शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2020

सबको साधने में बिखर गया मिर्जापुर का सीजन -2

क्या सबको साधने में मिर्जापुर-2 बिखर गया हैनवरात्रि में मिर्जापुर-2 के अमेज़न प्राइम पर जारी होने का दबाव इस वेबसीरीज़ पर रहा हैनवरात्रि में स्त्री सशक्तिकरण के पारंपरिक विमर्श से इस नए सीजन को जोड़ने की कोशिश हुई हैबीते दिनों में आपत्तिजनक कहे जाने वाले प्रसंगों को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरती गयी हैसोशल मीडिया के ट्रेण्ड्स हावी हुए हैंबीते दिनों के ज्वलंत मुद्दों को ध्यान में रखकर प्रसंगों को गढ़ा गया है और विवादित होने से बचाने के सभी प्रयास किए गए हैंअमेज़न प्राइम पर मिर्जापुर का सीजन -2 देखते हुए अनेकश: ऐसे खयाल उभरते हैं।

अमेज़न प्राइम पर मिर्जापुर का सीजन -2 दस बड़े अंकों (एपिसोड) के साथ कल देर शाम जारी हो गया। मिर्जापुर का आरंभिक सीजन बहुत लोकप्रिय हुआ था और कसे हुए कथानकउत्तम अभिनय और चुस्त संवाद के लिए जाना गया। अपराध की दुनिया को केंद्र में रखकर बुने गए कथानक में हिंसासेक्स और गालियों के छौंक से वह ठीक ठाक मसालेदार भी बना था। दूसरा सीजन कालीन भैयामुन्ना त्रिपाठीगुड्डू पण्डितशरद शुक्ला के आपसी गैंगवार में अपना क्षेत्र विस्तार करता है और अब इसका क्षेत्र मिर्जापुर से आगे जौनपुरलखनऊ के साथ-साथ बलियासोनभद्रगाजीपुरगोरखपुर गो कि समूचे पूर्वाञ्चल को समेट लेता है और अफीम के अवैध व्यापार का क्षेत्र बिहार के सिवान तक जा पहुँचता है। इस क्रम में कुछ नए माफियाओं का उदय होता है जिसमें सिवान का त्यागी खानदान और लखनऊ में रॉबिन की विशेष छाप है।


          पिछले सीजन के अंत तक यह बात समझ में आने लगती है कि माफियाओं की दुनिया में महिलाओं का प्रवेश होने वाला है। कालीन भैया की पत्नी की महत्वाकांक्षा ज़ोर पर है, जौनपुर में शुक्ला के मरने के बाद उसकी विधवा यह जिम्मा लेती है। गुड्डू पण्डित के साथ उसके छोटे भाई की मंगेतर है और छोटी बहन। सीजन दो में मुख्यमंत्री की विधवा पुत्री माधुरी यादव का अवतरण है जो मुन्ना त्रिपाठी की आकांक्षाओं को पंख देती है और सत्ता-संघर्ष में सबको पीछे छोडते हुए मुख्यमंत्री बन जाती है।

          सीजन दो में महिलाओं के प्रवेश और उनके हस्तक्षेप से यह सहज समझ में आने लगता है कि निर्माता इसमें स्त्री सशक्तिकरण का अध्याय जोड़ना चाहते हैं। माफियाओं की दुनिया में लड़कियाँ अग्रणी भूमिका में हैं। लगभग हर गिरोह में स्त्री शक्ति की भूमिका बन गयी है। उनकी महत्वाकांक्षा चरम पर है लेकिन सभी प्रसंग मिलकर भी कोई विशेष छवि नहीं गढ़ पाते। सारी कवायद संतुलन बनाने के लिए की गयी है और अगर वह बिखर नहीं गयी है तो वह कसाव नहीं बना पाई है, जो उदघाटन वाले सीजन में था।

          मिर्जापुर का सीजन -2 अपना क्षेत्र विस्तार करता है और लखनऊ समेत पूर्वाञ्चल के अन्यान्य जिलों में भी इसका कथानक पहुँचता है और बिहार के सिवान तक भी लेकिन सिवान और बलिया को छोडकर किसी अन्य जनपद की कोई विशेष उल्लेखनीय परिघटना नहीं मिलती। गाजीपुर का नाम अफीम के खेत के सिलसिले में उभरता है और बलिया का बिहार से सटे निकटवर्ती जनपद और गुड्डू पण्डित के ताज़ा अड्डे से जुड़कर। लखनऊ का इसलिए कि वह राजनीतिक घट्नाक्रमों का केंद्र है और रॉबिन का अवतरण स्थान। क्षेत्र विस्तार करने में सिर्फ नाम दे दिये गए हैं। किसी अन्य स्थानीय विशेषता से यह प्रकट नहीं होता कि पात्र बिहार में है अथवा जौनपुर में। यहाँ तक कि भाषिक भिन्नता भी रेखांकित नहीं की जा सकेगी।

          इस सीजन का सबसे लचर पक्ष राजनीतिक उठापटक है। मुख्यमंत्री बनने की लालसा में जेपी यादव अपने बड़े भाई और पुनर्निर्वाचित मुख्यमंत्री को मरवा देता है। जे पी यादव पिछले सीजन में मिर्जापुर की गद्दी दिलवाने के लिए राजनीतिक एजेंट की भूमिका में था जो इस बार मुख्यमंत्री बनने के लिए हर हथकंडे अपनाता है। लेकिन शपथ ग्रहण से पूर्व उसको जिस तरह से पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्काषित किया जाता है वह सबसे अविश्वसनीय पहलू है। फिर माधुरी यादव त्रिपाठी- माधुरी यादव मुन्ना त्रिपाठी की ब्याहता बनने के बाद मुख्यमंत्री पिता के मरने के बाद इसी रूप में आती हैं- विधायक दल की बैठक में अपना नाम स्वतः प्रस्तावित करती हैं। कालीन भैया भी मुख्यमंत्री बनने की रेस में हैं और प्रथमद्रष्टया तो लगता है कि माधुरी उनका नाम ही प्रस्तावित करेंगी। लेकिन इस सीजन के कथानक बुनने वालों ने राजनीतिक उठापटक को इतना एकरैखिक बनाया है और इस विषय पर इतना कम शोध किया है कि यह समूचा प्रकरण अतिनाटकीय और यथार्थ से बहुत परे चला गया है।

