गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

मौन निमंत्रण : सुमित्रानंदन पंत

स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार

चकित रहता शिशु सा नादान ,

विश्व के पलकों पर सुकुमार
विचरते हैं जब स्वप्न अजान,
           न जाने नक्षत्रों से कौन
           निमंत्रण देता मुझको मौन !
सघन मेघों का भीमाकाश
गरजता है जब तमसाकार,
दीर्घ भरता समीर निःश्वास,
प्रखर झरती जब पावस-धार ;
            न जाने ,तपक तड़ित में कौन
            मुझे इंगित करता तब मौन !
देख वसुधा का यौवन भार
गूंज उठता है जब मधुमास,
विधुर उर के-से मृदु उद्गार
कुसुम जब खुल पड़ते सोच्छ्वास,
               न जाने, सौरभ के मिस कौन
               संदेशा मुझे भेजता मौन !
क्षुब्ध जल शिखरों को जब बात
सिंधु में मथकर फेनाकार ,
बुलबुलों का व्याकुल संसार
बना,बिथुरा देती अज्ञात ,
               उठा तब लहरों से कर कौन
               न जाने, मुझे बुलाता कौन !
स्वर्ण,सुख,श्री सौरभ में भोर
विश्व को देती है जब बोर
विहग कुल की कल-कंठ हिलोर
मिला देती भू नभ के छोर ;
              न जाने, अलस पलक-दल कौन
              खोल देता तब मेरे मौन  !
तुमुल तम में जब एकाकार
ऊँघता एक साथ संसार ,
भीरु झींगुर-कुल की झंकार
कँपा देती निद्रा के तार
              न जाने, खद्योतों से कौन
              मुझे पथ दिखलाता तब मौन !
कनक छाया में जबकि सकल
खोलती कलिका उर के द्वार
सुरभि पीड़ित मधुपों के बाल
तड़प, बन जाते हैं गुंजार;
             न जाने, ढुलक ओस में कौन
             खींच लेता मेरे दृग मौन !
बिछा कार्यों का गुरुतर भार
दिवस को दे सुवर्ण अवसान ,
शून्य शय्या में श्रमित अपार,
जुड़ाता जब मैं आकुल प्राण ;
            न जाने, मुझे स्वप्न में कौन
            फिराता छाया-जग में मौन !
न जाने कौन अये द्युतिमान !
जान मुझको अबोध, अज्ञान,
सुझाते हों तुम पथ अजान
फूँक देते छिद्रों में गान ;
            अहे सुख-दुःख के सहचर मौन !
            नहीं कह सकता तुम हो कौन !

 



सुमित्रानंदन पंत 


मंदिर का दीप इसे नीरव जलने दो! : महादेवी वर्मा

 यह मंदिर का दीप इसे नीरव जलने दो!

रजत शंख-घड़ियाल स्वर्ण वंशी-वीणा-स्वर,


गए आरती वेला को शत-शत लय से भर,

जब था कल कंठों का मेला,


विहँसे उपल तिमिर था खेला,

अब मंदिर में इष्ट अकेला,


इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो!

चरणों से चिह्नित अलिंद की भूमि सुनहली,


प्रणत शिरों के अंक लिए चंदन की दहली,

झरे सुमन बिखरे अक्षत सित,


धूप-अर्घ्य-नैवेद्य अपरिमित,

तम में सब होंगे अंतर्हित,


सबकी अर्चित कथा इसी लौ में पलने दो!

पल के मनके फेर पुजारी विश्व सो गया,


प्रतिध्वनि का इतिहास प्रस्तरों बीच खो गया,

साँसों की समाधि-सा जीवन,


मसि-सागर का पंथ गया बन,

रुका मुखर कण-कण का स्पंदन,


इस ज्वाला में प्राण-रूप फिर से ढलने दो!

झंझा है दिग्भ्रांत रात की मूर्च्छा गहरी,


आज पुजारी बने, ज्योति का यह लघु प्रहरी,

जब तक लौटे दिन की हलचल,


तब तक यह जागेगा प्रतिपल,

रेखाओं में भर आभा-जल,


दूत साँझ का इसे प्रभाती तक चलने दो!

महादेवी वर्मा 


सिंदूर तिलकित भाल : नागार्जुन की कविता

घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल!

याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल!


कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिए न समाज?

कौन है वह एक जिसको नहीं पड़ता दूसरे से काज?

चाहिए किसको नहीं सहयोग?

चाहिए किसको नहीं सहवास?

कौन चाहेगा कि उसका शून्य में टकराए यह उच्छ्वास?


हो गया हूँ मैं नहीं पाषाण

जिसको डाल दे कोई कहीं भी

करेगा वह कभी कुछ न विरोध

करेगा वह कुछ नहीं अनुरोध

वेदना ही नहीं उसके पास

उठेगा फिर कहाँ से निःश्वास


मैं न साधारण, सचेतन जंतु

यहाँ हाँ-ना किंतु और परंतु

यहाँ हर्ष-विषाद-चिंता-क्रोध


यहाँ है सुख-दुख का अवबोध

यहाँ है प्रत्यक्ष औ’ अनुमान

यहाँ स्मृति-विस्मृति सभी के स्थान

तभी तो तुम याद आतीं प्राण,

हो गया हूँ मैं नहीं पाषाण!


याद आते स्वजन

जिनकी स्नेह से भींगी अमृतमय आँख

स्मृति-विहंगम को कभी थकने न देंगी पाँख


याद आता मुझे अपना वह ‘तरउनी’ ग्राम

याद आतीं लीचियाँ, वे आम

याद आते मुझे मिथिला के रुचिर भू-भाग

याद आते धान

याद आते कमल, कुमुदिनि और तालमखान

याद आते शस्य-श्यामल जनपदों के

रूप-गुण-अनुसार ही रखे गए वे नाम

याद आते वेणुवन के नीलिमा के निलय अति अभिराम


धन्य वे जिनके मृदुलतम अंक

हुए थे मेरे लिए पर्यंक

धन्य वे जिनकी उपज के भाग

अन्न-पानी और भाजी-साग

फूल-फल औ’ कंद-मूल अनेक विध मधु-मांस

विपुल उनका ऋण, सधा सकता न मैं दशमांश


ओह, यद्यपि पड़ गया हूँ दूर उनसे आज

हृदय से पर आ रही आवाज़

धन्य वे जन, वही धन्य समाज

यहाँ भी तो हूँ न मैं असहाय

यहाँ भी हैं व्यक्ति औ’ समुदाय

किंतु जीवन भर रहूँ फिर भी प्रवासी ही कहेंगे हाय!


