीरङ्गा  तक की यात्रा करते/कराते  हैं।

          कुबेरनाथ राय अपने लेखन-उद्देश्य के प्रति सतत जागरूक रहे हैं-‘‘सच तो यह है कि मेरा सम्पूर्ण साहित्य या तो क्रोध है, नहीं तो अंतर का हाहाकार। पर इस क्रोध और आर्तनाद को मैंने सारे हिंदुस्तान के क्रोध और आर्तनाद के रूप में देखा है। इन निबंधों को लिखते समय मुझे सदैव अनुभव होता रहा : ‘अहं भारतोऽस्मि’।” (रस-आखेटक, पृ॰195) अपने एक निबंध संग्रह के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए वे लिखते  हैं- “निषाद-बांसुरी’ संग्रह का एक गौण उद्देश्य यह भी है : भारतीयता का प्रत्यभिज्ञान, अर्थात भारत की सही ‘आइडेंटिटी’ का पुनराविष्कार, जिससे वे जो कई हजार वर्षों से आत्महीनता की तमसा में आबद्ध रहें हैं.....।’’ (निषाद बांसुरी, पृ॰244)  श्री राय अपने सम्पूर्ण लेखन में उनकी अनिमेष लोचन-दृष्टि भारतीयता के गुणसूत्रों की तलाश करती है- “जिस ‘भारत’ की बात मेरे सम्पूर्ण साहित्य में आती गई है वह है इस देश का ‘चिन्मय’ और ‘मनोमय’ संस्करण। वह चिन्मय और मनोमय रूप किसी प्रकार की क्षुद्रता और संकीर्णता से ऊपर है। शिवत्व, बुद्धत्व, रामत्व ही इसके प्रतीक हैं।” (मराल, पृ- 168)


          
श्री राय की नजर में यह ‘भारतीयता’ किसी एक की बपौती नहीं अपितु ‘संयुक्त उत्तराधिकार’ है और इस उत्तराधिकार के रचयिता सिर्फ आर्य ही नहीं रहे हैं। वस्तुत: आर्यों के  नेतृत्व में इस संयुक्त उत्तराधिकार की रचना द्रविड़-निषाद-किरात ने की है। ग्राम-संस्कृति और कृषि-सभ्यता का बीजारोपण और विकास निषाद द्वारा हुआ है। नगर सभ्यता, कला-शिल्प, ध्यान-धारणा,  भक्तियोग के पीछे द्रविड़ मन है। आरण्यक शिल्प और  कला-संस्कारों  में किरातों का योगदान है।  श्री राय के लिए ‘भारतीयता’ कोई अमूर्त भाव अथवा यूटोपिया नहीं है अपितु प्रत्यक्ष सगुण रूप है- “मुझसे जब कोई पूछता है कि ‘भारतीयता क्या है’ तो मैं इसका एक शब्द में उत्तर देता हूँ, वह शब्द है ‘रामत्व’-राम जैसा होना ही सही ढंग की भारतीयता है। हमारे युग में  भी एक पुरुष ऐसा हो गया था जिसने राम जैसा होने की चेष्टा की और बहुत कुछ सफल भी रहा। वह पुरुष था महात्मा गांधी।” (त्रेता का वृहत्साम, पृ.165) श्री राय के लिए ‘भारत’ कोई ‘मानसिक भोग’ या ‘भौगोलिक सत्ता’ नहीं है। यह उससे बढ़कर ‘एक प्रकाशमय, संगीतमय भाव-प्रत्यय या चैतन्य-प्रतिमा का रूप’ तो है ही ‘अधिक सत्य एवं शाश्वत’ भी है। (कामधेनु, पृ.90) श्री राय का आग्रह है कि ‘भारत’ को मात्र एक राजनीतिक और भौगोलिक इकाई के रूप मे न देखकर उसे भारतीय मनुष्य, भारतीय धरती और भारतीय संस्कार के त्रिक के रूप में देखना चाहिए। एक राजनीतिक इकाई मात्र मान लेने से ‘भारत’ का अस्तित्व एक मतदाता सूची में बदल जाता है।  एक भौगोलिक  इकाई मात्र स्वीकार कर लेने पर उसका बंटवारा हो सकता है। पर एक संस्कार समूह और बोध सत्ता के रूप मे उसका विशिष्ट निराकार रूप कालजयी है- “भारत की यह निराकार मूर्ति  (अर्थात ‘संस्कार समूह’ के रूप में) सूक्ष्मतर होने की वजह से अधिक कालजयी है। कोई जवाहरलाल या कोई जिन्ना इसका’ पार्टीशन’ या बंदर-बाँट नहीं कर सकता।” (कामधेनु, पृ.-90) महात्मा गांधी ने भी ‘हिन्द-स्वराज’ में इसी बात को थोड़ा और गर्वीले भाव में कहा है -‘हिंदुस्तान को बहुत से अक्ल देने वाले आए और गए पर हिंदुस्तान जस का तस रहा’ । अपने एक अन्य निबंध संग्रह ‘मराल’ में श्री राय ‘भारतीयता’ को और भी स्पष्ट करते हैं- “अत: ‘राम’ शब्द के मर्म को पहचानने का अर्थ है भारतीयता के सारे स्तरों के आदर्श रूप को पहचानना..... सही भारतीयता क्षुद्र, संकीर्ण राष्ट्रीयता के दम्भ से बिल्कुल अलग तथ्य है। यह ‘सर्वोत्तम मनुष्यत्व’ है। पूर्ण ‘भारतीय’ बनने का अर्थ  है ‘राम’ जैसा बनना।” (मराल, पृ.163)