          सिवान का क्षेत्र इस सीरीज में दद्दा त्यागी के कारण उल्लेखनीय हो गया है। बिहार में शराबबंदी लागू है लेकिन दद्दा धड़ल्ले से उसका अवैध व्यापार कर रहे हैं। उनके दो बेटों में छोटे को भी सम्मान पाने की लालसा है। वह स्मैक का धंधा ले आता है जबकि दद्दा त्यागी ने संकल्प किया है कि वह अफीम के धंधे में नहीं उतरेगा क्योंकि उसका नाटा कद इसी नशे के कारण है। त्यागी अधिकांशतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वर्चस्व वाले हैं। इस सीरीज में वह सिवान में हैं, यह बात भी थोड़ी अटपटी लग सकती है।


         मिर्जापुर का सीजन -2 अंतत: गैंगवार और सत्ता संघर्ष है। आखिरी अंक में यह निर्णायक संग्राम होता है जिसमें मुन्ना त्रिपाठी मारा जाता है। कालीन भैया को शरद ने बचा लिया है लेकिन वह कब तक और किन शर्तों पर बचेंगे, यह अगले सीजन के लिए छोड़ दिया गया है। माधुरी के लिए वैधव्य ही नियति है। कालीन भैया को मंत्रीपद मिला है लेकिन पिता की मृत्यु के बाद वह जिस तरह अंतिम संस्कार करने पहुँचते हैं, वह यथार्थ से बहुत दूर की कौड़ी है।

          इस सीरीज के दस अध्यायों के नामकरण में भी कोई खास रचनात्मक विशेषता नहीं झलकती। इस सीरीज के अध्यायों में एक और खटकने वाली बात है कि सिवान, बलिया, जौनपुर से मिर्जापुर या लखनऊ तक पहुँचने की दूरी पलक झपकते पूरी कर ली जाती है। कोई पात्र मिलने की इच्छा प्रकट करता है और यह मिलन हो जाता है। यह इतना सहज है जैसे एक मुहल्ले से दूसरे तक का सफर करना हुआ हो। अतः यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि इस वेबसीरीज़ में कई पक्षों को साधने की कोशिश असफल हुई है और यह बिखर गया है।

          तमाम अव्यवस्थाओं और शिथिलताओं के बावजूद मिर्जापुर का सीजन -2 पंकज त्रिपाठी, अली फज़ल, दिव्येंदु शर्मा, ईशा तलवार, कुलभूषण खरबन्दा, श्वेता त्रिपाठी के दमदार अभिनय और कथाजनित सस्पेंस से दर्शनीय बन गया है। इसे एक बार तो देखा ही जा सकता है!

 

डॉ रमाकान्त राय

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी

राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय,

इटावा, उत्तर प्रदेश 206001

9838952426, royramakantrk@gmail.com


गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

झूला : मूल पाठ और व्याख्या

 

अम्मा आज लगा दे झूला

(मूल पाठ और व्याख्या)

-रीमा राय

अम्मा आज लगा दे झूला,

इस झूले पर मैं झूलूँगा।

उस पर चढ़कर, ऊपर बढ़कर,

आसमान को मैं छू लूँगा।

 

झूला झूल रही है डाली,

झूल रहा है पत्ता-पत्ता।

इस झूले पर बड़ा मज़ा है,

चल दिल्ली, ले चल कलकत्ता।

 

झूल रही नीचे की धरती,

उड़ चल, उड़ चल,

उड़ चल, उड़ चल।

बरस रहा है रिमझिम, रिमझिम,

उड़कर मैं लुटूँ  दल-बादल

इस प्यारी सी कविता में बालक अपनी माँ से आग्रह कर रहा है कि वह अपने बेटे के लिए एक झूला लगवा दे। झूला, जिसपर बैठकर वह बहुत ऊँचाई तक पींग भरे। बालक के मन में आकाश को लेकर गहरी उत्सुकता है और वह उस ऊँचाई तक पहुँचना चाहता है। झूले पर बैठकर वह आकाश को छू लेना चाहता है।  आसमान को छू लूँगा कहने से उसकी सहज महत्त्वाकांक्षा प्रकट हो रही है।

बालक अपने आसपास, प्रकृति के कई दृश्यों में झूला का रूप देख रहा है। डालियाँ हवा के असर से ऊपर नीचे हो रही हैं, उसके साथ-साथ पत्तियाँ भी तो बालक को प्रतीत होता है कि डाली और पत्तियाँ तक झूल रही हैं। झूले की ऊँची पींग को देखकर वह सोचता है कि इसपर बड़ा सुख मिलेगा, जैसे यात्रा करने पर प्राप्त होता है। बालक के मन में दो बड़े महानगरों- दिल्ली और कलकत्ता; की छवि है जो शान शौकत और ऊँची-ऊँची इमारतों के लिए प्रसिद्ध हैं।

झूले पर सवार बालक को नीचे आने पर लगता है कि धरती भी झूल रही है। फिर वह बहुत तेजी से ऊपर जाता है तो रोमांच से भर जाता है। ऊपर कविता में बालक की जो महत्त्वाकांक्षा व्यक्त हुई है, वह यहाँ स्पष्ट रूप से झलक रही है। 

आमतौर पर झूले का रिवाज सावन के महीने का है जब धरती पर वर्षा के बाद खूब हरियाली रहती है, बादल रिमझिम बरसते रहते हैं। कविता की आखिरी पंक्तियों में भी रिमझिम बरसते बादलों की स्मृति है। बालक कह रहा है कि रिमझिम बारिश में बहुत ऊँचाई पर जाकर वह बादलों के समूह को छू लेगा।

          बालक अपनी माँ से एक सहज अनुरोध कर रहा है। उसके अनुरोध में बालकोचित इच्छा है। आगे बढ़ाने और ऊँचाई तक जाने की आकांक्षा है। जब इतनी सहज माँग रहेगी तो कोई भी उसे पूरा करने का उपक्रम अवश्य करेगा। 

       इस कविता में विशेष ध्वन्यात्मकता है, जो लय के अनुरूप है। इसे बहुत आसानी से गाया जा सकता है और इसीलिए यह जल्दी ही याद हो जाती है। छोटे बालकों को यह बहुत मनोहर लगेगी।