मरूँगा तो चिता पर दो फूल देंगे डाल

समय चलता जाएगा निर्बाध अपनी चाल

सुनोगी तुम तो उठेगी हूक

मैं रहूँगा सामने (तस्वीर में) पर मूक!


सांध्य नभ में पश्चिमांत-समान

लालिमा का जब करुण आख्यान

सुना करता हूँ, सुमुखि, उस काल

याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल।

नागार्जुन


शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

मठ तथा संन्यासी : आनंद मठ से मैला आंचल तक

 मठ तथा संन्यासी : आनंद मठ से मैला आंचल तक-   डॉ रमाकान्त राय

शोध सार

 (सूचना-
यह शोध आलेख नागपुर से प्रकाशित शोध पत्रिका समिधा के प्रवेशांक में प्रकाशित है)

इस शोध पत्र में बंकिम चन्द्र चटर्जी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ और फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आंचल में चित्रित मठ और संन्यासियों के माध्यम से भारत में मठ और संन्यासी की भूमिकाओं को समझने का प्रयास किया गया है। बंगाल में सन 1770 और 1774 के मध्य भीषण अकाल का दौर रहा। इस समय में अंग्रेजी शासन और देसी शासकों, जिसमें यवन शासक प्रमुख थे; ने कर का बोझ इतना बढ़ा दिया था कि आमजन का जीवन दुष्कर हो गया था। ऐसी गंभीर अवस्था में बंगाल में संन्यासियों ने ‘संतान सेना’ का गठन किया और यवन तथा अंग्रेजी शासन से डटकर मुकाबला किया। इसमें संतान सेना विजयी हुई और उसने ‘लोकतन्त्र की स्थापना की तथा कई वर्षों तक शासन की बागडोर अपने हाथ में रखी। इसी प्रकार स्वाधीनता प्राप्ति के बाद लिखे गए उपन्यासों में एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास ‘मैला आँचल’ में एक मठ तथा उसमें रहने वाले संन्यासी वर्ग की कहानी आई है। यह मठ व्यभिचार और दुराचार के अड्डे की तरह चित्रित है। इसमें रहने वाले लोग पूजा-पाठ और कर्मकांड के नाम पर लोगों को किस तरह बरगलाते हैं, उसको कथा का अंग बनाया गया है।

          हिंदी के एक प्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध ने अपनी एक कविता में मठों और गढ़ों को तोड़ने की बात की है। शोधपत्र में उस विकास यात्रा को समझने का प्रयास है जिसमें स्वाधीनता आन्दोलन में प्रतिभाग करने वाले मठ और गढ़ किस प्रकार व्यभिचार के अड्डों में परिवर्तित होते गये हैं। इसमें दृष्टि का भेद भी एक प्रमुख कारक है।

(बीज शब्द- मठ, संन्यासी, आनन्द-मठ, मैला आंचल, स्वाधीनता संग्राम, यवन और अंग्रेजी शासन, बंगला उपन्यास, हिंदी उपन्यास, बंकिम चन्द्र चटर्जी, फणीश्वर नाथ रेणु)

 

 

भूमिका-

हिंदी के प्रख्यात कवि ‘मुक्तिबोध’ की कविता ‘अँधेरे में में एक चर्चित अंश है-

“अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे

उठाने ही होंगे।

तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब।”[1]

इस अंश में कवि ने सभी मठों और गढ़ को तोड़ने की आवश्यकता जताई गयी  है। किन्तु क्यों? क्या मठ और गढ़ सर्वथा अनुपयोगी और निरर्थक हो गए हैं? उनकी क्या भूमिका थी और क्या हो गयी है? बंकिम चन्द्र चटर्जी के उपन्यास आनंद मठ और फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास मैला आँचल में चित्रित प्रसंगों के आधार पर हम कुछ ऐसी विशिष्टताओं को यहाँ व्यवस्थित करने का प्रयास करेंगे, जिससे भारत में मठों की स्थितियों के विषय में एक धारणा बनाई जा सके।

जैसा कि विदित है, गढ़ राजाओं के रहने की सुरक्षित संरचना है और मठ धार्मिक संस्थान। यह दोनों ही राजतन्त्र के अनिवार्य अंग हैं। इसमें मठ गुरु और उसके शिष्यों का स्थान है। यहाँ परस्पर ज्ञानार्जन और विद्याओं के संरक्षण का उपक्रम चलता रहता है। भारत में प्राचीन काल से ही मठों की परम्परा है। आदि शंकराचार्य ने देश के चार स्थानों पर मठ स्थापित किये, जहाँ आज भी शंकराचार्य की गद्दी है और यह सनातन धर्म के व्यवस्थापक हैं। इन चार मठों में वेदान्त ज्ञानमठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम में, गोवर्धन मठ भारत के पूर्वी भाग ओड़िसा के जगन्नाथ पुरी में, शारदा मठ पश्चिम भाग गुजरात के द्वारका धाम में और उत्तर के उत्तरांचल के बद्रीनाथ में स्थित है ज्योतिर्मठ। कालान्तर में देश भर में कई मठ और आश्रम स्थापित हुए। यह मठ और आश्रम ज्ञान-विज्ञान के केन्द्र हैं और यहाँ से देश की बौद्धिक सम्पदा का संरक्षण और विस्तार होता है।

समय समय पर इन मठों ने राजनीतिक हस्तक्षेप भी किया और कई बार सशस्त्र प्रतिरोध भी। महानिर्वाणी अखाड़े का औरंगजेब के साथ संघर्ष इतिहास की प्रमुख घटनाओं में से एक है। बंगाल के गिरि सम्प्रदाय के संन्यासियों ने अठारहवीं शती के अंत में अंग्रेजी और यवन शासन के विरोध में सशत्र आन्दोलन किया था। संन्यासी विद्रोहियों ने अपनी स्वतंत्र सरकार बोग्रा और मैमनसिंह में स्थापित किया । वह लोग गुरिल्ला पद्धति से युद्ध करते थे।

बंकिम चन्द्र चटर्जी का उपन्यास ‘आनन्द मठ :

