शनिवार, 12 सितंबर 2026

हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा : विविध आयाम - जिलाधिकारी श्री शुभ्रांत कुमार शुक्ल का व्याख्यान



'हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा : विविध आयाम' विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी इस महाविद्यालय में रखी गई है। जो भी इसके आयोजक गण हैं उनको ढेर सारी बधाइयां। हमारे जो प्रिंसिपल साहब हैं, प्रोफेसर श्यामपाल सिंह जी और जो हिंदुस्तानी एकेडमी है, दोनों लोग मिलकर इसको आज आयोजित किए हैं, आपको ढेर सारी शुभकामनाएं और बधाई। आज के इस कार्यक्रम में यहाँ पर उपस्थित हमारे प्रिंसिपल साहब और जो बाहर से आए हुए गेस्ट स्पीकर्स हैं—प्रोफेसर संजीव दुबे साहब, प्रो गौरव तिवारी साहब, अन्य जो डिस्टिंग्विश्ड एकेडेमिशियंस हैं, प्राचार्य गण हैं, आचार्य गण हैं, प्रोफेसर्स हैं, आयोजन सचिव डॉ रमाकान्त राय जी, और सभी यहाँ पर उपस्थित स्टूडेंट्स। बहुत ही अच्छा विषय है और बहुत ही व्यापक विषय है, बहुत बड़ा विषय है। यह अपने आप में बहुत बड़ा सब्जेक्ट है, यूजी-पीजी और रिसर्च का सब विषय हो सकता है।

फिल्मों में मेरी कोई इस विषय में विशेषज्ञता भी नहीं है। लेकिन जैसा कि हम सभी जानते हैं, इंडिया की जो लाइफस्टाइल है उसमें फिल्म समाई हुई है। जैसे रोटी, कपड़ा और मकान हमारे जीवन में आवश्यक हैं, इसी तरह से यह सिनेमा भी हमारी लाइफ का एक हिस्सा है।

मैं थोड़ा बहुत अपना जो फिलॉसॉफिकल (दार्शनिक) अप्रोच है, वह यहाँ प्रस्तुत कर सकता हूँ। कंटेंट के मामले में बहुत ज्यादा मेरा शौक भी नहीं रहा है, तो बतौर प्रशासक (As an Administrator) मैं इसे विशेषकर भारतीय और हिंदी सिनेमा को किस रूप में देखता हूँ, उस पर थोड़ी बात करूँगा। आशा है कि इन दो दिनों में अच्छा डिस्कशन होगा और उसमें स्टूडेंट्स को भी जोड़ेंगे।

देखिए, इस तरह के राष्ट्रीय सेमिनार कराने का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि हमारे जो स्टूडेंट्स हैं, उनको किस तरह से हम अनुसंधान (Research) की तरफ मोड़ें, किस तरह से वे सेल्फ-लर्निंग मोड में जाएँ। वे आएँ, देखें कि यह जो टॉपिक है, इसकी कितनी शाखाएँ (Branches) निकल रही हैं—कोई इसे किस रूप में देखता है, कोई किसी और रूप में देखता है।

स्टूडेंट्स में इस स्तर पर 'डीप थिंकिंग' (गहन चिंतन) की एप्रोच विकसित होने की आवश्यकता है। जो एक बार इन चीजों को समझ लेता है, वह दिमाग में हमेशा बना रहता है। जब कभी कोई मुद्दा सामने आता है, तो व्यक्ति अलग-अलग दृष्टिकोणों (Different Perspectives) से सोचने लगता है। यहाँ जो अलग-अलग स्पीकर्स हैं, हो सकता है उनके विचार एक-दूसरे के विरोधी हों या एक-दूसरे को सपोर्ट करते हों। विचारों की यह विविधता ही सभी को एक बेहतरीन एक्सपोज़र देती है।

दार्शनिक रूप से मुझे ऐसा लगता है कि सिनेमा समाज के लिए दर्पण की तरह है। जैसा समाज में घटित होता है, वैसा ही हम सिनेमा में देखते हैं। जब डकैतों का दौर था, तो 'शोले' जैसी फ़िल्में बनीं। सिनेमा एक मिरर इमेज (प्रतिबिंब) है। साथ ही, बहुत सारा विरोध (Protest) जो पहले केवल लेखन से होता था, अब फ़िल्मों के माध्यम से भी लोग अपनी बात और विरोध दर्ज कराने लगे हैं।

फ़िल्म की जो खास बात है, वह यह है कि यह एक 'ग्रुप एक्टिविटी' (सामूहिक गतिविधि) है। इसमें बहुत सारे संसाधन (Resources) लगते हैं और कई तरह के कौशल शामिल होते हैं—डायलॉग, संगीत, तकनीक और एक बहुत बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर।