(कक्षा एक की हिन्दी भाषा की पुस्तक में अम्मा आज लगा दे झूला शीर्षक कविता पाठ्यक्रम में रखी गयी है। इस कविता को समझने के लिए मूल पाठ और इसकी व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। व्याख्याकार श्रीमती रीमा राय अध्यापक हैं और बच्चों की अकादमिक और रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करती रहती हैं। उन्होंने आकाशवाणी इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से बालकों के लिए कई वार्ताओं की प्रस्तुति भी की है।)

रविवार, 11 अक्तूबर 2020

केशव की लघु कथाएँ

इंजीनियस 

          बिहार के लोग इंजीनियस हैं, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। बहुत दिनों बाद पटना जाना हुआ। पटना तेज़ी से बदल रहा है। हर बार पटना जाने पर कोई नई सड़क नया पुल, नई बिल्डिंग बनती दिख जाती है। पटना मीठापुर बस स्टैंड पर उतर कर मैं पैदल ही पटना जंक्शन की तरफ बढ़ने लगा। यद्यपि यहाँ टैंपो और ई-रिक्सा वाले बहुतायत हैं, और ऐसा आक्रामक रुख रखते हैं कि नहीं जाने वाले को भी खींच कर गाड़ी में बैठा लेंगे। पैदल जाने वालों को ऐसी हिकारत भरी नज़रों से देखते हैं जैसे कह रहे हों, कितना कंजूस आदमी है, 10 रुपये बचाने के लिए घाम में पैदल जा रहा है”।

          पर इनकी नज़रों से नज़र बचा मैं पैदल ही आगे बढ़ने लगा। मीठापुर से जंक्शन जाने के रास्ते में कई शानदार इमारतें हैं। सबसे पहले है आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी, उसके बाद फ़ैशन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और फिर कृषि विभाग का नया कार्यालय। मैं तीनों प्रतिष्ठानों के इन्सपैक्शन के इरादे से चला था।

          तभी पीछे से एक मोटरसाइकिल सवार मेरे पास आकर रुका। मुझे लगा रास्ता पूछ रहा होगा। भटके हुए मुसाफिर को रास्ता दिखाने का पुण्य मैं छोड़ना नहीं चाहता था, सो मैं उसकी तरफ लपका।

          पास आया तो वो मुझसे पूछने लगा, “कार्बिगाहिया जाना है”?

          मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया। उसने कहा चलिये छोड़ देते हैं। मैं तो ईश्वर के इस करिश्मे से दंग हो गया। बिहार में तो लोग माँगने पर लिफ्ट नहीं देते यहाँ तो बिना माँगे मिल रहा है। पुण्य करने की इच्छा मात्र से पुण्य का फल मिलने लगा। मैंने अवसर को दोनों हाथों से लपका और झट से मोटरसाइकिल पर सवार हो गया।

          अभी मोटरसाइकिल लुढ़कना ही शुरू हुई थी कि मोटर साइकिल सवार ने कहा, “मैं रैपीडो वाला हूँ।

          मैं अभी तक ईश्वर को धन्यवाद ही दे रहा था उसकी बात पर ज्यादा ध्यान न देते हुए मैंने ज़ोर से कह दिया- अच्छा !

          उसे लगा जैसे मुझे उसकी बात समझ में नहीं आई। वह समझाते हुये बोला, “जो भाड़ा पर बाइक नहीं चलता हैहम वही हैं …”

          अब मोटर साइकिल थोड़ी रफ्तार पकड़ चुकी थी। और मेरा धन्यवाद ज्ञापन अभी खतम भी नहीं हुआ था

          ईश्वर की दया पर पूरा विश्वास करते हुए मैंने पूछ लिया, "तो हमसे भी भाड़ा लेंगे ?"

          वो बे संकोच सिर्फ इतना बोला, तो लेंगे नहीं।"

          वह चाहता तो यह भी बोल सकता था की ,आप क्या नितीश कुमार के भतीजा हैं कि आपसे नहीं लेंगे। अब तक मेरा ईश्वर से मोह भंग हो चुका था। मैंने भी बेसंकोच कहा, तो हम पैदल नहीं चल जाएँगे। उसने बेहयाई से मोटर साइकिल रोका और मुझे उतार दिया

          मैं जो बिहार के आधुनिक वास्तुकला का अध्ययन करने निकला था। जबर्दस्ती मानव संसाधन का विद्यार्थी बना दिया गया। बिहारियों के इस इंजीनियस तरीके की तारीफ करता मैं पैदल ही जंक्शन की तरफ़ बढ़ने लगा। 


आ जाई

          बिहार में 38 जिले हैं जिनमें 37 में गन्ने की खेती होती है। यहाँ एक समय में 16 सरकारी चीनी मिलें हुआ करती थी, आज एक भी नहीं है। बिहार का उत्तर पश्चिमी क्षेत्र आज भी गन्ने की खेती के लिए जाना जाता है। कहानी तब की है जब मुजफ्फरपुर का चीनी मिल बंद हो गया था। यहाँ के किसान अपनी गन्ने की फसल लेकर चम्पारण के प्राइवेट चीनी मिल जाते थे।

          मास्टर दीनानाथ बहुत सीधे सरल स्वभाव के आदमी थे। मास्टरी से रिटायर हो कर गाँव में ही रहने लगे थे। वहीं पुश्तैनी जमीन पर गन्ने की खेती करवाते थे। गन्ना चम्पारण चीनी मिल ले जाने के लिए उन्होंने एक ट्रैक्टर भी ले लिया था। गाँव में तब ट्रैक्टर की बहुत शान थी। शंकर जो शहर में ड्राइविंग करता था, उनके ट्रैक्टर का ड्राइवर बन गया था। चीनी मिल में गन्ना खरीद का काम तीन-चार महीने ही चलता है। यह समय गन्ना किसानों के लिए बहुत व्यस्तता का होता है। चीनी मिल के दरवाजे दो तीन दिनों में एक बार खुलते है। तब तक गन्ने से लदे ट्रैक्टर, बैल गाडियाँ लंबी लम्बी कतारों में अपनी बारी के इंतज़ार में खड़ी रहती है। ड्राइवर अपनी गाड़ियों पर ही सोते है घंटा बजने पर गाड़ी आगे बढ़ा लेते है।

