गुरुवार, 5 नवंबर 2026

रामायण : फिल्म है या प्रहसन ...

 श्रीमद्वाल्मीकिरामायण में वर्णित है कि जब भगवान परशुराम राम से मिले तो उनके कंधे पर फरसा है। हाथ में विद्युत्गुणों के समान दीप्तिमान धनुष और बाण है। वह आवेश में हैं। उन्हें ज्ञात है कि शिव जी का धनुष तोड़ा गया है।



परशुराम ने वहां दशरथ से बात तक नहीं की और श्रीराम से कहा कि वह इस धनुष पर बाण चढ़ा दें। ऐसा करने पर वह उन्हें द्वंद्व युद्ध के लिए आमंत्रित करेंगे। जब राजा दशरथ ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए कुछ कहा तो परशुराम ने उनकी अवहेलना की।


जब श्रीराम ने ऐसा किया तो उससे परशुराम का पुण्यक्षय हो गया। फिर वह धनुष सौंप कर चले गए।


अब जो #RamayanaMovie बनी है, उसमें दिखाया है कि परशुराम ने फरसे से प्रहार कर दिया। श्रीराम ने उस प्रहार को निष्फल कर दिया। तब परशुराम ने वह धनुष दिया जो उन्हें भगवान विष्णु से मिला था।


इसी बीच में लक्ष्मण परशुराम संवाद है और लक्ष्मण कह रहे हैं कि अब टूट गया तो टूट गया! एक दम "हुआ तो हुआ" वाला अप्रोच! 


एक तो आजकल अस्त्र/शस्त्र इस आकार प्रकार के बना रहे हैं फिल्मों में कि खिलौना लग रहा है। फरसा का काम कृषि और बागवानी के क्षेत्र में रहता है। पिता की हत्या से आक्रोशित परशुराम ने उसे ही अपना अस्त्र बना लिया था।


श्रीमद्वाल्मीकिरामायण में लक्ष्मण-परशुराम संवाद ही नहीं है! यह विशेष-प्रसंग-रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की है। उन्होंने ही परशुराम जी को जनक की सभा में उपस्थित दिखाया और एक हास्य व्यंग्य का सुंदर दृश्य बनाया। कुमार विश्वास #KumarVishwas के लड़के कह रहे हैं कि मूलकथा वाल्मीकि रामायण से ली गई है! वहां तो यह सब है ही नहीं!


अच्छा! रावण चन्द्रहास तलवार से जटायु को इस तरह मारता है जैसे यूनानी फिल्मों में शत्रुओं को मारते हैं। एकदम से सीने में तलवार घोंप देता है! जटायु गिर रहे हैं तो उसका नाखून पकड़ लेता है जो उखड़ जाता है। सेट पर खड़ी सीता देखती रह जाती हैं! निर्निमेष। आश्चर्यचकित। शोक नहीं, भय अथवा आशंका नहीं। दुख नहीं। विक्षोभ नहीं।


#Ramayana में कुमार विश्वास, बोधिसत्व और रहमान ने एकदम से भषड़ कर दिया है।

मीरजापुर : हिन्दी सिनेमा में एक रीतिकाल चल रहा है।

ओटीटी पर आने के बाद कल हमने यह फिल्म भी देख ली। जब यह रिलीज हुई थी तो एक झोंका आया था कि देखने चलते हैं लेकिन ठहर गया था। ओटीटी अमेजन प्राइम पर आई। वेब सीरीज के बाद फिल्म के रूप में ले आना और उसे देखने लायक बनाये रखना एक चुनौती तो रहती है। इसके निर्देशक के साथ भी यह चुनौती थी।

फिल्म में एक नया माफिया, बल्कि दो माफिया नए आ गए हैं और यह समझ में आ रहा है कि गद्दी देश के हर जनपद में है। उत्तर प्रदेश के हर जनपद में है और इससे बाहर राज्य स्तर पर। हर जगह वही काम चल रहा, तस्करी, फिरौती, अपराध और राजनीति। हर जगह सेक्स का छौंक लगा दिया गया है।


इसमें एक जबरदस्ती यह हुई है कि कई लोगों की प्रेम कहानी ठूंस दी गई है और उस प्रेम की अभिव्यक्ति गीतों में है। एकदम अनावश्यक युक्ति अपनाई गई है।


कुछ एक दृश्य अच्छे हैं लेकिन उनमें कोई नयापन नहीं है। दुकान है, सैलून है, ठेला है! उसपर कुछ नए तरीके की रचना है।


छोटू पंडित की भूमिका में जितेंद्र आ गए हैं। वह बहुत जहीन बतलाये गए हैं और आंख बंद रखकर भी वह मार्ग ट्रैक कर ले रहे हैं! इसके लिए दिखाया गया है कि वह हाथ में बंधी हुई ट्रैकर का प्रयोग करते हैं। स्मार्टफोन के जमाने में ऐसा कौन करता है? एक पेशेवर अपराधी ऐसी जगह पर अपना आदमी रखता है। लेकिन जनता को सिनेमा दिखाना है बस!


