सोमवार, 14 सितंबर 2026

आंसू खण्ड काव्य से!

जयशंकर प्रसाद विरचित आंसू खण्ड काव्य से यह अंश बी ए प्रथम सेमेस्टर के विद्यार्थियों की सुविधा के लिए यहाँ प्रस्तुत है. यह अंश जयशंकर प्रसाद की काव्यात्मक प्रतिभा और उनकी छायावादी वृत्ति का परिचय देता है.

जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति-सी छाई,
दुर्दिन में आंसू बनकर, वह आज बरसने आई।

अर्थ: कवि कहते हैं कि उनके भीतर जो दुःख और पीड़ा लंबे समय से जमा (घनीभूत) थी, वह उनके दिमाग में पुरानी यादों की तरह छाई हुई थी। आज जब जीवन में बुरे दिन (दुर्दिन) आए, तो वह अंदर दबी हुई पुरानी पीड़ा आँखों से आँसू के रूप में बहने लगी है।
इस करुणा-कलित हृदय में, अब विकल रागिनी बजती,
क्यों हाहाकार-स्वरों में, वेदना असीम गरजती?

अर्थ: इस करुणा और दुःख से भरे हुए दिल में अब सुख के गीत नहीं, बल्कि व्याकुलता और बेचैनी का संगीत (विकल रागिनी) बज रहा है। कवि पूछते हैं कि मेरे भीतर का यह असीमित दर्द आज चीख-पुकार और हाहाकार के रूप में क्यों उमड़ रहा है?
मानस-सागर के तट पर, क्यों लोल लहरियां उठतीं,
कललोल-विशृंखल करतीं, उपहास हमारा करतीं।

अर्थ: मेरे मन रूपी समुद्र के किनारे पर यादों की चंचल (लोल) लहरें उठ रही हैं। ये लहरें बेकाबू होकर इतनी तेज गूंज रही हैं कि ऐसा लगता है जैसे वे मेरी इस बेबसी और अकेलेपन का मजाक (उपहास) उड़ा रही हों।
आती है शून्य क्षितिज से, क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी,
अकलाई-सी गिरती है, इस विजन-गगन में मेरी।

अर्थ: इस अकेलेपन में जब मैं अपने प्रिय को पुकारता हूँ, तो उस खाली और शांत आसमान (शून्य क्षितिज) से मेरी ही आवाज टकराकर वापस आ जाती है। वह गूंज थकी और घबराई हुई सी मेरे ही एकांत आकाश में गिरकर खत्म हो जाती है।
शीतल ज्वाला जलती है, ईंधन होता दृग-जल का,
यह व्यर्थ सांस चल-चलकर, महकाता है मन मल का।

अर्थ: यहाँ कवि ने 'शीतल ज्वाला' (अलंकार) का प्रयोग किया है। विरह की आग बाहर से ठंडी दिखती है पर अंदर ही अंदर जलाती है। इस आग को भड़काने का काम आँखों के आँसू (दृग-जल) कर रहे हैं। इस दुःख में जो सांसें चल रही हैं, वे व्यर्थ लग रही हैं और मन के मैल (उदासी) को और बढ़ा रही हैं।
बढ़ती है लपट विरह की, सुलगती है सुधि प्यारी,
इस विरह-चिंता-चिन्मय में, जलती है दुनिया सारी।

अर्थ: अपने प्रिय से अलग होने का दुःख (विरह) लगातार बढ़ता जा रहा है और उनकी प्यारी यादें दिल में सुलग रही हैं। दुःख के इस माहौल में कवि को ऐसा लगता है जैसे उनके साथ-साथ यह पूरी दुनिया ही विरह की आग में जल रही है।
यह सुलगती हुई आग है, बुझने की आस नहीं है,
जीवन की इस बेला में, कोई भी पास नहीं है।

अर्थ: दिल के भीतर दुःख की जो आग सुलग रही है, उसके बुझने की कोई उम्मीद (आस) नहीं दिखती। जीवन के इस कठिन और उदास समय (बेला) में कवि खुद को बिल्कुल अकेला पाते हैं, उनके पास ढाढस बंधाने वाला कोई नहीं है।
जो सुख का सपना देखा, वह दुःख का कारण बन गया,
जीवन का सुंदर उपवन, अब मरुस्थल जैसा बन गया।

अर्थ: अतीत में प्रिय के साथ बिताए जिन सुख के दिनों का सपना कवि ने देखा था, आज वही यादें उनके सबसे बड़े दुःख का कारण बन गई हैं। उनका हंसता-खेलता खुशहाल जीवन (सुंदर उपवन) अब एक सूखे रेगिस्तान (मरुस्थल) की तरह सुनसान हो गया है।
जिसके आगे सब फीका, वह रूप कहाँ अब पाऊँ,
इस सूने मन के भीतर, मैं किसको आज बिठाऊँ।

