सोमवार, 10 अगस्त 2026

हर्बर्ट स्पेंसर: भारतीयता का दीवाना

हरबर्ट स्पेंसर

हर्बर्ट स्पेंसर 

(प्रसिद्ध दार्शनिक हर्बर्ट स्पेंसर के बारे में पढ़ रहा था कि जब उनका निधन हुआ तो एक ईसाई की तरह उन्हें दफनाया नहीं गया बल्कि उनका अग्नि दाह किया गया। वह भारतीय दर्शन से इस प्रकार प्रभावित थे कि अपनी देह को दाह संस्कार से पंचतत्व में विलीन करवाया। प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने एक हजार पाउंड देकर उनका स्मारक बनवाया था।)


हर्बर्ट स्पेंसर : भारतीय दर्शन से प्रभावित एक पाश्चात्य चिंतक

हर्बर्ट स्पेंसर का नाम आधुनिक पाश्चात्य दर्शन, समाजशास्त्र और विकासवाद के इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। सामान्यतः उन्हें चार्ल्स डार्विन के बाद विकासवाद को व्यापक सामाजिक और दार्शनिक आधार देने वाले चिंतक के रूप में जाना जाता है। किंतु स्पेंसर का व्यक्तित्व केवल पश्चिमी वैज्ञानिक चिंतन तक सीमित नहीं था। उनके चिंतन में भारतीय दर्शन और भारतीय संस्कृति की अनेक ऐसी छवियाँ दिखाई देती हैं, जो यह संकेत करती हैं कि वे भारतीय ज्ञान-परंपरा से प्रभावित थे और भारतीय दर्शन की गहराइयों को समझने का प्रयास करते थे।

स्पेंसर का जन्म 27 अप्रैल 1820 को इंग्लैंड के डर्बी नगर में हुआ था। वे किसी विश्वविद्यालय की पारंपरिक शिक्षा से विशेष रूप से जुड़े हुए दार्शनिक नहीं थे। उन्होंने व्यापक स्वाध्याय के माध्यम से अपने ज्ञान का विस्तार किया। विज्ञान, समाज, प्रकृति, मनुष्य, धर्म, नैतिकता और शिक्षा—इन सभी विषयों पर उन्होंने स्वतंत्र चिंतन किया। उनका सबसे बड़ा दार्शनिक प्रयास था कि प्रकृति और समाज में दिखाई देने वाले विभिन्न परिवर्तनों को एक व्यापक विकास-प्रक्रिया के रूप में समझा जाए।

उनकी प्रसिद्ध कृति First Principles में उनके दार्शनिक चिंतन का मूल स्वरूप दिखाई देता है। वे मानते थे कि संसार में जो कुछ दिखाई देता है, उसके पीछे कोई मूलभूत वास्तविकता अवश्य है, लेकिन मनुष्य की सीमित बुद्धि उस परम वास्तविकता को पूरी तरह समझ पाने में समर्थ नहीं है। उन्होंने इसे “The Unknowable” अर्थात् ‘अज्ञेय’ कहा। यह विचार भारतीय उपनिषदों और वेदान्त की उस परंपरा के अत्यंत निकट दिखाई देता है, जिसमें परम सत्य को सामान्य इंद्रिय-बुद्धि से परे माना गया है।

भारतीय दर्शन में ब्रह्म को अनंत, सर्वव्यापक और सामान्य ज्ञान की सीमाओं से परे माना गया है। उपनिषदों में परम सत्ता को व्यक्त करने के लिए ‘नेति-नेति’ की पद्धति अपनाई गई है। अर्थात् परम सत्य को किसी सीमित रूप में बाँधा नहीं जा सकता। स्पेंसर का ‘Unknowable’ भी मनुष्य की बौद्धिक सीमा की ओर संकेत करता है। इसीलिए स्पेंसर के दर्शन को भारतीय वेदान्त के संदर्भ में पढ़ने पर दोनों के बीच एक गहरा वैचारिक संबंध दिखाई देता है।

स्पेंसर का विकासवाद भी भारतीय सांख्य दर्शन के संदर्भ में विशेष रूप से विचारणीय है। सांख्य दर्शन में प्रकृति को जगत् की मूल आधारभूत सत्ता माना गया है। प्रकृति की विभिन्न अवस्थाओं से क्रमशः अनेक तत्त्वों का विकास होता है और इसी प्रक्रिया से दृश्य जगत् की रचना होती है। स्पेंसर भी संसार को स्थिर और जड़ व्यवस्था के रूप में नहीं देखते। उनके अनुसार प्रकृति निरंतर परिवर्तन और विकास की प्रक्रिया में है। सरल से जटिल, असंगठित से संगठित और अस्पष्ट से स्पष्ट की ओर होने वाली गति उनके विकासवाद का महत्वपूर्ण आधार है।

