सोमवार, 27 मई 2024

भवानी प्रसाद मिश्र की कविता

[आपातकाल के दौरान लिखी भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएं ‘त्रिकाल सन्ध्या’ संकलन में हैं. यहां बाल-कविता के रूप में लिखी एक कविता पेश है। आपातकाल में सक्रिय और बदनाम चार महानुभावों का सन्दर्भ स्पष्ट है।]


बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले ,

उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले

उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गाएं 

वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं


कभी कभी जादू हो जाता है दुनिया में

दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में

ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये

इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये।


हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में

हाथ बांध कर खडे हो गये सब विनती में

हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें

पिऊ – पिऊ को छोड़ें कौए – कौए गायें।


बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को

खाना – पीना मौज उड़ाना छुट्भैयों को

कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में

बड़े – बड़े मनसूबे आए उनके जी में।


उड़ने तक तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले

उड़ने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है

यह दिन कवि का नहीं, चार कौओं का दिन है।


उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना

लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ?

मंगलवार, 21 मई 2024

गिल्लू : महादेवी वर्मा


सोनजुही में आज एक पीली कली लगी है। इसे देखकर अनायास ही उस छोटे जीव का स्मरण हो आया, जो इस लता की सघन हरीतिमा में छिपकर बैठता था और फिर मेरे निकट पहुँचते ही कंधे पर कूदकर मुझे चौंका देता था। तब मुझे कली की खोज रहती थी, पर आज उस लघुप्राण की खोज है।

परंतु वह तो अब तक इस सोनजुही की जड़ में मिट्टी होकर मिल गया होगा। कौन जाने स्वर्णिम कली के बहाने वही मुझे चौंकाने ऊपर आ गया हो!

अचानक एक दिन सवेरे कमरे से बरामदे में आकर मैंने देखा, दो कौवे एक गमले के चारों ओर चोंचों से छूआ-छुऔवल जैसा खेल खेल रहे हैं। यह काकभुशुंडि भी विचित्र पक्षी है - एक साथ समादरित, अनादरित, अति सम्मानित, अति अवमानित।

हमारे बेचारे पुरखे न गरूड़ के रूप में आ सकते हैं, न मयूर के, न हंस के। उन्हें पितरपक्ष में हमसे कुछ पाने के लिए काक बनकर ही अवतीर्ण होना पड़ता है। इतना ही नहीं हमारे दूरस्थ प्रियजनों को भी अपने आने का मधु संदेश इनके कर्कश स्वर में ही देना पड़ता है। दूसरी ओर हम कौवा और काँव-काँव करने को अवमानना के अर्थ में ही प्रयुक्त करते हैं।

मेरे काकपुराण के विवेचन में अचानक बाधा आ पड़ी, क्योंकि गमले और दीवार की संधि में छिपे एक छोटे-से जीव पर मेरी दृष्टि रफ़क गई। निकट जाकर देखा, गिलहरी का छोटा-सा बच्चा है जो संभवतः घोंसले से गिर पड़ा है और अब कौवे जिसमें सुलभ आहार खोज रहे हैं।

काकद्वय की चोंचों के दो घाव उस लघुप्राण के लिए बहुत थे, अतः वह निश्चेष्ट-सा गमले से चिपटा पड़ा था।

सबने कहा, कौवे की चोंच का घाव लगने के बाद यह बच नहीं सकता, अतः इसे ऐसे ही रहने दिया जावे।

परंतु मन नहीं माना -उसे हौले से उठाकर अपने कमरे में लाई, फिर रूई से रक्त पोंछकर घावों पर पेंसिलिन का मरहम लगाया।

रूई की पतली बत्ती दूध से भिगोकर जैसे-तैसे उसके नन्हे से मुँह में लगाई पर मुँह खुल न सका और दूध की बूँदें दोनों ओर ढुलक गईं।

कई घंटे के उपचार के उपरांत उसके मुँह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका। तीसरे दिन वह इतना अच्छा और आश्वस्त हो गया कि मेरी उँगली अपने दो नन्हे पंजों से पकड़कर, नीले काँच के मोतियों जैसी आँखों से इधर-उधर देखने लगा।

तीन-चार मास में उसके स्निग्ध रोए, झब्बेदार पूँछ और चंचल चमकीली आँखें सबको विस्मित करने लगीं।

