जयशंकर प्रसाद विरचित आंसू खण्ड काव्य से यह अंश बी ए प्रथम सेमेस्टर के विद्यार्थियों की सुविधा के लिए यहाँ प्रस्तुत है. यह अंश जयशंकर प्रसाद की काव्यात्मक प्रतिभा और उनकी छायावादी वृत्ति का परिचय देता है.
सोमवार, 14 सितंबर 2026
आंसू खण्ड काव्य से!
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
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श्रद्धा सर्ग (कामायनी ) - जयशंकर प्रसाद

(कामायनी में कुल 15 सर्ग हैं- 1. चिन्ता 2. आशा 3. श्रद्धा 4. काम 5. वासना 6. लज्जा 7. कर्म 8. ईर्ष्या 9. इड़ा 10. स्वप्न 11. संघर्ष 12. निर्वेद 13. दर्शन 14. रहस्य 15. आनन्द.
इसके तीसरे सर्ग 'श्रद्धा' में जल प्रलय से हताश और निराश मनु और श्रद्धा की भेंट का वर्णन है। श्रद्धा मनु को निराशा से उबारकर कर्म, प्रेम और सकारात्मकता का संदेश देती है तथा उनके जीवन में नई आशा का संचार करती है। श्रद्धा के इस प्रेरणास्पद सहयोग से मनु एक नई सृष्टि के आरंभ के लिए तैयार होते हैं। इस सर्ग में श्रद्धा के सौंदर्य का बहुत उत्कृष्ट वर्णन किया है.)
“कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर
तरंगों से फेंकी मणि एक,
कर रहे निर्जन का चुपचाप
प्रभा की धारा से अभिषेक!
मधुर विश्रांत और एकांत—
जगत का सुलझा हुआ रहस्य,
एक करुणामय सुंदर मौन
और चंचल मन का आलस्य!”
सुना यह मनु ने मधु-गुंजार
मधुकरी का-सा जब सानंद,
किए मुख नीचा कमल समान
प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद;
एक झिटका-सा लगा सहर्ष,
निरखने लगे लुटे-से, कौन—
गा रहा यह सुंदर संगीत?
कुतूहल रह न सका फिर मौन!
और देखा वह सुंदर दृश्य
नयन का इंद्रजाल अभिराम;
कुसुम-वैभव में लता समान
चंद्रिका से लिपटा घन श्याम।
हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
एक लंबी काया, उन्मुक्त;
मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल
सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।
मसृण गांधार देश के, नील
रोम वाले मेघों के चर्म,
ढँक रहे थे उसका वपु कांत
बन रहा था वह कोम वर्म।
नील परिधान बीच सुकुमार
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग;
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ-बन बीच गुलाबी रंग।
आह! वह मुख! पश्चिम के व्योम—
बीच जब घिरते हों घन श्याम;
अरुण रवि-मंडल उनको भेद
दिखाई देता हो छविधाम।
या कि, नव इंद्र नील लघु शृंग
फोड़ कर धधक रही हो कांत;
एक लघु ज्वालामुखी अचेत
माधवी रजनी में अश्रांत।
घिर रहे थे घुँघराले बाल
अंस अवलंबित मुख के पास;
नील घन-शावक से सुकुमार
सुधा भरने को विधु के पास।
और उस मुख पर वह मुस्क्यान!
रक्त किसलय पर ले विश्राम
अरुण की एक किरण अम्लान
अधिक अलसाई हो अभिराम।
नित्य यौवन छवि से ही दीप्त
विश्व की करुण कामना मूर्ति;
स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण
प्रकट करती ज्यों जड़ से स्फूर्ति।
उषा की पहिली लेखा कांत,
माधुरी से भींगी भर मोद;
मद भरी जैसे उठे सलज्ज
भोर की तारक द्युति की गोद।
कुसुम कानन-अंचल में मंद
पवन प्रेरित सौरभ साकार,
रचित परमाणु पराग शरीर
खड़ा हो ले मधु का आधार।
और पड़ती हो उस पर शुभ्र
नवल मधु-राका मन की साध;
हँसी का मद विह्वल प्रतिबिंब
मधुरिमा खेला सदृश अबाध।
कहा मनु ने, “नभ धरणी बीच
बना जीवन रहस्य निरुपाय;
एक उल्का-सा जलता भ्रांत,
शून्य में फिरता हूँ असहाय।
शैल निर्झर न बना हतभाग्य
गल नहीं सका जो कि हिम-खंड,
दौड़कर मिला न जलनिधि अंक
आह वैसा ही हूँ पाषंड।
पहेली-सा जीवन है व्यस्त
उसे सुलझाने का अभिमान,
बताता है विस्मृति का मार्ग
चल रहा हूँ बन कर अनजान।
भूलता ही जाता दिन-रात
सजल अभिलाषा कलित अतीत;
बढ़ रहा तिमिर गर्भ में नित्य,
दीन जीवन का यह संगीत।
क्या कहूँ, क्या कहूँ मैं उद्भ्रांत?
