रविवार, 9 अगस्त 2026

कष्टोंसे बचनेके कुछ अनुभूत उपाय

 कष्टोंसे बचनेके कुछ अनुभूत उपाय



यह उपाय बहुत सरल है। इसमें कोई खर्च नहीं


है, न बहुत परिश्रम ही करना पड़ता है और न समय ही बहुत लगता है। यह क्रिया क्या है?- एक प्रकारकी अंगडाई है, जिससे सब अंगोंमें खून तेजीसे दौड़ने लगता है और शरीरमें फुर्ती आ जाती है। रोज-रोज नियमित रूपसे केवल १०-१५ मिनट भी ऐसा करता रहे तो कुछ दिनोंमें जवानी-सी आने लगती है। हम इसे बराबर कर रहे हैं और लाभ उठा रहे हैं। इस समय हमारी अवस्था ८२ वर्षकी है और अभीतक कमर नहीं झुकी है। सबेरे सोकर उठते ही बिस्तरपर चित्त पड़े-ही-पड़े, तकिया हठाकर इन कसरतोंको करना पड़ता है। तखत या फर्शपर और भी अच्छा है। स्वभावतः लोग सबेरे उठते ही अंगड़ाई लेते हैं, उसीका यह विशद रूप है। इसमें बिस्तरपर पड़े-ही-पड़े एक-एक करके प्रत्येक अंगको तानना (कसना) और २-४ सेकेण्ड बाद एकदम ढीला छोड़ देना पड़ता है। मुट्ठी कसकर दबाओ तो हथेलीका खून ऊपर कलाईमें दौड़ जाता है और एकदम ढील देनेपर खून तेजीसे लौट आता है। इसी प्रकार शरीरके प्रत्येक अंगको बारी-बारीसे अकड़ाने (तानने) और ढीला करनेपर वहाँका खून दौड़ता है। बुढ़ापेमें नसोंके अन्दर मल जम जाता है और नसें कड़ी पड़ जाती हैं, इसीसे बुढ़ापा आता है। इस क्रिया (Contraction and Relaxation)-से वह मल धीरे-धीरे खूनके दौड़ानके साथ साफ होता जाता है, हटता जाता है और नसें नरम और लचीली होने लगती हैं, जो जवानीकी निशानी है। उक्त अमेरिकनका कहना है कि नसोंके अन्दर मल न जमने पावे तो बुढ़ापा आयेगा ही नहीं। दवाइयोंसे यह काम हो नहीं सकता, केवल परिश्रमसे


तथा खूनकी दौड़ानसे यह सफाई ठीक होती है। अतः आप भी ऊपरसे शुरू करके नीचेतक शरीरके


५६१ प्रत्येक अंगको रोज सबेरे तानकर (अकड़ाकर) एकदम ढीलाकर दीजिये तो आपका बुढ़ापा कुछ दिनोंमें भागना शुरू करेगा और धीरे-धीर जवानी (शक्ति) याने लगेगी। हाथ, गर्दन, कंधा, कमर, पेट, पीठ, पैर वगैरह एकके बाद एक ताने जा सकते हैं। मुँहके जबड़े, दादी, कनपटी, हथेली, भुजाएँ, पैरकी पिंडली, पंजे वगैरह भी ताने जा सकते हैं। और भी जो-जो अंग आप तान सकें, तानिये; इधर-उधर फैलाइये, घुमाइये, करवट लीजिये। बहुत थकनेकी जरूरत नहीं है। थकावट मालूम हो तो लीजिये; हर एक अवयवको तानना और ढीला करन यही इस क्रियाका उद्देश्य है। सम्पूर्ण क्रियामें १०-१५ मिनट लगते हैं, परंतु इससे लाभ अपूर्व होता है, प्रारम्भमें प्रत्येक अंगको २-४ बार तानकर ५-७ मिनटमें खत्प बीच-बीचमें एक-आध मिनट सुस्ता लीजिये. दम ले कर दीजिये। बादमें अभ्यास परिपक्व हो जाय, तब संख्या धीरे-धीरे बढ़ाते-बढ़ाते १०-१२ तक ले जाइये। हम तो इस क्रियाके बाद चित्त पड़े-पड़े टाँगोंको ऊपर उठाकर दस-बीस बार हवामें साइकिल-जैसी चलाते हैं। इससे पेटकी और टाँगोंकी अच्छी कसरत हो जाती है और पाखाना साफ होता है।


आप इन कसरतोंको एक-दो महीना करके देखिये कैसा लाभ होता है। प्रत्येक अंगको तानते समय यदि थोड़ी-सी साँस रोक ली जाय और ढील देते समय धीरे-धीरे निकाल दी जाय तो जल्दी लाभ होगा, इसे खुली हवामें अथवा खिड़कियाँ खोलकर करना चाहिये। बहुत ठण्डके दिनोंमें कम्बल ओढ़े हुए भी बहुत कुछ कर सकते हैं, पर मुँह खुला रहे। बैठकर भी ये क्रियाएँ की जा सकती हैं।


आप इस क्रियाको आलस्य त्यागकर नियमितरूपसे करते रहेंगे तो बुढ़ापेमें फिर जवानीकी शक्ति आ जायगी और बुढ़ापेके कष्ट बहुत कम हो जायेंगे। बूढ़े लोगोंके लिये बड़े कामकी चीज है। ५०-६० वर्षके बूढ़ोंको इसे अवश्य करके लाभ उठाना चाहिये। ७०-७५ वर्षके जर्जर बूढ़े भी धीरे-धीरे कर सकते हैं। विशेष विवरणके लिये उपर्युक्त पुस्तक देखनी चाहिये। अमेरिकन लेखकका नाम है- Sanford Bennett, पुस्तक अमेरिकाकी छपी है।

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सद्य: आलोकित!

फिराक गोरखपुरी की याद

खेतों को संवारा तो सँवरते गये खुद भी , फसलों को उभारा तो उभरते गये खुद भी , फितरत को निखारा तो निखरते गये खुद भी , नित अपने बनाये हुए ...

आपने जब देखा, तब की संख्या.