रतीशंकर शुक्ला को वर्णमाला सुनना है। हिंदी वर्णमाला सुनाने वाला टवर्ग छोड़ देता है लेकिन उसे ज्ञानी माना जाता है और नई शर्त रखी जाती है कि वह उर्दू का अलिफ़ बे पढ़कर दिखाए।


फिल्मकार ने यह शुरू तो करवाया है लेकिन वह इसकी तौहीन नहीं करवा सका है। सबका हलक सूखता है। निर्देशक का भी सूखा है।


मीरजापुर में बीना त्रिपाठी के ही अंतरंग सीन दिखाए गए हैं। वही सुलभ हैं, संभवतः। पंकज त्रिपाठी के पास कोई काम नहीं है। मुन्ना ठीक जंचें हैं। गुड्डू पंडित को भी ठीक ही बैलाट दिखाया गया है।


हिंदी सिनेमा में एक रीतिकाल चल रहा है। मीरजापुर उसी का नमूना भर है।


#FilmTwitter #cinema #Mirzapur #movie

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

राग दरबारी के श्रीलाल शुक्ल

अप्रतिम कृति राग दरबारी के रचयिता श्रीलाल शुक्ल जी की पुण्यतिथि 28 अक्टूबर पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। 🙏

श्रीलाल शुक्ल 

‘राग दरबारी’ पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि शुक्ल जी ने देश की आजादी के बीस साल बाद के परिदृश्य का चित्र खींचा था, लेकिन विडंबना है कि वह हमारे समय का दस्तावेज़ बन गया है! शिवपालगंज काल्पनिक नहीं है। वहाँ की राजनीति, शिक्षा व्यवस्था, अवसरवाद, जोड़-तोड़ और व्यवस्था के छिद्रान्वेषण में हमें आज भी अपने आसपास के अनेक परिचित चेहरे दिखाई दे जाते हैं। मैं छंगामल कॉलेज को लगभग प्रतिदिन देखता हूं।

श्रीलाल शुक्ल का व्यंग्य हँसाता है, लोट पोट कर देता है लेकिन ठीक बाद एक असहज सवाल छोड़ जाता है। उनके लेखन की विशिष्टता यही थी कि वे समाज की स्थितियों को इस तरह सामने रखते थे कि पाठक मुस्कराते-मुस्कराते अपनी व्यवस्था की सच्चाई पहचानने लगता था। उस विसंगति को झट चिह्नित कर लेता था।

‘राग दरबारी’ का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि उसे पढ़ते हुए लगता है—कहानी पुरानी नहीं हुई, पात्र हमारे आसपास हैं, रंगनाथ आज भी उसी तरह शोध कर रहा है । रूप्पन छात्रा राजनीति कर रहे। छोटे पहलवान अकड़ रहे और वैद जी! वह थे, हैं और रहेंगे। थे, हैं और रहेंगे तो शाश्वत सत्य बन गया है। उपन्यास की पटकथा लिखने वाले आज भी वही हैं! वही रामाधीन, बद्री पहलवान, लंगड़ और शनीचर। राधेलाल और जोगनाथ हमें यत्र तत्र सर्वत्र दिख जाते हैं।😄

श्रीलाल शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य को केवल एक कालजयी उपन्यास नहीं दिया, बल्कि सत्ता, समाज और संस्थाओं को देखने की एक ऐसी दृष्टि दी, जिसकी प्रासंगिकता समय के साथ कम होने के बजाय बढ़ती ही गई है। उनका उपन्यास हर उस स्थिति में याद आता है जब हम अपने आसपास कुछ विरूप होते हुए देखते हैं! आज ही मैं रामधारी सिंह बिल्डर को याद कर रहा था। कल रश्मिरथी का मंचन देखने एक वैद जी के इंस्टीट्यूट में जाना है।

हमारी विनम्र श्रद्धांजलि उस लेखक को, जिसने हमें सिखाया कि एक गंभीर सच्चाई को प्रभावी ढंग से कहने के लिए गंभीर चेहरा और भारी भरकम शब्द नहीं, व्यंग्य की नुकीली छुरी चाहिए। लगे कि गुदगुदा रहे हैं लेकिन असल में खुरच रहे होते हैं।

अपने "गंज" के सभी साथियों को कहूंगा कि वह इस महान रचनाकार को श्रद्धांजलि दें। 

#श्रीलालशुक्ल #रागदरबारी #हिंदीसाहित्य

बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

विजयदशमी या विजयादशमी!