विवर में नील गगन के आज,
वायु की झटकी एक तरंग,
शून्यता का उजड़ा-सा राज।
एक विस्मृति का स्तूप अचेत,
ज्योति का धुँधला-सा प्रतिबिंब;
और जड़ता की जीवन राशि
सफलता का संकलित विलंब।
“कौन हो तुम वसंत के दूत?
विरस पतझड़ में अति सुकुमार!
घन तिमिर में चपला की रेख,
तपन में शीतल मंद बयार।
नखत की आशा किरण समान,
हृदय की कोमल कवि की कांत—
कल्पना की लघु लहरी दिव्य
कर रही मानस हलचल शांत!”
लगा कहने आगंतुक व्यक्ति
मिटाता उत्कंठा सविशेष;
दे रहा हो कोकिल सानंद
सुमन को ज्यों मधुमय संदेश:
“भरा था मन में नव उत्साह
सीख लूँ ललित कला का ज्ञान
इधर रह गंधर्वों के देश
पिता की हूँ प्यारी संतान।
घूमने का मेरा अभ्यास,
बढ़ा था मुक्त व्योम-तल नित्य;
कुतूहल खोज रहा था व्यस्त
हृदय सत्ता का सुंदर सत्य।
दृष्टि जब जाती हिम-गिरि ओर
प्रश्न करता मन अधिक अधीर,
धरा की यह सिकुड़न भयभीत
आह कैसी है? क्या है पीर?
मधुरिमा में अपनी ही मौन,
एक सोया संदेश महान,
सजग हो करता था संकेत;
चेतना मचल उठी अनजान।
बढ़ा मन और चले ये पैर,
शैल मालाओं का शृंगार;
आँख की भूख मिटी यह देख
आह कितना सुंदर संभार!
एक दिन सहसा सुंधु अपार
लगा टकराने नग तल क्षुब्ध;
अकेला यह जीवन निरुपाय
आज तक घूम रहा विश्रब्ध।
यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न,
भूत-हित-रत किसका यह दान!
इधर कोई है अभी सजीव
हुआ ऐसा मन में अनुमान।
तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत?
वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश
बताओ यह कैसा उद्वेग!
हृदय में क्या है नहीं अधीर,
लालसा जीवन की निश्शेष?
कर रहा वंचित कहीं न त्याग
तुम्हें, मन में धर सुंदर वेश!
दु:ख के डर से तुम अज्ञात
जटिलताओं का कर अनुमान,
काम से झिझक रहे हो आज,
भविष्यत् से बन कर अनजान।
कर रही लीलामय आनंद,
महा चिति सजग हुई सी व्यक्त,
विश्व का उन्मीलन अभिराम
इसी में सब होते अनुरक्त।
काम मंगल से मंडित श्रेय
स्वर्ग, इच्छा का है परिणाम;
तिरस्कृत कर उसको तुम भूल
बनाते हो असफल भवधाम।
“दु:ख की पिछली रजनी बीच
विकसता सुख का नवल प्रभात;
एक परदा यह झीना नील
छिपाए है जिसमें सुख गात।
जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल;
ईश का वह रहस्य वरदान,
कभी मत इसको जाओ भूल।
विषमता की पीड़ा से व्यस्त
हो रहा स्पंदित विश्व महान;
यही दु:ख सुख विकास का सत्य
यही भूमा का मधुमय दान।
नित्य समरसता का अधिकार,
उमड़ता कारण जलधि समान;
व्यथा से नीली लहरों बीच
बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!”
लगे कहने मनु सहित विषाद:-
“मधुर मारुत से ये उच्छ्वास
अधिक उत्साह तरंग अबाध
उठाते मानस में सविलास।
किंतु जीवन कितना निरुपाय!