          हर बार की तरह इस बार भी मास्टर जी के ट्रैक्टर पर दशहरी गन्ना लाद रहा था। उसका 6 साल का लड़का दिनु गन्ने लदे ट्रैक्टर पर चढ़ गन्ना चूस रहा था और खेल रहा था। जब शंकर ट्रैक्टर लेकर चला तो उसे मालूम ही नहीं था कि आज वो सिर्फ गन्ना नहीं ले जा रहा। दिनु खेलते खेलते ट्रैक्टर पर ही सो गया था।

          हमेशा की तरह इस बार भी शंकर ट्रैक्टर कतार में खड़ा कर अपनी बारी का इंतज़ार करने लगा। रात ढली तो ट्रैक्टर पर ही शंकर की भी आँख लग गई। सुबह किरण फूटने से पहले ही शोर शराबा शुरू हुआ। मिल का दरवाजा खुल गया था और सब अपनी अपनी गाडियाँ आगे बढ़ा रहे थे। शंकर ने भी अपनी गाड़ी स्टार्ट कि पर जैसे ही आगे बढ़ा एक चीख़ के साथ ज़ोर की आवाज हुई। कुछ ही देर में वहाँ लोग जुट गए। शंकर ने पीछे जा कर देखा तो सन्न रह गया। एक बच्चा ट्रैक्टर के चक्के के नीचे आ गया था। ट्रैक्टर का चक्का उसके पेट पर चढ़ा था। रात को जब शंकर ट्रैक्टर पर सो रहा था, दिनु शीत से बचने के लिए ट्रैक्टर के नीचे सो गया। उसका पेट रोड के साथ मिलकर एक हो रहा था। शरीर में प्राण का एक कतरा भी बचे होने की कोई संभावना नहीं थी।

          लेकिन सब को अपना गन्ना बेचने की जल्दी थी। कोई फालतू चक्कर में पड़ना नहीं चाहता था। देखने वालों ने पलकें झपकाई , शंकर ने लाश को चादर में लपेट कर बोरे में डाल दिया। फिर सब कुछ सामान्य रूप से चलता रहा। शाम को जब शंकर गाँव लौटा तब हल्का हल्का अंधेरा हो चुका था। वह मास्टर जी के पास गया। उनको बुलाकर ट्रैक्टर तक लाया। लाश दिखाई और सब कुछ कह सुनाया।
          मास्टर जी को लगा जैसे अचानक गाँव की हवा मोटी हो गई हो, या उनके सांस की नलियाँ सिकुड़ने लगी हो। आंखों के सामने पुलिस, कचहरी, हथकरी और फांसी का फंदा एक साथ नाचने लगे।
शंकर का कंधा पकड़ कर बोले, “बउआ ई का कईले?” शंकर पहले तो चुप रहा फिर बोला, “मालिक हम का करती?” फिर मास्टर जी ने वो कहा जिसकी शंकर को उम्मीद नहीं थी, “मर गइल रहे त फेक देते”। शंकर तो यह सोच भी नहीं सकता था कि मास्टर दीनानाथ ऐसा कहेंगे। वह जानता तो लाश पहले ही ठिकाने लगा आता। शंकर बोला, “मालिक आराम करी, हम देख लेब”। शंकर ने थोड़ा और अंधेरा होने का इंतज़ार किया फिर लाश को पास ही बह रही बागमती में फेंक आया। इधर दशहरी जो दो दिन से अपने बच्चे को ढूंढ रहा था, सुबह सुबह ही मास्टर दीनानाथ के यहाँ आ गया। दिनु को किसी ने मास्टर जी के ट्रैक्टर पर बैठा देखा था। दशहरी पहले तो मास्टर जी से पूछता-जाँचता रहा, फिर फफककर रोने लगा।
          मास्टर जी अंदर से डरे हुए थे। भले आदमी को भगवान से ज़्यादा पुलिस का डर होता है। भगवान के डर से सच बोलता है, पुलिस के डर से झूठ। दीनानाथ दशहरी से केवल इतना कह पाये ,”रोअ मत, तहार बेटा आ जाई”।

          बेटा नहीं आना था सो नहीं आया। बगल के गाँव में मल्लाहों को एक बच्चे की लाश मिली। दारोगा दीनदयाल सिंह को खबर मिली। साथ ही यह भी खबर मिली की दशहरी का बेटा लापता है। किसी चौकीदार ने यह भी खबर दी कि चम्पारण चीनी मिल में ट्रैक्टर से एक बच्चा कुचला गया। मास्टर जी के चाहने वालों ने दारोगा को यह भी बता दिया कि आखिरी बार दिनु मास्टर जी के ट्रैक्टर पर दिखा था, और ट्रैक्टर पर उस रात लदनी हुई थी। दारोगा दीनदयाल सिंह ने एक और एक जोड़कर पूरी कहानी बना ली। फिर बुलेट उठाई और लाश देखने के बदले जा पहुँचे मास्टर जी के यहाँ। दीनानाथ मास्टर जी भी समझ गए की राज़ अब राज़ नहीं रहा। दारोगा जी को देख कर पहले तो उनका मन हुआ की पीछे के दरवाजे से भाग जाएँ लेकिन जब तक कुछ फैसला लेते दीनानाथ और दीनदयाल आमने-सामने खड़े थे। दारोगा जी अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते थे। बात घुमा फिरा कर करने की उनकी आदत नहीं थी या यूं कहिए कि उनको जरूरत भी नहीं थी। दारोगा दीनदयाल, “मास्टर जी 15 हज़ार लागी”। मास्टर जी ने भी नहीं पूछा कि 15 हज़ार किस बात के। बोले, “एतना कहाँ से आई दारोगा जी दारोगा दीनदयाल के बस इतना ही कहा, "कहाँ से आई, वो आप सोचिए”।

          मास्टर जी कुछ कहना चाहते थे तब तक दारोगा जी फिर बोले, “जो पाप किए है उसमें तो आपको पचास हज़ार भी खर्च कीजियेगा तो भी जेल तय है”। पुलिसकचहरीहथकड़ीजेलफांसीमास्टर जी पसीने से तर बतर होने लगे। दारोगा दीनदयाल गरजे,15 हज़ार में हम आपका वो पाप पी जा रहे है जो ब्रह्मा भी नहीं पचा सकतेकाहे की हम दीनदयाल हैं”। अगले दिन मास्टर जी का ट्रैक्टर बिक गया, कुछ खेत भी। दिनु का श्राद्ध नहीं हुआ, उसके लौटने का इंतजार होता रहा। दशहरी अब भी मास्टर जी से कहता, “मास्टर जी हमार बेटा ना आइल”।