सामान्यतया दोनों शब्दों का प्रयोग एक ही दिवस विशेष से संबंधित होने के कारण एक ही संदर्भ के लिए किया जाता है। कोश में भी इसे उत्तर भारत के एक प्रमुख उत्सव के लिए बताया गया है जो #दशहरा से संबंधित है। 


वैष्णव साधना में भगवान श्रीराम द्वारा राक्षसराज रावण के वध का दिन अश्विन मास की दशमी तिथि है और यह विजयदशमी है। विजय+दशमी। यह दिन शस्त्र पूजन का है। अपने आपको पुनर्सृजित करने का। यह तिथि प्रति सत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और अन्याय पर न्याय के जीत से संबंधित हो गया है क्योंकि भगवान श्रीराम ने रावण का कुल समेत संहार कर दिया था।

विजयादशमी की तिथि शक्ति से जुड़ी हुई है और शाक्त परंपरा से संबंधित है। शक्ति की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा ने आज की तिथि पर ही महिषासुर का वध किया था। दुर्गा जी का एक नाम बिजया/विजया भी है। बंगाली शुभ बिजॉया लिखते भी हैं। यह विजया+दशमी है। संधि के नियम के अनुसार यही विच्छेद सही है। 


इतने लोगों द्वारा, इतनी बार और इतने तरीके से विजयदशमी और विजयादशमी लिखा और बोला जा रहा है कि सब मिक्स हो गया है। कह सकते हैं कि कोशकारों ने हिंदी कोश का निर्माण करते समय वैष्णव साधना का ध्यान रखा था।


एक नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गांधी ने पिछले साल की शुभकामनाओं में विजयदशमी लिखा है लेकिन इस साल विजयादशमी। मेरा मानना है कि विजयदशमी ही सही है जब भगवान श्रीराम और रावण का प्रसंग हो। मां महिषासुरमर्दिनी का प्रसंग हो तो विजयादशमी लिखना चाहिए।






#दशहरा

#Dussehra 

#विजयदशमी 

#विजयादशमी

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

घनआनंद : रामचंद्र शुक्ल

ये साक्षात् रसमूर्ति और ब्रजभाषा के प्रधान स्तंभों में हैं। इनका जन्म संवत् १७४६ के लगभग हुआ था और ये संवत् १७९६ में नादिरशाही में मारे गए। ये जाति के कायस्थ और दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के मीरमुंशी थे। कहते हैं कि एक दिन दरबार में कुछ कुचक्रियो ने बादशाह से कही कि मीरमुंशी साहब गाते बहुत अच्छा हैं। बादशाह से इन्होंने बहुत टालमटोल किया। इस पर लोगों ने कहा कि ये इस तरह न गाएँगे, यदि इनकी प्रेमिका सुजान नाम की वेश्या कहे तब गाएँगे। वेश्या बुलाई गई। इन्होंने उसकी ओर मुँह और बादशाह की ओर पीठ करके ऐसा गाया कि सब लोग तन्मय हो गए। बादशाह इनके गाने पर जितना ही खुश हुआ उतना ही बेअदबी पर नाराज। उसने इन्हे शहर से निकाल दिया। जब ये चलने लगे तब सुजान से भी साथ चलने को कहा पर वह न गई। इसपर इन्हे विराग उत्पन्न हो गया और ये वृंदावन जाकर निंवार्क-संप्रदाय के वैष्णव हो गए और वहीं पूर्ण विरक्त भाव से रहने लगे। वृंदावन-भूमि का प्रेम इनके इस कवित्त से झलकता है––


गुरनि बतायो, राधा मोहन हू गायो,

⁠सदा सुखद सुहायो वृंदावन गाढ़े गहि रे।

अद्भुत अभूत महिमंडन, परे तें परे,

⁠जीवन को लाहु हा हा क्यों न ताहि लहि रे॥

आनंद को घन छायो रहत निरंतर ही,

⁠सरस सुदेय सो, पपीहापन बहि रे।

जमुना के तीर केलि कोलाहल भीर ऐसी,

⁠पावन पुलिन पै पतित परे रहि रे॥

संवत् १७९६ में जब नादिरशाह की सेना के सिपाही मथुरा तक आ पहुँचे तब कुछ लोगों ने उनसे कह दिया कि वृंदावन में बादशाह का मीरमुंशी रहता है; उसके पास बहुत कुछ माल होगा। सिपाहियों ने इन्हें आ घेरा और 'जर जर जर' (अर्थात् धन, धन, धन, लाओ) चिल्लाने लगे। घनानंदजी ने शब्द को उलटकर 'रज' 'रज' कहकर तीन मुट्ठी वृंदावन की धूल उनपर फेंक दी। उनके पास सिवा इसकें और था ही क्या? सैनिकों ने क्रोध में आकर इनका हाथ काट डाला। कहते है कि मरते समय इन्होंने अपने रक्त से यह कवित्त लिखा था––