       बांग्ला के प्रख्यात उपन्यासकार बंकिम चन्द्र चटर्जी ने सन 1882 में संन्यासी आन्दोलन की पृष्ठभूमि में ‘आनन्द मठ नामक उपन्यास लिखा। इस उपन्यास में संन्यासियों द्वारा गाया गया गीत ‘वन्दे मातरम् आज भारत का राष्ट्रीय गीत है। इस उपन्यास में सन 1770 से 1774 में पड़े भीषण अकाल का मार्मिक चित्रण है। यह वह समय था जब “बंगाल प्रदेश अंग्रेजों के शासनाधीन नहीं हुआ था। अंग्रेज उस समय बंगाल के दीवान ही थे। वे खजाने का रुपया वसूलते थे , लेकिन तब तक बंगालियों की रक्षा का भार उन्होंने अपने ऊपर लिया न था। उस समय लगान की वसूली का भार अंग्रेजों पर था और कुल संपत्ति की रक्षा का भार पापिष्ठ, नराधम, विश्वासघातक, मनुष्य कुल कलंक मीरजाफर पर था। मीरजाफर आत्मरक्षा में ही अक्षम था तो बंगाल प्रदेश की रक्षा कैसे कर सकता था।”[2] जब “बंगाल में भीषण अकाल पड़ा तो एक ओर अंग्रेजों और दूसरी ओर नवाबों ने मिलकर जन सामान्य पर भारी करों का बोझ लाद दिया था। जनता त्राहि त्राहि कर उठी थी। सुन्दर लाल ने ‘भारत में अंग्रेजी राज शीर्षक पुस्तक में लिखा है, “एडमण्ड बर्क लिखता है कि लगान बेहद बढ़ा दिए जाने की वजह से ही सारा देश वीरान दिखाई देना लगा। इस लगान बढ़ाये जाने ही का एक नतीजा बंगाल-भर के अन्दर सन 1770 का वह भयंकर दुष्काल था, जिसके सामान विपत्ति देश पर पहले कभी न आई थी और जिसमें लाखों गाँव उजड़ गए।”[3] चारो ओर प्रताड़ना और अत्याचारों का भीषण तांडव हो रहा था। ऐसी गहन-गंभीर परिस्थितियों में उत्तर भारत के उस क्षेत्र में संन्यासियों ने एकजुट होकर शस्य श्यामल वसुन्धरा को माता मान ‘संतान सेना’ का गठन किया। इस संतान सेना ने पहले बंगाल के नवाब की सेना के और फिर फिरंगी सेना के दांत खट्टे कर दिए। संतान सेना संतान धर्म का पालन करते हुए अंततः विजयी हुई।”[4] बंकिम चन्द्र चटर्जी का उपन्यास ऐतिहासिक है और सत्य घटनाओं पर आश्रित है। “आनंद मठ में जिस काल खंड का वर्णन किया गया है, उसमें व हंटर की ऐतिहासिक कृति ‘एनाल्स ऑफ़ रूरल बंगाल जी०आर० गलेग की ‘मेमायर्स ऑफ़ द लाइफ ऑफ़ वारेन हेस्टिंग्स और उस समय के ऐतिहासिक दस्तावेजों में शामिल तथ्यों में काफी समानता है।”[5]

          आनंद मठ उपन्यास का अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है कि बंगाब्द 1175 अर्थात ईस्वी सन 1768 में ग्रामवासी अपने सुख दुःख का प्रकटीकरण अपने घर के साथ साथ मठ में भी करते थे। बंगाब्द 1174 में अनावृष्टि के उपरान्त जब बंगाब्द 1175 में बरसात हुई तो “आनन्द में फिर मठ-मंदिरों में गाना-बजाना शुरू हुआ।”[6] किन्तु जब उसी वर्ष अकाल पड़ गया तो मठ दुर्दशा को प्राप्त हो गए। बंकिम चन्द्र चटर्जी ने मठ का सामान्य परिचय करते हुए लिखा है- “वन में एक बहुत विस्तृत भूमि पर ठोस पत्थरों से निर्मित एक बहुत बड़ा मठ है। पुरातत्त्व वेत्ता उसे देखकर कह सकते हैं कि पूर्वकाल में यह बौद्धों का विहार था- इसके बाद हिन्दुओं का मठ हो गया है। दो खंड में अट्टालिकाएं बनी हैं, उसमें अनेक देव-मंदिर और सामने नाट्य मंदिर है।

          वह समूचा मठ चहारदीवारी से घिरा हुआ है और बाहरी हिस्सा ऊँचे ऊँचे सघन वृक्षों से इस तरह आच्छादित है कि दिन में समीप जाकर भी कोई यह नहीं जान सकता कि यहाँ इतना बड़ा मठ है। यों तो प्राचीन होने के कारण मठ की दीवारें अनेक स्थानों से टूट-फूट गयी हैं, लेकिन दिन में देखने से साफ़ पता लगेगा कि अभी हाल ही में उसे बनाया गया है। देखने से तो यही जान पड़ेगा कि इस दुर्भेद्य वन के अन्दर कोई मनुष्य न रहता होगा।”[7]

यह विवरण इस बात का सूचक है कि मठ आदि राज्याश्रय में समृद्ध रहते थे। कालान्तर में जब यवनों और अंग्रेजों का शासन हुआ तो मठ उपेक्षित हो गए। यह मठ देवताओं के स्थान थे। इन मठों में निर्बल, असहाय जन और स्त्रियों आदि को सहज आश्रय मिल जाता था। इन मठों में रहने वाले संन्यासियों के बारे में बंकिम चन्द्र चटर्जी ने लिखा है- “उस समय के संन्यासी आजकल जैसे न होते थे- सुशिक्षित, बलिष्ठ, युद्ध विशारद एवं अन्यान्य गुणों से गुणवान होते थे। वे लोग वस्तुतः एक तरह के राजविद्रोही होते थे- राजाओं का राजस्व लूटकर खाते थे। बलिष्ठ बालक पाते ही उनका अपहरण करते थे, उन्हें शिक्षित कर अपने सम्प्रदाय में मिला लिया करते थे। इसलिए लोग उन्हें ‘लकड़-पकडवा’ या ‘लकड़-सुंघवा भी कहते थे।”[8]