इस दृष्टि से स्पेंसर का विकासवाद भारतीय सांख्य की विकास-दृष्टि के साथ अत्यंत रोचक साम्य प्रस्तुत करता है। यह साम्य केवल बाहरी नहीं है। दोनों में प्रकृति के भीतर निहित विकास-क्षमता और जगत् के क्रमिक रूपांतरण को समझने का प्रयास दिखाई देता है। भारतीय दर्शन के अध्ययन और पश्चिमी चिंतन के संपर्क ने स्पेंसर के लिए निश्चित रूप से एक नया बौद्धिक क्षितिज निर्मित किया होगा।

स्पेंसर की दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक Education: Intellectual, Moral, and Physical है। सामान्यतः इसे Education के नाम से जाना जाता है। इसमें उन्होंने शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं माना। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का बौद्धिक, नैतिक और शारीरिक विकास करना है। मनुष्य को जीवन के लिए तैयार करना शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है।

भारतीय शिक्षा-दर्शन में भी शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार या सूचना प्राप्त करना नहीं माना गया। भारतीय परंपरा में शिक्षा को व्यक्ति के समग्र विकास, चरित्र-निर्माण, आत्मानुशासन और जीवन-दृष्टि के निर्माण से जोड़ा गया। इस दृष्टि से स्पेंसर की शिक्षा संबंधी अवधारणाओं में भारतीय समग्र शिक्षा-दृष्टि के साथ एक स्वाभाविक साम्य दिखाई देता है।

स्पेंसर का चिंतन मृत्यु और जीवन के प्रश्नों तक भी पहुँचता है। उनके दर्शन में जीवन को प्रकृति की व्यापक विकास-प्रक्रिया का एक हिस्सा माना गया है। मृत्यु को केवल धार्मिक भय के रूप में देखने के बजाय वे उसे अस्तित्व और प्रकृति की व्यापक प्रक्रिया में समझने का प्रयास करते हैं। उनकी रचनाओं में अनंतता, मृत्यु, अज्ञेय सत्ता और मनुष्य की सीमाओं का जो दार्शनिक विवेचन मिलता है, वह पाठक को गहरे अस्तित्वगत प्रश्नों के सामने खड़ा करता है।

उनके जीवन का अंतिम प्रसंग भी भारतीय दृष्टि से अत्यंत रोचक है। हर्बर्ट स्पेंसर का निधन 8 दिसंबर 1903 को हुआ। उनके शरीर का अग्निदाह किया गया। सामान्यतः उस समय ब्रिटेन में ईसाई समाज में मृतकों को दफनाने की परंपरा अधिक प्रचलित थी। ऐसे वातावरण में स्पेंसर का अग्निदाह विशेष रूप से उल्लेखनीय था। भारतीय संस्कृति में शरीर को पंचतत्त्वों से निर्मित माना जाता है और मृत्यु के बाद अग्नि के माध्यम से उसका प्रकृति में विलय किया जाता है। इसलिए स्पेंसर की इस इच्छा और भारतीय दाह-संस्कार परंपरा के बीच एक सांस्कृतिक साम्य सहज ही दिखाई देता है।

स्पेंसर के भारतीय संबंध का सबसे रोचक अध्याय श्यामजी कृष्ण वर्मा से जुड़ा हुआ है। श्यामजी कृष्ण वर्मा महान संस्कृतज्ञ, राष्ट्रवादी चिंतक और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी क्रांतिकारी विचारकों में थे। वे स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रभावित थे और पश्चिमी विचारकों का भी गहन अध्ययन करते थे। हर्बर्ट स्पेंसर उनके प्रिय चिंतकों में शामिल थे।

श्यामजी कृष्ण वर्मा ने स्पेंसर के विचारों में व्यक्ति की स्वतंत्रता, सत्ता के अतिक्रमण का विरोध और स्वतंत्र चिंतन की शक्तिशाली भावना देखी। उन्होंने स्पेंसर को केवल एक पाश्चात्य दार्शनिक के रूप में नहीं पढ़ा, बल्कि उनके विचारों को भारत की स्वतंत्रता के प्रश्न से जोड़ा।

स्पेंसर की मृत्यु के बाद श्यामजी कृष्ण वर्मा ने उनके सम्मान में एक हजार पाउंड की बड़ी राशि प्रदान की। इस धनराशि से स्पेंसर की स्मृति में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में Herbert Spencer Memorial Lectureship स्थापित करने की पहल हुई। यह घटना अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक भारतीय राष्ट्रवादी द्वारा एक ब्रिटिश दार्शनिक के सम्मान में इतनी बड़ी राशि देना बताता है कि स्पेंसर का प्रभाव श्यामजी कृष्ण वर्मा के मन और विचार-जगत् पर कितना गहरा था।