बहुत दिनान की अवधि आसपास परे,

⁠खरे अरबरनि भरै हैं उठिं जान को।

कहि कहि आवन छबीले मन-भावन को,

⁠गहि गहि राखति ही दै दै सनमान को॥

झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास ह्वै कै,

⁠अब ना घिरत घनआनँद निदान को।

अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान,

⁠चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को॥


घनआनंदजी के इतने ग्रंथों का पता लगता है––सुजान सागर, बिरहलीला, कोकसागर, रसकेलिवल्ली और कृपाकंड। इसके अतिरिक्त इनके कवित्त सवैयो के फुटकल संग्रह डेढ़ सौ से लेकर सवा चार सौ कवित्तों तक के मिलते हैं। कृष्णभक्ति संबंधी इनका एक बहुत बड़ा ग्रंथ छत्रपुर के राज-पुस्तकालय में है जिसमें प्रियाप्रसाद, ब्रजव्यवहार, वियोगवेली, कृपाकद निबंध, गिरिगाथा, भावनाप्रकाश, गोकुलविनोद, धाम चमत्कार, कृष्णकौमुदी, नाममाधुरी, वृंदावनमुद्रा, प्रेमपत्रिका, रसबसंत इत्यादि अनेक विषय वर्णित हैं। इनकी 'विरहलीला' ब्रजभाषा में पर फारसी के छंद में है।

इनकी सी विशुद्ध, सरस, और शक्तिशालिनी ब्रजभाषा लिखने में और कोई कवि समर्थ नहीं हुआ। विशुद्धता के साथ प्रौढ़ता और माधुर्य भी अपूर्व ही है। विप्रलभ शृंगार ही अधिकतर इन्होंने लिया है। ये वियोग शृंगार के प्रधान मुक्तक कवि है। "प्रेम की पीर" ही लेकर इनकी वाणी का प्रादुर्भाव हुआ। प्रेम मार्ग का ऐसा प्रवीण और धीर पथिक तथा जबाँदानी का ऐसा दावा रखनेवाला ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ। अतः इनके संबंध में निम्नलिखित उक्ति बहुत ही संगत है––


नेही महा, ब्रजभाषा-प्रवीन औ सुंदरताहु के भेद को जानै।

योग वियोग की रीति में कोविद, भावना भेद स्वरूप को ठानै॥

चाह के रंग में भीज्यो हियों, बिछुरे मिले प्रीतम सांति न मानै।

भाषाप्रबीन, सुछंद सदा रहै सो घन जू के कवित्त बखानै॥


इन्होंने अपनी कविताओं में बराबर 'सुजान' को संबोधन किया है जो शृंगार में नायक के लिये और भक्तिभाव में कृष्ण भगवान् के लिये प्रयुक्त मानना चाहिए। कहते हैं कि इन्हें अपनी पूर्व प्रेयसी 'सुजान' का नाम इतना प्रिय था कि विरक्त होने पर भी इन्होंने उसे नहीं छोड़ा। यद्यपि अपने पिछले जीवन में घनानंद विरक्त भक्त के रूप में वृंदावन जा रहे पर इनकी अधिकांश कविता भक्ति-काव्य की कोटि में नहीं आएगी, शृंगार की ही कही जायगी। लौकिक प्रेम की दीक्षा पाकर ही ये पीछे भगवत्प्रेम में लीन हुए। कविता इनकी भावपक्षप्रधान है। कोरे विभावपक्ष का चित्रण इनमें कम मिलता है। जहाँ रूप छटा का वर्णन इन्होंने किया भी है वहाँ उसके प्रभाव का ही वर्णन मुख्य हैं। इनकी वाणी की प्रवृत्ति अंतर्वृत्ति-निरूपण की ओर ही विशेष रहने के कारण बाह्यार्थ-निरूपक रचना कम मिलती है। होली के उत्सव, मार्ग में नायक-नायिका की भेंट, उनकी रमणीय चेष्टाओं आदि के वर्णन के रूप में ही वह पाई जाती है। संयोग का भी कहीं कहीं बाह्य वर्णन मिलता है, पर उसमें भी प्रधानता बाहरी व्यापारों या चेष्टाओं की नहीं है, हृदय के उल्लास और लीनता की ही है।


प्रेमदशा की व्यंजना ही इनको अपना क्षेत्र है। प्रेम की गूढ़ अंतर्दशा का उद्घाटन जैसा इनमें है वैसा हिंदी के अन्य शृंगारी कवि में नहीं। इस दशा का पहला स्वरूप है हृदय या प्रेम का आधिपत्य और बुद्धि का अधीन पद, जैसा कि घनानंद ने कहा है––


"रीझ सुजान सची पटरानी, बची बुधि बापुरी ह्वै करि दासी‌।"


प्रेमियों की मनोवृत्ति इस प्रकार की होती है कि वे प्रिय की कोई साधारण चेष्टा भी देखकर उसको अपनी ओर झुकाव मान लिया करते हैं और फूले फिरते हैं। इसका कैसा सुंदर आभास कवि ने नायिका के इस वचने द्वारा दिया है जो मन को संबोधन करके कहा गया है––