हमने उसकी जातिवाचक संज्ञा को व्यक्तिवाचक का रूप दे दिया और इस प्रकार हम उसे गिल्लू कहकर बुलाने लगे। मैंने फूल रखने की एक हलकी डलिया में रूई बिछाकर उसे तार से खिड़की पर लटका दिया।

वही दो वर्ष गिल्लू का घर रहा। वह स्वयं हिलाकर अपने घर में झूलता और अपनी काँच के मनकों -सी आँखों से कमरे के भीतर और खिड़की से बाहर न जाने क्या देखता-समझता रहता था। परंतु उसकी समझदारी और कार्यकलाप पर सबको आश्चर्य होता था।

जब मैं लिखने बैठती तब अपनी ओर मेरा ध्यान आकर्षित करने की उसे इतनी तीव्र इच्छा होती थी कि उसने एक अच्छा उपाय खोज निकाला।

वह मेरे पैर तक आकर सर्र से परदे पर चढ़ जाता और फिर उसी तेजी से उतरता। उसका यह दौड़ने का क्रम तब तक चलता जब तक मैं उसे पकड़ने के लिए न उठती।

कभी मैं गिल्लू को पकड़कर एक लंबे लिफ़ाफ़े में इस प्रकार रख देती कि उसके अगले दो पंजों और सिर के अतिरिक्त सारा लघुगात लिफ़ाफ़े के भीतर बंद रहता। इस अद्भुत स्थिति में कभी-कभी घंटों मेज़ पर दीवार के सहारे खड़ा रहकर वह अपनी चमकीली आँखों से मेरा कार्यकलाप देखा करता।

भूख लगने पर चिक-चिक करके मानो वह मुझे सूचना देता और काजू या बिस्कुट मिल जाने पर उसी स्थिति में लिफ़ाफ़े से बाहर वाले पंजों से पकड़कर उसे कुतरता रहता।

फिर गिल्लू के जीवन का प्रथम बसंत आया। नीम-चमेली की गंध मेरे कमरे में हौले-हौले आने लगी। बाहर की गिलहरियां खिड़की की जाली के पास आकर चिक-चिक करके न जाने क्या कहने लगीं?

गिल्लू को जाली के पास बैठकर अपनेपन से बाहर झाँकते देखकर मुझे लगा कि इसे मुक्त करना आवश्यक है।

मैंने कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और इस मार्ग से गिल्लू ने बाहर जाने पर सचमुच ही मुक्ति की साँस ली। इतने छोटे जीव को घर में पले कुत्ते, बिल्लियों से बचाना भी एक समस्या ही थी।

आवश्यक कागज़ -पत्रों के कारण मेरे बाहर जाने पर कमरा बंद ही रहता है। मेरे कालेज से लौटने पर जैसे ही कमरा खोला गया और मैंने भीतर पैर रखा, वैसे ही गिल्लू अपने जाली के द्वार से भीतर आकर मेरे पैर से सिर और सिर से पैर तक दौड़ लगाने लगा। तब से यह नित्य का क्रम हो गया।

मेरे कमरे से बाहर जाने पर गिल्लू भी खिड़की की खुली जाली की राह बाहर चला जाता और दिन भर गिलहरियों के झुंड का नेता बना हर डाल पर उछलता-कूदता रहता और ठीक चार बजे वह खिड़की से भीतर आकर अपने झूले में झूलने लगता।

मुझे चौंकाने की इच्छा उसमें न जाने कब और कैसे उत्पन्न हो गई थी। कभी फूलदान के फूलों में छिप जाता, कभी परदे की चुन्नट में और कभी सोनजुही की पत्तियों में।

मेरे पास बहुत से पशु-पक्षी हैं और उनका मुझसे लगाव भी कम नहीं है, परंतु उनमें से किसी को मेरे साथ मेरी थाली में खाने की हिम्मत हुई है, ऐसा मुझे स्मरण नहीं आता।

