मंगलवार, 21 जुलाई 2026

परदखिना करि करहिं प्रनामा।

परदखिना करि करहिं प्रनामा।

श्रीरामचरितमानस की यह पंक्ति केवल एक क्रिया का वर्णन नहीं करती, बल्कि भक्ति, समर्पण और आदर की पराकाष्ठा को दर्शाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने मानस में जिस सुंदर भाव से 'प्रदक्षिणा' शब्द को पिरोया है, वह भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का मूल दर्शन है।

आइए, इस भावपूर्ण प्रसंग और 'प्रदक्षिणा' के आध्यात्मिक रहस्य का विस्तार से अवलोकन करें:

 १. शब्द का अर्थ और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

 दक्षिणावर्त गति: प्रदक्षिणा शब्द का सीधा अर्थ है—'दक्षिण' (दाएं) ओर से घूमना। जब हम किसी पूज्य व्यक्ति, विग्रह या पवित्र स्थान के चारों ओर इस प्रकार घूमते हैं कि वह स्थान सदा हमारे दाहिनी ओर रहे, तो उसे प्रदक्षिणा या परिक्रमा कहा जाता है।



केंद्र में परमेश्वर: आध्यात्मिक दृष्टि से, प्रदक्षिणा का अर्थ है अपने जीवन के केंद्र में ईश्वर (या अपने पूज्य) को स्थापित करना। जब हम चक्कर काटते हैं, तो यह स्वीकार करते हैं कि हमारी पूरी सृष्टि, हमारी विचार-धारा और हमारा अस्तित्व केवल उसी एक 'केंद्र' के इर्द-गिर्द घूमता है।


२. मानस प्रसंग: भरत जी का अनुपम प्रेम

चित्रकूट की पावन भूमि हो या अयोध्या का आंगन, श्री भरत जी का चरित्र समर्पण का सर्वोच्च शिखर है।

परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं देवतन्हि दूषन नामा॥

जब श्री भरत जी चित्रकूट में प्रभु श्री राम से जुड़े स्थानों—उनकी पर्णकुटी, उनके मार्ग, और चरणों की रज को देखते हैं—तो वे केवल प्रणाम नहीं करते, बल्कि अश्रुपूरित नेत्रों से उनकी प्रदक्षिणा करते हैं।

 सर्वस्व न्यौछावर करने का भाव: भरत जी के लिए श्रीराम केवल भाई नहीं, उनके आराध्य हैं। किसी वस्तु की परिक्रमा करने का अर्थ है—"मेरा जो कुछ भी है, इस स्थान और इसके स्वामी पर समर्पित है।" वे राम से जुड़ी हर कंकड़ी, हर वृक्ष और हर कण को पूज्य मानते हैं। यह भक्ति का वह रूप है जहाँ भक्त अपने आराध्य से जुड़ी हर सूक्ष्म वस्तु में भी ईश्वर का ही स्वरूप देखता है।

३. प्रदक्षिणा का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व

भारतीय संस्कृति में परिक्रमा का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं, बल्कि गहरा व्यावहारिक और ऊर्जात्मक पहलू भी है:

सकारात्मक ऊर्जा का संचय: पूज्य स्थानों, मंदिरों और पवित्र वृक्षों (जैसे पीपल, तुलसी) में एक विशेष ऊर्जा क्षेत्र (Energy Field) होता है। जब हम उसके दाहिनी ओर से घूमते हैं, तो हमारे शरीर में सकारात्मक तरंगों का प्रवाह होता है।

अहंकार का विसर्जन: गोल घूमकर बार-बार झुकना और प्रणाम करना मनुष्य के भीतर से 'मैं' (अहंकार) को समाप्त करता है।

पूर्ण समर्पण: जीवन का चक्र भी प्रदक्षिणा जैसा ही है—जहाँ से यात्रा शुरू होती है, अंततः वहीं आकर समाप्त होती है। परिक्रमा करके साधक यह प्रार्थना करता है कि उसका अंतिम आश्रय केवल ईश्वर का चरण-कमल ही हो।