          कुबेरनाथ राय की दृष्टि में ‘भारत भूगोल से ज्यादा एक जीवन दर्शन और एक मूल्य परंपरा है’, जिसे वे  ‘मनुष्यत्व का महायान’ कहते हैं। (उत्तरकुरु, पृ.-105) इसके पीछे के कारणों को भी वे स्पष्ट करते हैं- “इसी जम्बूद्वीप में देवता मनुष्य के लोक में नीचे उतरकर मनुष्यों के साथ ‘मिश्र’ होकर रहते आये हैं।” (उत्तरकुरु, पृ.-105)  देवता से उनका तात्पर्य किसी पारलौकिक सत्ता से न होकर देवोपम जीवन दृष्टि से है। वे लिखते हैं– “वह सारी मानसिक ऋद्धि, मानसिक दिव्यता जिसकी कल्पना देवता में की जाय यदि किसी मनुष्य में उतर जाये तो वह देवोपम हो जाता है।” (उत्तरकुरु, पृ.-105-6) इसी देवोपम की पहचान ही असल में ‘भारतीयता’ की पहचान है। इस पहचान-स्वरूप की निर्मिति के लिए वे इतिहास में पसरे कला, शिल्प, शास्त्र के खोह में प्रवेश करते चले जाते हैं और वहाँ से ‘भारतीयता की मणि’ लेकर निकलते हैं।   


          
प्रसिद्ध समाजशास्त्री डा श्यामाचरण दुबे ने अपने निबंध ‘भारतीयता की तलाश’ में भारतीयता की सही समझ की कुछ पूर्व शर्तों की ओर इशारा किया है, जिनमें ‘इतिहास दृष्टि’, ‘परंपरा बोध’, ‘समग्र जीवन-दृष्टि’ और ‘वैज्ञानिक विवेक’ प्रमुख हैं। (समय और संस्कृति, पृ- 44-5) श्री राय के लेखन में यह ‘चतुरानन-दृष्टि’ हर जगह देखने को मिलती  है। ‘भारतीयता’ की पहचान के लिए जिस शास्त्रीय, स्थानीय और क्षेत्रीय परम्पराओं के अंतरावलंबन की  सूक्ष्म समझ की आवश्यकता पर डॉ श्यामाचरण दुबे ने जोर दिया है, वह श्री राय को संस्कार में मिली है। कला-शिल्प की आंतरिक संरचना और बुनावट को जिस आत्मीयता से वे प्रस्तुत करते हैं, वह अद्भुत तो है ही असल ‘भारतीय मन’ का प्रमाण भी है। महाकवि कालिदास की अमरकृति ‘शकुंतला’ उनके लिए ‘दुष्यंत-शकुंतला’ की प्रणय-गाथा मात्र न होकर ‘भारतीयता की निर्मिति’ के एक महत्वपूर्ण कोण की तरफ इशारा करती है। उनकी दृष्टि में यह कथा आर्येतर और आर्य के महासमन्वय और वर्णाश्रम के सही ऐतिहासिक स्वरूप की ओर इशारा करने के साथ ही भारतीय धर्म साधना की पूर्णांगता को भी प्रस्तुत करती है, जिसके अनुसार काम और तप परस्पर विरोधी न होकर सहजीवी हैं। भारत के जल-जंगल-जमीन को लेकर लिखे गये उनके निबंधो में ‘भारतीयता’ का इंद्र्धनुषी रूप देखने को मिलता है। इस ‘आसेतु हिमाचल वसुंधरा’ को वे मामूली मिट्टी मानने के लिए कत्तई तैयार नहीं हैं। यह उनके लिए ‘साक्षात देव-विग्रह’ है जिसे ‘कोई जय नहीं कर सकता’। ‘महीमाता’ निबंध में भारतवर्ष के मृण्मय स्वरूप की सार्थक विवेचना करते हुए श्री राय ने यह सिद्ध किया है कि भारत का सिर्फ झंडा ही तिरंगा नहीं  है अपितु ‘मिट्टी के रंग की दृष्टि से यह भारतवर्ष तिरंगा, त्रिवर्णी भूमि है- सादी, लाल और काली’। श्री राय की नजर में ‘यह स्वर्णगर्भा वसुंधरा है, शस्य लक्ष्मी,... साक्षात माता है’। (निषाद बांसुरी, पृ.-84)