गिल्लू इनमें अपवाद था। मैं जैसे ही खाने के कमरे में पहुँचती, वह खिड़की से निकलकर आँगन की दीवार, बरामदा पार करके मेज़ पर पहुंच जाता और मेरी थाली में बैठ जाना चाहता। बड़ी कठिनाई से मैंने उसे थाली के पास बैठना सिखाया जहां बैठकर वह मेरी थाली में से एक-एक चावल उठाकर बड़ी सफ़ाई से खाता रहता। काजू उसका प्रिय खाद्य था और कई दिन काजू न मिलने पर वह अन्य खाने की चीजें या तो लेना बंद कर देता या झूले से नीचे फेंक देता था।

उसी बीच मुझे मोटर दुर्घटना में आहत होकर कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा। उन दिनों जब मेरे कमरे का दरवाजा खोला जाता गिल्लू अपने झूले से उतरकर दौड़ता और फिर किसी दूसरे को देखकर उसी तेज़ी से अपने घोंसले में जा बैठता। सब उसे काजू दे आते, परंतु अस्पताल से लौटकर जब मैंने उसके झूले की सफ़ाई की तो उसमें काजू भरे मिले, जिनसे ज्ञात होता था कि वह उन दिनों अपना प्रिय खाद्य कितना कम खाता रहा।

मेरी अस्वस्थता में वह तकिए पर सिरहाने बैठकर अपने नन्हे-नन्हे पंजों से मेरे सिर और बालों को इतने हौले-हौले सहलाता रहता कि उसका हटना एक परिचारिका के हटने के समान लगता।

गरमियों में जब मैं दोपहर में काम करती रहती तो गिल्लू न बाहर जाता न अपने झूले में बैठता। उसने मेरे निकट रहने के साथ गरमी से बचने का एक सर्वथा नया उपाय खोज निकाला था। वह मेरे पास रखी सुराही पर लेट जाता और इस प्रकार समीप भी रहता और ठंडक में भी रहता।

गिलहरियों के जीवन की अवधि दो वर्ष से अधिक नहीं होती, अतः गिल्लू की जीवन यात्रा का अंत आ ही गया। दिन भर उसने न कुछ खाया न बाहर गया। रात में अंत की यातना में भी वह अपने झूले से उतरकर मेरे बिस्तर पर आया और ठंडे पंजों से मेरी वही उँगली पकड़कर हाथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन की मरणासन्न स्थिति में पकड़ा था।

पंजे इतने ठंडे हो रहे थे कि मैंने जागकर हीटर जलाया और उसे उष्णता देने का प्रयत्न किया। परंतु प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया।

उसका झूला उतारकर रख दिया गया है और खिड़की की जाली बंद कर दी गई है, परंतु गिलहरियों की नयी पीढ़ी जाली के उस पार चिक-चिक करती ही रहती है और सोनजुही पर बसंत आता ही रहता है। सोनजुही की लता के नीचे गिल्लू को समाधि दी गई है - इसलिए भी कि उसे वह लता सबसे अधिक प्रिय थी - इसलिए भी कि उस लघुगात का, किसी वासंती दिन, जुही के पीताभ छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास, मुझे संतोष देता है।

 

शनिवार, 11 मई 2024

फिर छिड़ी रात बात फूलों की

 मख़दूम मुहीउद्दीन की ग़ज़ल .. 


फिर छिड़ी रात बात फूलों की 

रात है या बरात फूलों की 


फूल के हार फूल के गजरे 

शाम फूलों की रात फूलों की 


आपका साथ साथ फूलों का 

आपकी बात बात फूलों की 


नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं 

मिल रही है हयात फूलों की 


कौन देता है जान फूलों पर 

कौन करता है बात फूलों की 


वो शराफ़त तो दिल के साथ गई 

लुट गई काएनात फूलों की 


अब किसे है दिमाग़-ए-तोहमत-ए-इश्क़ 

कौन सुनता है बात फूलों की 


मेरे दिल में सुरूर-ए-सुब्ह-ए-बहार 

तेरी आँखों में रात फूलों की 


फूल खिलते रहेंगे दुनिया में 

रोज़ निकलेगी बात फूलों की 


ये महकती हुई ग़ज़ल 'मख़दूम' 

जैसे सहरा में रात फूलों की।।

रविवार, 28 अप्रैल 2024

जातिवादी विमर्श में चमकीला

 एक फिल्म आई है #चमकीला नाम से। उसके गीत भी हिट हो गए हैं। फिल्म को जातिवादी कोण से इम्तियाज अली ने बनाया है जो चमकीला नाम के एक पंजाबी गायक के जीवन पर आधारित है। चमकीला अश्लील गीत गाता था, यह कहकर पंजाब में उनकी हत्या कर दी गई। निर्देशक ने इसे जातिवादी हिंसा की तरह परोसा है।