💡 निष्कर्ष

'परदखिना' मात्र एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मन को पूरी तरह शांत और समर्पित कर देने का एक जरिया है। भरत जी का यह भाव हमें सिखाता है कि प्रेम में केवल पाना महत्वपूर्ण नहीं है; आराध्य के प्रति आदर, श्रद्धा और उनके प्रति स्वयं को पूरी तरह से विसर्जित कर देना ही सच्ची भक्ति है।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

फॉकलैंड समस्या और विश्व

 फाकलैंड द्वीप बहुत छोटा है। वह अर्जेंटीना के निकट है, लगभग पांच सौ किमी दूर। ब्रिटेन से 12 हजार किमी दूर। चाहिए तो यह कि फाकलैंड का अपना स्वतंत्र अस्तित्व हो लेकिन बहुत छोटा क्षेत्र होना कई समस्याओं को जन्म देता है इसलिए उसे निकटवर्ती बड़े क्षेत्र के साथ रहना चाहिए। यही स्वाभाविक है। परन्तु हुआ यह है कि 12 हजार किमी दूर से जाकर ब्रितानियों ने वहां अधिकार जमाया हुआ है। अपने नागरिक वहां बसा रखे हैं।


जिन जिन देशों के उपनिवेश बने, सबने अपने एजेंडे उन कालोनियों पर थोप दिए। अपने प्रशासक और नागरिक बसा दिए। फ्रांस, इंग्लैंड, स्पेन, पुर्तगाल, हॉलैंड सबने यह किया।


1939-45 तक जो घमासान युद्ध हुआ था, उसके बाद यूरोपीय देशों ने अपने उपनिवेश स्वाधीन कर दिए थे लेकिन तब यह शत प्रतिशत नहीं हुआ था। अभी भी उनका अधिकार दुनिया के कई हिस्सों पर है। स्वाधीनता, समानता और विश्व बंधुत्व का नारा लगाने वाले यूरोपीय अभी भी अत्याचारी की भूमिका में हैं और अतिक्रमणकारी हैं।



फाकलैंड का प्रकरण ऐसा ही है। 12 हजार किमी दूर के देश ब्रिटेन का फाकलैंड पर अधिकार अस्वाभाविक है। अर्जेंटीना इस बात को विभिन्न मंचों पर उठा रहा है। कल एक पोस्टर में भी यह अभिव्यक्त हुआ है।


दुनिया के उच्च संघों को चाहिए कि वह दुनिया के देशों को फिर से देखें। क्षेत्रों का पुनर्निधारण हो। उपनिवेश समाप्त हों। अमरीका भी अपनी दादागिरी बंद करे।

मंगलवार, 30 जून 2026

लंगड़ा आम के पक्ष में

 जब मेरे सामने कोई व्यक्ति लंगड़ा आम छोड़कर दशहरी के सम्बन्ध में पूछताछ करता है तो मैं उसे नौसिखिया मानकर देखता हूं। आजकल लंगड़ा आम मुझे मिल ही जा रहा है। दुकानदार जब मुझे बताता है कि आम लंगड़ा है तो मैं सोचता हूं कि इसे गुणवान की परख नहीं। जो व्यक्ति दूर से आम देखकर खिंचा चला आया है और आम की कई किस्मों में केवल लंगड़े के सम्बन्ध में जानकारी ले रहा है, उसे आम का पारखी समझना चाहिए।

लंगड़ा आम 


वैसे तो मैं प्रतिदिन ही #चार_आम मार दे रहा हूं। (हालांकि एक बैठक में नहीं!) लेकिन आज मैंने जो खाए, वह सही मायने में राजा थे।