श्यामजी कृष्ण वर्मा ने आगे चलकर भारतीय विद्यार्थियों के लिए Herbert Spencer Indian Fellowships की व्यवस्था भी की। उनका उद्देश्य भारतीय युवाओं को उच्च शिक्षा और स्वतंत्र चिंतन के अवसर उपलब्ध कराना था। इस प्रकार स्पेंसर की स्मृति केवल किसी स्मारक तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह भारतीय युवाओं की शिक्षा और बौद्धिक विकास से जुड़ गई।

स्पेंसर और भारत का संबंध केवल श्यामजी कृष्ण वर्मा तक सीमित नहीं था। स्वामी विवेकानंद जैसे भारतीय चिंतकों ने भी स्पेंसर का गंभीर अध्ययन किया। विवेकानंद पश्चिमी विज्ञान और दर्शन की उपलब्धियों को भारतीय वेदान्त के साथ जोड़कर देखने के पक्षधर थे। इस बौद्धिक वातावरण में स्पेंसर का विकासवाद, अज्ञेय सत्ता और मनुष्य के विकास संबंधी चिंतन भारतीय दर्शन के पुनर्पाठ का एक महत्वपूर्ण आधार बना।

इस प्रकार हर्बर्ट स्पेंसर को केवल पश्चिमी विकासवाद का दार्शनिक मानना उनके चिंतन के एक महत्वपूर्ण पक्ष की उपेक्षा होगी। उनके विचारों में भारतीय दर्शन के साथ गहरा संवाद दिखाई देता है। सांख्य का प्रकृति-विकास, वेदान्त का परम सत्य, उपनिषदों की अज्ञेय सत्ता और भारतीय शिक्षा की समग्र दृष्टि—इन सभी के साथ स्पेंसर के विचारों की निकटता उल्लेखनीय है।

उनका जीवन इस बात का भी उदाहरण है कि संस्कृति और विचारों का प्रवाह किसी एक भूगोल की सीमा में बंद नहीं रहता। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत और यूरोप के बीच जिस बौद्धिक संवाद का निर्माण हुआ, उसमें स्पेंसर एक महत्वपूर्ण नाम बनकर सामने आते हैं। और श्यामजी कृष्ण वर्मा इस संवाद को भारतीय राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बन जाते हैं।

हर्बर्ट स्पेंसर के जीवन और चिंतन का भारतीय संदर्भ हमें यह समझने का अवसर देता है कि भारतीय दर्शन केवल भारत की अपनी आध्यात्मिक विरासत नहीं था, बल्कि उसने आधुनिक विश्व के बौद्धिक विमर्श को भी प्रभावित किया। स्पेंसर के विकासवाद और ‘अज्ञेय’ की अवधारणा से लेकर उनके शिक्षा-दर्शन और जीवन-मृत्यु संबंधी चिंतन तक भारतीय दर्शन के साथ उनकी निकटता का अध्ययन आज भी एक महत्त्वपूर्ण शोध-विषय हो सकता है।


रविवार, 9 अगस्त 2026

भारतीय न्यायपालिका: रक्षात्मकता और जमानत के दुरुपयोग की त्रासदी

भारत का संविधान विश्व के सबसे विस्तृत और समावेशी संविधानों में से एक है, जो अपनी न्यायपालिका को लोकतंत्र का एक मजबूत स्तंभ मानता है। किंतु स्वतंत्रता के सात दशकों बाद भी यह देखना अत्यंत दुखद है कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में अपराधी न केवल कानून की कमजोरियों का लाभ उठाते हैं, बल्कि जमानत जैसे प्रावधानों के दुरुपयोग से समाज में भय और अविश्वास का माहौल बनाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बलात्कार के 31,516 मामले दर्ज किए गए, जो प्रतिदिन औसतन 86 मामलों के बराबर है। इनमें से केवल 27-28% मामलों में ही सजा हो पाई। यह आंकड़ा भारतीय न्यायपालिका की रक्षात्मक कार्यप्रणाली और लंबित मामलों के बोझ को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। कर्नाटक का हावेरी कांड इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, जहां अपराधियों को जमानत की सहज उपलब्धता ने पीड़ितों के लिए न्याय की राह को और कठिन बना दिया। यह लेख भारतीय न्यायपालिका की कमियों, जमानत के दुरुपयोग, और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में सुधार की आवश्यकता पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है।

जमानत प्रणाली: स्वतंत्रता की रक्षा या अपराधियों का संरक्षण?