चमकीला का एक दृश्य


इस फिल्म में परिणति चोपड़ा हैं, इसलिए इसका प्रमोशन भी हो रहा है।

चमकीला अश्लील बोल वाले गीत गाता था, वह अनुसूचित जाति का था। इसे नायक के मुंह से ही कहलवाया गया है।

चमकीला के अश्लील गीतों का बचाव करते हुए भोजपुरी गीतों में अश्लील गीत को लाया जा रहा है। अव्वल तो यह कहना है कि भोजपुरी गीतों से चमकीला की तुलना निरर्थक है। जिस समय चमकीला गा रहा था, भोजपुरी समाज बहुत उत्कृष्ट साहित्य रच रहा था। यहां तक कि भिखारी ठाकुर जैसे लोगों के बिदेसिया और भोजपुरी समाज के चैता, कजरी आदि की धूम थी। और तरल तथा संवेदनशील गीत थे। पंजाबी कभी उसकी बराबरी नहीं कर सकता।


पंजाब की किसी घटना का जस्टिफिकेशन भोजपुरी से करके क्या वाहियात काम कर रहे हैं लोग। भोजपुरी समाज अकुंठ समाज है। अब अब्राहमिक प्रभाव में भोजपुरी जगत थोड़ा उदंड व्यवहार कर रहा है जिससे लोग विचलित हैं। चूंकि वह आर्थिक रूप से उतना समृद्ध नहीं है, इसलिए सब उसे निशाने पर रखते हैं।


सच्चाई यह है कि #भोजपुरी समाज जोगीरा और कबीरा आदि भी बहुत मुक्त भाव से रचकर आनंद में अभिव्यक्त करता है। इसलिए पंजाबी अश्लीलता और मनबढ़ अभिव्यक्ति को भोजपुरी से नहीं जोड़ना चाहिए। पंजाबी अश्लीलता सांस्कृतिक दूषण है। चमकीला उसका निकृष्ट रूप रख रहा था।

अस्तु!

कहना है कि #चमकीला के बहाने #हिन्दू समाज में फूट डालने और जातिगत विभेद को उभारने के प्रयास को हतोत्साहित करने की आवश्यकता है। दूसरे यह ध्यान देने की बात है कि #लोकसभा_चुनाव_2024 से ठीक पहले पंजाब में इम्तियाज यह फिल्म ले आए हैं जब अलग अलग क्षेत्रों में जातीय अस्मिता उभारी जा रही है।


तीसरे, घटनाओं की व्याख्या के जो टूल प्रयुक्त हो रहे हैं, वह समरस करने की मंशा से नहीं।


भारत में सिनेमा बहुत सशक्त माध्यम है। फिल्में बनें तो इनपर सूक्ष्म दृष्टि रखी जाए और प्रवाद फैलाने की कोशिश को रोकी जाए। दुर्भाग्य से हिंदू समाज ही इनके निशाने पर है और समाज सुधार की इनकी चिंता हिंदू समाज में प्रविष्ट कर ही हो पाती है। दुनिया का सबसे उन्नत और तार्किक सोच वाला समाज हिन्दू समाज है। उसके हर क्रिया प्रतिक्रिया का एक निश्चित और सुचिंतित आधार है। अब्राहमिक प्रभाव से आप्लावित लोग अपने समुदाय की कूपमंडूकता को देखें। मुक्त हों।


