रविवार, 28 जून 2026
Etawah Lion 🦁 safari
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
मोबाइल- कमेंट box में पूछें।
E-mail- royramakantrk@gmail.com
सोमवार, 9 फ़रवरी 2026
सेन संग चतुरंग अपारा
सेन संग चतुरंग अपारा।
हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल सैनिक; जिस सेना में यह चार अंग हों, उसको #चतुरंगिणी कहा जाता है। एक शक्तिशाली सम्राट अपनी सेना में इन चारो अंग पर विशेष ध्यान देता है। प्राचीन ग्रंथों में यह बारंबार उल्लिखित हुआ है जो सैन्य संगठन की #संस्कृति का परिचय भी है।
#शब्द
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
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मंगलवार, 13 जनवरी 2026
शिश्नोदरी
शिश्नोदरी शब्द संस्कृत से लिया गया है, जो 'शिश्नोदरपरायण' का रूप है। इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो केवल पेट (उदर) और जननेंद्रिय (शिश्न) की तृप्ति में लगा रहता है
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| प्रतीकात्मक छवि |
, अर्थात भोजन और कामवासना में डूबा हुआ, पशुवत जीवन जीने वाला।
प्रश्न यह है कि शिश्नोदरी कहने से आपको किस समुदाय का ध्यान सबसे पहले आता है?
शिश्नोदरी शब्द का प्रयोग आचार्य कुबेरनाथ राय ने अपने निबंधों में कई जगह किया है।
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उत्तर प्रदेश।
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मंगलवार, 6 जनवरी 2026
नाम एकतनु हेतु तेहि, देह न धरि बहोरि!
नाम एकतनु हेतु तेहि, देह न धरि बहोरि!
रावण के पूर्व जन्म की कहानी में #एकतनु नामक चरित्र है।प्रतापभानु से पराजित एक राजा ने छल करने के लिए यह नाम रखा था। वह कहता है कि जब सृष्टि बनी तब मैं उपजा और तबसे इसी रूप में हूं। आशय कि वह सृष्टि का समवयसी है। इसे समझकर मुझे अमीबा का ध्यान आया जो एक कोशीय जीव है। और सृष्टि में सबसे पहला जीव माना जाता है।
#संस्कृति #शब्द
चौपाई
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।।
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।।
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।।
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।।
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।।
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी।।
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई।।
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।
दोहा/सोरठा
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि।।
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
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शनिवार, 3 जनवरी 2026
नेति नेति जेहि बेद निरूपा।
नेति नेति जेहि बेद निरूपा।
ब्रह्म क्या है ? इसका प्रतिपादन करने के लिए #नेति_नेति सूत्र है। अव्यक्त भाव को "यह नहीं है, यह नहीं है" से जानते हैं। ब्रह्म को "यह नहीं है" कहकर अलगाने की चेष्टा की गई है। तुलसीदास जी कहते हैं कि वह प्रेम से सहज प्राप्त हो जाता है।
चौपाई
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।।
पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे।।
उर अभिलाष निंरंतर होई। देखअ नयन परम प्रभु सोई।।
अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी।।
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा।।
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।।
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई।।
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा।।
दोहा/सोरठा
एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार।
संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार।।
#संस्कृति #शब्द
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भारत में स्त्री शिक्षा और सावित्री बाई फुले
सावित्रीबाई फुले के साथ फातिमा शेख की कल्पना करके प्रो दिलीप मंडल ने इतना बड़ा फ्रॉड किया था कि ज्ञान जगत चकरा कर रह गया। भारतीय इतिहास में ऐसी असंख्य बातें चल पड़ी हैं। इसी में यह मिथ्या वचन भी चल गया कि वह पहली शिक्षिका हैं। उनसे पहले स्त्री शिक्षा का प्रचार नहीं था। यह भी एक मिथ्या धारणा है कि शूद्र पढ़ नहीं सकते थे।
सच्चाई यह है कि ऐसा नहीं है। भारत में विदुषी महिलाएं बहुत प्राचीन काल से ही मिलती हैं। मैं रानी लक्ष्मीबाई के जीवन चरित्र को देखता हूं तो सोचता हूं कि घुड़सवारी और युद्ध कला उन्होंने कैसे सीखी होगी? झलकारी बाई, अवंतीबाई, अहिल्याबाई आदि को किसने लड़ना सिखाया? माताएं अपने बच्चों को अक्षर ज्ञान कराती थीं और वह पुराण, सुखसागर आदि का सहज अध्ययन कर लेती थीं।
प्राचीन काल में गुरुकुल में लड़कियों को शिक्षा देने वाली ऋषि पत्नियां थीं। महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधती का नाम ही मुझे बहुत अच्छा लगता है। वह शिक्षा देने वाली ही तो हैं। महाभारत में आरुणि के गुरु महर्षि आयोदधौम्य और उनकी पत्नी सुजाता का कितना नाम है। असंख्य महिलाओं का नाम प्राचीन वांग्मय में मिलता है।