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 437 और 439 जमानत के प्रावधानों को नियंत्रित करती हैं, जिनका उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना था। किंतु बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में इन प्रावधानों का बार-बार दुरुपयोग हुआ है। हावेरी कांड जैसे मामलों में अपराधियों को त्वरित जमानत मिलना इस बात का प्रमाण है कि कानून की यह उदारता अपराधियों को और अधिक उद्दंड बना रही है। NCRB के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में दर्ज 31,516 बलात्कार के मामलों में से 89% मामले ऐसे थे, जहां अपराधी पीड़ित से परिचित था। फिर भी, जमानत की आसान उपलब्धता ने अपराधियों को समाज में स्वतंत्र विचरण का अवसर प्रदान किया, जिससे पीड़ितों में भय और असुरक्षा का भाव और गहरा हो गया।

जमानत के दुरुपयोग के पीछे कई कारण हैं। प्रथम, न्यायाधीशों की कमी और मामलों की अधिकता के कारण जमानत याचिकाओं पर त्वरित सुनवाई होती है, लेकिन गहन जांच नहीं। दूसरा, प्रभावशाली अपराधी अक्सर अपने वर्चस्व और धनबल का उपयोग कर जमानत प्राप्त कर लेते हैं। तीसरा, कानूनी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी के कारण जमानत के निर्णयों पर सवाल उठते हैं। हावेरी कांड इसका केवल एक उदाहरण है। ऐसे सैकड़ों मामले हैं, जैसे निर्भया कांड, कठुआ, और उन्नाव, जहां जमानत की सहज उपलब्धता ने समाज में आक्रोश को जन्म दिया।

लंबित मामले: न्याय की बाट जोहता भारत

भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी विडंबना है इसके लंबित मामलों का बोझ। 2025 तक भारत में 5 करोड़ से अधिक मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। इस देरी के कई कारण हैं: जजों की कमी (उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में स्वीकृत पदों का एक बड़ा हिस्सा रिक्त है), अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, और जटिल कानूनी प्रक्रियाएं। बलात्कार जैसे संवेदनशील मामलों में यह देरी पीड़ितों के लिए अन्याय का पर्याय बन जाती है। वर्षों तक सुनवाई के लिए प्रतीक्षा करना न केवल पीड़ित के मनोबल को तोड़ता है, बल्कि अपराधी को समाज में खुला घूमने का अवसर भी देता है।

निर्भया कांड के बाद सरकार ने फास्ट-ट्रैक कोर्ट की स्थापना की थी, लेकिन इनकी प्रभावशीलता सीमित रही। NCRB के अनुसार, 2018-2022 तक बलात्कार के मामलों में सजा की दर केवल 27-28% रही, जो ब्रिटेन (60.2%) और कनाडा (42%) जैसे देशों की तुलना में बहुत कम है। फास्ट-ट्रैक कोर्ट में भी संसाधनों की कमी और प्रशासनिक बाधाओं के कारण देरी होती है। यह स्थिति भारतीय न्यायपालिका की समृद्धि के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव

जमानत का दुरुपयोग और न्याय में देरी केवल कानूनी समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक संकट भी है। जब अपराधी खुलेआम घूमते हैं, तो यह समाज में भय और अविश्वास का माहौल बनाता है। विशेष रूप से महिलाएं और कमजोर वर्ग असुरक्षित महसूस करते हैं। NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2022 में दिल्ली में बलात्कार के 1,204 मामले दर्ज हुए, जो कुल अपराधों का 31.2% हिस्सा है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय राजधानी में महिलाओं की असुरक्षा को रेखांकित करता है।

इसके अतिरिक्त, प्रभावशाली अपराधियों को अक्सर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। हावेरी कांड और अन्य समान मामलों में यह देखा गया कि अपराधी अपने धनबल और प्रभाव का उपयोग कर न केवल जमानत प्राप्त करते हैं, बल्कि जांच को भी प्रभावित करते हैं। यह स्थिति यह प्रश्न उठाती है कि क्या हमारा न्याय तंत्र वास्तव में निष्पक्ष और स्वतंत्र है?


सुधार की दिशा में कदम

“यतो धर्मस्ततो जयः” के सिद्धांत पर आधारित हमारी भारतीय न्याय व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अन्याय की प्रतिमूर्ति बलात्कार के अपराधी स्वतंत्र होकर विजय यात्रा निकालने का साहस न जुटा सकें। इसके लिए निम्नलिखित सुधार आवश्यक हैं:

गैर-जमानती प्रावधानों का सख्ती से पालन: बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में जमानत को असाधारण परिस्थितियों तक सीमित करना चाहिए। CrPC में संशोधन कर ऐसे मामलों में गैर-जमानती गिरफ्तारी को अनिवार्य किया जाए।

फास्ट-ट्रैक कोर्ट की प्रभावशीलता बढ़ाना: इन कोर्ट्स के लिए अधिक संसाधन, जजों की नियुक्ति, और समयबद्ध सुनवाई की व्यवस्था होनी चाहिए।

न्यायिक जवाबदेही: जमानत के निर्णयों में पारदर्शिता और तर्कसंगतता सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए जाएं।

सामाजिक जागरूकता और पुलिस सुधार: पुलिस की संवेदनशीलता और जांच की गुणवत्ता में सुधार आवश्यक है। NCRB के अनुसार, 71% बलात्कार के मामले दर्ज ही नहीं होते, क्योंकि पीड़ित पुलिस की प्रतिक्रिया से डरते हैं।