"रुचि के वे राजा जान प्यारे हैं आनंदघन,

⁠होत कहा हेरे, रंक! मानि लीनो मेल सो"॥


कवियों की इसी अंतर्दृष्टि की ओर लक्ष्य करके एक प्रसिद्ध मनस्तत्ववेत्ता ने कहा है कि भावो या मनोविकारों के स्वरूप-परिचय के लिये कवियो की वाणी का अनुशीलन जितना उपयोगी है उतना मनोविज्ञानियों के निरूपण नहीं।


प्रेम की अनिर्वचनीयता का आभास घनानंद ने विरोधाभासों के द्वारा दिया है। उनके विरोध-मूलक वैचित्र्य की प्रवृत्ति का कारण यहीं समझना चाहिए।


यद्यपि इन्होंने संयोग और वियोग दोनों पक्षो को लिया है, पर वियोग की अंतर्दशाऔ की ओर ही दृष्टि अधिक है। इसी से इनके वियोग संबंधी पद्य ही प्रसिद्ध है। वियोग-वर्णन भी अधिकतर अंतर्वृत्ति-निरूपक है, बाह्यार्थ-निरूपक नहीं। घनानंद ने न तो बिहारी की तरह विरह ताप को बाहरी मान से मापा है, न बाहरी उछल-कूद दिखाई है, जो कुछ हलचल है वह भीतर की है–– बाहर से वह वियोग प्रशांत और गभीर है; न उसमें करवटें बदलना है, न सेज की आग की तरह तपना है, न उछल-उछल कर भागना है। उनकी "मौन मधि पुकार" है।


यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि भाषा पर जैसा अचूक अधिकार इनका था वैसा और किसी कवि का नहीं। भाषा मानो इनके हृदय के साथ जुड़ कर ऐसी वशवर्त्तिनी हो गई थी कि ये उसे अपनी अनूठी भावभंगी के साथ साथ जिस रूप में चाहते थे उस रूप में मोड़ सकते थे। इनके हृदय का योग पाकर भाषा को नूतन गतिविधि का अभ्यास हुआ और वह पहले से कहीं अधिक बलवती दिखाई पड़ी। जब आवश्यकता होती थी तब ये उसे बँधी प्रणाली पर से हटाकर अपनी नई प्रणाली पर ले जाते थे। भाषा की पूर्व अर्जित शक्ति से ही काम न चला कर इन्होंने उसे अपनी ओर से शक्ति प्रदान की है। घनानंदजी उन विरले कवियों में हैं जो भाषा की व्यंजकता बढ़ाते हैं। अपनी भावनाओं के अनूठे रूप-रंग की व्यंजना के लिये भाषा का ऐसा बेधड़क प्रयोग करने वाला हिंदी के पुराने कवियों में दूसरा नहीं हुआ। भाषा के लक्षक और व्यंजक बल की सीमा कहाँ तक है, इसकी पूरी परख इन्हीं को थी।


लक्षण का विस्तृत मैदान खुला रहने पर भी हिंदी-कवियों ने उसके भीतर बहुत ही कम पैर बढ़ाया। एक घनानंद ही ऐसे कवि हुए है जिन्होंने इस क्षेत्र में अच्छी दौड़ लगाई। लाक्षणिक मूर्तिमत्ता और प्रयोग-वैचित्र्य की जो छटा इनमें दिखाई पड़ी, खेद है कि वह फिर पौने दो सौ वर्ष पीछे जाकर आधुनिक काल के उत्तरार्द्ध में, अर्थात् वर्तमान, काल की नूतन काव्यधारा में ही, 'अभिव्यंजना-वाद' के प्रभाव से कुछ विदेशी रंग, लिए प्रकट हुई। घनानंद का प्रयोगवैचित्र्य दिखाने के लिये कुछ पंक्तियाँ नीचे उद्धृत की जाती हैं––


(क) अरसानि गही वह वानि कछू, सरसानि सो आनि निहोरत है।


(ख) ह्वै है सोऊ घरी भाग-उघरी अनंदघन सुरस बरसि, लाल! देखिहौ हरी हमे। ('खुले भाग्यवाली घड़ी' में विशेषण-विपर्यय)।


(ग) उघरो जग, छाय रहे घन-आनँद, चातक ज्यों तकिए अब तौ। (उघरो जग=संसार जो चारो ओर घेरे था वह दृष्टि से हट गया।)


(घ) कहिए सु कहा, अब मौन भली, नहिं खोवते जौ हमैं पावते जू। (हमैं=हमारा हृदय)।


विरोधमूलक वैचित्र्य भी जगह जगह बहुत सुंदर मिलता है, जैसे––


(च) झूठ की सचाई छाक्यो, त्यों हित-कचाई पाक्यो, ताके गुनगन घनानंद कहा गनौं।


(छ) उजरनि बसी है हमारी अँखियानि देखौ, सुब्स सुदेस जहाँ रावरे बसत हो।


(ज) गति सुनि हारी, देखि थकनि मैं चली जाति, थिर चर दसा कैसी ढकी उघरति है।


(झ) तेरे ज्यौं न लेखो, मोहिं मारत परेखो महा, जान घनानँद पै खोयबो लहत हैं।


इन उद्धरणो से कवि की चुभती हुई वचन-वक्रता पूरी पूरी झलकती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि कवि की उक्ति ने वक्र पथ हृदय के वेग के कारण पकड़ा है।