अर्थ: जिस प्रिय की सुंदरता के आगे दुनिया की हर चीज फीकी लगती थी, उसे अब कहाँ ढूंढूं? इस खाली और वीरान हो चुके दिल में अब उस प्रिय के अलावा किसी और को बिठाने (जगह देने) की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
रो-रोकर सिसक-सिसककर, कहता मैं करुण कहानी,
तुम सुमन नोचते करते, अपने सुंदर मनमानी।

अर्थ: कवि रोते और सिसकते हुए अपने दर्द की कहानी बयां कर रहे हैं। वे अपने प्रिय को याद करते हुए कहते हैं कि एक तरफ मैं इस कदर टूट चुका हूँ, और दूसरी तरफ तुम फूलों (खुशियों) को नोचते हुए अपनी ही सुंदर मनमानी में व्यस्त रहे, तुम्हें मेरे दर्द का अहसास तक न हुआ।

श्रद्धा सर्ग (कामायनी ) - जयशंकर प्रसाद


(कामायनी में कुल 15 सर्ग हैं-    1. चिन्ता   2. आशा 3. श्रद्धा   4. काम   5. वासना  6. लज्जा   7. कर्म   8. ईर्ष्या   9. इड़ा   10. स्वप्न   11. संघर्ष   12. निर्वेद  13. दर्शन  14. रहस्य  15. आनन्द. 

इसके तीसरे सर्ग 'श्रद्धा' में जल प्रलय से हताश और निराश मनु और श्रद्धा की भेंट का वर्णन है। श्रद्धा मनु को निराशा से उबारकर कर्म, प्रेम और सकारात्मकता का संदेश देती है तथा उनके जीवन में नई आशा का संचार करती है। श्रद्धा के इस प्रेरणास्पद सहयोग से मनु एक नई सृष्टि के आरंभ के लिए तैयार होते हैं। इस सर्ग में श्रद्धा के सौंदर्य का बहुत उत्कृष्ट वर्णन किया है.)


“कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर

तरंगों से फेंकी मणि एक,

कर रहे निर्जन का चुपचाप

प्रभा की धारा से अभिषेक!


मधुर विश्रांत और एकांत—

जगत का सुलझा हुआ रहस्य,

एक करुणामय सुंदर मौन

और चंचल मन का आलस्य!”


सुना यह मनु ने मधु-गुंजार

मधुकरी का-सा जब सानंद,

किए मुख नीचा कमल समान

प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद;


एक झिटका-सा लगा सहर्ष,

निरखने लगे लुटे-से, कौन—

गा रहा यह सुंदर संगीत?

कुतूहल रह न सका फिर मौन!


और देखा वह सुंदर दृश्य

नयन का इंद्रजाल अभिराम;

कुसुम-वैभव में लता समान

चंद्रिका से लिपटा घन श्याम।


हृदय की अनुकृति बाह्य उदार

एक लंबी काया, उन्मुक्त;

मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल

सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।


मसृण गांधार देश के, नील

रोम वाले मेघों के चर्म,

ढँक रहे थे उसका वपु कांत

बन रहा था वह कोम वर्म।


नील परिधान बीच सुकुमार

खुल रहा मृदुल अधखुला अंग;

खिला हो ज्यों बिजली का फूल

मेघ-बन बीच गुलाबी रंग।


आह! वह मुख! पश्चिम के व्योम—

बीच जब घिरते हों घन श्याम;

अरुण रवि-मंडल उनको भेद

दिखाई देता हो छविधाम।


या कि, नव इंद्र नील लघु शृंग

फोड़ कर धधक रही हो कांत;

एक लघु ज्वालामुखी अचेत

माधवी रजनी में अश्रांत।


घिर रहे थे घुँघराले बाल

अंस अवलंबित मुख के पास;

नील घन-शावक से सुकुमार

सुधा भरने को विधु के पास।


और उस मुख पर वह मुस्क्यान!