कठोर दंड की व्यवस्था: बलात्कार के दोषियों के लिए न्यूनतम 10 वर्ष की सजा को और सख्त करना चाहिए, विशेष रूप से जब पीड़ित नाबालिग हो।

निष्कर्ष

हावेरी कांड और इसके जैसे सैकड़ों मामले भारतीय न्यायपालिका के सामने एक दर्पण रखते हैं। ये मामले न केवल कानूनी व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हैं, बल्कि समाज के सामने यह प्रश्न भी प्रस्तुत करते हैं कि क्या हमारी न्याय प्रक्रिया वास्तव में पीड़ितों के साथ खड़ी है? इतना विशाल संविधान और विस्तृत न्याय संहिता पाकर भी यदि हमारी न्यायपालिका समृद्ध न हो सकी, तो यह हम सभी के लिए आत्ममंथन का विषय है। बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में अपराधियों को त्वरित राहत देने की प्रवृत्ति को समाप्त करना होगा। केवल एक निर्णय की दूरी थी और अपराधी दंडित हो सकता था, किंतु ऐसा हो न सका। अब समय है कि हमारी न्याय व्यवस्था रक्षात्मक न होकर दंडात्मक बने, ताकि “यतो धर्मस्ततो जयः” का सिद्धांत सही मायनों में साकार हो।

कष्टोंसे बचनेके कुछ अनुभूत उपाय

 कष्टोंसे बचनेके कुछ अनुभूत उपाय



यह उपाय बहुत सरल है। इसमें कोई खर्च नहीं


है, न बहुत परिश्रम ही करना पड़ता है और न समय ही बहुत लगता है। यह क्रिया क्या है?- एक प्रकारकी अंगडाई है, जिससे सब अंगोंमें खून तेजीसे दौड़ने लगता है और शरीरमें फुर्ती आ जाती है। रोज-रोज नियमित रूपसे केवल १०-१५ मिनट भी ऐसा करता रहे तो कुछ दिनोंमें जवानी-सी आने लगती है। हम इसे बराबर कर रहे हैं और लाभ उठा रहे हैं। इस समय हमारी अवस्था ८२ वर्षकी है और अभीतक कमर नहीं झुकी है। सबेरे सोकर उठते ही बिस्तरपर चित्त पड़े-ही-पड़े, तकिया हठाकर इन कसरतोंको करना पड़ता है। तखत या फर्शपर और भी अच्छा है। स्वभावतः लोग सबेरे उठते ही अंगड़ाई लेते हैं, उसीका यह विशद रूप है। इसमें बिस्तरपर पड़े-ही-पड़े एक-एक करके प्रत्येक अंगको तानना (कसना) और २-४ सेकेण्ड बाद एकदम ढीला छोड़ देना पड़ता है। मुट्ठी कसकर दबाओ तो हथेलीका खून ऊपर कलाईमें दौड़ जाता है और एकदम ढील देनेपर खून तेजीसे लौट आता है। इसी प्रकार शरीरके प्रत्येक अंगको बारी-बारीसे अकड़ाने (तानने) और ढीला करनेपर वहाँका खून दौड़ता है। बुढ़ापेमें नसोंके अन्दर मल जम जाता है और नसें कड़ी पड़ जाती हैं, इसीसे बुढ़ापा आता है। इस क्रिया (Contraction and Relaxation)-से वह मल धीरे-धीरे खूनके दौड़ानके साथ साफ होता जाता है, हटता जाता है और नसें नरम और लचीली होने लगती हैं, जो जवानीकी निशानी है। उक्त अमेरिकनका कहना है कि नसोंके अन्दर मल न जमने पावे तो बुढ़ापा आयेगा ही नहीं। दवाइयोंसे यह काम हो नहीं सकता, केवल परिश्रमसे


तथा खूनकी दौड़ानसे यह सफाई ठीक होती है। अतः आप भी ऊपरसे शुरू करके नीचेतक शरीरके


५६१ प्रत्येक अंगको रोज सबेरे तानकर (अकड़ाकर) एकदम ढीलाकर दीजिये तो आपका बुढ़ापा कुछ दिनोंमें भागना शुरू करेगा और धीरे-धीर जवानी (शक्ति) याने लगेगी। हाथ, गर्दन, कंधा, कमर, पेट, पीठ, पैर वगैरह एकके बाद एक ताने जा सकते हैं। मुँहके जबड़े, दादी, कनपटी, हथेली, भुजाएँ, पैरकी पिंडली, पंजे वगैरह भी ताने जा सकते हैं। और भी जो-जो अंग आप तान सकें, तानिये; इधर-उधर फैलाइये, घुमाइये, करवट लीजिये। बहुत थकनेकी जरूरत नहीं है। थकावट मालूम हो तो लीजिये; हर एक अवयवको तानना और ढीला करन यही इस क्रियाका उद्देश्य है। सम्पूर्ण क्रियामें १०-१५ मिनट लगते हैं, परंतु इससे लाभ अपूर्व होता है, प्रारम्भमें प्रत्येक अंगको २-४ बार तानकर ५-७ मिनटमें खत्प बीच-बीचमें एक-आध मिनट सुस्ता लीजिये. दम ले कर दीजिये। बादमें अभ्यास परिपक्व हो जाय, तब संख्या धीरे-धीरे बढ़ाते-बढ़ाते १०-१२ तक ले जाइये। हम तो इस क्रियाके बाद चित्त पड़े-पड़े टाँगोंको ऊपर उठाकर दस-बीस बार हवामें साइकिल-जैसी चलाते हैं। इससे पेटकी और टाँगोंकी अच्छी कसरत हो जाती है और पाखाना साफ होता है।