जब महेन्द्र की पत्नी कल्याणी डाकुओं से बचने के लिए भाग जाती है और अपने पति से विलग हो जाती है तो उसे मठ में आश्रय मिलता है। यहाँ उल्लिखित उपन्यास में जिस मठ का वर्णन है, उसका नाम भी आनंद मठ है। आनंद मठ में रहने वाले लोग एक विशेष उद्देश्य के लिए संगठित हुए हैं। उन्होंने संतान सेना का व्रत लिया है। इस व्रत में स्त्री और कन्या के त्याग का व्रत लेना पड़ता है। स्त्री और कन्या के त्याग के व्रत से यह मठ सहज ही उन दुर्बलताओं से बचे हुए थे जो कालान्तर में मठों की पहचान बन गए। आनंद मठ में रहने वाले लोगों को न केवल बौद्धिक रूप से अपितु युद्ध कौशल से भी प्रशिक्षित किया जाता था। जीवानंद की पत्नी शान्ति, जो मठ में आकर नवीनानन्द बनती है; वह संन्यासियों के “दल में मिलकर व्यायाम करती थी, अस्त्र चलाना सीखती थी, अतः वह परिश्रम सहिष्णु हो उठी। उनके साथ उसने देश-विदेश भ्रमण किया, अनेक लड़ाइयाँ देखीं और अस्त्र विद्या में निपुण हो गयी।”[9]

आनन्द मठ वैष्णव धर्म का अनुपालन कर्ता है। यह वैष्णव मत प्रकृत है। इस वैष्णव मत का लक्षण “दुष्टों का दमन और धरा का उद्धार है। कारण, भगवान विष्णु ही संसार के पालक हैं। उन्होंने दस बार शरीर धारण कर पृथ्वी का उद्धार किया था।... वही जेता, जयदाता, पृथ्वी के उद्धारकर्ता और संतानों के इष्ट देवता हैं। चैतन्य देव का वैष्णव धर्म वास्तविक वैष्णव धर्म नहीं है- वह धर्म अधूरा है। चैतन्य देव के विष्णु केवल प्रेममय हैं – लेकिन भगवान केवल प्रेममय ही नहीं हैं, वे अनंत शक्तिमय भी हैं। संतानों के विष्णु केवल शक्तिमय हैं। हम दोनों ही वैष्णव हैं – लेकिन दोनों ही अधूरे हैं।”[10] इस मठ के संतानों का मुख्य उद्देश्य भी बहुत निश्चित है। “हमलोग राज्य नहीं चाहते – केवल यवन भगवान् के विद्वेषी हैं, इसलिए समूल विनाश चाहते हैं।”[11]

आनंद मठ में दो तरह के संतान हैं- दीक्षित और अदीक्षित। “जो अदीक्षित हैं, वे या तो संसारी हैं अथवा भिखारी। वे लोग केवल युद्ध के समय आकर उपस्थित हो जाते हैं, लूट का हिस्सा या पुरस्कार पाकर फिर चले जाते हैं। जो दीक्षित होते हैं, वे सर्वस्वत्यागी हैं। यही लोग सम्प्रदाय के कर्ता हैं।”[12] मठ के सभी संतान एक जाति के हैं। सत्यानन्द बताते हैं – “समस्त संतान एक जाति में हैं। इस महाव्रत में ब्राह्मण-शूद्र का विचार नहीं है।”[13] ऐसे मठ में यदि कोई ब्रह्मचर्य के व्रत से डिगता है तो उसके लिए प्रायश्चित की व्यवस्था है। संतान मत में दीक्षित होने के बाद जीवानन्द अपनी पत्नी, जो स्वयं रूप बदलकर संतान मत में दीक्षित है; के निकट आना चाहते हैं तो वह उन्हें उनके प्रण का ध्यान कराकर निरुत्तर कर देती है। दीक्षा के अवसर पर स्त्री के साथ एकासन पर कभी न बैठने तक की शपथ ली जाती है।

कठोर जीवनचर्या और अनुशासन के कारण मठों का जीवन पवित्र और निष्ठापूर्ण है। यही देश भर के मठों और संन्यासियों की पहचान थी। किन्तु देश में जब अंग्रेजों का शासन हो गया, उन्होंने भारतीयों का चौतरफा दमन शुरू किया तो उन्होंने मठों को भी अनुदान आदि से वंचित कर दिया। जब संस्कृत शिक्षा को राज्याश्रय से वंचित कर दिया गया तो मठ अधिक दुर्दशा को प्राप्त हुए। उनका स्वतन्त्र चिन्तन ठप्प पड़ गया। मठ के महंत और संन्यासी नियम और आचार का पालन करने में ही स्वयं को सीमित कर लिया। स्वाधीनता प्राप्ति के समय तक इनकी प्रतिष्ठा धूमिल हो चुकी थी। मठ यद्यपि धार्मिक आस्था के केन्द्र बने हुए थे किन्तु अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों का मानस इनसे विरक्त होने लगा था। लोकतन्त्र की स्थापना और नवीन शिक्षा प्रणाली ने ऐसे संस्थानों को पिछड़ा, दकियानूस, अवैज्ञानिक तथा धार्मिक गतिविधि का केन्द्र माना। परिणामस्वरुप ऐसे संस्थान रुढ़िवादी होते गए।

फणीश्वर नाथ रेणु का उपन्यास ‘मैला आंचल

 

फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आंचल में मेरीगंज गाँव में जो मठ है उस मठ की दिनचर्या कर्मकांडों में उलझ कर रह गयी है। यहाँ सत्संग का समय निश्चित हैं और इसमें भाग लेना अनिवार्य है। “प्रातकी और बीजक में कोई सम्मिलित हो या नहीं, सत्संग में भाग लेना अनिवार्य है। मठ का भंडारी इसी समय रोज की हाजिरी लेता है। इस समय जो अनुपस्थित रहे उसकी ‘चिप्पी (राशन) बंद हो जाती है। सत्संग में महंथ साहब साधुओं और शिष्यों को उपदेश देते हैं, प्रश्नों के उत्तर देते हैं, अज्ञान अन्धकार को अपनी वाणी से दूर करते हैं।”[14] सत्संग समाप्त होने के बाद ‘हाजिरी के समय जो बक-झक होता है, वह ‘सत्संग से प्राप्त की हुई मन की पवित्रता नष्टकर देता है।