भाव का स्रोत जिस प्रकार टकराकर कहीं कहीं वक्रोक्ति के छींटे फेंकता है उसी प्रकार कहीं कहीं भाषा के स्निग्ध, सरल और चलते प्रवाह के रुप में भी प्रकट होता है। ऐसे स्थलों पर अत्यंत चलती और प्रांजल ब्रजभाषा की रमणीयता दिखाई पड़ती है––


कान्ह परे बहुतायत में, इकलैन की वेदन जानौ कहाँ तुम?

हौ मन-मोहन, मोहे कहूँ न, बिथा बिमनैन की मानौ कहा तुम?

बौरे बियोगिन्ह आप सुजान ह्वै, हाय! कछु उर आनौ कहो तुम?

आरतिवंत पपीहन को घन आनँद जू! पहिचानौ कहा तुम?


कारी कूर कोकिल कहाँ को बैर काढ़ति री,

⁠कूकि कूकि अबहीं करेजो किन कोरि लै।

पैंढ परै पापी ये कलापी निसि द्यौस ज्यों ही,

⁠चातक रे घातक ह्वै तूहू कान फोरि लैं॥


आनँद के घन प्रान-जीवन सुजान बिना,

⁠जानि कै अकेली सब घेरो-दल जोरि लै।

जौ लौं करैं आवन विनोद-बरसावन वे,

⁠तौ लौं रे डरारे बजमारे घन घोरि लै॥


इस प्रकार की सरल रचनाओं में कहीं-कहीं नाद-व्यंजना भी बड़ी अनूठी है। एक उदाहरण लीजिए––


ए रे बीर पौन! तेरो सबै और गौन, वारि

⁠तो सों और कौन मनै ढरकौहीं बानि दै।

जगत के प्रान, ओछे बडे़ को समान, घन

⁠आनंद-निधान सुखदान दुखियानि दै॥

जान उजियारे, गुन-भारे अति मोहि प्यारे

⁠अब ह्वै अमोही बैठे पीठि पहिचान दै।

बिरह बिथा को मूरि आँखिन में राखौं पूरि,

⁠धूरि तिन्ह पायँन की हा हा! नैकु आनि दै॥


ऊपर के कवित्त के दूसरे चरण में आए हुए "आनँद-निधान सुखदान दुखियानि दै" में मृदंग की ध्वनि का बड़ा सुंदर अनुकरण हैं।


उक्ति का अर्थगर्भव भी धनानंद का स्वतंत्र और स्वावलंबी होता है, बिहारी के दोहों के समान साहित्य की रूढ़ियों (जैसे, नायिकाभेद) पर आश्रित नहीं रहता। उक्तियो की सांगोपांग योजना या अन्विति इनकी निराली होती है। कुछ उदाहरण लीजिए––


पूरन प्रेम को मंत्र महा पन जा मधि सोधि सुधारि है लेख्यो।

ताही के चारु चरित्र विचित्रनि यों पचि कै रचि राखि विसेख्यो॥

ऐसो हियो-हित-पत्र पवित्र जो आन कथा न कहूँ अवरेख्यो।

सो घन-आनँद जान अजान लौं टूक कियो,पर वाँचि न देख्यो॥


आनाकानी आरसी निहारिबो करोगे कौलो?

⁠कहा भो चकित दसा त्यों न दीठि डोलि है?


मौन हू सो देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू,

⁠कूक-भरी मूकता बुलाय आप बोलिहै।

जान घन-आनँद यों मोहिं तुम्हैं पैज परी,

⁠जानियैगो टेक टरें कौंन धौं भलोलिहे।

रूई दिए रहौगे कहाँ लौं बहरायबे की?

⁠कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलिहै॥


अंतर में बासी पै प्रवासी कैसो अंतर है,

⁠मेरी न सुनत, दैया! आपनीयौ ना कहौ।

लोचननि तारे ह्वै सुझायो सब, सुझी नाहिं,

⁠बुझी न परति ऐसी सोचनि कहा दहौ॥

हौं तौ जानराय, जाने जाहु न, अजान यातें,

⁠आनँद के घन छाया छाय उधरे रहौ।

मूरति मया की हा हा! सूरति दिखैए नैकु,

⁠हमैं खोय या बिधि हो! कौन धौं लहा लहौ॥


मूरति सिंगार की उजारी छबि आछी भाँति,

⁠दीठि-लासला के लोयननि लै लै आँजिहौ।

रति-रसना-सवाद पाँवड़े पुनीतकारी पाय,

⁠चूमि चूमि कै कपोलनि सों माँजिहौ॥

जान प्यारे प्रान अंग-अंग-रुचि-रंगनि में,

⁠बोरि सब अंगन अनंग-दुख भाँजिहौं।

कब घन-आनँद ढ़रौही बानि देखें,

⁠सुधा हेत मन-घट दरकनि सुठि राँजिहौं॥

⁠(राँजना=फूटे बरतन में जोड़ या टाँका लगाना।)


