शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

भारतेंदु हरिश्चंद्र के मातृभाषा पर दोहे शब्दार्थ और भावार्थ सहित

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मातृभाषा के दोहे में अपनी भाषा के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण विचार दोहा छंद में रखा है। उनका स्पष्ट मानना है कि किसी भी तरह की उन्नति में भाषा का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। वह भाषा  के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान के प्रसार की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं। सरल और स्पष्ट तरीके से भारतेंदु हरिश्चंद्र ने विकास का सूत्र दिया है।

यहां भारतेंदु हरिश्चंद्र के मातृभाषा पर दोहे का सरल भावार्थ और उसके बाद कठिन शब्दार्थ अलग-अलग दिए हैं।


1. 

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।


सरल अर्थ


अपनी भाषा की उन्नति ही सभी प्रकार की उन्नति का मूल आधार है। जब तक व्यक्ति को अपनी मातृभाषा का सही ज्ञान नहीं होगा, तब तक उसके मन की पीड़ा, हीनता या बेचैनी दूर नहीं हो सकती। भारतेंदु कहना चाहते हैं कि भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और मानसिक विकास का आधार भी है।


कठिन शब्दार्थ


निज — अपनी

भाषा — अपनी मातृभाषा/अपनी भाषा

उन्नति — विकास, प्रगति

अहै — है

मूल — आधार, जड़

हिय — हृदय, मन

सूल — पीड़ा, कष्ट, चुभन


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2. 

अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।

पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।


सरल अर्थ


अंग्रेज़ी पढ़कर भले ही मनुष्य अनेक गुणों और विषयों में निपुण हो जाए, लेकिन अपनी भाषा का ज्ञान न होने पर वह वास्तव में हीन ही बना रहता है। अर्थात् विदेशी भाषा का ज्ञान उपयोगी है, लेकिन अपनी भाषा के ज्ञान की कीमत पर नहीं।


कठिन शब्दार्थ

पढ़ि के — पढ़कर

जदपि — यद्यपि, हालांकि

गुन — गुण, योग्यताएँ

प्रवीन — निपुण, कुशल

पै — लेकिन, परंतु

ज्ञान — जानकारी, समझ

हीन — कमतर, वंचित


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3. 

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय।

निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।


सरल अर्थ


वास्तविक और पूर्ण उन्नति तभी मानी जा सकती है, जब घर-परिवार और समाज की भी उन्नति हो। केवल अपने शरीर अथवा अपने व्यक्तिगत विकास को उन्नति मानना मूर्खता है। यहाँ कवि व्यक्तिगत उन्नति के बजाय सामूहिक उन्नति पर बल देते हैं। सबकी उन्नति हो असली उन्नति है।


कठिन शब्दार्थ


पूरी — सम्पूर्ण

तबहिं — तभी

घर — परिवार; व्यापक अर्थ में अपना समाज

शरीर — स्वयं/व्यक्तिगत अस्तित्व

मूढ़ — अज्ञानी, नासमझ

सब कोय — सभी लोग

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4. 

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय।

लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।।


सरल अर्थ


अपनी भाषा की उन्नति के बिना वास्तविक उन्नति कभी नहीं हो सकती। कोई व्यक्ति चाहे कितने ही उपाय क्यों न कर ले, अपनी भाषा के विकास के बिना उसकी उन्नति अधूरी ही रहेगी।


कठिन शब्दार्थ


उन्नति — विकास, प्रगति

बिना — के अभाव में

कबहुँ — कभी

ह्यैहैं — होगी/हो पाएगी

सोय — वही/वास्तविक उन्नति

लाख — बहुत अधिक, असंख्य

उपाय — साधन, तरीके

अनेक — बहुत से

यों — इस प्रकार

भले — चाहे कितने ही

करो किन — क्यों न करो

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5.

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।

तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।


सरल अर्थ


जब एक परिवार या समाज के लोग एक भाषा और एक विचारधारा से जुड़े होते हैं, तब उनमें एकता और सामंजस्य पैदा होता है। इससे अज्ञानता और दुख दूर होते हैं और सभी के साथ मिलकर विकास संभव होता है। यहाँ ‘एक भाषा’ का अर्थ केवल एक ही भाषा बोलना नहीं, बल्कि भाषा के माध्यम से आपसी एकता और विचारों की समानता से है।


कठिन शब्दार्थ


जीव — प्राण/जीवन; यहाँ एकता का भाव

मति — बुद्धि, विचार

सब घर के लोग — परिवार/समाज के सभी लोग

तबै — तभी

बनत — बनता है

सबन सों — सबके साथ

मूढ़ता — अज्ञानता

सोग — शोक, दुःख


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6. 