सबका कल्याण हो।

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

आर्तिहर : मानस शब्द संस्कृति

करहिं आरती आरतिहर कें।

रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।।

आर्तिहर : मानस शब्द संस्कृति 


जब भगवान श्रीराम अयोध्या जी लौटे तो सबसे प्रेमपूर्वक मिले। सबके योगदान का बखान किया। अवधपुरी में लोगों ने अपना सर्वस्व उनपर न्योछावर किया। युवतियों ने #आर्तिहर (दु:ख हर लेने वाले) सूर्यकुलरूपी कमलवन के सूर्य भगवान राम की आरती की।
तुलसीदास जी ने आरती और आर्तिहर में यमक अलंकार का बहुत सुंदर प्रयोग कर काव्य के सौंदर्य को बढ़ा दिया है।
आज #रामनवमी है। रामचंद्र जी के अवतरण की पवित्र तिथि। आज शताब्दियों बाद अयोध्या जी में उसी भावना से आरती हुई। #जन्मभूमि में विराजमान रामलला की छवि को लोगों ने भावपूर्ण निहारा। तुलसीदास जी ने एक चौपाई में यह विशिष्ट कथन किया है कि भगवान ने अमित रूप धारण किया और सबसे यथायोग्य, एक ही समय में मिले -
"अमित रूप प्रगटे तेहि काला।
जथा जोग मिले सबहि कृपाला।।"
यहां यह बताकर आज #मानस_शब्द #संस्कृति की बात पूरी करूंगा कि भगवान के चरित्र की यह विशिष्टता है कि वह सबके लिए सुलभ हैं, सबके अपने हैं।

आम गज़ल

आम फलते रहेंगे बागों में

रोज निकलेगी बात आमों की।


कड़ा पहरा है अबकी आमों पर

रस में डूबेंगे कैसे आमों की।।

कच्चा आम


आम का साथ साथ आमों का 

आम की बात बात आमों की।


आम तो आम है, कोई खास नहीं

कब  लगेगी नुमाइश  आमों की।


आम देखूं तो ललक उठती है

दिल में उठती है हूक आमों की।


आम देखा तो होंठ याद आए

याद आती गई हैं आमों की।


आम की फस्ल आम नहीं होती

कई  कलमें  लगेंगीं  आमों की।


रसाल


#चार_आम

मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

जन्मभूमि : मानस शब्द संस्कृति

जद्यपि सब बैकुंठ बखाना।

बेद पुरान बिदित जगु जाना।।

अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ।

यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।


जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि।

उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।।

जन्मभूमि : मानस शब्द संस्कृति 


पुष्पक विमान में बैठे हुए सूर्यवंशी राम, सीता को उन स्थलों से परिचित कराते लेकर आए जहां जिनसे वह परिचित न थीं। उन स्थानों पर रुके, जहां जाते समय विश्राम किया था। फिर पहुंचे अपनी #जन्मभूमि, अयोध्या जी। वह कपि समूह को दिखाने लगे।

वहां वह #जन्मभूमि के प्रति अपने प्रेम का बहुत रुचिर वर्णन करते हैं। बैकुंठ से अधिक महिमाशाली कहते हैं। बैकुंठ भी उन्हें उतना प्रिय नहीं, जितना अवधपुरी। अपने जन्म स्थान से यह प्रेम भारत और भारतीय जन की पहचान है।


महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" को स्वर्णमयी लंका के तुलना में रखा है जबकि गोस्वामी जी ने बैकुंठ के।


#रामकथा मे आज श्रीराम अपनी #जन्मभूमि अयोध्या जी लौट आए। चौदह वर्ष का वनवास बहुत बड़ा था, कठिन था। श्रीरामचरितमानस की कथा भी इसी के साथ पूरी हुई। इसके बाद उत्तर कांड है और उत्तर कांड रामकथा का प्रसाद है। उसे प्राप्त किया जाएगा किंतु उससे पूर्व यह कहना है कि जैसे भगवान श्रीराम अपने घर लौटे, सब लौटें। जो आदर्श उन्होंने स्थापित किया, वह ध्येय हो। उन्होंने जो मर्यादा स्थापित की, वह हमारा आदर्श रहे। सब सुखी हों, नीरोग हों, चिंतामुक्त रहें।

अन्त में,

यहां यह भी कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं कि कई सौ साल की प्रतीक्षा के बाद रामलला का विग्रह अयोध्या जी में इस साल स्थापित हुआ है। इस महान परिघटना के बाद कल पहली श्रीरामनवमी है।

मैं इस पावन अवसर पर आप सबको "सियाराममय" जानकर प्रणाम करता हूं।


कहिए! जय श्री राम! 🚩

सद्य: आलोकित!

भवानी प्रसाद मिश्र की कविता

[आपातकाल के दौरान लिखी भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएं ‘त्रिकाल सन्ध्या’ संकलन में हैं. यहां बाल-कविता के रूप में लिखी एक कविता पेश है। आपातका...

आपने जब देखा, तब की संख्या.