फणीश्वर नाथ रेणु

मेरीगंज के इस मठ के विषय में रेणु लिखते हैं- “महंथ सेवा दास इस इलाके के ग्यानी साधु समझे जाते थे – सभी सास्तर-पुरान के पंडित! मठ पर आकर लोग भूख-प्यास भूल जाते थे। बड़ी पवित्र जगह समझी जाती थी। लेकिन जब महंथ दासिन को लाया
, लोगों की राय बदल गयी। बसुमतिया मठ के महंथ से इसी दासिन को लेकर कितने लड़ाई-झगड़े और मुकदमे हुए। बसुमतिया का महंथ कहता था, लछमी दासिन का बाप हमारा गुरु-भाई था इसलिए बाप के मरने के बाद उसपर मेरा हक़ है। सेवादास की दलील थी, लछमी पर हमारा अधिकार है। अंत में लछमी कानूनन सेवादास की ही हुई।”[15] यहाँ लछमी दासिन बनकर रहने को विवश होती है और स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि “अब तो महंथ सेवादास को बहुत लोग प्रणाम बंदगी भी नहीं करते। .... धर्म भ्रष्ट हो गया है। बगुला भगत है। ब्रह्मचारी नहीं, व्यभिचारी है।”[16]

मैला आंचल में वर्णित मठ में व्यभिचार तो सामान्य बात है। महंथ साहेब की मृत्यु भी इसी व्यभिचार प्रकरण में होती है। महंथ की मृत्यु के बाद लरसिंघदास नया महंत बनते हैं। नयी नियुक्ति भी उसी प्रथा को बढाने वाली है। “लछमी ने लरसिंघदास की आँखों में न जाने क्या देखा है कि उसकी छाया से भी बचकर चलती है, रात में किवाड़ मजबूती से बंद करके सोती है। किवाड़ की छिटकनी लगाने के बाद एक ओखल किवाड़ में सटा देती है। .... लरसिंघदास को शायद बहुमूत्र की बीमारी है; रात-भर में दस-ग्यारह बार पेशाब करने के लिए उठता है।”[17] लरसिंघदास महंथ बनने के लिए छल छद्म करता है लेकिन गाँव के लोगों के उग्र रूप को देखते हुए रामदास को नया महंथ नियुक्त किया जाता है। रामदास की कुदृष्टि लछमी पर है। दुराचार करने के प्रयास में लछमी के आघात से रामदास भी घायल हो जाता है। बाद में बालदेव मठ में लछमी का भोग करने लगते हैं।

मठ में जातिवाद भी चरम पर है। मठ पर भंडारा आयोजन में सभी जातियां अलग अलग खाना पकाने के लिए राशन की मांग करती हैं। “सिपैहिया टोला के लोग भी नहीं खायेंगे। हिबरनसिंघ का बेटा आकर कह गया है, ग्वाला लोगों के साथ एक पंगत में नहीं खायेंगे। हमलोगों के गाँव का आटा-घी-चीनी अलग दे दिया जाए। हम लोग अलग बनवा लेंगे।”[18] गाँव का मठ राजनीति का अड्डा बन गया है। यहाँ महंथ के चुनाव में हिंसा सामान्य बात हो गयी है। कहने का आशय यह है कि मेरीगंज का मठ किसी भी नवाचार के स्थान पर व्यभिचार, भाई-भतीजावाद, जातिवाद के पोषक अड्डे की तरह काम कर रहा है। यहाँ महंथ से लेकर सेवक तक, सबकी दृष्टि भोग पर है।

मेरीगंज का मठ एक कबीरपंथी मठ है। कबीर दास ने जीवन में शुचिता और पवित्रता तथा त्याग को बहुत महत्त्व दिया था किन्तु उनके नाम और उपदेश आधारित मठ में भोग विलास और दुराचार आम बात है। बालदेव, जो गांधीवादी है, वह मठ का प्रमुख बनता है तो लछमी के साथ तो रहता ही है, वह लछमी पर शक भी करता है। आशय यह है कि मैला आँचल में वर्णित मठ उद्देश्यविहीन, दुराचार का अड्डा और सांसारिक कीचड में लिथड़ा हुआ है।

     उपसंहार-

       बंगला और हिंदी में लगभग सात दशक के अंतराल पर लिखे गए दो उपन्यासों में मठ और संन्यासी की भूमिकाओं और स्थितियों को देखकर यह सहज ज्ञात हो जाता है कि अंग्रेजी शासन काल में मठों की दशा में उल्लेखनीय गिरावट आई। इसमें एक बड़ा कारण शिक्षा में अंग्रेजी का प्रभुत्वशाली होना था। अंग्रेजों ने भारतीय ज्ञान विज्ञान और शास्त्रों की मनमानी व्याख्या की और अपने शासन तथा तंत्र के माध्यम से इसका खूब प्रचार किया। परिणाम यह हुआ कि मठ तथा गुरुकुल उद्देश्यहीन हो गए। राज्याश्रय न मिलने से और सरकारी संरक्षण खोकर मठों ने अपनी उपादेयता भी समाप्त कर ली। अठारवीं सदी में आनंद मठ जैसे मठ और संतान सेना सरीखे संन्यासी; लोगों को संगठित कर यवन सेना और अंग्रेजी सेना को परास्त कर अपना शासन स्थापित करने में सक्षम थे किन्तु स्वाधीनता प्राप्ति के काल तक मेरीगंज के कबीर मठ व्यभिचार और सत्ताभोग के केन्द्र बन गए थे। वर्तमान समय में केन्द्रीय शासन ने फिर से मठों और आश्रमों को अपने शासन प्रणाली में शामिल करने का उपक्रम किया है और यह देखने लायक होगा कि क्या फिर से मठ और संन्यासी ज्ञान-विज्ञान और अनुसन्धान के केन्द्र बन सकेंगे?

-   डॉ रमाकान्त राय

अध्यक्ष, हिंदी विभाग

पंचायत राज राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय

इटावा, उत्तर प्रदेश

211006

ramakantroy@Zohomail.com

 

 

सन्दर्भ सूची-



[1] मुक्तिबोध, गजानन माधव, अंधेरे में, प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, राजकमल पेपरबैक्स, 1984 पृष्ठ-161

[2] चटर्जी, बंकिम चन्द्र, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पुनर्संस्करण- 2022, पृष्ठ-29

[3] सुन्दरलाल, भारत में अंग्रेजी राज, प्रथम खण्ड, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, पंचम संस्करण-2016, पृष्ठ- 315

[4] राजस्वी, एम०आई०, आनन्द मठ: संन्यासियों का संयुक्त विकल्प, दो शब्द, आनंदमठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पृष्ठ-5

[5] अंतिम कवर पृष्ठ, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली

[6] चटर्जी, बंकिम चन्द्र, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पृष्ठ-17

[7] चटर्जी, बंकिम चन्द्र, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पृष्ठ-24-25

[8] चटर्जी, बंकिम चन्द्र, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पृष्ठ-75