          मास्टर दीनानाथ कहते, “आ जाई”।


                            

(केशव उदीयमान रचनाकार हैं। मूलतः बिहार के हैं। मुखर हैं और स्वयम को अभिव्यक्त करना जानते हैं। जिज्ञासु हैं। उनके प्रश्न अध्ययन-मनन और वर्तमान जगत के साहित्यिक सरोकारों से अनिवार्य सम्बद्ध होते हैं। केशव चाहते थे कि 'कथा-वार्ता' में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हों। उन्होंने अपने बारे में चंद पंक्तियाँ भेजी हैं- अविकल रख रहा हूँ। 

"नाम- केशव, हृदय से कवि हूँ, व्यंग्य में सोचता हूँ, स्वभाव से घुमक्कड़। छपरा जिला घर बा। पिता जी के लिए असकत ( आलस्य) के अलमारी।" - सम्पादक)

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2020

दिशा-भेद : ललित निबन्ध अन्तिम भाग

हला'हल'

- सम्यक् शर्मा

दिशा-भेद : ललित निबन्ध, भाग-1 

विरोधाभास : दिशा-भेद : ललित निबन्ध, भाग-2

ज्यों-ज्यों विरोधाभास बलवान हो रहा था, त्यों-त्यों बलवती हो रही थी चिंता की बेड़ियाँ और तोड़ रही थीं मुझ सुख में अधबैठे-अधलेटे मनुज के आलस्य को। तन्द्रा स्वयं मूर्छित पड़ी थी। सुप्तावस्था में जल-छिड़काव कार्य से जाग्रत हुए एक भड़भड़ाए श्वान की भाँति हम अचंभित व सतर्कता से ओतप्रोत थे। रीढ़ की हड्डी ऋजु रेखा (स्ट्रेट लाइन) में रूपांतरित हो चुकी थी जिसका समीकरण : 'x = C' था, जहाँ C एक स्थिर राशि थी। निर्देशांक ज्यामिति यू नो!

स्मरण हुआ एक और स्कूली प्रसंग। बात होगी कक्षा 1 या 2 की, हिंदी श्रुतलेखन (कॉमनली नोन ऐज़ डिक्टेशन) का घंटा चालू था। महोदया ने ऊँचे स्वर में कहा "बच्चो, लिखो हिरणी। 'ह' के पीछे छोटी 'ई' की मात्रा, 'र' और 'ण' के आगे बड़ी 'ई' की मात्रा।" 'दीर्घ और ह्रस्व के चक्कर में कौन पड़े?' यह सोचकर अध्यापक-अध्यापिकाएँ प्रायः ही मात्राओं के लिए 'छोटे' और 'बड़े' शब्दों का प्रयोग करते हैं। ठीक ही है, 6-7 वर्षीय जूनियर जी के दर्शक क्या ही जान पाते दीर्घ-ह्रस्व का मर्म। हमने भी रट लिया था। मस्तिष्क में छाप लिया था कि 'ह' के 'पीछे' छोटी 'ई' की मात्रा लगाने से 'हि' बन जाता है और 'ण' के 'आगे' बड़ी 'ई' की मात्रा लगाने से 'णी' बन जाता है।

फिर हम बड़े हुए (जो कि होना ही था, स्वाभाविक है!) और बात कक्षा 5 तक पहुँच गयी। अब हम कॉपी के पन्ने मरोड़कर उसे बिल्ली का स्वरूप देकर उस पर ग्लिटर पेन से 'IInd  Term' और 'IIIrd Term  लिखने में उस्ताद हो गए थे। अब लगता है कि यदि हम वही लय बरक़रार रखते तो आज दिशाभेद और विरोधाभास के भँवरजाल से परे एक नामचीन पच्चीकार होते। ख़ैर...एक बार आंग्ल भाषा साहित्य का घंटा चालू था और महोदया ने उवाचा "राइट अहैड।" (यानी 'आगे' लिखिए) और फ़लाँ-फ़लाँ लिखवाने लगीं। तात्पश्चात् वे फिर उवाचीं "टर्न बैक टू पेजेज़।" एंड आइ वॉज़ लाइक "ओकेएएएय्...!"

फिर सोचे कि अब समय-रेखा और नोटबुक में भी एक अदद तुलना तो बनती ही है। जिस प्रकार समय-रेखा का आदि था वृहत्काय विस्फोट, उसी प्रकार नोटबुक का आदि है उसका सर्वप्रथम/पूर्वतम/अग्र पृष्ठ, वहीं से तो नोटबुक का आरम्भ है न! तो यदि हम नोटबुक के आदि (अग्रपृष्ठ) से उसके अंत (अंतिम पृष्ठ) की ओर बढ़ेंगे, तब हम समय-रेखा के समान 'आगे से पीछे' की दिशा में ही बढ़ रहे होंगे। इसी के अनुसार देखें तो महोदया का 'ह' के 'पीछे' छोटी 'ई' और 'ण' के 'आगे' बड़ी 'ई' कहना एवं 'राइट अहैड' व 'टर्न टू पेजेज़ बैक' कहना बिलकुल विपरीत है। वास्तविकता यह है ' नोटबुक के आगे' से ' नोटबुक के पीछे' की ओर बढ़ने वाली दिशा ही हमारे लिखने की दिशा है।

यहीं हमारा विरोधाभास चरम पर पहुँच चुका था, और चरमपंथी तो हमें किसी भी कोण से नहीं भाते। इससे पहले कि ये श्याल विरोधाभास हमारे हिय के लिए हलाहल बनता, हमें हर हाल में हल निकालना था। चैन इक पल नहीं (था), और कोई हल नहीं (था)। डाका तो बहुत दूर की बात है, चोरी तक भी तो नहीं हुई थी, फिर भी हंगामा बरपा था, हमारे चित्त में। इस हंगामे से पार पाने हेतु हमने छत पर श्री सोनू निगम और श्री मोहित चौहान के अवलंबन से घंटा-सवा घंटा पदयात्रा करी। तरावट न मिलने पर नीचे आकर किरकिट के सजीव प्रसारण के आभाव में B4U चैनल की सूर्यवंशम अर्थात् 'बादशाह' फ़िल्म का आनंद लिया। तनाव घट रहा था और हम फिर से माथापच्ची करने को दम भर रहे थे।