गांधी जी को जब अच्छी तरह से जानना होता है, तो 'गांधी' मूवी याद आती है और 2 अक्टूबर को उसका प्रसारण भी किया जाता है। फ़िल्मों के माध्यम से बायोग्राफी प्रस्तुत की जाती है और वैल्यू सिस्टम (मूल्य प्रणाली) को भी समाज में प्रमोट किया जाता है।

यह दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ जहाँ पुरानी संस्कृति को दिखाना, प्रमोट करना और संरक्षित करना है; वहीं दूसरी तरफ बाहरी संस्कृति का प्रदर्शन भी होता है, जिसको लेकर लोगों के मन में अलग-अलग विचार होते हैं। यह अपने आप में एक रहस्यमयी दुनिया है।

'नदिया के पार' जैसी फ़िल्म ने पूर्वांचल की संस्कृति को दर्शाया। वह फ़िल्म इतनी लोकप्रिय इसलिए हुई क्योंकि उसने मानवीय भावनाओं (Human Emotions) को सीधे स्पर्श किया।

आज की नई फ़िल्में यंगस्टर्स और नई पीढ़ी के लिए बन रही हैं। पुरानी पीढ़ी के लोग शायद आज की फ़िल्मों की तेज़ गति और उनकी स्लैंग भाषा को उतनी आसानी से नहीं समझ पाते, क्योंकि सिनेमा का दायरा बहुत व्यापक हो चुका है।

एक प्रशासक के तौर पर देखें, तो सिनेमा में व्यापार और विज्ञापन का बहुत बड़ा रोल है। यह रोजी-रोटी और रोजगार का साधन है। इस इंडस्ट्री में बहुत से लोगों के लिए करियर और जॉब के अवसर हैं। लोग अपने पैशन और शौक को पूरा करते हैं, पैसा भी कमाते हैं और जीवन-यापन करते हैं। इसके अलावा, इसमें इनोवेशन (नवाचार) का बहुत स्कोप है। लिखने वालों के लिए यह एक बड़ा मोटिवेशन है। कवियों और गीतकारों ने फ़िल्मों के लिए बहुत अच्छे-अच्छे गीत लिखे, जिससे उन्हें पहचान और प्रेरणा मिली।

तकनीक के दृष्टिकोण से देखें, तो मूक फिल्मों से शुरुआत होकर आज सिनेमा असीम संभावनाओं तक पहुँच गया है। बहुत सारे रिसर्च और डेवलपमेंट के बाद यह यहाँ तक विकसित हुआ है। आज इसका स्वरूप ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स और मोबाइल के रूप में हमारे सामने है। आज हम सिनेमा हॉल कम जा रहे हैं, लेकिन मोबाइल, टीवी और इंटरनेट के ज़रिए यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

फ़िल्ममेकर्स के पास अवसर है कि वे सकारात्मक विचार प्रमोट करें। हालाँकि कभी-कभी विवादित या विनाशकारी विचारों को लेकर सेंसर बोर्ड और रेगुलेटरी मैकेनिज्म काम करता है, फिर भी एक संवेदनशीलता हमेशा बनी रहती है।

फैशन, पहनावे और जीवनशैली में आने वाले बदलावों में भी सिनेमा का असर दिखता है। एक ज़माने में अमिताभ बच्चन का जो स्टाइल था, उसे पूरी पीढ़ी ने फॉलो किया।

मैं चाहूँगा कि हमारे स्टूडेंट्स भी इस पर शोध कार्य करें। आज हमारे देश और उच्च शिक्षा की यही ज़रूरत है। हमें उस पारंपरिक पेडागॉजी (शिक्षण पद्धति) को बदलना होगा जहाँ सिर्फ़ शिक्षक पढ़ाए और छात्र सिर्फ़ सवाल हल करे। हमें छात्रों को क्लास में प्रेजेंटेशन देने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, उन्हें नए असाइनमेंट्स देने चाहिए। मैंने भारत में भी पढ़ाई की है और यूरोप में भी। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली में नई चीज़ों को जोड़ना होगा और युवाओं को रिसर्च तथा नई खोजों के लिए तैयार करना होगा।

यह संगोष्ठी विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के लिए एक बेहतरीन अवसर है। आप सभी को इस आयोजन और अच्छे विचार-विमर्श के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं और धन्यवाद।


कोई टिप्पणी नहीं:

सद्य: आलोकित!

हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा : विविध आयाम - जिलाधिकारी श्री शुभ्रांत कुमार शुक्ल का व्याख्यान

'हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा : विविध आयाम' विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी इस महाविद्यालय में रखी गई है। जो भी इसके आयोजक गण हैं उन...

आपने जब देखा, तब की संख्या.