[9] चटर्जी, बंकिम चन्द्र, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पृष्ठ-75

[10] चटर्जी, बंकिम चन्द्र, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पृष्ठ-85

[11] चटर्जी, बंकिम चन्द्र, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पृष्ठ-85

[12] चटर्जी, बंकिम चन्द्र, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पृष्ठ-84

[13] चटर्जी, बंकिम चन्द्र, आनंद मठ, फिंगरप्रिंट हिंदी, नयी दिल्ली, पृष्ठ-87

[14] रेणु, फणीश्वर नाथ, मैला आंचल, रेणु रचनावली-2, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, तीसरा संस्करण-2007 पृष्ठ-36

[15] रेणु, फणीश्वर नाथ, मैला आंचल, रेणु रचनावली-2, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-39

[16] रेणु, फणीश्वर नाथ, मैला आंचल, रेणु रचनावली-2, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-39

[17] रेणु, फणीश्वर नाथ, मैला आंचल, रेणु रचनावली-2, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-73

[18] रेणु, फणीश्वर नाथ, मैला आंचल, रेणु रचनावली-2, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-40

बुधवार, 16 जुलाई 2025

प्रेमचंद की कहानी “जिहाद”

जिहाद


बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफिला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाती थी। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे। पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहां से आकर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशन कर देने का सबाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएं लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा। और सारी जनता यह आवाज सुनकर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिंदुओं पर, जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियां दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं, बिखरे हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिल्कुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पांव फूले हुए हैं, कितने तो अपनी जमा-जगह छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आंधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिला भी उन्हीं भागने वालों में था।

प्रेमचंद 


दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था। यहां तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छांह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआं नजर आया। वहीं डेरे डाल दिये। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो। दो युवकों ने बंदूक भरकर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियां बालकों को गोद से उतारकर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को संभालने लगीं। सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे। सभी चिंता और भय से त्रस्त हो रहे थे, यहां तक कि बच्चे जोर से न रोते थे। दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है। उसकी आंखों से अभिमान की रेखाएं-सी निकल रही हैं, मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं। दूसरा कद का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है, मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भांति रो-रोकर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है। उसका नाम धर्मदास है; इसका खजानचंद। धर्मदास ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा-तुमने अपने लिए क्या सोचा? कोई लाख-सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी?

खजानचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया-लाख-सवा लाख की तो नहीं, हां, पचास-साठ हजार तो नकद ही थे।

 ”तो अब क्या करोगे ?”

“जो कुछ सिर पर आयेगा, झेलूंगा! रावलपिंडी में दो-चार संबंधी हैं, शायद कुछ मदद करें। तुमने क्या सोचा है?”

“मुझे क्या गम! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं। वहां इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।” “आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं। मैं तो मना रहा हूं कि एकाध शिकार मिल जाय। एक दर्जन भी आ जाएं तो भूनकर रख दूं।”

इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिये निकली और सामने कुएं की ओर चली। प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी। दोनों युवक उसकी ओर बढ़े, लेकिन खजानचंद तो दो-चार कदम चल कर रुक गया, धर्मदास ने युवती के हाथ से लोटा-डोर ले लिया और खजानचंद की ओर सगर्व नेत्रों से ताकता हुआ कुएं की ओर चला। खजानचंद ने फिर बंदूक संभाली और अपनी झेंप मिटाने के लिए आकाश की ओर ताकने लगा। इसी तरह कितनी ही बार धर्मदास के हाथों वह पराजित हो चुका था। शायद उसे इसका अभ्यास हो गया था। अब इसमें लेशमात्र भी संदेह न था कि श्यामा का प्रेमपात्र धर्मदास है। खजानचंद की सारी सम्पत्ति धर्मदास के रूप-वैभव के आगे तुच्छ थी। परोक्ष ही नहीं, प्रत्यक्ष रूप से भी श्यामा कई बार खजानचंद को हताश कर चुकी थी; पर वह अभागा निराश होकर भी न जाने क्यों उस पर प्राण देता था। तीनों एक ही बस्ती के रहने वाले थे। श्यामा के माता-पिता पहले ही मर चुके थे। उसकी बुआ ने उसका पालन-पोषण किया था। अब भी वह बुआ ही के साथ रहती थी। उसकी अभिलाषा थी कि खजानचंद उसका दामाद हो, श्यामा सुख से रहे और उसे भी जीवन के अंतिम दिनों के लिए कुछ सहारा हो जाये; लेकिन श्यामा धर्मदास पर रीझी हुई थी। उसे क्या खबर थी कि जिस व्यक्ति को वह पैरों से ठुकरा रही है, वही उसका एकमात्र अवलम्ब है। खजानचंद ही वृद्धा का मुनीम, खजांची, कारिंदा सब कुछ था और यह जानते हुए भी कि श्यामा उसे जीवन में नहीं मिल सकती। उसके धन का यह उपयोग न होता, तो वह शायद अब तक उसे लुटाकर फकीर हो जाता।

धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिए। जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पांच आदमी हैं। उनकी बंदूक की नलियां धूप में साफ चमक रही थीं। धर्मदास पानी लिये हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिये वह बहुत तेज न दौड़ सकता था। फासला दो सौ गज से कम न था। रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे। भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं पैर न फिसल जाएं। इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे। अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या, उस पर मंजिलों का धावा हुआ। मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सिर पर आ पहुंचे और तुरंत उसे घेर लिया। धर्मदास बड़ा साहसी था; पर मृत्यु को सामने खड़ी देख कर उसकी आंखों में अंधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूटकर गिर पड़ी। पांचों उसी के गांव के महसूदी पठान थे। एक पठान ने कहा-उड़ा दो सिर मरदूद का। दगाबाज काफिर।

दूसरा-नहीं, नहीं, ठहरो। अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं। क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दगा की क्या सजा दी जाय? हमने तुम्हें रात-भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था। मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुंचा दिये जाओगे; लेकिन हम तुम्हें फिर मौका देते हैं। यह आखिरी मौका है। अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी। धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा-जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे …। पहले सवार ने आवेश में आकर कहा-मजहब को अक्ल से कोई वास्ता नहीं।

तीसरा-कुफ्र है! कुफ्र है!

पहला-उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआं इस पार।

दूसरा-ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहां हैं धर्मदास?

धर्मदास-सब मेरे साथ ही हैं।

दूसरा-कलामे शरीफ की कसम; अगर तुम सब खुदा और उनके रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा। धर्मदास-आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे?