रक्त किसलय पर ले विश्राम

अरुण की एक किरण अम्लान

अधिक अलसाई हो अभिराम।


नित्य यौवन छवि से ही दीप्त

विश्व की करुण कामना मूर्ति;

स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण

प्रकट करती ज्यों जड़ से स्फूर्ति।


उषा की पहिली लेखा कांत,

माधुरी से भींगी भर मोद;

मद भरी जैसे उठे सलज्ज

भोर की तारक द्युति की गोद।


कुसुम कानन-अंचल में मंद

पवन प्रेरित सौरभ साकार,

रचित परमाणु पराग शरीर

खड़ा हो ले मधु का आधार।


और पड़ती हो उस पर शुभ्र

नवल मधु-राका मन की साध;

हँसी का मद विह्वल प्रतिबिंब

मधुरिमा खेला सदृश अबाध।


कहा मनु ने, “नभ धरणी बीच

बना जीवन रहस्य निरुपाय;

एक उल्का-सा जलता भ्रांत,

शून्य में फिरता हूँ असहाय।


शैल निर्झर न बना हतभाग्य

गल नहीं सका जो कि हिम-खंड,

दौड़कर मिला न जलनिधि अंक

आह वैसा ही हूँ पाषंड।


पहेली-सा जीवन है व्यस्त

उसे सुलझाने का अभिमान,

बताता है विस्मृति का मार्ग

चल रहा हूँ बन कर अनजान।


भूलता ही जाता दिन-रात

सजल अभिलाषा कलित अतीत;

बढ़ रहा तिमिर गर्भ में नित्य,

दीन जीवन का यह संगीत।


क्या कहूँ, क्या कहूँ मैं उद्भ्रांत?

विवर में नील गगन के आज,

वायु की झटकी एक तरंग,

शून्यता का उजड़ा-सा राज।


एक विस्मृति का स्तूप अचेत,

ज्योति का धुँधला-सा प्रतिबिंब;

और जड़ता की जीवन राशि

सफलता का संकलित विलंब।


“कौन हो तुम वसंत के दूत?

विरस पतझड़ में अति सुकुमार!

घन तिमिर में चपला की रेख,

तपन में शीतल मंद बयार।


नखत की आशा किरण समान,

हृदय की कोमल कवि की कांत—

कल्पना की लघु लहरी दिव्य

कर रही मानस हलचल शांत!”


लगा कहने आगंतुक व्यक्ति

मिटाता उत्कंठा सविशेष;

दे रहा हो कोकिल सानंद

सुमन को ज्यों मधुमय संदेश:


“भरा था मन में नव उत्साह

सीख लूँ ललित कला का ज्ञान

इधर रह गंधर्वों के देश

पिता की हूँ प्यारी संतान।


घूमने का मेरा अभ्यास,

बढ़ा था मुक्त व्योम-तल नित्य;

कुतूहल खोज रहा था व्यस्त

हृदय सत्ता का सुंदर सत्य।


दृष्टि जब जाती हिम-गिरि ओर

प्रश्न करता मन अधिक अधीर,

धरा की यह सिकुड़न भयभीत

आह कैसी है? क्या है पीर?


मधुरिमा में अपनी ही मौन,

एक सोया संदेश महान,

सजग हो करता था संकेत;

चेतना मचल उठी अनजान।


बढ़ा मन और चले ये पैर,

शैल मालाओं का शृंगार;

आँख की भूख मिटी यह देख

आह कितना सुंदर संभार!



एक दिन सहसा सुंधु अपार

लगा टकराने नग तल क्षुब्ध;

अकेला यह जीवन निरुपाय

आज तक घूम रहा विश्रब्ध।


यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न,

भूत-हित-रत किसका यह दान!

इधर कोई है अभी सजीव

हुआ ऐसा मन में अनुमान।


तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत?

वेदना का यह कैसा वेग?

आह! तुम कितने अधिक हताश

बताओ यह कैसा उद्वेग!


हृदय में क्या है नहीं अधीर,

लालसा जीवन की निश्शेष?

कर रहा वंचित कहीं न त्याग

तुम्हें, मन में धर सुंदर वेश!


दु:ख के डर से तुम अज्ञात

जटिलताओं का कर अनुमान,

काम से झिझक रहे हो आज,

भविष्यत् से बन कर अनजान।


कर रही लीलामय आनंद,

महा चिति सजग हुई सी व्यक्त,

विश्व का उन्मीलन अभिराम

इसी में सब होते अनुरक्त।


काम मंगल से मंडित श्रेय

स्वर्ग, इच्छा का है परिणाम;

तिरस्कृत कर उसको तुम भूल

बनाते हो असफल भवधाम।


“दु:ख की पिछली रजनी बीच

विकसता सुख का नवल प्रभात;

एक परदा यह झीना नील

छिपाए है जिसमें सुख गात।


जिसे तुम समझे हो अभिशाप,

जगत की ज्वालाओं का मूल;

ईश का वह रहस्य वरदान,

कभी मत इसको जाओ भूल।


विषमता की पीड़ा से व्यस्त

हो रहा स्पंदित विश्व महान;

यही दु:ख सुख विकास का सत्य

यही भूमा का मधुमय दान।


नित्य समरसता का अधिकार,

उमड़ता कारण जलधि समान;

व्यथा से नीली लहरों बीच

बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!”