          श्री राय एक जगह लिखते हैं कि ‘भारतीय सभ्यता में बाह्य तत्वों को आत्मसात करने की अपूर्व क्षमता थी। ऐसे तत्वों का भारतीय सांस्कृतिक परिवेश में अनुकूलन भी हुआ,समाकलन भी’। सच तो यह है कि भारतीयता का विकास एक लम्बी सांस्कृतिक यात्रा है। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। लेकिन आज परिस्थितियां भिन्न हैं। आज हम पर फिर चौतरफा आक्रमण हो रहा है। हर्षवर्धनोत्तर काल में जो स्थिति पैदा हुई थी कुछ वैसी ही परिस्थितियां आज फिर से हमारे सामने उत्पन्न हो गई हैं। आज बड़ी सफाई और बारीकी से ‘भारतीयता’ को कुचलने की कोशिश हो रही है- “भारतीयता के सगुण प्रतीक ‘महात्मा गांधी’ के नाम को ही मिटाने की कोशिश हो रही है। इसी के साथ ‘अन्नों के देशी बीज, पशुओं की देशी नस्लें, देशी भूषा और सज्जा, देशी भाषा और शब्दावली सब कुछ से हमें धीरे-धीरे काटने की कोशिश चालू है जिससे हम सर्वथा जड़-मूलहीन हो जाएँ। अत: ठहरकर सोचने की जरूरत है। आज हमारे लिए जरूरी है कि पश्चिमी मानसिकता को निरंतर उधार लेने की जगह अपने देशी मानसिक उत्तराधिकारों की चर्चा करें।” (उत्तरकुरु, पृ.-70) सरस्वती के वरद पुत्र श्री कुबेरनाथ राय की यह चिंता अत्यंत सहज और स्वाभाविक है। उनके लेखन का गम्भीर अनुशीलन आवश्यक है। ‘भारतीयता’ के महत्वपूर्ण प्रतीकों की सारगर्भित विवेचना जिस ईमानदारी और प्रमाणिकता के साथ उन्होने अपने निबंधों में की है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। आज समय की मांग है कि हम उसे समझकर सही परिप्रेक्ष्य में समाज के सामने रखें। 