विद्यालय का पुनः स्मरण हुआ। स्कूल में एक खेल-कूद व शारीरिक शिक्षा के अध्यापक हुआ करते थे अर्थात् पी.टी. सर। वे ड्रम बजाकर छात्रों से परेड का (जबरन) अभ्यास कराया करते थे। सर ड्रम बजाने के इतने आदी थे कि ड्रम बजाने वाली डंडी भी प्रायः अपने साथ ही रखते थे। पी.टी. सर हास-परिहास से कोसों दूर रहते थे इसलिए अधिकांश लड़कों की जाँघों के पश्च भाग पर वह डंडी मुद्रित रहती ही थी। ख़ैर... अधिक नहीं कहेंगे, बस इतना और कि पुरवइया चलने के समय थोड़ी सावधानी आज भी बरतते हैं।

नईं होणा था, नईं होणा था, लेकिन हो गया (था)....विषयांतर! फ़िल्म 'बड़े मियाँ - छोटे मियाँ' के असरानी का संवाद "तो क्या हुआ? हहा!" सोचकर हम 'आगे' बढ़े। लंबाई के अनुसार प्रार्थना सभा में पंक्ति लग चुकी थी, पी.टी. सर हमारे (मेरे) समक्ष अपनी वृहत् काया लिए जमे हुए थे यह निरिक्षण करने के लिए कि पंक्ति ऋजु है या नहीं? इस समय कोई सर से पूछे कि उनके आगे/पूर्व/सामने कौन है, तो हमारी ओर तर्जनी करके उनका उत्तर होता "ये छोटा चेतन !" क्योंकि पंक्ति में सबसे आगे/पूर्व हम ही हैं। अब ज्यों ही आगे से छठा बालक दूसरी कक्षा की पंक्ति में लगे आगे से छठे बालक के संग ठिठोली करने हेतु उसके निकट जाता है, त्यों ही पंक्ति ऋजु न रहकर वक्र हो जाती है। ज्यामिति, ऐज़ यू नो! अब उन्हें 'सीधा' करने के लिए डंडी उपयोग में लाई जानी है, इसलिए अब पी.टी. सर हमारी पंक्ति के पाँचवे और छठे बालक के मध्य खड़े हैं। फिर क्या हुआ, ये ना पूछो, कुछ ऐसी बात, हो गयी... क्योंकि इसका वर्णन करना कष्टदायक तो होगा ही, अनचाहा विषयांतर और हो जायेगा। तो काहे करें भाई! अतः वीडियो यहीं पॉज़ करते हैं।

तो यदि इस क्षण मास्साब से पूछे कि अब उनके आगे/सामने/पूर्व कौन है? तो वे कहेंगे " यही 'छठा' हुआ नालायक जिसे हम अभी 'छठी' का दूध याद दिलाये दे रहे हैं।" यहाँ से ज्ञानिवर्ग दो निष्कर्ष निकाल सकता है, पहला यह कि मास्टरजी केवल लड़कों को ही नहीं बल्कि लड़कों पर तंज़ भी अच्छा कस लेते हैं। दूसरा यह कि स्थानान्तर होने पर मास्टरजी के दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर आ गया है। पहले इनके 'आगे' हम थे, अब वो छठा (हुआ) छात्र है, कल को कोई और होगा।

मास्टरजी अपने दृष्टिकोण के अनुसार ठीक हैं किन्तु प्रिंसिपल महोदय जो कि थोड़ी दूर, तटस्थ खड़े, मंच पर 'छात्र जीवन में आत्मानुशासन' की महत्ता समझते हुए छात्रों को संबोधित कर रहे हैं, उनके दृष्टिकोण से गलत हैं। पूर्णतः विपरीत। मास्टरजी के सापेक्ष (अर्थात् रिलेटिव) दृष्टिकोण से छठा बालक उनके 'आगे' खड़ा है जबकि प्रिंसिपल महोदय के तटस्थ दृष्टिकोण से वही छठा बालक मास्टरजी के 'पीछे' है। हमारे विचार में दोनों दृष्टिकोण अपने में सही हैं, यदि गूढ़ता से इन्हें समझें तो।

कुल जमा यह है कि यही हल है क्योंकि अत्यधिक अंतर्द्वंद्व से केवल बाल ही झड़ते हैं, कोई विशेष बुद्धत्व की प्राप्ति नहीं होती। किसी को हो जाये तो वह "अयम् अन्तिमा जाति, नत्थिदानी पुनब्भवोति" कहकर 'आगे' बढ़ सकता है, हम कतई नहीं रोकेंगे।

 

जय दाऊजी की।


 

(सम्यक युवा हैं और बहुत सधा हुआसुविचारित लिखते हैं। किंचित संकोची हैं। दिशा-भेद पर उन्होंने यह ललित निबन्ध लिखा है। यह तीन भागों में है- तीनों स्वतन्त्र हैं परन्तु एक दूसरे से गहरे सम्बद्ध। यह तीसरा भाग हला'हल' शीर्षक से है।

          सम्यक शर्मा  पर क्लिक करने पर ट्विटर पर पाये जाते हैं। उन्होंने अपने बारे में लिख भेजा है- ज्यों का त्यों उतार रहा हूँ- "सम्यक् शर्मा। आगरावासी। ब्रजभाषी। शहरी एवं ग्रामीण के बीच का हलुआ। दसवीं-बारहवीं आगरा से ही करी। यांत्रिक अभियांत्रिकी में बी.टेक. ग़ाज़ियाबाद के अजय कुमार गर्ग इंजीनियरिंग कॉलेज से करी। क्यों ही करी! क्रिकेट का आदी। फ़िज़िक्स और हिंदी से विशेष प्रेम। गणित से लगाव। बस।"- सम्पादक)

 

बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

दिशा भेद : ललित निबन्ध भाग-2

विरोधाभास

- सम्यक् शर्मा

दिशा भेद निबन्ध का पहला भाग- से आगे

अब जब दिशा भेद खुल चुका है तो आइए पारी को वहीं से आगे बढ़ाते हैं।

"ठीक ! उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम की पशोपेश बहुत हुई" यह सोचकर हम चिंतामुक्त होकर अधबैठे-अधलेटे से हो गए। आप समझ ही गए होंगे कि दोनों हाथ भी ग्रीवा (वही गरदन अपनी!) के पीछे ही थे तथा चिंतामुक्ति के भाव को और बल दे रहे थे। अब हमारे भीतर का नीलेश मिश्रा जाग उठा था और हम 'यादों का सफ़र' करते हुए सुप्तावस्था की ओर अग्रसर थे। कई यादें आयीं - गाँव की, नानी के घर की, कॉलेज की, स्कूल की, इत्यादि-इत्यादि।

