शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

फिराक गोरखपुरी की याद

खेतों को संवारा तो सँवरते गये खुद भी,

फसलों को उभारा तो उभरते गये खुद भी,

फितरत को निखारा तो निखरते गये खुद भी,

नित अपने बनाये हुए साँचे में ढलेंगे।

हम जिन्दा थे, हम जिन्दा हैं, हम जिन्दा रहेंगे। - फ़िराक गोरखपुरी

 


फ़िराक गोरखपुरी का असली नाम रघुपति सहाय था। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में अंग्रेजी के आचार्य थे। उर्दू में उनकी बहुत प्रसिद्ध रचना है - गुल ए नगमा। सन 1969 में इस रचना के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है। फ़िराक गोरखपुरी ने कई चर्चित गजल और नज़्म लिखी हैं। उनमें मुझे उक्त नज़्म बहुत अच्छी लगती है क्योंकि इसमें अपने देश की सुगंध है। एक गौरव बोध है। उत्कृष्ट इतिहास बोध है। वह सभ्यतागत निरंतरता का उल्लेख है जो केवल भारत की पहचान है। इस नज़्म में आई "हम जिंदा थे, हम जिंदा हैं और जिंदा रहेंगे!" कालजयी पंक्तियां हैं जो भारत की सनातनता का उद्घोष हैं। आज फ़िराक गोरखपुरी का जन्मदिन है। 28 अगस्त!

उनके जन्मदिन पर इस ग़ज़ल के साथ पुण्य स्मरण! श्रद्धांजलि।

ये तो नहीं कि ग़म नहीं

हाँ! मेरी आँख नम नहीं

तुम भी तो तुम नहीं हो आज

हम भी तो आज हम नहीं

अब न खुशी की है खुशी

ग़म भी अब तो ग़म नहीं

मेरी नशिस्त है ज़मीं

खुल्द नहीं इरम नहीं

1 टिप्पणी:

शिवम कुमार पाण्डेय ने कहा…

कुछ होगा कुछ तो होगा
अगर मैं बोलूंगा टूटे न टूटे
तिलिस्म सत्ता का
मेरे भीतर का कायर तो टूटेगा.....
~ रघुवीर सहाय
नमन 🌸🙏

सद्य: आलोकित!

फिराक गोरखपुरी की याद

खेतों को संवारा तो सँवरते गये खुद भी , फसलों को उभारा तो उभरते गये खुद भी , फितरत को निखारा तो निखरते गये खुद भी , नित अपने बनाये हुए ...

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