लगे कहने मनु सहित विषाद:-

“मधुर मारुत से ये उच्छ्वास

अधिक उत्साह तरंग अबाध

उठाते मानस में सविलास।


किंतु जीवन कितना निरुपाय!

लिया है देख नहीं संदेह

निराशा है जिसका परिणाम

सफलता का वह कल्पित गेह।“


कहा आगंतुक ने सस्नेह:-

“अरे तुम इतने हुए अधीर!

हार बैठे जीवन का दाँव,

जीतते मर कर जिसको वीर।


तप नहीं केवल जीवन सत्य

करुण यह क्षणिक दीन अवसाद;

तरल आकांक्षा से है भरा

सो रहा आशा का आह्लाद।


प्रकृति के यौवन का शृंगार

करेंगे कभी न बासी फूल;

मिलेंगे वे जाकर अति शीघ्र

आह उत्सुक है उनकी धूल।


पुरातनता का यह निर्मोक

सहन करती न प्रकृति पल एक;

नित्य नूतनता का आनंद

किए हैं परिवर्तन में टेक।


युगों की चट्टानों पर सृष्टि

डाल पद-चिह्न चली गंभीर;

देव, गंधर्व, असुर की पंक्ति

अनुसरण करती उसे अधीर।


“एक तुम, यह विस्तृत भू-खंड

प्रकृति वैभव से भरा अमंद;

कर्म का भोग, भोग का कर्म

यही जड़ का चेतन आनंद।


अकेले तुम कैसे असहाय

यजन कर सकते? तुच्छ विचार!

तपस्वी! आकर्षण से हीन

कर सके नहीं आत्म विस्तार।


दब रहे हो अपने ही बोझ

खोजते भी न कहीं अवलंब;

तुम्हारा सहचर बन कर क्या न

उऋण होऊँ मैं बिना विलंब?


समर्पण लो सेवा का सार

सजल संसृति का यह पतवार,

आज से यह जीवन उत्सर्ग

इसी पद तल में विगत विकार।


दया, माया, ममता लो आज,

मधुरिमा लो, अगाध विश्वास;

हमारा हृदय रत्न निधि स्वच्छ

तुम्हारे लिए खुला है पास।


बनो संसृति के मूल रहस्य

तुम्हीं से फैलेगी वह बेल;

विश्व भर सौरभ से भर जाए

सुमन खेलो सुंदर खेल।


“और यह क्या तुम सुनते नहीं

विधाता का मंगल वरदान—

‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो,

विश्व में गूँज रहा जय गान।


“डरो मत अरे अमृत संतान

अग्रसर है मंगलमय वृद्धि;

पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र

खिंची आवेगी सकल समृद्धि।


देव-असफलताओं का ध्वंस

प्रचुर उपकरण जुटाकर आज;

पड़ा है बन मानव संपत्ति

पूर्ण हो मन का चेतन राज।


चेतना का सुंदर इतिहास

अखिल मानव भावों का सत्य;

विश्व के हृदय-पटल पर दिव्य

अक्षरों से अंकित हो नित्य।


विधाता की कल्याणी सृष्टि

सफल हो इस भूतल पर पूर्ण;

पटें सागर, बिखरें ग्रह-पुंज

और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।


उन्हें चिंगारी सदृश सदर्प

कुचलती रहे खड़ी सानंद;

आज से मानवता की कीर्ति

अनिल, भू, जल में रहे न बंद।


जलधि में फूटें कितने उत्स

द्वीप, कच्छप डूबें-उतराएँ;

किंतु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति

अभ्युदय का कर रही उपाय।


विश्व की दुर्बलता बल बने,

पराजय का बढ़ता व्यापार

हँसाता रहे उसे सविलास

शक्ति का क्रीड़ामय संचार।


शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त

विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;

समन्वय उसका करें समस्त

विजयिनी मानवता हो जाए।


शनिवार, 12 सितंबर 2026

हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा : विविध आयाम - जिलाधिकारी श्री शुभ्रांत कुमार शुक्ल का व्याख्यान



'हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा : विविध आयाम' विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी इस महाविद्यालय में रखी गई है। जो भी इसके आयोजक गण हैं उनको ढेर सारी बधाइयां। हमारे जो प्रिंसिपल साहब हैं, प्रोफेसर श्यामपाल सिंह जी और जो हिंदुस्तानी एकेडमी है, दोनों लोग मिलकर इसको आज आयोजित किए हैं, आपको ढेर सारी शुभकामनाएं और बधाई। आज के इस कार्यक्रम में यहाँ पर उपस्थित हमारे प्रिंसिपल साहब और जो बाहर से आए हुए गेस्ट स्पीकर्स हैं—प्रोफेसर संजीव दुबे साहब, प्रो गौरव तिवारी साहब, अन्य जो डिस्टिंग्विश्ड एकेडेमिशियंस हैं, प्राचार्य गण हैं, आचार्य गण हैं, प्रोफेसर्स हैं, आयोजन सचिव डॉ रमाकान्त राय जी, और सभी यहाँ पर उपस्थित स्टूडेंट्स। बहुत ही अच्छा विषय है और बहुत ही व्यापक विषय है, बहुत बड़ा विषय है। यह अपने आप में बहुत बड़ा सब्जेक्ट है, यूजी-पीजी और रिसर्च का सब विषय हो सकता है।

फिल्मों में मेरी कोई इस विषय में विशेषज्ञता भी नहीं है। लेकिन जैसा कि हम सभी जानते हैं, इंडिया की जो लाइफस्टाइल है उसमें फिल्म समाई हुई है। जैसे रोटी, कपड़ा और मकान हमारे जीवन में आवश्यक हैं, इसी तरह से यह सिनेमा भी हमारी लाइफ का एक हिस्सा है।

मैं थोड़ा बहुत अपना जो फिलॉसॉफिकल (दार्शनिक) अप्रोच है, वह यहाँ प्रस्तुत कर सकता हूँ। कंटेंट के मामले में बहुत ज्यादा मेरा शौक भी नहीं रहा है, तो बतौर प्रशासक (As an Administrator) मैं इसे विशेषकर भारतीय और हिंदी सिनेमा को किस रूप में देखता हूँ, उस पर थोड़ी बात करूँगा। आशा है कि इन दो दिनों में अच्छा डिस्कशन होगा और उसमें स्टूडेंट्स को भी जोड़ेंगे।

देखिए, इस तरह के राष्ट्रीय सेमिनार कराने का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि हमारे जो स्टूडेंट्स हैं, उनको किस तरह से हम अनुसंधान (Research) की तरफ मोड़ें, किस तरह से वे सेल्फ-लर्निंग मोड में जाएँ। वे आएँ, देखें कि यह जो टॉपिक है, इसकी कितनी शाखाएँ (Branches) निकल रही हैं—कोई इसे किस रूप में देखता है, कोई किसी और रूप में देखता है।

स्टूडेंट्स में इस स्तर पर 'डीप थिंकिंग' (गहन चिंतन) की एप्रोच विकसित होने की आवश्यकता है। जो एक बार इन चीजों को समझ लेता है, वह दिमाग में हमेशा बना रहता है। जब कभी कोई मुद्दा सामने आता है, तो व्यक्ति अलग-अलग दृष्टिकोणों (Different Perspectives) से सोचने लगता है। यहाँ जो अलग-अलग स्पीकर्स हैं, हो सकता है उनके विचार एक-दूसरे के विरोधी हों या एक-दूसरे को सपोर्ट करते हों। विचारों की यह विविधता ही सभी को एक बेहतरीन एक्सपोज़र देती है।

दार्शनिक रूप से मुझे ऐसा लगता है कि सिनेमा समाज के लिए दर्पण की तरह है। जैसा समाज में घटित होता है, वैसा ही हम सिनेमा में देखते हैं। जब डकैतों का दौर था, तो 'शोले' जैसी फ़िल्में बनीं। सिनेमा एक मिरर इमेज (प्रतिबिंब) है। साथ ही, बहुत सारा विरोध (Protest) जो पहले केवल लेखन से होता था, अब फ़िल्मों के माध्यम से भी लोग अपनी बात और विरोध दर्ज कराने लगे हैं।

फ़िल्म की जो खास बात है, वह यह है कि यह एक 'ग्रुप एक्टिविटी' (सामूहिक गतिविधि) है। इसमें बहुत सारे संसाधन (Resources) लगते हैं और कई तरह के कौशल शामिल होते हैं—डायलॉग, संगीत, तकनीक और एक बहुत बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर।

गांधी जी को जब अच्छी तरह से जानना होता है, तो 'गांधी' मूवी याद आती है और 2 अक्टूबर को उसका प्रसारण भी किया जाता है। फ़िल्मों के माध्यम से बायोग्राफी प्रस्तुत की जाती है और वैल्यू सिस्टम (मूल्य प्रणाली) को भी समाज में प्रमोट किया जाता है।