आप इन कसरतोंको एक-दो महीना करके देखिये कैसा लाभ होता है। प्रत्येक अंगको तानते समय यदि थोड़ी-सी साँस रोक ली जाय और ढील देते समय धीरे-धीरे निकाल दी जाय तो जल्दी लाभ होगा, इसे खुली हवामें अथवा खिड़कियाँ खोलकर करना चाहिये। बहुत ठण्डके दिनोंमें कम्बल ओढ़े हुए भी बहुत कुछ कर सकते हैं, पर मुँह खुला रहे। बैठकर भी ये क्रियाएँ की जा सकती हैं।


आप इस क्रियाको आलस्य त्यागकर नियमितरूपसे करते रहेंगे तो बुढ़ापेमें फिर जवानीकी शक्ति आ जायगी और बुढ़ापेके कष्ट बहुत कम हो जायेंगे। बूढ़े लोगोंके लिये बड़े कामकी चीज है। ५०-६० वर्षके बूढ़ोंको इसे अवश्य करके लाभ उठाना चाहिये। ७०-७५ वर्षके जर्जर बूढ़े भी धीरे-धीरे कर सकते हैं। विशेष विवरणके लिये उपर्युक्त पुस्तक देखनी चाहिये। अमेरिकन लेखकका नाम है- Sanford Bennett, पुस्तक अमेरिकाकी छपी है।

अंग्रेजी और भारतीय खान-पान में कौन श्रेष्ठ है?

खान पान के मामले में कौन समृद्ध है, भारतीय या अंग्रेज? अच्छा और विविधतापूर्ण खाना कौन खाता है?


खान-पान के मामले में भारतीय व्यंजन स्पष्ट रूप से ज्यादा समृद्ध और विविधतापूर्ण हैं। अंग्रेजी (ब्रिटिश) खाना भी अच्छा है, लेकिन तुलना में भारतीय खाना बहुत आगे है। आइए तथ्यों के आधार पर समझते हैं:



1. विविधता (Diversity) में कौन आगे?

  • भारतीय खाना: भारत की जलवायु, भूगोल, धर्म, जाति और क्षेत्रीय संस्कृतियों के कारण व्यंजनों की विविधता दुनिया में सबसे ज्यादा में से एक है।
    उत्तर भारत का मुगलई/पंजाबी (बिरयानी, रोटी, दाल-मक्खनी), दक्षिण का चावल-आधारित (इडली, डोसा, सांभर, नारियल करी), पश्चिम का गुजराती-राजस्थानी (थाली, मीठे-खट्टे स्वाद), पूर्व का बंगाली-ओडिया (मछली, सरसों), पूर्वोत्तर का अलग स्वाद — हर 200-300 किमी पर खाना बदल जाता है। मसालों का इस्तेमाल, शाकाहारी-मांसाहारी दोनों की समृद्ध परंपरा, और हजारों व्यंजन इसे बेहद विविध बनाते हैं।
  • अंग्रेजी/ब्रिटिश खाना: पारंपरिक अंग्रेजी खाना अपेक्षाकृत सरल और सीमित है — रोस्ट डिनर, फिश एंड चिप्स, पाई, फुल इंग्लिश ब्रेकफास्ट, सॉसेज-मैश आदि। मसालों का इस्तेमाल कम, स्वाद ज्यादा हल्का और ingredient-focused। आधुनिक ब्रिटेन (खासकर लंदन) में इमिग्रेशन की वजह से बहुत विविधता आ गई है (इंडियन, चाइनीज, इटालियन, कैरिबियन आदि), लेकिन यह “अंग्रेजी मूल” खाना नहीं, बल्कि borrowed/adapted है।

निष्कर्ष: विविधता में भारतीय खाना कहीं ज्यादा समृद्ध है।

2. स्वाद, जटिलता और “अच्छा” खाना

  • भारतीय खाना मसालों, जड़ी-बूटियों और अलग-अलग कुकिंग तकनीकों (तंदूर, दम, तड़का, फर्मेंटेशन) से बेहद जटिल और लेयर्ड फ्लेवर वाला है। एक थाली में ही कई स्वाद (मीठा, खट्टा, तीखा, कड़वा) बैलेंस होते हैं।
  • अंग्रेजी खाना ज्यादातर सरल, हार्डी और comfort-oriented है। ताजे ingredients और अच्छी क्वालिटी पर फोकस रहता है, लेकिन मसालों और जटिलता में भारतीय जितना नहीं।

