सुबह उठते ही विद्यालय की तैयारी में
लगे बच्चे के पास इतना समय भी नहीं होता कि वह भगवान जी के समक्ष एक अगरबत्ती
जलाकर खड़ा हो जाए। उसे "कराग्रे
वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥" श्लोक याद करा दो तो उसके पास समय नहीं
कि वह इसे दोहरा ले। वह इसके प्रभाव को कभी अनुभूत न कर सकेगा। उसके पास सूर्य
नमस्कार करने का समय नहीं है। व्यायाम करने का समय नहीं है। जो पाठ उसे सीखना है, उसे देखने का समय नहीं है। कोई खेल
खेलता है तो उसके अभ्यास का समय नहीं है।
बच्चा उठता है और जल्दी जल्दी
हॉर्लिक्स अथवा चौकोस मिला हुआ दूध पीता है। यही उसका नाश्ता है। पौने छह बजे
बच्चा खाए भी तो क्या? जल्दी
जल्दी उसका टिफिन रेडी होता है और वह लेकर विद्यालय चला जाता है। जिन बच्चों को खिलाने में मां, दादी नखरे उठाती हैं और संतान सुख
प्राप्त करती हैं, उन
बच्चों को एक डिब्बे में रोटी/परांठा ठूंस कर थमाकर भेज दिया जाता है। वह जाने
कैसे खाता है, जाने
कैसे भोजन मंत्र करता है, किसी
को नहीं पता!
इसलिए सुबह सुबह विद्यालय भेजने का यह
तरीका अपसंस्कृति का परिचायक है। यह ऐसी पीढ़ी का निर्माण कर रही है जिसने जीवन
जीने का सुसंस्कृत ढंग नहीं जाना।
मैं कहूंगा कि सुबह के शिफ्ट में 7:00-2:00 बजे तक के
विद्यालय की टाइमिंग बंद करो! बच्चों से उनका बचपन और सीखने का समय न छीनो।
और हाँ, कोचिंग बंद करो।
#schooleducation

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