सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty)
भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। इसका उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली की 6 प्रमुख नदियों — सिंधु, वितस्ता, अश्किनी या चंद्रभागा, शतद्रु, इरावती और विपासा — के जल के न्यायसंगत और शांतिपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना था।
1. पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, वितस्ता, चंद्रभागा या अश्किनी) – इनका अधिकार मुख्य रूप से पाकिस्तान को दिया गया, लेकिन भारत को सीमित गैर-उपभोगी उपयोग (जैसे सिंचाई, विद्युत उत्पादन) की अनुमति है।
2. पूर्वी नदियाँ (इरावती, विपासा, शतद्रु) – इनका पूरा उपयोग भारत को सौंपा गया।
संधि के अंतर्गत एक स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission) की स्थापना की गई है, जो जल साझा करने, आंकड़ों का आदान-प्रदान और विवाद निवारण का कार्य करता है।
⚔️ क्या भारत इसे एकतरफा रद्द कर सकता है?
अंतरराष्ट्रीय कानून (विशेषतः वियना संधि संनियम, 1969) के अनुसार,
➡️ कोई भी देश द्विपक्षीय संधि को एकतरफा रद्द नहीं कर सकता, जब तक उस संधि में ऐसा प्रावधान न हो या दोनों पक्ष सहमत न हों।
➡️ सिंधु जल समझौते में एकतरफा समाप्ति का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
यदि भारत ऐसा करता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जाएगा, और विवाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहुँच सकता है।
विश्व बैंक की भूमिका
▪️यह समझौता विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ था और वह इसका गारंटर (guarantor) है।
▪️यदि भारत समझौते को रद्द करता है या उल्लंघन करता है, तो विश्व बैंक को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।
राजनीतिक और कूटनीतिक परिणाम
▪️भारत का ऐसा कोई कदम पाकिस्तान के साथ तनाव को बढ़ा सकता है।
▪️अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की छवि को नुकसान पहुँच सकता है।
▪️भारत ने 2016 (उड़ी हमले के बाद) जैसे अवसरों पर समझौते की समीक्षा की बात जरूर की, लेकिन कभी इसे रद्द करने का निर्णय नहीं लिया।
तकनीकी दृष्टि से भारत क्या कर सकता है?
▪️भारत पहले ही पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) का पूरा उपयोग कर रहा है।
▪️पश्चिमी नदियों पर भारत के पास सीमित अधिकार हैं, लेकिन किशनगंगा और रतले जैसे परियोजनाओं द्वारा जल प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है।
🇵🇰 पाकिस्तान के पास क्या विकल्प हैं?
1. कूटनीतिक विरोध
पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और अन्य मंचों पर शिकायत दर्ज कर सकता है।
भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने का प्रयास कर सकता है।
2. कानूनी रास्ता
समझौते में दिए गए प्रावधानों के तहत वह तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) या मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) से विवाद सुलझाने की मांग कर सकता है।
पूर्व में किशनगंगा और रतले विवाद इसी प्रक्रिया से सुलझाए गए थे।
ICJ (अंतरराष्ट्रीय न्यायालय) में भी जा सकता है, पर यह जटिल और लंबी प्रक्रिया होगी।
3. आंतरिक उपाय
पाकिस्तान अपनी जल प्रबंधन प्रणाली को सुधार सकता है – जैसे नए बांध (डायमर-भाषा) बनाना, वर्षा जल संचयन, भूजल का बेहतर उपयोग आदि।
4. सैन्य या अस्थिरता फैलाने की कोशिश
यह विकल्प खतरे से खाली नहीं, लेकिन किसी भी प्रकार की सीमा पर उथल-पुथल को नकारा नहीं जा सकता।
5. दोस्त देशों का सहयोग
पाकिस्तान चीन, सऊदी अरब जैसे सहयोगी देशों से समर्थन मांग सकता है।
चीन, जो सिंधु की सहायक नदियों पर खुद बांध बना रहा है, इस मामले में पाकिस्तान का साथ दे सकता है — यह भारत के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकता है।
सिंधु जल समझौता अब तक भारत-पाक संबंधों में एक स्थिर स्तंभ रहा है, जो युद्धों के समय भी नहीं टूटा।
हालाँकि भारत के पास इस पर पुनर्विचार या समीक्षा का अधिकार है

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