यह दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ जहाँ पुरानी संस्कृति को दिखाना, प्रमोट करना और संरक्षित करना है; वहीं दूसरी तरफ बाहरी संस्कृति का प्रदर्शन भी होता है, जिसको लेकर लोगों के मन में अलग-अलग विचार होते हैं। यह अपने आप में एक रहस्यमयी दुनिया है।

'नदिया के पार' जैसी फ़िल्म ने पूर्वांचल की संस्कृति को दर्शाया। वह फ़िल्म इतनी लोकप्रिय इसलिए हुई क्योंकि उसने मानवीय भावनाओं (Human Emotions) को सीधे स्पर्श किया।

आज की नई फ़िल्में यंगस्टर्स और नई पीढ़ी के लिए बन रही हैं। पुरानी पीढ़ी के लोग शायद आज की फ़िल्मों की तेज़ गति और उनकी स्लैंग भाषा को उतनी आसानी से नहीं समझ पाते, क्योंकि सिनेमा का दायरा बहुत व्यापक हो चुका है।

एक प्रशासक के तौर पर देखें, तो सिनेमा में व्यापार और विज्ञापन का बहुत बड़ा रोल है। यह रोजी-रोटी और रोजगार का साधन है। इस इंडस्ट्री में बहुत से लोगों के लिए करियर और जॉब के अवसर हैं। लोग अपने पैशन और शौक को पूरा करते हैं, पैसा भी कमाते हैं और जीवन-यापन करते हैं। इसके अलावा, इसमें इनोवेशन (नवाचार) का बहुत स्कोप है। लिखने वालों के लिए यह एक बड़ा मोटिवेशन है। कवियों और गीतकारों ने फ़िल्मों के लिए बहुत अच्छे-अच्छे गीत लिखे, जिससे उन्हें पहचान और प्रेरणा मिली।

तकनीक के दृष्टिकोण से देखें, तो मूक फिल्मों से शुरुआत होकर आज सिनेमा असीम संभावनाओं तक पहुँच गया है। बहुत सारे रिसर्च और डेवलपमेंट के बाद यह यहाँ तक विकसित हुआ है। आज इसका स्वरूप ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स और मोबाइल के रूप में हमारे सामने है। आज हम सिनेमा हॉल कम जा रहे हैं, लेकिन मोबाइल, टीवी और इंटरनेट के ज़रिए यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

फ़िल्ममेकर्स के पास अवसर है कि वे सकारात्मक विचार प्रमोट करें। हालाँकि कभी-कभी विवादित या विनाशकारी विचारों को लेकर सेंसर बोर्ड और रेगुलेटरी मैकेनिज्म काम करता है, फिर भी एक संवेदनशीलता हमेशा बनी रहती है।

फैशन, पहनावे और जीवनशैली में आने वाले बदलावों में भी सिनेमा का असर दिखता है। एक ज़माने में अमिताभ बच्चन का जो स्टाइल था, उसे पूरी पीढ़ी ने फॉलो किया।

मैं चाहूँगा कि हमारे स्टूडेंट्स भी इस पर शोध कार्य करें। आज हमारे देश और उच्च शिक्षा की यही ज़रूरत है। हमें उस पारंपरिक पेडागॉजी (शिक्षण पद्धति) को बदलना होगा जहाँ सिर्फ़ शिक्षक पढ़ाए और छात्र सिर्फ़ सवाल हल करे। हमें छात्रों को क्लास में प्रेजेंटेशन देने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, उन्हें नए असाइनमेंट्स देने चाहिए। मैंने भारत में भी पढ़ाई की है और यूरोप में भी। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली में नई चीज़ों को जोड़ना होगा और युवाओं को रिसर्च तथा नई खोजों के लिए तैयार करना होगा।

यह संगोष्ठी विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के लिए एक बेहतरीन अवसर है। आप सभी को इस आयोजन और अच्छे विचार-विमर्श के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं और धन्यवाद।


शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

भारतेंदु हरिश्चंद्र के मातृभाषा पर दोहे शब्दार्थ और भावार्थ सहित

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मातृभाषा के दोहे में अपनी भाषा के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण विचार दोहा छंद में रखा है। उनका स्पष्ट मानना है कि किसी भी तरह की उन्नति में भाषा का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। वह भाषा  के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान के प्रसार की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं। सरल और स्पष्ट तरीके से भारतेंदु हरिश्चंद्र ने विकास का सूत्र दिया है।


यहां भारतेंदु हरिश्चंद्र के मातृभाषा पर दोहे का सरल भावार्थ और उसके बाद कठिन शब्दार्थ अलग-अलग दिए हैं।

1. 