दुनिया के रैंकिंग में (TasteAtlas जैसे) भारतीय व्यंजन टॉप 15 में आते हैं, जबकि पारंपरिक ब्रिटिश उतना हाई रैंक नहीं करता। ब्रिटेन में भी भारतीय खाना (करी) इतना पॉपुलर है कि चिकन टिक्का मसाला को कभी-कभी “ब्रिटिश नेशनल डिश” कहा जाता है — यानी अंग्रेज खुद भारतीय स्वाद को अपना चुके हैं।

3. आधुनिक समय में

  • भारत: घर का खाना अभी भी बहुत विविध और क्षेत्रीय है। स्ट्रीट फूड, थाली कल्चर और रीजनल स्पेशलिटीज मजबूत हैं।
  • इंग्लैंड: सुपरमार्केट, टेकअवे और मल्टीकल्चरल रेस्टोरेंट्स की वजह से विकल्प ज्यादा हैं, लेकिन रोजमर्रा का पारंपरिक खाना सीमित रहता है।

कुल मिलाकर:
भारतीय खान-पान ज्यादा समृद्ध, ज्यादा विविधतापूर्ण और स्वाद के मामले में ज्यादा जटिल/अच्छा माना जाता है। अंग्रेजी खाना भी स्वादिष्ट और संतुष्ट करने वाला है (खासकर आरामदायक भोजन के लिए), लेकिन विविधता और समृद्धि में भारतीय आगे हैं।


फॉलोबाज़ी: एक नया शब्द FollowBazi : A new Word

 फॉलोबाज़ी!


यह नयाशब्द है, उस खेल और प्रक्रिया के लिए जिसमें फॉलोवर बढ़ाने के लिए तुम मुझे फॉलो करो, मै तुम्हें करता हूं सिद्धांत काम करता है। इस तरह फॉलोअर्स की संख्या काउंट करने में तो बढ़ जाती है लेकिन ऐसे लोग दुबारा आपको देखने नहीं आते। X भी ऐसे लोगों तक पोस्ट पहुँचाता नहीं, अथवा इग्नोर करता रहता है।


बोनसाई बरगद


नतीजा यह होता है कि ऐसे लोग बस गिनती के लिए रह जाते हैं।


X, facebook, instagram पर यह खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है और फल फूल रहा है।


इस बढ़ती प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर यह नया शब्द चलन में आ रहा है - फॉलोबाज़ी!


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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

परदखिना करि करहिं प्रनामा।

परदखिना करि करहिं प्रनामा।

श्रीरामचरितमानस की यह पंक्ति केवल एक क्रिया का वर्णन नहीं करती, बल्कि भक्ति, समर्पण और आदर की पराकाष्ठा को दर्शाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने मानस में जिस सुंदर भाव से 'प्रदक्षिणा' शब्द को पिरोया है, वह भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का मूल दर्शन है।

आइए, इस भावपूर्ण प्रसंग और 'प्रदक्षिणा' के आध्यात्मिक रहस्य का विस्तार से अवलोकन करें:

 १. शब्द का अर्थ और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

 दक्षिणावर्त गति: प्रदक्षिणा शब्द का सीधा अर्थ है—'दक्षिण' (दाएं) ओर से घूमना। जब हम किसी पूज्य व्यक्ति, विग्रह या पवित्र स्थान के चारों ओर इस प्रकार घूमते हैं कि वह स्थान सदा हमारे दाहिनी ओर रहे, तो उसे प्रदक्षिणा या परिक्रमा कहा जाता है।



केंद्र में परमेश्वर: आध्यात्मिक दृष्टि से, प्रदक्षिणा का अर्थ है अपने जीवन के केंद्र में ईश्वर (या अपने पूज्य) को स्थापित करना। जब हम चक्कर काटते हैं, तो यह स्वीकार करते हैं कि हमारी पूरी सृष्टि, हमारी विचार-धारा और हमारा अस्तित्व केवल उसी एक 'केंद्र' के इर्द-गिर्द घूमता है।


२. मानस प्रसंग: भरत जी का अनुपम प्रेम

चित्रकूट की पावन भूमि हो या अयोध्या का आंगन, श्री भरत जी का चरित्र समर्पण का सर्वोच्च शिखर है।

परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं देवतन्हि दूषन नामा॥

जब श्री भरत जी चित्रकूट में प्रभु श्री राम से जुड़े स्थानों—उनकी पर्णकुटी, उनके मार्ग, और चरणों की रज को देखते हैं—तो वे केवल प्रणाम नहीं करते, बल्कि अश्रुपूरित नेत्रों से उनकी प्रदक्षिणा करते हैं।