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।

निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।


सरल अर्थ


अपनी भाषा में शिक्षा और ज्ञान की बातें करने का एक बहुत बड़ा लाभ यह है कि उसका लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यदि ज्ञान-विज्ञान और शिक्षा अपनी भाषा में दी जाए, तो वह लोगों तक अधिक सहजता से पहुँच सकती है।


कठिन शब्दार्थ


अति — बहुत अधिक

या में — इसमें

प्रगट — स्पष्ट, प्रत्यक्ष

लखात — दिखाई देता है

विद्या — ज्ञान, शिक्षा

बात — विषय, ज्ञान की बात


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7. 

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।

यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।।


सरल अर्थ


अपनी भाषा में कही गई ज्ञान की बात को जो भी व्यक्ति सुनता है, वह उसका लाभ उठा सकता है। अपनी भाषा की यही विशेषता है कि वह ज्ञान को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाती है। अन्य भाषाओं में यह गुण हमेशा नहीं पाया जाता।


कठिन शब्दार्थ


तेहि — उसे/उससे

सुनि — सुनकर

पावै — प्राप्त करता है 

और महं — दूसरी भाषाओं में

होय — होता


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8. 

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।


सरल अर्थ


विभिन्न प्रकार की कलाओं, शिक्षाओं और अनेक प्रकार के ज्ञान को दूसरे सभी देशों से प्राप्त करना चाहिए और फिर उसका अपनी भाषा में प्रचार-प्रसार करना चाहिए। भारतेंदु यहाँ विदेशी ज्ञान का विरोध नहीं, बल्कि उसे अपनी भाषा में उपलब्ध कराने की बात कर रहे हैं।


कठिन शब्दार्थ


कला — कलाएँ, कौशल

शिक्षा — अध्ययन/ज्ञान

अमित — असीम, बहुत अधिक

देसन — देशों

लै करहू — लेकर करो

भाषा माहि — भाषा में

प्रचार — प्रसार, फैलाव




9. 

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।

विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।


सरल अर्थ


भारत में लोगों के बीच बहुत अधिक विविधता और भिन्नता है, इसलिए अनेक प्रकार की समस्याएँ और संघर्ष उत्पन्न होते हैं। अलग-अलग देशों में भी अलग-अलग विचार, मत और भाषाएँ दिखाई देती हैं। यहाँ भारतेंदु भाषाई और सामाजिक विविधता के कारण उत्पन्न होने वाली दूरी की ओर संकेत करते हैं।


कठिन शब्दार्थ


भिन्न — अलग-अलग

अति — बहुत अधिक

ताहीं सों — उसी कारण से

उत्पात — उपद्रव, अशांति, समस्याएँ

मत — विचार, मत

मतहू — मत भी/विचार भी

लखात — दिखाई देते हैं


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10. 

सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।

उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।


सरल अर्थ


हे भाइयों! आप सभी मिलकर दूसरे उपायों को छोड़कर अपनी भाषा की उन्नति के लिए प्रयास करें। भाषा का विकास सामूहिक प्रयास से ही संभव है। यह दोहा पूरे विचार का आह्वान और निष्कर्ष है—अपनी भाषा के विकास के लिए समाज के सभी लोगों को मिलकर काम करना चाहिए।


कठिन शब्दार्थ


तासों — उससे/उनसे

छाँड़ि कै — छोड़कर

दूजे — दूसरे

उपाय — साधन, तरीके

उन्नति — विकास

करहु — करो

अहो — हे!

भ्रातगन — हे भाइयों/बंधुओं

आय — आकर





इन दोहों को एक साथ पढ़ने पर भारतेंदु का भाषा-दर्शन लगभग इस क्रम में सामने आता है— अपनी भाषा से ही ज्ञान मिलता है । इससे आत्मसम्मान की भावना विकसित होती है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने से सामाजिक एकता आती है जो सामूहिक उन्नति का कारक है और इससे ही राष्ट्र की प्रगति सुनिश्चित होती है।


भारतेंदु का मूल आग्रह यह नहीं है कि अंग्रेज़ी या विदेशी भाषाओं को छोड़ दिया जाए, बल्कि यह है कि दूसरे देशों से प्राप्त ज्ञान-विज्ञान, कला और शिक्षा को अपनी भाषा में लाकर समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जाए। विशेष रूप से छठे, सातवें और आठवें दोहे में यह विचार बहुत स्पष्ट है कि ज्ञान तभी व्यापक सामाजिक शक्ति बनता है, जब वह जनता की अपनी भाषा में उपलब्ध हो।


भारतेंदु हरिश्चंद्र का संदेश स्पष्ट है - विदेशी ज्ञान ग्रहण करने में बुराई नहीं है, लेकिन उसे अपनी भाषा में समाज तक पहुँचाओ —क्योंकि अपनी भाषा की उन्नति ही व्यापक सामाजिक उन्नति का आधार है। भाषा को लेकर उनके विचार भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है निबंध में भी दिखाई पड़ते हैं।

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सद्य: आलोकित!

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