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

 

सरल अर्थ

 

अपनी भाषा की उन्नति ही सभी प्रकार की उन्नति का मूल आधार है। जब तक व्यक्ति को अपनी मातृभाषा का सही ज्ञान नहीं होगा, तब तक उसके मन की पीड़ा, हीनता या बेचैनी दूर नहीं हो सकती। भारतेंदु कहना चाहते हैं कि भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और मानसिक विकास का आधार भी है।

 

कठिन शब्दार्थ

 

निज — अपनी

भाषा — अपनी मातृभाषा/अपनी भाषा

उन्नति — विकास, प्रगति

अहै — है

मूल — आधार, जड़

हिय — हृदय, मन

सूल — पीड़ा, कष्ट, चुभन

 

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2. 

अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।

पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

 

सरल अर्थ

 

अंग्रेज़ी पढ़कर भले ही मनुष्य अनेक गुणों और विषयों में निपुण हो जाए, लेकिन अपनी भाषा का ज्ञान न होने पर वह वास्तव में हीन ही बना रहता है। अर्थात् विदेशी भाषा का ज्ञान उपयोगी है, लेकिन अपनी भाषा के ज्ञान की कीमत पर नहीं।

 

कठिन शब्दार्थ

पढ़ि के — पढ़कर

जदपि — यद्यपि, हालांकि

गुन — गुण, योग्यताएँ

प्रवीन — निपुण, कुशल

पै — लेकिन, परंतु

ज्ञान — जानकारी, समझ

हीन — कमतर, वंचित

 

 

3. 

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय।

निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।

 

सरल अर्थ

 

वास्तविक और पूर्ण उन्नति तभी मानी जा सकती है, जब घर-परिवार और समाज की भी उन्नति हो। केवल अपने शरीर अथवा अपने व्यक्तिगत विकास को उन्नति मानना मूर्खता है। यहाँ कवि व्यक्तिगत उन्नति के बजाय सामूहिक उन्नति पर बल देते हैं। सबकी उन्नति हो असली उन्नति है।

 

कठिन शब्दार्थ

 

पूरी — सम्पूर्ण

तबहिं — तभी

घर — परिवार; व्यापक अर्थ में अपना समाज

शरीर — स्वयं/व्यक्तिगत अस्तित्व

मूढ़ — अज्ञानी, नासमझ

सब कोय — सभी लोग

 

4. 

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय।

लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।।

 

सरल अर्थ

 

अपनी भाषा की उन्नति के बिना वास्तविक उन्नति कभी नहीं हो सकती। कोई व्यक्ति चाहे कितने ही उपाय क्यों न कर ले, अपनी भाषा के विकास के बिना उसकी उन्नति अधूरी ही रहेगी।

 

कठिन शब्दार्थ

 

उन्नति — विकास, प्रगति

बिना — के अभाव में

कबहुँ — कभी

ह्यैहैं — होगी/हो पाएगी

सोय — वही/वास्तविक उन्नति

लाख — बहुत अधिक, असंख्य

उपाय — साधन, तरीके

अनेक — बहुत से

यों — इस प्रकार

भले — चाहे कितने ही

करो किन — क्यों न करो

 

5.

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।

तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।

 

सरल अर्थ

 

जब एक परिवार या समाज के लोग एक भाषा और एक विचारधारा से जुड़े होते हैं, तब उनमें एकता और सामंजस्य पैदा होता है। इससे अज्ञानता और दुख दूर होते हैं और सभी के साथ मिलकर विकास संभव होता है। यहाँ ‘एक भाषा’ का अर्थ केवल एक ही भाषा बोलना नहीं, बल्कि भाषा के माध्यम से आपसी एकता और विचारों की समानता से है।

 

कठिन शब्दार्थ

 

जीव — प्राण/जीवन; यहाँ एकता का भाव

मति — बुद्धि, विचार

सब घर के लोग — परिवार/समाज के सभी लोग

तबै — तभी

बनत — बनता है

सबन सों — सबके साथ

मूढ़ता — अज्ञानता

सोग — शोक, दुःख

 

6. 

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।

निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।

 

सरल अर्थ

 

अपनी भाषा में शिक्षा और ज्ञान की बातें करने का एक बहुत बड़ा लाभ यह है कि उसका लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यदि ज्ञान-विज्ञान और शिक्षा अपनी भाषा में दी जाए, तो वह लोगों तक अधिक सहजता से पहुँच सकती है।

 

कठिन शब्दार्थ

 

अति — बहुत अधिक

या में — इसमें

प्रगट — स्पष्ट, प्रत्यक्ष

लखात — दिखाई देता है

विद्या — ज्ञान, शिक्षा

बात — विषय, ज्ञान की बात

 

7. 