 सर्वस्व न्यौछावर करने का भाव: भरत जी के लिए श्रीराम केवल भाई नहीं, उनके आराध्य हैं। किसी वस्तु की परिक्रमा करने का अर्थ है—"मेरा जो कुछ भी है, इस स्थान और इसके स्वामी पर समर्पित है।" वे राम से जुड़ी हर कंकड़ी, हर वृक्ष और हर कण को पूज्य मानते हैं। यह भक्ति का वह रूप है जहाँ भक्त अपने आराध्य से जुड़ी हर सूक्ष्म वस्तु में भी ईश्वर का ही स्वरूप देखता है।

३. प्रदक्षिणा का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व

भारतीय संस्कृति में परिक्रमा का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं, बल्कि गहरा व्यावहारिक और ऊर्जात्मक पहलू भी है:

सकारात्मक ऊर्जा का संचय: पूज्य स्थानों, मंदिरों और पवित्र वृक्षों (जैसे पीपल, तुलसी) में एक विशेष ऊर्जा क्षेत्र (Energy Field) होता है। जब हम उसके दाहिनी ओर से घूमते हैं, तो हमारे शरीर में सकारात्मक तरंगों का प्रवाह होता है।

अहंकार का विसर्जन: गोल घूमकर बार-बार झुकना और प्रणाम करना मनुष्य के भीतर से 'मैं' (अहंकार) को समाप्त करता है।

पूर्ण समर्पण: जीवन का चक्र भी प्रदक्षिणा जैसा ही है—जहाँ से यात्रा शुरू होती है, अंततः वहीं आकर समाप्त होती है। परिक्रमा करके साधक यह प्रार्थना करता है कि उसका अंतिम आश्रय केवल ईश्वर का चरण-कमल ही हो।

💡 निष्कर्ष

'परदखिना' मात्र एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मन को पूरी तरह शांत और समर्पित कर देने का एक जरिया है। भरत जी का यह भाव हमें सिखाता है कि प्रेम में केवल पाना महत्वपूर्ण नहीं है; आराध्य के प्रति आदर, श्रद्धा और उनके प्रति स्वयं को पूरी तरह से विसर्जित कर देना ही सच्ची भक्ति है।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

फॉकलैंड समस्या और विश्व

 फाकलैंड द्वीप बहुत छोटा है। वह अर्जेंटीना के निकट है, लगभग पांच सौ किमी दूर। ब्रिटेन से 12 हजार किमी दूर। चाहिए तो यह कि फाकलैंड का अपना स्वतंत्र अस्तित्व हो लेकिन बहुत छोटा क्षेत्र होना कई समस्याओं को जन्म देता है इसलिए उसे निकटवर्ती बड़े क्षेत्र के साथ रहना चाहिए। यही स्वाभाविक है। परन्तु हुआ यह है कि 12 हजार किमी दूर से जाकर ब्रितानियों ने वहां अधिकार जमाया हुआ है। अपने नागरिक वहां बसा रखे हैं।


जिन जिन देशों के उपनिवेश बने, सबने अपने एजेंडे उन कालोनियों पर थोप दिए। अपने प्रशासक और नागरिक बसा दिए। फ्रांस, इंग्लैंड, स्पेन, पुर्तगाल, हॉलैंड सबने यह किया।


1939-45 तक जो घमासान युद्ध हुआ था, उसके बाद यूरोपीय देशों ने अपने उपनिवेश स्वाधीन कर दिए थे लेकिन तब यह शत प्रतिशत नहीं हुआ था। अभी भी उनका अधिकार दुनिया के कई हिस्सों पर है। स्वाधीनता, समानता और विश्व बंधुत्व का नारा लगाने वाले यूरोपीय अभी भी अत्याचारी की भूमिका में हैं और अतिक्रमणकारी हैं।



फाकलैंड का प्रकरण ऐसा ही है। 12 हजार किमी दूर के देश ब्रिटेन का फाकलैंड पर अधिकार अस्वाभाविक है। अर्जेंटीना इस बात को विभिन्न मंचों पर उठा रहा है। कल एक पोस्टर में भी यह अभिव्यक्त हुआ है।


दुनिया के उच्च संघों को चाहिए कि वह दुनिया के देशों को फिर से देखें। क्षेत्रों का पुनर्निधारण हो। उपनिवेश समाप्त हों। अमरीका भी अपनी दादागिरी बंद करे।

सद्य: आलोकित!

हर्बर्ट स्पेंसर: भारतीयता का दीवाना

हरबर्ट स्पेंसर हर्बर्ट स्पेंसर  (प्रसिद्ध दार्शनिक हर्बर्ट स्पेंसर के बारे में पढ़ रहा था कि जब उनका निधन हुआ तो एक ईसाई की तरह उन्हें दफनाय...

आपने जब देखा, तब की संख्या.