मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

मेरा प्रतिनिधि रघुवीर सहाय की कविता

उसके दिल की धड़कन

उस दिल की धड़कन है

भीड़ के शिकार के

सीने में जो है।


हाहाकार

उठता है घोष कर

एक जन

उठता है रोषकर

व्याकुल आत्मा से आक्रोश कर

अकस्मात

अर्थ

भर जाता है पुरुष वह

हम सबके निर्विवाद जीने में।

सिंहासन ऊँचा है सभाध्यक्ष छोटा है

अगणित पिताओं के

एक परिवार के

मुँह बाये बैठे हैं लड़के सरकार के

लूले काने बहरे विविध प्रकार के

हल्की-सी दुर्गन्ध से भर गया है सभाकक्ष।

सुनो वहाँ कहता है

मेरा प्रतिनिधि

मेरी हत्या की करुण कथा।


हँसती है सभा

तोंद मटका

ठठाकर

अकेले अपराजित सदस्य की व्यथा पर

फिर मेरी मृत्यु से डरकर चिंचियाकर

कहती है

अशिव है अशोभन है मिथ्या है।


मैं

कि जो अन्यत्र

भीड़ में मारा गया था

लिये हुए मशअलें रात में

लोग

मुझे लाये थे साथ में

काग़ज़

था एक मेरे हाथ में

मेरी स्वाधीन जन्मभूमि पर जन्म लिये होने का मेरा प्रमाणपत्र।


मारो मारो मारो शोर था मारो

एक ओर साहब था

सेठ था सिपाही था

एक ओर मैं था

मेरा पुत्र और भाई था

मेरे पास आकर खड़ा हुआ एक राही था

एक ओर आकाश में हो चला था भोर।

मैं अपने घर में फिर

वापस आऊँगा

मैंने कहा


रघुवीर सहाय


बीस वर्ष

खो गये भरमे उपदेश में

एक पूरी पीढ़ी जनमी पली पुसी क्लेश में

बेगानी हो गयी अपने ही देश में

वह

अपने बचपन की

आज़ादी

छीनकर लाऊँगा।


तभी मुझे क़त्ल किया लो मेरे प्रतिनिधि मेरा प्रमाण

घुटता था गला व्यर्थ सत्य कहते-कहते

वाणी से विरोध कर तन से सहते-सहते

सील-भरी बन्द कोठरी में रहते-रहते

तोड़ दिया द्वार आजऋ देखो-देखो मेरी मातृभूमि का उजाड़!


---रघुवीर सहाय

सद्य: आलोकित!

मेरा प्रतिनिधि रघुवीर सहाय की कविता

उसके दिल की धड़कन उस दिल की धड़कन है भीड़ के शिकार के सीने में जो है। हाहाकार उठता है घोष कर एक जन उठता है रोषकर व्याकुल आत्मा से आक्रोश कर अकस...

आपने जब देखा, तब की संख्या.