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।

यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।।

 

सरल अर्थ

 

अपनी भाषा में कही गई ज्ञान की बात को जो भी व्यक्ति सुनता है, वह उसका लाभ उठा सकता है। अपनी भाषा की यही विशेषता है कि वह ज्ञान को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाती है। अन्य भाषाओं में यह गुण हमेशा नहीं पाया जाता।

 

कठिन शब्दार्थ

 

तेहि — उसे/उससे

सुनि — सुनकर

पावै — प्राप्त करता है 

और महं — दूसरी भाषाओं में

होय — होता

 

8. 

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

 

सरल अर्थ

 

विभिन्न प्रकार की कलाओं, शिक्षाओं और अनेक प्रकार के ज्ञान को दूसरे सभी देशों से प्राप्त करना चाहिए और फिर उसका अपनी भाषा में प्रचार-प्रसार करना चाहिए। भारतेंदु यहाँ विदेशी ज्ञान का विरोध नहीं, बल्कि उसे अपनी भाषा में उपलब्ध कराने की बात कर रहे हैं।

 

कठिन शब्दार्थ

 

कला — कलाएँ, कौशल

शिक्षा — अध्ययन/ज्ञान

अमित — असीम, बहुत अधिक

देसन — देशों

लै करहू — लेकर करो

भाषा माहि — भाषा में

प्रचार — प्रसार, फैलाव

 



9. 

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।

विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।

 

सरल अर्थ

 

भारत में लोगों के बीच बहुत अधिक विविधता और भिन्नता है, इसलिए अनेक प्रकार की समस्याएँ और संघर्ष उत्पन्न होते हैं। अलग-अलग देशों में भी अलग-अलग विचार, मत और भाषाएँ दिखाई देती हैं। यहाँ भारतेंदु भाषाई और सामाजिक विविधता के कारण उत्पन्न होने वाली दूरी की ओर संकेत करते हैं।

 

कठिन शब्दार्थ

 

भिन्न — अलग-अलग

अति — बहुत अधिक

ताहीं सों — उसी कारण से

उत्पात — उपद्रव, अशांति, समस्याएँ

मत — विचार, मत

मतहू — मत भी/विचार भी

लखात — दिखाई देते हैं

 

 

10. 

सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।

उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।

 

सरल अर्थ

 

हे भाइयों! आप सभी मिलकर दूसरे उपायों को छोड़कर अपनी भाषा की उन्नति के लिए प्रयास करें। भाषा का विकास सामूहिक प्रयास से ही संभव है। यह दोहा पूरे विचार का आह्वान और निष्कर्ष है—अपनी भाषा के विकास के लिए समाज के सभी लोगों को मिलकर काम करना चाहिए।

 

कठिन शब्दार्थ

 

तासों — उससे/उनसे

छाँड़ि कै — छोड़कर

दूजे — दूसरे

उपाय — साधन, तरीके

उन्नति — विकास

करहु — करो

अहो — हे!

भ्रातगन — हे भाइयों/बंधुओं

आय — आकर

 

 

इन दोहों को एक साथ पढ़ने पर भारतेंदु हरिश्चन्द्र का भाषा-दर्शन लगभग इस क्रम में सामने आता है कि अपनी भाषा से ही ज्ञान मिलता है । इससे आत्मसम्मान की भावना विकसित होती है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने से सामाजिक एकता आती है जो सामूहिक उन्नति का कारक है और इससे ही राष्ट्र की प्रगति सुनिश्चित होती है।

 

भारतेंदु का मूल आग्रह यह नहीं है कि अंग्रेज़ी या विदेशी भाषाओं को छोड़ दिया जाए, बल्कि यह है कि दूसरे देशों से प्राप्त ज्ञान-विज्ञान, कला और शिक्षा को अपनी भाषा में लाकर समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जाए। विशेष रूप से छठे, सातवें और आठवें दोहे में यह विचार बहुत स्पष्ट है कि ज्ञान तभी व्यापक सामाजिक शक्ति बनता है, जब वह जनता की अपनी भाषा में उपलब्ध हो।

 

भारतेंदु हरिश्चंद्र का संदेश स्पष्ट है - विदेशी ज्ञान ग्रहण करने में बुराई नहीं है, लेकिन उसे अपनी भाषा में समाज तक पहुँचाओ —क्योंकि अपनी भाषा की उन्नति ही व्यापक सामाजिक उन्नति का आधार है। भाषा को लेकर उनके विचार भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है निबंध में भी दिखाई पड़ते हैं।

सद्य: आलोकित!

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