इस पर चारों सवार चिल्ला उठे-नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौका है। इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला-बस बोलो, क्या मंजूर है?

धर्मदास सिर से पैर तक कांप कर बोला-अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूं तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी?

दूसरा-हां, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे। पहला-हम इस शर्त को नहीं मानते। तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे। तुम अपनी कहो। क्या चाहते हो? हां या नहीं? धर्मदास ने जहर का घूंट पीकर कहा-मैं खुदा पर ईमान लाता हूं। पांचों ने एक स्वर से कहा-अलहमद व लिल्लाह! और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया।

श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी। वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा? अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगी, तो मैं प्यासी मर जाती, पर इन्हें न जाने देती। श्यामा से कुछ दूर खजानचंद भी खड़ा था। श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा-अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती।

खजानचंद-बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है। श्यामा-न जाने क्या बातें हो रही हैं। अरे गजब! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है! खजानचंद-जरा और समीप आ जाएं, तो मैं बंदूक चलाऊ़। इतनी दूर की मार इसमें

नहीं है।

श्यामा-अरे! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं। यह माजरा क्या है?

खजानचंद-कुछ समझ में नहीं आता।

श्यामा-कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया? खजानचंद-नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है।

श्यामा-मैं समझ गयी। ठीक यही बात है। बंदूक चलाओ। खजानदान-धर्मदास बीच में हैं। कहीं उन्हें न लग जाय।

श्यामा-कोई हर्ज नहीं। मैं चाहती हूं, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े। कायर! निर्लज्ज! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया। ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है। क्या सोचते हो। क्या तुम्हारे भी हाथ-पांव फूल गये। लाओ, बंदूक मुझे दे दो। मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूंगी।

खजानचंद-मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास…

श्यामा-तुम्हें कभी विश्वास न आयेगा। लाओ, बंदूक मुझे दो। खडे़ क्या ताकते हो? क्या जब वे सिर पर आ जायंगे, तब बंदूक चलाओ? क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान होकर जान बचाओ? अच्छी बात है, जाओ। श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है; मगर उसे अब मुंह न दिखाना।

खजानचंद ने बंदूक चलायी। गोली एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी। जिहादियों ने “अल्लाहो अकबर!” की हांक लगायी। दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी। घोड़ा वहीं गिर पड़ा। जिहादियों ने फिर “अल्लाहो अकबर!” की सदा लगायी और आगे बढ़े। तीसरी गोली आयी। एक पठान लोट गया; पर इसके पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान खजानचंद के सिर पर पहुंच गये और बंदूक उसके हाथ से छीन ली। एक सवार ने खजानचंद की ओर बंदूक तानकर कहा-उड़ा दूं सिर मरदूद का, इससे खून का बदला लेना है।

दूसरे सवार ने, जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा-नहीं-नहीं, यह दिलेर आदमी है। खजानचंद, तुम्हारे ऊपर दगा, खून और कुफ्र, ये तीन इल्जाम हैं, और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाब है, लेकिन हम तुम्हें एक मौका और देते हैं। अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ, तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं। इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा (प्रायश्चित्त) नहीं है। यह हमारा आखिरी फैसला है। बोलो, क्या मंजूर है?

चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाल लीं, और उन्हें खजानचंद के सिर पर तान दिया मानो “नहीं” का शब्द मुंह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जाएंगी !

खजानचंद का मुखमंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा। उसकी दोनों आंखें स्वर्गिक ज्योति से चमकने लगीं। दृढ़ता से बोला-तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहे हो? क्या तुम समझते हो कि जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा? हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुंचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं! चारों पठानों ने कहा-काफिर! काफिर! खजानचंद-अगर तुम मुझे काफिर समझते हो तो समझो। मैं अपने को तुमसे ज्यादा खुदापरस्त समझता हूं। मैं उस धर्म को मानता हूं, जिसकी बुनियाद अक्ल पर है। आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर (प्रकाश) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल…

चारों पठानों के मुंह से निकला “काफिर! काफिर!” और चारों तलवारें एक साथ खजानचंद की गर्दन पर गिर पड़ीं। लाश जमीन पर फड़कने लगी। धर्मदास सिर झुकाये खड़ा रहा। वह दिल में खुश था कि अब खजानचंद की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा; पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। श्यामा अब तक मर्माहत-सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी। ज्यों ही खजानचंद की लाश जमीन पर गिरी, वह झपटकर लाश के पास आयी और उसे गोद में लेकर आंचल से रक्त-प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी। उसके सारे कपड़े खून से तर हो गये। उसने बड़ी सुंदर बेल -बूटोंवाली साडि़यां पहनी होंगी, पर इस रक्त-रंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी। बेल-बूटों वाली साडि़यां रूप की शोभा बढ़ाती थीं, यह रक्त-रंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी।

ऐसा जान पड़ा मानो खजानचंद की बुझती आंखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गयी हैं। उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी। जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पायी, वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था।

धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़कर कहा-श्यामा, होश में आओ, तुम्हारे सारे कपड़े खून से तर हो गये हैं। अब रोने से क्या हासिल होगा? ये लोग हमारे मित्र हैं, हमें कोई कष्ट न देंगे। हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे?

श्यामा ने तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देखकर कहा-तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ। मेरी चिंता मत करो, मैं अब न जाऊंगी। हां, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो तो इन लोगों से इन्हीं तलवारों से मेरा भी अंत करा दो।

धर्मदास करुण-कातर स्वर से बोला-श्यामा, यह तुम क्या कहती हो, तुम भूल गयीं कि हमारी-तुम्हारी क्या बातें हुई थीं? मुझे खुद खजानचंद के मारे जाने का शोक है; पर भावी को कौन टाल सकता है?