लिया है देख नहीं संदेह
निराशा है जिसका परिणाम
सफलता का वह कल्पित गेह।“
कहा आगंतुक ने सस्नेह:-
“अरे तुम इतने हुए अधीर!
हार बैठे जीवन का दाँव,
जीतते मर कर जिसको वीर।
तप नहीं केवल जीवन सत्य
करुण यह क्षणिक दीन अवसाद;
तरल आकांक्षा से है भरा
सो रहा आशा का आह्लाद।
प्रकृति के यौवन का शृंगार
करेंगे कभी न बासी फूल;
मिलेंगे वे जाकर अति शीघ्र
आह उत्सुक है उनकी धूल।
पुरातनता का यह निर्मोक
सहन करती न प्रकृति पल एक;
नित्य नूतनता का आनंद
किए हैं परिवर्तन में टेक।
युगों की चट्टानों पर सृष्टि
डाल पद-चिह्न चली गंभीर;
देव, गंधर्व, असुर की पंक्ति
अनुसरण करती उसे अधीर।
“एक तुम, यह विस्तृत भू-खंड
प्रकृति वैभव से भरा अमंद;
कर्म का भोग, भोग का कर्म
यही जड़ का चेतन आनंद।
अकेले तुम कैसे असहाय
यजन कर सकते? तुच्छ विचार!
तपस्वी! आकर्षण से हीन
कर सके नहीं आत्म विस्तार।
दब रहे हो अपने ही बोझ
खोजते भी न कहीं अवलंब;
तुम्हारा सहचर बन कर क्या न
उऋण होऊँ मैं बिना विलंब?
समर्पण लो सेवा का सार
सजल संसृति का यह पतवार,
आज से यह जीवन उत्सर्ग
इसी पद तल में विगत विकार।
दया, माया, ममता लो आज,
मधुरिमा लो, अगाध विश्वास;
हमारा हृदय रत्न निधि स्वच्छ
तुम्हारे लिए खुला है पास।
बनो संसृति के मूल रहस्य
तुम्हीं से फैलेगी वह बेल;
विश्व भर सौरभ से भर जाए
सुमन खेलो सुंदर खेल।
“और यह क्या तुम सुनते नहीं
विधाता का मंगल वरदान—
‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो,
विश्व में गूँज रहा जय गान।
“डरो मत अरे अमृत संतान
अग्रसर है मंगलमय वृद्धि;
पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र
खिंची आवेगी सकल समृद्धि।
देव-असफलताओं का ध्वंस
प्रचुर उपकरण जुटाकर आज;
पड़ा है बन मानव संपत्ति
पूर्ण हो मन का चेतन राज।
चेतना का सुंदर इतिहास
अखिल मानव भावों का सत्य;
विश्व के हृदय-पटल पर दिव्य
अक्षरों से अंकित हो नित्य।
विधाता की कल्याणी सृष्टि
सफल हो इस भूतल पर पूर्ण;
पटें सागर, बिखरें ग्रह-पुंज
और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।
उन्हें चिंगारी सदृश सदर्प
कुचलती रहे खड़ी सानंद;
आज से मानवता की कीर्ति
अनिल, भू, जल में रहे न बंद।
जलधि में फूटें कितने उत्स
द्वीप, कच्छप डूबें-उतराएँ;
किंतु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति
अभ्युदय का कर रही उपाय।
विश्व की दुर्बलता बल बने,
पराजय का बढ़ता व्यापार
हँसाता रहे उसे सविलास
शक्ति का क्रीड़ामय संचार।
शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त
विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करें समस्त
विजयिनी मानवता हो जाए।
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
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बुधवार, 10 अगस्त 2022
केशवदास की कविप्रिया से
काव्य दूषण वर्णन (तीसरा
प्रभाव)
समझैं बाला बालकहूं, वर्णन पंथ अगाध।
कविप्रिया केशव करी, छमियो कवि अपराध ॥1॥
भावार्थ :- बालक, युवक और युवती आदि के समझने के लिए, इस कविकर्म के गहरे, दुरूह और कठिन मार्ग का वर्णन करने के लिए, (काव्य के अंग-उपांग आदि को समझाने के लिए) कवि केशव दास ने यह कविप्रिया नामक ग्रंथ बनाया है। यदि इस अनुक्रम में कोई अपराध हो जाये तो वह क्षमा कर दिया जाना चाहिए।
अलंकार कवितान के, सुनि सुनि विविध विचार।