बाल्यकाल से ही हम अग्रिम पंक्ति के खिलाड़ी थे। इससे पहले कि कोई हमें हॉकी अथवा फुटबॉल का पुरोधा समझ लेवे, बताये देते हैं कि बचपन में हमारी लंबाई सीमित होने के कारण हम स्कूल की प्रार्थना सभा (हाँ वही असैम्बली) में अपनी कक्षा की पंक्ति में सर्वप्रथम लगा करते थे। लंबाई के अनुसार लगने वाली इस कुप्रथा को आरंभिक 5-6 लड़के बड़ी गंभीरता से लिया करते थे। मसलन यदि हम एक-आध बार ऐसे ही कभी मित्रों के संग हँसी-ठट्ठा हेतु पंक्ति के मध्य में कहीं लग जाते थे तो वे 'नॉटी' सहपाठी हमें "ओये! जा आगे लग।" कहकर आगे पटेल दिया करते थे और हम रन-आउट हुए इंज़माम की भाँति मुंडी लटकाए यथास्थान आ जाते थे, आगे।

          जी नहीं अभी 'दिशा विषय' से विषयांतर नहीं हुआ है, प्रार्थना सभा की चर्चा इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि ये यह स्थापित करती है कि 'आगे' और 'पहले' समानार्थी हैं। पंक्ति में सबसे 'आगे' अर्थात् 'पहले' हम लगते (या कहें लगाये जाते) थे। इसी अनुसार व्यक्ति क्रमांक- 3 से आगे/पहले व्यक्ति क्रमांक- 2 लगता था। इसी सम्बन्ध को बल देने के लिए कुछ उदाहरण लेते हैं - 'पूर्वज' = पूर्व अर्थात् पहले जन्मा; 'अग्रज' = अग्र अर्थात् आगे जन्मा (बड़ा भाई)। आशय यह है कि 'आगे' जन्म लेने वाला आपसे 'पहले' जन्म लेता है।

          आइये अब कल्पना करें बाएँ से दाएँ की ओर खिंची एक ऐसी समय-रेखा (ऑल्सो कॉल्ड टाइमलाइन) जिसका पूर्वतम/बाएँतम सिरा वृहत्काय विस्फोट (द बिग बैंग! यस यू गॉट इट, डिडण्ट यू ?) है जबकि दूसरा सिरा भविष्य के गर्त में कहीं अज्ञात है। मध्य में कहीं आप हैं। तो जो आपसे पूर्व=पहले/अग्र=आगे जन्मे हैं वे इस रेखा पर आपके बाएँ दर्शाये जायेंगे और जो आपके पश्चात्=पीछे जन्मेंगे वे आपके दाएँ दर्शाये जायेंगे। स्पष्ट है कि बाएँ से दाएँ की ओर हम समय की दिशा में चल रहे हैं।

          प्रायः हम कहते हैं कि " 'पिछली' पीढ़ियाँ धन के अभाव में रहीं, कम से कम 'आगे' की पीढ़ियाँ तो समृद्ध बनें!" यानि कि हम पूर्वजों को 'पिछली/पीछे छूटी हुई' पीढ़ी और भविष्य में आने वाली पीढ़ी को 'अगली/आगे आने वाली' पीढ़ी कह देते हैं। इसी तर्क के अनुसार यदि हम समय रेखा देखें तो अपने दाएँ वाली को 'अगली' और बाएँ वाली को 'पिछली' पीढ़ी बोलेंगे!

          परंतु आप स्मरण करें तो पायेंगे कि सैंतालीस सेकण्ड ही 'पूर्व' यह घोषित करते हुए ही हमने समय-रेखा का काल्पनिक चित्रण करवाया था कि वहाँ आपके 'पश्चात्=पीछे/बाद' जन्म लेने वाले आपके दाएँ हैं आपसे 'पूर्व=पहले/अग्र=आगे' जन्म लेने वाले आपके बाएँ हैं।

          तो सामान्य भाषा में पूर्वजों को 'पिछली' (अर्थात् पीछे जन्म लेने वाली) और भविष्य की पीढ़ियों को 'अगली' (अर्थात् आगे जन्म लेने वाली) पीढ़ी कहना विरोधाभास नहीं ! घोर विरोधाभास है।

          आगे भी बहुत कुछ है विरोधाभास के हवाले से धुआँ पेलने को। और पेलेंगे भीइस रचना-त्रय (ट्रिलजी फोक्स!) के अन्तिम भाग हला'हलके द्वारा। तब तक के लिए कोरोना से 'सावधान रहें, सतर्क रहें'



          (सम्यक युवा हैं और बहुत सधा हुआसुविचारित लिखते हैं। किंचित संकोची हैं। दिशा-भेद पर उन्होंने यह ललित निबन्ध लिखा है। यह तीन भागों में है- तीनों स्वतन्त्र हैं परन्तु एक दूसरे से गहरे सम्बद्ध। यह दूसरा भाग विरोधाभास शीर्षक से है।

          सम्यक शर्मा  पर क्लिक करने पर ट्विटर पर पाये जाते हैं। उन्होंने अपने बारे में लिख भेजा है- ज्यों का त्यों उतार रहा हूँ- "सम्यक् शर्मा। आगरावासी। ब्रजभाषी। शहरी एवं ग्रामीण के बीच का हलुआ। दसवीं-बारहवीं आगरा से ही करी। यांत्रिक अभियांत्रिकी में बी.टेक. ग़ाज़ियाबाद के अजय कुमार गर्ग इंजीनियरिंग कॉलेज से करी। क्यों ही करी! क्रिकेट का आदी। फ़िज़िक्स और हिंदी से विशेष प्रेम। गणित से लगाव। बस।"- सम्पादक)

दिशा भेद : ललित निबन्ध (भाग- एक)

-सम्यक शर्मा

 