श्यामा-अगर यह भावी था, तो यह भी भावी है कि मैं अपना अधम जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूं, जिसका मैंने सदैव निरादर किया। यह कहते-कहते श्यामा का शोकोद्गार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था, उबल पड़ा और वह खजानचंद के निस्पंद हाथों को अपने गले में डाल कर रोने लगी।

चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्म-समर्पण देख कर करुणार्द्र हो गये। सरदार ने धर्मदास से कहा-तुम इस पाकीजा खातून से कहो, हमारे साथ चले। हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी। हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे।

धर्मदास के हृदय में ईर्ष्या की आग धधक रही थी। वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था, इस वक्त उसका मुंह भी नहीं देखना चाहती थी। बोला-श्यामा, तुम चाहो इस लाश पर आंसुओं की नदी बहा दो, पर यह जिंदा न होगी। यहां से चलने की तैयारी करो। मैं साथ के और लोगों को भी जाकर समझाता हूं। खान लोेग हमारी रक्षा करने का जिम्मा ले रहे हैं। हमारी जायदाद, जमीन, दौलत सब हमको मिल जायगी। खजानचंद की दौलत के भी हमीं मालिक होंगे। अब देर न करो। रोने-धोने से अब कुछ हासिल नहीं।

श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देख कर कहा-और इस वापसी की कीमत क्या देनी होगी? वही जो तुमने दी है?

धर्मदास यह व्यंग्य न समझ सका। बोला-मैंने तो कोई कीमत नहीं दी। मेरे पास था ही क्या?

श्यामा-ऐसा न कहो। तुम्हारे पास वह खजाना था, जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए ऋषियों ने प्रदान किया था। जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवाजी और गोविंद सिंह ने की थी। उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया। इन पांवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो! तुम शौक से जाओ। जिन तलवारों ने वीर खजानचंद के जीवन का अंत किया, उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया। जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया, इसके साथ जो उदासीनता दिखायी, उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित्त करूंगी। यह धर्म पर मरने वाला वीर था, धर्म को बेचने वाला कायर नहीं! अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है, तो इसका क्रिया-कर्म करने में मेरी मदद करो और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो, तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूंगी।

पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे। धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया। देखते-देखते वहां लकडि़यों का ढेर लग गया। धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाये बैठा था और चारों पठान लकडि़यां काट रहे थे। चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने खजानचंद की जान ली थी उन्हीं ने उसके शव को चिता पर रखा। ज्वाला प्रचंड हुई। अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे।

पठानों ने खजांचंद की सारी जंगम सम्पत्ति ला कर श्यामा को दे दी। श्यामा ने वहीं पर एक छोटा-सा मकान बनवाया और वीर खजानचंद की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी। उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गयी, और सब लोग पठानों के साथ लौट गये, क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी। खजानचंद के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया। मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया। एक दिन नियत किया गया। मस्जिद में मुल्लाओं का मेला लगा और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आये; पर उसका वहां पता न था। चारों तरफ तलाश हुई। कहीं निशान न मिला।

साल-भर गुजर गया। संध्या का समय था। श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी। अतीत उसके लिए दु:ख से भरा हुआ था। वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था। सारी अभिलाषाएं भविष्य पर अवलम्बित थीं। और भविष्य भी वह, जिसका इस जीवन से कोई संबंध न था! आकाश पर लालिमा छायी हुई थी। सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी। वृक्षों की कांपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज निकल रही थी, मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियां भर रही हो।


उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोंपड़ी के सामने खड़ा हो गया। कुत्ता जोर से भूंक उठा। श्यामा ने चौंक कर देखा और चिल्ला उठी-धर्मदास !

धर्मदास ने वहीं जमीन पर बैठते हुए कहा-हां श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूं। साल-भर से मारा-मारा फिर रहा हूं। मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है। सारा प्रांत मेरे पीछे पड़ा हुआ है। इस जीवन से अब ऊब उठा हूं; पर मौत भी नहीं आती। धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया। फिर बोला-क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ नहीं हुआ! तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया!

श्यामा ने उदासीन भाव से कहा-मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी।

“मैं अब भी हिंदू हूं। मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।”

“जानती हूं!”

“यह जानकर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती!”

श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली-“तुम्हें अपने मुंह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती! मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूं, जिसने हिंदू-जाति का मुख उज्ज्वल किया है। तुम समझते हो कि वह मर गया! यह तुम्हारा भ्रम है। वह अमर है। मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूं। तुमने हिंदू-जाति को कलंकित किया है। मेरे सामने से दूर हो जाओ।”

धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया! चुपके से उठा, एक लम्बी सांस ली और एक तरफ चल दिया। प्रात:काल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी। दो-चार गिद्ध उस पर मंडरा रहे थे। उसका हृदय धड़कने लगा। समीप जाकर देखा और पहचान गयी। यह धर्मदास की लाश थी।



मंगलवार, 15 जुलाई 2025

एक आदर्श प्राथमिक विद्यालय के लिए आवश्यक संसाधन

एक प्राथमिक विद्यालय के लिए यह सब व्यवस्था हो -


1. कम से कम 18 कक्ष वाला विद्यालय। 12 कक्ष डेस्क और बेंच से युक्त ताकि हर कक्षा के लिए दो/तीन सेक्शन (वर्ग) बनाया जा सके।इसमें एक कक्ष प्रधानाध्यापक का, एक अध्यापकों का। एक स्टोर रूम। एक क्रीड़ा कक्ष। एक कंप्यूटर कक्ष और एक कार्यालय।


2. प्रधानाध्यापक को मिलाकर 15 अध्यापक। भाषा- 4, गणित- 3, विज्ञान- 3 और सामाजिकी - 2 कला 1, खेल 1 के लिए अलग अलग अध्यापक।


3. एक कार्यालय अधीक्षक, एक चपरासी, एक सफाई कर्मी, तीन रसोइया।


4. खेल/असेंबली के लिए एक बीघा जमीन।


5. चार शौचालय। अध्यापकों के लिए पृथक शौचालय।


6. पेय जल की समुचित व्यवस्था।

7. अबाध बिजली व्यवस्था।


8. दो सुरक्षाकर्मी जो गेट पर रहें।


9. समय पर गणवेश, पुस्तकें, स्टेशनरी आदि की आपूर्ति और


10. विद्यालय तक पहुंच का पक्का संपर्क मार्ग।


यह सुविधा संसाधन एक प्राथमिक विद्यालय को दीजिए। साथ ही प्रधान और शासन का अनावश्यक हस्तक्षेप बंद करें। फिर देखिए, गांव गांव में शिक्षा की कैसी ज्योति जलती है और कैसे बालक निखरते हैं। कौन नहीं चाहेगा परिषदीय विद्यालय में पढ़ाना। प्रवेश और मासिक फीस लगा दीजिए और बाद में उसकी प्रतिपूर्ति कर दीजिए।

#EducationForAll

सद्य: आलोकित!

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty)

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। इसका उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली की...

आपने जब देखा, तब की संख्या.