कवि प्रिया केशव करी, कविता को सिंगार ॥2॥
भावार्थ :- कवि
केशवदास कहते हैं कि कविता के अलंकरण के सम्बन्ध में विविध प्रकार के आचार्य, कवियों, काव्य
मर्मज्ञ जनों के विचार सुन सुनकर उन्होंने कविप्रिया का प्रबन्धन किया है ताकि
कविता का शृंगार किया जा सके।
कविप्रिया प्रबंध में इन्हीं स्थापनाओं के कारण केशवदास को आचार्य का पद दिया गया है और उन्हें अलंकारवादी कहा गया है। वह कविता के सौन्दर्य में अलंकारों को बहुत महत्त्व देने वाले कवि/आचार्य हैं।
चरण धरत, चिन्ता करत, नींद न भावत
शोर।
सुबरण को सोधत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर॥3॥
भावार्थ :- केशवदास इस दोहे में श्लेष अलंकार का प्रयोग करते हुए लिखते हैं कि कवि, व्यभिचारी और चोर; तीनों ही प्रकार के लोगों को सुवर्ण की चाह रहती है और वह उसे खोजते फिरते हैं। सुवर्ण की चाह में ही वह अपने पैर रखते हैं यानि किसी भी तरह का प्रयास, उद्योग करते हैं। उसके विषय में सोचते और मनन करते हैं। इस क्रम में उन्हें नींद भी नहीं आती और उन्हें हल्ला-गुल्ला, शोर कतई पसंद नहीं आता। यहाँ सुवर्ण का अर्थ चोर के लिए सोना, व्यभिचारी के लिए अच्छे वर्ण यानि रंग-रूप वाला तथा कवि के लिए काव्योचित अक्षर हैं।
राजत रंच न दोष युत, कविता, बनिता, मित्र।
बुंदक हाला परत ज्यों, गंगाघट अपवित्र॥4॥
भावार्थ :- कवि केशवदास का मानना है कि कविता, स्त्री तथा मित्र में थोड़ा सा भी दोष हो तो वह रंच मात्र भी शोभित नहीं होते। अर्थात दोषपूर्ण होने से कविता, स्त्री और मित्र अच्छा नहीं माने जाते। जिस प्रकार मदिरा की एक बूंद पड़ते ही गंगा जल का भरा हुआ पूरा घड़ा ही अपवित्र हो जाता है।
(केशवदास हिन्दी में रीतिकाल के सबसे प्रतिभाशाली कवियों में
से एक हैं। रामचंद्रिका, कविप्रिया, रसिकप्रिया, छंदमाला और जहांगीर जसचन्द्रिका उनकी प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं। इनमें उनका कवि और आचार्य रूप परस्पर गुंथा हुआ मिलता है।
रामचन्द्रिका उनकी कीर्ति का आधार ग्रंथ है जिसमें छंदों का बाहुल्य है। केशवदास
की कविता की गूढ़ता, विशिष्टता, चौंकाने
वाली सोच तथा अभिनव प्रयोग करने की प्रवृत्ति ने उन्हें कठिन काव्य का प्रेत बना
दिया है। रामचन्द्रिका में इतने प्रकार के छंद प्रयुक्त हुए हैं कि रामचन्द्र
शुक्ल ने इस ग्रंथ को छंदों का अजायबघर कहा है।
यहाँ उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय के बी ए प्रथम सेमेस्टर हिन्दी के विद्यार्थियों की सुविधा के लिए उनके पाठ्यक्रम में निर्धारित केशवदास की कविप्रिया से चार छंद (दोहा) और उनका भावार्थ प्रस्तुत किया गया है ताकि उन्हें समझने में आसानी हो।)
प्रस्तुति- डॉ रमाकान्त राय
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी
पंचायत राज राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
इटावा उत्तर प्रदेश 206001
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
मोबाइल- कमेंट box में पूछें।
E-mail- royramakantrk@gmail.com
बुधवार, 22 सितंबर 2021
गोरखबानी की सबदी : गोरखनाथ
(२)
अदेषि देषिबा देषि बिचारिबा अदिसिटी राषिबा चीया।
पाताल की गंगा ब्रह्मण्ड चढ़ाइबा, तहां बिमल जल पीया।
