सोमवार, 28 मई 2018

नमो अन्धकारं : पढ़ने का सलीका

यथार्थ के अनेक रंग होते हैं
और उन सबको समेटने का अन्त
एक अंधेरे में होता है।

-पिकासो

किसी रचना को पढ़ते हुए उसमें चित्रित पात्रों अथवा घटनाओं का साम्य बिठाना और उसे चर्चा के केंद्र में रखना सबसे घटिया दर्जे की आलोचना कही जा सकती है। वस्तुतः जब कोई रचनाकार इस तरह अभिव्यक्त करता है तो इसे किसी व्यक्ति/घटना से जोड़कर देखने के बजाय एक प्रवृत्ति के रूप में देखना चाहिए। रचना का अंग बनते ही वह एक वृत्ति में रूपायित हो जाती है। दूधनाथ सिंह की लंबी कहानी 'नमो अन्धकारं' इसी तरह की घटिया आलोचना का शिकार बनी थी।...

आज नमो अन्धकारं पढ़ते हुए बार बार खयाल आया कि दूधनाथ सिंह ने जिस वृत्ति को इस कृति में रखा है, उसकी चर्चा आखिर क्यों नहीं हुई। समूचा आलोचकीय समाज उसमें निजी जीवन और परिचित चेहरे क्यो तलाशने लगा था? मुझे यह कृति अपने अंतर्विरोधों की सफल अभिव्यक्ति के लिहाज से अच्छी लगी। 'मठ' ऐसी ही वासनाओं और दुरभिसंधियों का गढ़ रहता है जो इस लंबी कहानी में आया है और ऐसे ही मठ और गढ़ ढहाने के लिए लोग संकल्पबद्ध होते रहे हैं। मुक्तिबोध आखिर किस मठ को ढाहने के लिए आह्वान करते हैं?
नमो अन्धकारं ऐसी कई वृत्तियों को बेनकाब करता है और हमारे समक्ष उघाड़ देता है, जिससे हम लाभार्थी होना चाहते हैं लेकिन उसका ठप्पा लगने से बचना चाहते हैं। क्या यह कहानी इलाहाबाद की गलीज जिंदगी का दस्तावेज नहीं है? क्या इसमें बड़े बड़े मठाधीशों की पोल पट्टी नहीं है? क्या इसमें कॉमरेड्स की कलई नहीं उघड़ती? पियक्कड़ी और परनारिगमन तो इस वासना-पंक का एक सहज दुलीचा है। दूधनाथ सिंह इसी अंधकार में यथार्थ की कई कई छवियां घोलते हैं और सबको दागदार बनाकर रख देते हैं।
नमो अन्धकारम पढ़ा जाए तो यह न देखा जाए कि इसमें कौन किस भूमिका में है, यही रचना के साथ न्याय है।

सद्य: आलोकित!

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