निसि द्यौस खरी उतर माँझ अरी छबि रंगभरी मुरी चाहनि की।

तकि मोरनि त्यों चख ढोरि रहैं, ढरिगो हित ढोरनि बाहनि की॥

चट दै कटि पै बंट प्रान गए गति सों मति में अवगाहनि की।

घनआँनद जान लख्यों जब तें जक लागियै मोहि कराहनि की॥


इस अंतिम सवैये के प्रथम तीन चरणों में कवि ने बहुत सूक्ष्म कौशल दिखाया है। 'मुरि चाहनि' और 'तकि मोरनि' से यह व्यक्त किया गया है कि एक बार नायक ने नायिका की ओर मुड़कर देखा फिर देखकर मुड़ गए और अपना रास्ता पकड़ा। देख कर जब वे मुड़े तब नायिका का मन उनकी ओर इस प्रकार ढल पड़ा जैसे पानी नाली में दल जाता है। कटि में बल देकर प्यारे नायिका के मन में डूबने के भय से निकल गए।


घनानंद के ये दौ सवैये बहुत प्रसिद्ध है––


पर कारज देह को धारे फिरौ परजन्य! जथारथ ह्वै दरसौ।

निधि नीर सुधा के समान करो, सबही बिधि सुंदरता सरसौ॥

घनआनँद जीवनदायक हौ, कबौं मैरियौं पीर हिये परसौ।

कबहूँ वा बिसासी सुज्ञान के आँगन गो अँसुवान कौ लै बरसौ॥


अति सूधो सनेह को मारग हैं, जहँ नैकु सयानप बाँक नहीं।

तहँ साँचे चलैं तजि आपनपौ, झिझकैं कपटी जो निसाँक नहीं॥

घनआनँद प्यारे सुजान सुनौ, इत एक तें दूसरो आँक नहीं।

तुम कौन सी पाटी पढ़ें हो लला, मन लैहु पै देहु छटाँक नहीं।


('विरहलीला' से)


सलोने श्याम प्यारे क्यों न आवौ। दरस प्यासी मरैं तिनकौं जिवावौ॥

कहाँ हौ जू, कहाँ हौ जू, कहाँ हौ। लगे ये प्रान तुमसों हैं जहाँ हौ॥

रहौ किन प्रान प्यारे नैन आगैं। तिहारे कारनै दिनरात जागैं॥

सजन! हित मान कै ऐसी न कीजै! भई हैं बावरी सुध आय लीजै॥

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

मेरा प्रतिनिधि रघुवीर सहाय की कविता

उसके दिल की धड़कन

उस दिल की धड़कन है

भीड़ के शिकार के

सीने में जो है।


हाहाकार

उठता है घोष कर

एक जन

उठता है रोषकर

व्याकुल आत्मा से आक्रोश कर

अकस्मात

अर्थ

भर जाता है पुरुष वह

हम सबके निर्विवाद जीने में।

सिंहासन ऊँचा है सभाध्यक्ष छोटा है

अगणित पिताओं के

एक परिवार के

मुँह बाये बैठे हैं लड़के सरकार के

लूले काने बहरे विविध प्रकार के

हल्की-सी दुर्गन्ध से भर गया है सभाकक्ष।

सुनो वहाँ कहता है

मेरा प्रतिनिधि

मेरी हत्या की करुण कथा।


हँसती है सभा

तोंद मटका

ठठाकर

अकेले अपराजित सदस्य की व्यथा पर

फिर मेरी मृत्यु से डरकर चिंचियाकर

कहती है

अशिव है अशोभन है मिथ्या है।


मैं

कि जो अन्यत्र

भीड़ में मारा गया था

लिये हुए मशअलें रात में

लोग

मुझे लाये थे साथ में

काग़ज़

था एक मेरे हाथ में

मेरी स्वाधीन जन्मभूमि पर जन्म लिये होने का मेरा प्रमाणपत्र।


मारो मारो मारो शोर था मारो

एक ओर साहब था

सेठ था सिपाही था

एक ओर मैं था

मेरा पुत्र और भाई था

मेरे पास आकर खड़ा हुआ एक राही था

एक ओर आकाश में हो चला था भोर।

मैं अपने घर में फिर

वापस आऊँगा

मैंने कहा


रघुवीर सहाय


बीस वर्ष

खो गये भरमे उपदेश में

एक पूरी पीढ़ी जनमी पली पुसी क्लेश में

बेगानी हो गयी अपने ही देश में

वह

अपने बचपन की

आज़ादी

छीनकर लाऊँगा।


तभी मुझे क़त्ल किया लो मेरे प्रतिनिधि मेरा प्रमाण

घुटता था गला व्यर्थ सत्य कहते-कहते

वाणी से विरोध कर तन से सहते-सहते

सील-भरी बन्द कोठरी में रहते-रहते

तोड़ दिया द्वार आजऋ देखो-देखो मेरी मातृभूमि का उजाड़!