लंगड़ा आम अपने काषाय वल्कल के लिए पहचाना जाता है। चाकू से काट कर खाने वाले लोगों की तो यहां कोई बात ही नहीं है! इसलिए वो लोग आम प्रेमी न मानें। आदिम तरीके से आम खाने पर लंगड़ा आम परेशान कर सकता है लेकिन जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि आम को धैर्य के साथ खाना है। वल्कल उतारने में ही आपने शीघ्रता कर दी है तो आप कहां ठहरेंगे! शनै: शनै: आप इससे परिचित होते जाते हैं।


शास्त्रों में कहा गया है कि आग, स्त्री और घोड़े का मुंह पवित्र होता है। इसमें एक और चीज जोड़ना था। आग, स्त्री, घोड़े का मुंह और लंगड़ा आम; यह सदैव पवित्र होते हैं। इस आम को प्रिया की भाँति बरतना चाहिए।


केवल लंगड़ा आम ही ऐसा है जिसका बोकला उतारने के बाद आप भरपूर क्षमता से आक्रामक हो सकते हैं और अपनी क्षुधा शांत कर सकते हैं।


अंत में, इस आम की कोइली (गुठली) को इस तरह साफ करना चाहिए कि यह उगे न। वैसे भी भूमिहारों की गुठली उगने योग्य नहीं बचती।


आपने यह आम खाया है?

रविवार, 28 जून 2026

Etawah Lion 🦁 safari

Etawah Lion 🦁 safari park 
A visit with friends!

Spectacular. Incredible. Beautiful. Be sure to come to experience the thrill of wildlife. Lions roar as you pass by every morning. Spotted Spotted Deer, Bears, and Deer are also visible here. This is one of the best places in Etawah.

Accessible bus service is now available. But a safari is not a fun experience.

























 

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

सेन संग चतुरंग अपारा

 सेन संग चतुरंग अपारा।


हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल सैनिक; जिस सेना में यह चार अंग हों, उसको #चतुरंगिणी कहा जाता है। एक शक्तिशाली सम्राट अपनी सेना में इन चारो अंग पर विशेष ध्यान देता है। प्राचीन ग्रंथों में यह बारंबार उल्लिखित हुआ है जो सैन्य संगठन की #संस्कृति का परिचय भी है।



#शब्द

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

शिश्नोदरी

शिश्नोदरी शब्द संस्कृत से लिया गया है, जो 'शिश्नोदरपरायण' का रूप है। इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो केवल पेट (उदर) और जननेंद्रिय (शिश्न) की तृप्ति में लगा रहता है

प्रतीकात्मक छवि


, अर्थात भोजन और कामवासना में डूबा हुआ, पशुवत जीवन जीने वाला। 


प्रश्न यह है कि शिश्नोदरी कहने से आपको किस समुदाय का ध्यान सबसे पहले आता है?


शिश्नोदरी शब्द का प्रयोग आचार्य कुबेरनाथ राय ने अपने निबंधों में कई जगह किया है। 

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

नाम एकतनु हेतु तेहि, देह न धरि बहोरि!

नाम एकतनु हेतु तेहि, देह न धरि बहोरि!


रावण के पूर्व जन्म की कहानी में #एकतनु नामक चरित्र है।प्रतापभानु से पराजित एक राजा ने छल करने के लिए यह नाम रखा था। वह कहता है कि जब सृष्टि बनी तब मैं उपजा और तबसे इसी रूप में हूं। आशय कि वह सृष्टि का समवयसी है। इसे समझकर मुझे अमीबा का ध्यान आया जो एक कोशीय जीव है। और सृष्टि में सबसे पहला जीव माना जाता है।


#संस्कृति #शब्द


चौपाई


तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।।

प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।।

तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।।

अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।।

जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।।

देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी।।

नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई।।

कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।


दोहा/सोरठा



आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।

नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि।।

सद्य: आलोकित!

परदखिना करि करहिं प्रनामा।

परदखिना करि करहिं प्रनामा। श्रीरामचरितमानस की यह पंक्ति केवल एक क्रिया का वर्णन नहीं करती, बल्कि भक्ति, समर्पण और आदर की पराकाष्ठा को दर्शात...

आपने जब देखा, तब की संख्या.