जब मैकाले भारत आया तो वह इस सब से चिंतित हुआ। उसने गुरुकुलों को मिलने वाली सहायता बंद करवा दी। दुष्प्रचार करवाया।
कहते हैं कि दलित और शूद्र पढ़ नहीं सकते थे। भक्ति काल में एक पूरा संप्रदाय ऐसे कवियों का था जिन्हें सामाजिक दृष्टि से शूद्र माना जाता था लेकिन उन सबने बड़ी गद्दियाँ बनवाईं। कबीर, रैदास, दादू, नानक, सेन आदि कितने बड़े मठाधीश हुए। सब पढ़े लिखे थे।
बीसवीं शताब्दी के आधे हिस्से तक देश में नौकरी को निकृष्ट काम माना जाता था। लोग अपने घर में रहना चाहते थे। उनकी अपनी सामाजिक पहचान थी। जो व्यक्ति अपने गांव से कहीं और चला जाता था वह अकेलापन और निर्वासन जैसा संत्रास भोगता था। वह, जिन्हें हिब्बा मिल जाता था, वह भी बहुत लालचवश ही अपना ठीहा छोड़ते थे। यहां सुरक्षा थी, सम्मान था और सार्थकता थी।
तब शिक्षा वेदांग की एक कड़ी भर थी। बहुत से लोग इसे कठिन और दुर्गम, दुर्लभ मानते थे। जिन संतों ने निर्गुण का उपदेश किया है, उन सब ने और ज्ञान मार्गियों ने इसे कठिन साधना कहा है। ऐसे में, लोग इस पथ को नहीं के बराबर चुनते थे। सब विधि अगम अगोचर जानकर ही सूरदास सगुण पद गाते हैं।
तब शक्ति का अर्थ बाहुबल था।
फिर शक्ति का अर्थ धनबल हुआ। और क्रमशः ज्ञान की महिमा प्रकाश में आई। यद्यपि ज्ञान का बल सर्वोच्च था किंतु उसकी उपादेयता लोकहित में थी।
ऐसे में शिक्षा न सब प्राप्त करना चाहते थे और न यह सुलभ थी। किंतु जो चाहते थे, उन्हें सहज ही मिल जाती थी। यह अलभ्य थी इसलिए कठिनाई थी।
स्त्रियों को घर में ही रहना था इसलिए उनका दायरा सीमित था। उन्हें शिक्षा की और कम आवश्यकता थी। भजन, कीर्तन और पुराणादि समझने भर शिक्षा उन्हें प्रदान की जाती थी।
जब तक ऐतिहासिक संदर्भ नहीं समझा जाएगा, भारत में स्त्री शिक्षा और शूद्र जीवन को नहीं जाना जा सकता।
भारत, यूरोप अथवा अरब से पृथक देश है। हिन्दू अब्राहमिक कल्चर से अलग हैं। हमारे यहां स्त्रियां दोयम दर्जे की नहीं हैं। अब्राहमिक कल्चर में वह हव्वाजात हैं और शापित हैं। उनके यहां औरतों को यह सब नहीं मालूम था। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अपना कैनन भारत के सामाजिक क्षेत्र पर रखा और कुछ निष्कर्ष प्रतिपादित कर दिए।
इन चीजों को बदलना आवश्यक है।
सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन पर यह मुझे कहना था।
मैं अभी तो प्रो दिलीप मंडल @Profdilipmandal से अपील करता हूं कि वह फिर से वह उदघाटन करें कि फातिमा शेख उनकी कल्पना प्रसूता हैं।
सावित्री बाई फुले की जयंती जनचेतना का अवसर बने, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ!
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। राही मासूम रज़ा पर डी.फिल.।
विभिन्न पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्र और आलेख। एक पुस्तक "हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों के बहाने राही के उपन्यास" लोकभारती प्रकाशन से। दूरदर्शन पर चार बार साक्षात्कार और आकाशवाणी से एक दर्जन से अधिक वार्ता प्रसारित। ललित निबंध में रुचि।
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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026
मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही॥
रामकथा विस्तार से सुनकर गरुड़ का संशय जाता रहा। उन्होंने काक भुसुंडी का आभार प्रकट किया तो उन्होंने कहा कि यह भी विधि के विधान का अंग ही समझना चाहिए। यह मेरा सौभाग्य है कि आप यहां कथा सुनने आए। वह कहते हैं कि कौन ऐसा है जिसे मोह ने फांस न लिया हो, जिसे काम वेग ने नचाया न हो, जिसे तृष्णा ने पागल न बना दिया हो, जिसके हृदय को क्रोध ने दग्ध न किया हो!
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| को जग काम नचाव न जेही॥ |
आप अकेले नहीं हैं! इससे नारद, सारद सभी प्रभावित हुए हैं। मोह, तृष्णा, काम और क्रोध से लिप्त हो जाना कोई अपराध नहीं है। यदि इसमें निमग्न हो गए तो चाहिए सत्संग!
हनुमानजी इस सत्संग का आधार हैं। उनका नाम स्मरण सत्संग का प्रारंभिक बिंदु है।
#हनुमानजी #Hanumanji 🙏🙏
चौपाई
बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।
सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे।।
तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया।।
पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही।।
तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं।।
नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी।।
मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही।।
तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा।।
दोहा
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।
केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार।।
श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि।।
गाज़ीपुर का हूँ। बंगाल में पला-बढ़ा। गंगा किनारे का वासी।
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सद्य: आलोकित!
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Etawah Lion 🦁 safari park A visit with friends! Spectacular. Incredible. Beautiful. Be sure to come to experience the thrill of wildlife. ...





