---रघुवीर सहाय

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty)

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty)



भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। इसका उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली की 6 प्रमुख नदियों — सिंधु, वितस्ता, अश्किनी या चंद्रभागा, शतद्रु, इरावती और  विपासा — के जल के न्यायसंगत और शांतिपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना था।

1. पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, वितस्ता, चंद्रभागा या अश्किनी) – इनका अधिकार मुख्य रूप से पाकिस्तान को दिया गया, लेकिन भारत को सीमित गैर-उपभोगी उपयोग (जैसे सिंचाई, विद्युत उत्पादन) की अनुमति है।

2. पूर्वी नदियाँ (इरावती, विपासा, शतद्रु) – इनका पूरा उपयोग भारत को सौंपा गया।

संधि के अंतर्गत एक स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission) की स्थापना की गई है, जो जल साझा करने, आंकड़ों का आदान-प्रदान और विवाद निवारण का कार्य करता है।


⚔️ क्या भारत इसे एकतरफा रद्द कर सकता है?
अंतरराष्ट्रीय कानून (विशेषतः वियना संधि संनियम, 1969) के अनुसार,

➡️ कोई भी देश द्विपक्षीय संधि को एकतरफा रद्द नहीं कर सकता, जब तक उस संधि में ऐसा प्रावधान न हो या दोनों पक्ष सहमत न हों।

➡️ सिंधु जल समझौते में एकतरफा समाप्ति का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

यदि भारत ऐसा करता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जाएगा, और विवाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहुँच सकता है।


विश्व बैंक की भूमिका

▪️यह समझौता विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ था और वह इसका गारंटर (guarantor) है।


▪️यदि भारत समझौते को रद्द करता है या उल्लंघन करता है, तो विश्व बैंक को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।


 राजनीतिक और कूटनीतिक परिणाम

▪️भारत का ऐसा कोई कदम पाकिस्तान के साथ तनाव को बढ़ा सकता है।


▪️अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की छवि को नुकसान पहुँच सकता है।


▪️भारत ने 2016 (उड़ी हमले के बाद) जैसे अवसरों पर समझौते की समीक्षा की बात जरूर की, लेकिन कभी इसे रद्द करने का निर्णय नहीं लिया।


तकनीकी दृष्टि से भारत क्या कर सकता है?

▪️भारत पहले ही पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) का पूरा उपयोग कर रहा है।


▪️पश्चिमी नदियों पर भारत के पास सीमित अधिकार हैं, लेकिन किशनगंगा और रतले जैसे परियोजनाओं द्वारा जल प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है।

🇵🇰 पाकिस्तान के पास क्या विकल्प हैं?

1. कूटनीतिक विरोध

पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और अन्य मंचों पर शिकायत दर्ज कर सकता है।


भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने का प्रयास कर सकता है।


2. कानूनी रास्ता

समझौते में दिए गए प्रावधानों के तहत वह तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) या मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) से विवाद सुलझाने की मांग कर सकता है।


पूर्व में किशनगंगा और रतले विवाद इसी प्रक्रिया से सुलझाए गए थे।


ICJ (अंतरराष्ट्रीय न्यायालय) में भी जा सकता है, पर यह जटिल और लंबी प्रक्रिया होगी।


3. आंतरिक उपाय

पाकिस्तान अपनी जल प्रबंधन प्रणाली को सुधार सकता है – जैसे नए बांध (डायमर-भाषा) बनाना, वर्षा जल संचयन, भूजल का बेहतर उपयोग आदि।


4. सैन्य या अस्थिरता फैलाने की कोशिश

यह विकल्प खतरे से खाली नहीं, लेकिन किसी भी प्रकार की सीमा पर उथल-पुथल को नकारा नहीं जा सकता।


5. दोस्त देशों का सहयोग

पाकिस्तान चीन, सऊदी अरब जैसे सहयोगी देशों से समर्थन मांग सकता है।


चीन, जो सिंधु की सहायक नदियों पर खुद बांध बना रहा है, इस मामले में पाकिस्तान का साथ दे सकता है — यह भारत के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकता है।


सिंधु जल समझौता अब तक भारत-पाक संबंधों में एक स्थिर स्तंभ रहा है, जो युद्धों के समय भी नहीं टूटा।


हालाँकि भारत के पास इस पर पुनर्विचार या समीक्षा का अधिकार है

सद्य: आलोकित!

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