          श्री राय की एक बड़ी चिंता है हमारा अपनी जड़ों से अपरिचित होना। प्रसिद्ध समाजशास्त्री  डॉ श्यामा चरण दुबे ने भी स्वीकार किया है कि “जड़ों की तलाश एक बुनियादी सवाल है। वह एक सार्थक जिज्ञासा से जुड़ा है और अस्तित्वबोध को एक नया आयाम और नए मूल्य देता है।” (समय और संस्कृति, पृ.-44) श्री राय का मानना है कि पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों में इस आर्ष चिंतन को अँग्रेजी भाषा के माध्यम से गलत ढंग से समझा और परोसा जा रहा है। स्वतंत्र भारत के बुद्धिजीवी अपने निजी पर्यवेक्षण, अपनी भारतीय दृष्टि और अपने भारतीय स्रोतों के आधार पर आर्ष चिंतन और भारतीय समाज को समझने तथा तत्संबंधी सिद्धांतों को विकसित करने की अपेक्षा पश्चिमी अवधारणाओं और प्रत्ययों के सहारे अपने अधूरे सरलीकरण प्रस्तुत कर रहे हैं जिनसे देश का भयानक अहित अवश्यंभावी है। सच तो यह है कि भारतीय चिंतन और संरचना को ठीक-ठीक समझने के लिए भारतीय बुद्धिजीवियों को अपना निजी समाजशास्त्र या देशी नृतत्वशास्त्र या सौन्दर्य शास्त्र विकसित करना चाहिए। श्री राय इन्हीं जड़ों की तलाश में निरंतर मानसिक यात्रा करते रहे हैं। श्री राय विदेशी विद्वानों से विचारों के आदान-प्रदान के विरोधी नहीं हैं। परंतु गांधी की ही तरह अपने घर की खिड़कियों को खोले रखने के साथ–साथ अपनी निजी-देशी-सोंधी जमीन-‘हमारे हरि हारिल की लकड़ी’-को मजबूती से पकड़े रखने का आग्रह करते हैं। श्री राय उसी आर्ष चिंतन परंपरा के प्रामाणिक दस्तावेज़ के साथ हमारे सामने उपस्थित होते हैं। इसके लिए वे नृतत्व शास्त्र के साथ-साथ भाषा विज्ञान का भी सहारा लेते हैं और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भारतवर्ष को जानने के लिए ‘भारत’ और ‘भारतीय विश्व’ को जानना आवश्यक है। भारतीयता की तलाश का रास्ता-लेखन नीरस और उबाऊ न हो इसके लिए उन्होने आवश्यकतानुसार ‘लालित्य’ का खूब सहारा लिया है। भारतीयता की समझ के लिए लालित्य-बोध एक आवश्यक कड़ी है क्योंकि भारतीयता एक ही साथ ‘भावना’ और ‘मनोदशा’ दोनों है। बोधयुक्त देशज लालित्य के अखाड़े में खड़े श्री राय दोनों भुजाओं और जंघों पर भीम-ताल ठोंक कर चुनौती देते हैं। यह सच है कि इस तरह की यह ललकार तो कोई ‘मरदवा’ ही दे सकता है जिसकी अपनी जमीन उर्वरा शक्ति से भरपूर हो।

          यह एक तथ्य है कि स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद ही देश में एक सांस्कृतिक अराजकता की शुरुआत हो गई थी। हुमायूँ कबीर जैसे लोगों ने उल-जुलूल व्याख्या से इसकी शुरुआत की और नुरूल हसन की छ्त्रछाया में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने इसे खाद-पानी दिया। परिणाम यह हुआ कि आज राष्ट्रीय भावनाएँ बड़ी तेजी से अशक्त और निष्प्राण होती जा रही हैं। हम बेझिझक पश्चिम का अनुकरण कर अपनी अस्मिता खोते जा रहे हैं। कल तक यह प्रवृत्ति एक छोटे और प्रभावशाली तबके तक ही सीमित थी पर अब उसका फैलाव बड़ी तेजी से बढ़ता जा रहा है। आज हम सब इस बात से परिचित हैं कि संस्कृति आज की दुनिया में एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में उभर रही है। अपने स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्र और संस्थायें इसका खुलकर उपयोग कर रही हैं। यदि हम निष्ठा और प्रतिबद्धता से भारतीयता की तलाश करें, उसे पहचाने और आत्मसात करने की कोशिश करें  तो उन पर रोक लग सकती है। पर यह कहने और लिखने में जितना आसान है उतना ही व्यवहार में जटिल भी  है।