अर्थ- न देखे हुए (परब्रह्म) को देखना चाहिए। देख कर उस पर विचार करना चाहिए। जो आंखों से देखा नहीं जा सकता उसे चित्त में रखना चाहिए। पाताल (मणिपुर चक्र) की गंगा (योगिनी शक्ति, कुंडलिनी) को ब्रह्मांड (ब्रह्मरंध्र, सहस्रार या सहस्रदल कमल) में प्रेरित करना चाहिए। वहीं पहुंचकर (योगी साक्षात्काररूपी) निर्मल रस पीता है।
(४)
बेद कतेब न षांणीं। सब ढंकी यदि आंणीं।।
गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या। तहं बूझै अलष बिनांणीं।
अर्थ- (परब्रह्म का ठीक-ठीक निर्वचन) न वेद कर पाए हैं, न किताबी धर्मों की पुस्तकें और न चारों खानि की वाणी। यह सब तो उसे आच्छादन (ढंकी) के नीचे ले आए हैं। उन्होंने तो सत्य को प्रकट करने के बदले उस पर आवरण डाल दिया है। यदि ब्रह्म के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान तुम्हें अभीष्ट है तो ब्रह्मरंध्र (गगन शिखर) में समाधि द्वारा जो शब्द प्रकाश में आता है उसमें विज्ञान रूप अलक्ष्य परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करे।
(७)
हसिबा
षेलिबा रहिबा रंग। कांम क्रोध न करिबा संग।।
हसिबा षेलिबा गाइबा गीत। दिढ करि राषि आपनां चीत।।
अर्थ- हंसना चाहिए, खेलना चाहिए, मस्त रहना चाहिए किंतु कभी काम क्रोध का साथ ना करना चाहिए। हंसना, खेलना और गीत भी गाना चाहिए किंतु अपने चित्त को दृढ़ करके रखना चाहिए।
(८)
हसिबा षेलिबा धरिबा ध्यांन। अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियान।।
हसै षेलै न करै मन भंग। ते निहचल सदा नाथ कै संग।।
अर्थ- हंसना खेलना और ध्यान धरना चाहिए, रात-दिन ब्रह्म ज्ञान का कथन करना चाहिए। इस प्रकार (संयम पूर्वक) हंसते खेलते हुए जो अपने मन को भंग नहीं करते, वे निश्चल होकर ब्रह्म के साथ रमण करते हैं।
(१६)
अह निसि
मन लै रहे उनमन गम की छांड़ि अगम की कहै।
छांड़ै आसा रहै निरास, कहै
ब्रह्मा हूं ताका दास।।
अर्थ- जो रात दिन बहिर्मुख मन को उन्मनावस्था में लीन किए रहता है, गम्य जगत की बातें छोड़कर अगम्य आध्यात्मिक क्षेत्र की बातें करता है, सब आशाओं को छोड़ देता है, कोई आशा नहीं रखता, वह ब्रह्मा से भी बढ़कर है, ब्रह्मा उसका दासत्व स्वीकार करता है।
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| गोरखबानी :गोरखनाथ |
टिप्पणी-
गोरखबानी गुरु गोरक्ष नाथ (गोरखनाथ) के सबदी
और पदों का संकलन है। सबदी दोहे की तरह का एक छंद है। यह शब्द का अपभ्रंश रूप है।
गुरु के वचनों को इसमें संकलित किया गया है। इनमें उच्च दार्शनिक विचार समाहित
हैं। गुरु गोरखनाथ ने आचार-विचार, संयम नियम और गुरु आदि की महत्ता
पर सबदी की हैं।
उत्तर
प्रदेश के विश्वविद्यालयों में पीतांबरदत्त बड़थ्यवाल द्वारा संपादित गोरखबानी से
पाँच सबदी २, ४, ७, ८ और १६ को बी ए हिन्दी के प्रथम सेमेस्टर के पाठ्यक्रम में रखा गया है। उन्हीं पाँच सबदी को
यहाँ विद्यार्थियों की सुविधा के लिए अविकल रखने का प्रयास किया गया है।
हम
आशान्वित हैं कि विद्यार्थी इससे लाभान्वित होंगे और सही तथा सटीक पाठ से परिचित
हो सकेंगे।- सम्पादक
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
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सद्य: आलोकित!
सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty)
सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। इसका उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली की...


