सोमवार, 14 सितंबर 2026

आंसू खण्ड काव्य से!

जयशंकर प्रसाद विरचित आंसू खण्ड काव्य से यह अंश बी ए प्रथम सेमेस्टर के विद्यार्थियों की सुविधा के लिए यहाँ प्रस्तुत है. यह अंश जयशंकर प्रसाद की काव्यात्मक प्रतिभा और उनकी छायावादी वृत्ति का परिचय देता है.

जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति-सी छाई,
दुर्दिन में आंसू बनकर, वह आज बरसने आई।

अर्थ: कवि कहते हैं कि उनके भीतर जो दुःख और पीड़ा लंबे समय से जमा (घनीभूत) थी, वह उनके दिमाग में पुरानी यादों की तरह छाई हुई थी। आज जब जीवन में बुरे दिन (दुर्दिन) आए, तो वह अंदर दबी हुई पुरानी पीड़ा आँखों से आँसू के रूप में बहने लगी है।
इस करुणा-कलित हृदय में, अब विकल रागिनी बजती,
क्यों हाहाकार-स्वरों में, वेदना असीम गरजती?

अर्थ: इस करुणा और दुःख से भरे हुए दिल में अब सुख के गीत नहीं, बल्कि व्याकुलता और बेचैनी का संगीत (विकल रागिनी) बज रहा है। कवि पूछते हैं कि मेरे भीतर का यह असीमित दर्द आज चीख-पुकार और हाहाकार के रूप में क्यों उमड़ रहा है?
मानस-सागर के तट पर, क्यों लोल लहरियां उठतीं,
कललोल-विशृंखल करतीं, उपहास हमारा करतीं।

अर्थ: मेरे मन रूपी समुद्र के किनारे पर यादों की चंचल (लोल) लहरें उठ रही हैं। ये लहरें बेकाबू होकर इतनी तेज गूंज रही हैं कि ऐसा लगता है जैसे वे मेरी इस बेबसी और अकेलेपन का मजाक (उपहास) उड़ा रही हों।
आती है शून्य क्षितिज से, क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी,
अकलाई-सी गिरती है, इस विजन-गगन में मेरी।

अर्थ: इस अकेलेपन में जब मैं अपने प्रिय को पुकारता हूँ, तो उस खाली और शांत आसमान (शून्य क्षितिज) से मेरी ही आवाज टकराकर वापस आ जाती है। वह गूंज थकी और घबराई हुई सी मेरे ही एकांत आकाश में गिरकर खत्म हो जाती है।
शीतल ज्वाला जलती है, ईंधन होता दृग-जल का,
यह व्यर्थ सांस चल-चलकर, महकाता है मन मल का।

अर्थ: यहाँ कवि ने 'शीतल ज्वाला' (अलंकार) का प्रयोग किया है। विरह की आग बाहर से ठंडी दिखती है पर अंदर ही अंदर जलाती है। इस आग को भड़काने का काम आँखों के आँसू (दृग-जल) कर रहे हैं। इस दुःख में जो सांसें चल रही हैं, वे व्यर्थ लग रही हैं और मन के मैल (उदासी) को और बढ़ा रही हैं।
बढ़ती है लपट विरह की, सुलगती है सुधि प्यारी,
इस विरह-चिंता-चिन्मय में, जलती है दुनिया सारी।

अर्थ: अपने प्रिय से अलग होने का दुःख (विरह) लगातार बढ़ता जा रहा है और उनकी प्यारी यादें दिल में सुलग रही हैं। दुःख के इस माहौल में कवि को ऐसा लगता है जैसे उनके साथ-साथ यह पूरी दुनिया ही विरह की आग में जल रही है।
यह सुलगती हुई आग है, बुझने की आस नहीं है,
जीवन की इस बेला में, कोई भी पास नहीं है।

अर्थ: दिल के भीतर दुःख की जो आग सुलग रही है, उसके बुझने की कोई उम्मीद (आस) नहीं दिखती। जीवन के इस कठिन और उदास समय (बेला) में कवि खुद को बिल्कुल अकेला पाते हैं, उनके पास ढाढस बंधाने वाला कोई नहीं है।
जो सुख का सपना देखा, वह दुःख का कारण बन गया,
जीवन का सुंदर उपवन, अब मरुस्थल जैसा बन गया।

अर्थ: अतीत में प्रिय के साथ बिताए जिन सुख के दिनों का सपना कवि ने देखा था, आज वही यादें उनके सबसे बड़े दुःख का कारण बन गई हैं। उनका हंसता-खेलता खुशहाल जीवन (सुंदर उपवन) अब एक सूखे रेगिस्तान (मरुस्थल) की तरह सुनसान हो गया है।
जिसके आगे सब फीका, वह रूप कहाँ अब पाऊँ,
इस सूने मन के भीतर, मैं किसको आज बिठाऊँ।

अर्थ: जिस प्रिय की सुंदरता के आगे दुनिया की हर चीज फीकी लगती थी, उसे अब कहाँ ढूंढूं? इस खाली और वीरान हो चुके दिल में अब उस प्रिय के अलावा किसी और को बिठाने (जगह देने) की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
रो-रोकर सिसक-सिसककर, कहता मैं करुण कहानी,
तुम सुमन नोचते करते, अपने सुंदर मनमानी।

अर्थ: कवि रोते और सिसकते हुए अपने दर्द की कहानी बयां कर रहे हैं। वे अपने प्रिय को याद करते हुए कहते हैं कि एक तरफ मैं इस कदर टूट चुका हूँ, और दूसरी तरफ तुम फूलों (खुशियों) को नोचते हुए अपनी ही सुंदर मनमानी में व्यस्त रहे, तुम्हें मेरे दर्द का अहसास तक न हुआ।

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सद्य: आलोकित!

आंसू खण्ड काव्य से!

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