          भारतीयता की पहचान का असल स्वरूप हमें उसकी वांगमय परंपरा अर्थात साहित्य और शिल्प में देखने को मिलता है। इस पहचान के उद्घाटन के लिए हमारा आर्ष चिंतन से परिचित होना जरूरी है। ‘चिन्मय भारत’ नामक पुस्तक में श्री राय ने आर्ष चिंतन के बुनियादी सूत्रों को स्पष्ट करने की कोशिश की है- “आर्ष से हमारा तात्पर्य ‘वैदिक’ मात्र या ‘ऋषि दृष्टि प्रसूत’ मात्र नहीं है। हम उस पूरी परंपरा को, जो ऋषि के अनुधावन से बनती है, आर्ष परंपरा मानते हैं। आर्ष से हमारा तात्पर्य उस समूची चिंतन परंपरा से जिसका प्रस्थान बिन्दु तो ऋषि ही है, पर अविच्छिन्न रूप में कालिदास, शंकराचार्य, रामानुज-वल्लभ-चैतन्य, संत और भक्त से होती हुई आधुनिक गांधी-अरविंद तक आती है। बीज है ऋषि और भारतीय चिंतन का यह अश्वत्थ अभी तक विराजमान है। वृक्ष बीज के आधार पर ही नामांकित होता है। अत: इस इतिहासव्यापी अखंड चिंतन परंपरा की संज्ञा आर्ष हो सकती है।” (चिन्मय भारत, पृ.-16-17)

          आज जब समाज के सभी तबके- बुद्धिजीवी से लेकर साहित्यकार तक सभी सरकार-बाजार के पिछलग्गू बनने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं वैसे समय में श्री राय गंगातीरी पगड़ी बांधे हुए कंधे पर मजबूत देशी में भारतीयता का अमृत-घट लटकाये हुए आर्यावर्त से लगायत जंबूद्वीपे-भरतखंडे की परिक्रमा करते हैं। इस बोध-परिक्रमा के  लिए जिस अकुंठ साहस, निर्भयता, स्पष्टता और दोटूकपन की जरूरत होती है वह कुबेरनाथ राय के लेखन में सर्वत्र मौजूद है। श्री राय ने भारतीयता के उदात्त तत्वों को न केवल आत्मसात किया है अपितु अपने निबंधों में इसकी गंभीर विवेचना भी की है। उनकी तर्कशक्ति अद्भुत है। इसे धार देने के लिए वे विज्ञान, नृतत्व शास्त्र, भाषा विज्ञान, मिथक, इतिहास आदि अनुशासनों का यथासंभव सहारा भी लेते हैं। श्री राय किसी के विरोध या उपेक्षा से मुक्त  सम्पूर्ण आर्यावर्त में शिव के सांड की तरह मुक्त विचरण करते हैं। सच तो यह है कि श्री राय अपने आत्मलब्ध सत्य के प्रति न केवल पूरी  तरह ईमानदार हैं अपितु  साहस के साथ उसकी अभिव्यक्ति भी करते हैं जिसका प्रथम और आखिरी सूत्र है-‘अहं भारतोऽस्मि’।

डॉ मनोज राय
-एसोसिएट प्रोफेसर
अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा

(डॉ मनोज राय  गांधीवादी चिंतक हैं। हिन्द स्वराज पर आपकी एक पुस्तक ‘हिन्द स्वराज अरथ अमित आखर अति थोरे’ शीर्षक से प्रकाशित है। आपने ‘बापू ने कहा था’ शीर्षक से गांधी जी के साहित्य से 19 महत्त्वपूर्ण लेखों को चुनकर एक पुस्तक संपादित की है। ‘महात्मा गांधी का सौन्दर्य बोध’, ‘गांधी चिंतन में योग और शांति’ तथा ‘महात्मा गांधी की धर्म दृष्टि’ शीर्षक से आपकी अन्य उल्लेखनीय पुस्तकें प्रकाशित हैं। आप वर्तमान में अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। आपकी कृति ‘महात्मा गांधी की धर्म दृष्टि’ को मध्य प्रदेश विधानसभा द्वारा गांधी दर्शन पुरस्कार प्राप्त है। आप कुबेरनाथ राय साहित्य के मर्मज्ञ हैं। उनके साहित्य का जैसा अनुशीलन आपने किया है, वह मेरे देखे अनूठा है। 

आज कुबेरनाथ राय की पुण्यतिथि पर यह विशेष आलेख मेरा गाँव मेरा देश पर विशेष रूप से आपके लिए।)

सद्य: आलोकित!

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