          यूँ ही एक दिन प्राथमिक भूगोल (Elementary Geography) का पाठ कर रहे थे, तो Deccan Plateau पर दृष्टि पड़ी। अपराध-शिरोमणि गोगो के स्वर में सोचे कि "ये deccan-deccan क्या है? ये deccan-deccan?" थोड़ी देर माथापच्ची के बाद 'तान्हाजी' चलचित्र से 'दक्खन' का स्मरण हुआ। बिना Mentos खाये दिमाग की बत्ती जल चुकी थी। दिमागी घोड़े 'दक्खन' के अर्थ की खोज में चहूँ दिशाओं में दौड़ रहे थे।

          यकायक हमारे मस्तिष्क में 'पुकार' चलचित्र के लोकप्रिय गीत 'हे के सरा सरा' के बोल -

                   'प्यार है जैसे पूरब - पश्चिम,

                   प्यार है उत्तर - दक्खिन' ...वगैरह

          त्वरित गति से आकर छा गए। अब चूंकि वहाँ लेखक ने प्रेम को चारों दिशाओं की उपमा दी है अतः निष्कर्ष निकाला गया कि 'दक्षिण' ही दक्खिन है अर्थात् वही दक्खन है। बात तर्कसंगत भी है, दक्खन का पठार (Deccan Plateau) दक्षिण भारत में ही स्थित है। यानी 'दक्षिण' है तत्सम और 'दक्खिन' 'दक्खन' हैं तद्भव।

          तो यहाँ से खेला गति पकड़ने लगता है। किसी दिशा का नाम 'दक्षिण' ही क्यों रखा होगा ?क्योंकि 'दक्षिण' अर्थात् 'दाएं' एक सापेक्ष दिशा (relative direction) है जबकि दक्षिण दिशा तो एक पूर्ण दिशा (absolute direction) है! बिना मानकीकरण (standardisation) के 'दाएँ दिशा' को 'दक्षिण दिशा' कह देना अतार्किक लगता है। किस प्रकार मानकीकरण किया गया? किया भी गया है तो 'दक्षिण' (दाएँ) का विपरीत 'वाम' (बाएँ) भी एक दिशा का नाम होना चाहिए, जोकि नहीं है।

          अभी तक दाएँ-बाएँ के खेल में ही अटके थे कि पूर्व-पश्चिम के भँवरजाल ने घेर लिया। थोड़ी देर मंथन के 'पश्चात्' भान हुआ कि पश्चिम का तात्पर्य तो 'पश्च' धातु से है अर्थात् 'पीछे', 'बाद में' से है जैसे 'पश्चात्', 'पश्चात्ताप' इत्यादि (तर्क यह भी है कि 'पश्च' का तद्भव 'पीछे' है)। अधिक समय न व्यतीत करते हुए तर्क लगाया कि 'पूर्व' का अर्थ 'पहले' से होता है जैसे 'पूर्व-कप्तान', 'पूर्वनियोजित' इत्यादि।

          इस 'पहले-बाद में' के मर्म को समझने के पश्चात् अधिक समय नहीं लगा इस बात को सिद्ध करने में कि ये सब सूर्योदय व सूर्यास्त से संबंधित है। जिस दिशा में सूर्य देव 'पहले' प्रकट होते हैं वह है 'पूर्व' और उसके 'पश्चात्' जहाँ प्रकट होते हैं वह है 'पश्चिम'

          इतना सब होने के 'पश्चात्' भी 'दाएँ-बाएँ', 'दक्षिण?' का रहस्य ज्यों का त्यों बना ही हुआ था कि विद्यालय में सिखायी हुई दिशाओं को स्मरण रखने की विधि स्मरण हुई। 'Face towards North with wide open arms, at the right hand you get East, at the left hand you get West and at the back you have South' ....पर तब क्या हो जब किसी को North का ज्ञान ही न हो? कुछ पता हो न हो, व्यक्ति को सूर्योदय तो दिखाई देगा ही.... 'चलिये सूर्यदेव के ही सम्मुख खड़े हो जाएं और बाहें खोल लें' ऐसा विचार हमने किया। दिशा-भेद अब खुलने को था... सामने सबसे पहले सूर्यदेव, दाएँ हाथ पर दक्षिण दिशा, पीठ पीछे पश्चिम और अंत में बाएँ हाथ पर उत्तर दिशा। मानकीकरण हो चुका था। शाब्दिक अर्थ के अनुसार भी सब सटीक था-

                    पूर्व - पहले, सामने

                    दक्षिण - दाएँ

                    पश्चिम - बाद में, पीछे

                    उत्तर - अंत में

          इसी कारण 'पूर्व' के दो विलोम हैं - पश्चिम और उत्तर

                    पूर्व (पहले) – उत्तर (अंत)

                    पूर्व (सामने) – पश्चिम (पीछे)

          यहाँ तक भी रहता तो ठीक था, पर हठीला मन बोला "ये दिल माँगे मोर..."। हमने भी कहा रुको ससुर! अभी तुम्हारी सारी खुजली निकाले देते हैं।

 

          (डटे रहिये 'आगेआने वाले 'विरोधाभासको झेलने हेतु।)

 





          (सम्यक युवा हैं और बहुत सधा हुआ, सुविचारित लिखते हैं। किंचित संकोची हैं। दिशा-भेद पर उन्होंने यह ललित निबन्ध लिखा है। यह तीन भागों में है- तीनों स्वतन्त्र हैं परन्तु एक दूसरे से गहरे सम्बद्ध। सम्यक शर्मा  पर क्लिक करने पर ट्विटर पर पाये जाते हैं। उन्होंने अपने बारे में लिख भेजा है- ज्यों का त्यों उतार रहा हूँ- "
सम्यक् शर्मा। आगरावासी। ब्रजभाषी। शहरी एवं ग्रामीण के बीच का हलुआ। दसवीं-बारहवीं आगरा से ही करी। यांत्रिक अभियांत्रिकी में बी.टेक. ग़ाज़ियाबाद के अजय कुमार गर्ग इंजीनियरिंग कॉलेज से करी। क्यों ही करी! क्रिकेट का आदी। फ़िज़िक्स और हिंदी से विशेष प्रेम। गणित से लगाव। बस।"- सम्पादक)

 


सद्य: आलोकित!

सबको साधने में बिखर गया मिर्जापुर का सीजन -2

क्या सबको साधने में मिर्जापुर-2 बिखर गया है ?  नवरात्रि में मिर्जापुर-2 के अमेज़न प्राइम पर जारी होने का दबाव इस वेबसीरीज़ पर रहा है ?  नवरा...