ओटीटी पर आने के बाद कल हमने यह फिल्म भी देख ली। जब यह रिलीज हुई थी तो एक झोंका आया था कि देखने चलते हैं लेकिन ठहर गया था। ओटीटी अमेजन प्राइम पर आई। वेब सीरीज के बाद फिल्म के रूप में ले आना और उसे देखने लायक बनाये रखना एक चुनौती तो रहती है। इसके निर्देशक के साथ भी यह चुनौती थी।
फिल्म में एक नया माफिया, बल्कि दो माफिया नए आ गए हैं और यह समझ में आ रहा है कि गद्दी देश के हर जनपद में है। उत्तर प्रदेश के हर जनपद में है और इससे बाहर राज्य स्तर पर। हर जगह वही काम चल रहा, तस्करी, फिरौती, अपराध और राजनीति। हर जगह सेक्स का छौंक लगा दिया गया है।
इसमें एक जबरदस्ती यह हुई है कि कई लोगों की प्रेम कहानी ठूंस दी गई है और उस प्रेम की अभिव्यक्ति गीतों में है। एकदम अनावश्यक युक्ति अपनाई गई है।
कुछ एक दृश्य अच्छे हैं लेकिन उनमें कोई नयापन नहीं है। दुकान है, सैलून है, ठेला है! उसपर कुछ नए तरीके की रचना है।
छोटू पंडित की भूमिका में जितेंद्र आ गए हैं। वह बहुत जहीन बतलाये गए हैं और आंख बंद रखकर भी वह मार्ग ट्रैक कर ले रहे हैं! इसके लिए दिखाया गया है कि वह हाथ में बंधी हुई ट्रैकर का प्रयोग करते हैं। स्मार्टफोन के जमाने में ऐसा कौन करता है? एक पेशेवर अपराधी ऐसी जगह पर अपना आदमी रखता है। लेकिन जनता को सिनेमा दिखाना है बस!
रतीशंकर शुक्ला को वर्णमाला सुनना है। हिंदी वर्णमाला सुनाने वाला टवर्ग छोड़ देता है लेकिन उसे ज्ञानी माना जाता है और नई शर्त रखी जाती है कि वह उर्दू का अलिफ़ बे पढ़कर दिखाए।
फिल्मकार ने यह शुरू तो करवाया है लेकिन वह इसकी तौहीन नहीं करवा सका है। सबका हलक सूखता है। निर्देशक का भी सूखा है।
मीरजापुर में बीना त्रिपाठी के ही अंतरंग सीन दिखाए गए हैं। वही सुलभ हैं, संभवतः। पंकज त्रिपाठी के पास कोई काम नहीं है। मुन्ना ठीक जंचें हैं। गुड्डू पंडित को भी ठीक ही बैलाट दिखाया गया है।
हिंदी सिनेमा में एक रीतिकाल चल रहा है। मीरजापुर उसी का नमूना भर है।
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