बुधवार, 18 मार्च 2020

कथावार्ता : साफ–सफाई, गोबर, गौमूत्र और हम


देश - दुनिया की बड़ी जनसंख्या एक समयांतराल के बाद यह कतई नहीं मानेगी कि हम अपने घरों को साफ और पवित्र करने के लिए गाय के गोबर से लीपते थे। चौका पूरने के लिए गोबर से लीपना अपरिहार्य था। पंचगव्य एक आवश्यक औषधि थी। इसमें दूध, दही, घी, गोबर और मूत्र का प्रयोग होता था। मेरे एक मित्र को बवासीर हो गया था तो वह स्वमूत्र चिकित्सा करते थे और अपने पेशाब से शौच करते थे। जब हम छोटे थे तो खेलने कूदने में कहीं चोटिल हुए तो चोट ग्रस्त स्थान पर सूसू कर लेते थे कि यह बहुत अच्छा एंटीसेप्टिक है। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई तो स्वमूत्र को औषधि की तरह लेते थे।
हम यह भी नहीं मानेंगे कि अपने घरों की दीवार गड़ही की मिट्टी से पोता करते थे और वह चमकदार लगती थी। कि सबसे अच्छी खाद मल से बनती थी। हमने वह जगह खूब अच्छे से देखी है जहां निरन्तर मूत्र विसर्जन करने से खेत का एक हिस्सा पीला पड़ जाता था और हम विज्ञान की भाषा सीखते हुए कहा करते थे कि यूरिया के प्रभाव से यह होता है और यह अच्छा उर्वरक है। गोइंठा, उपला, चिपरी, गोहरौर यह सब हमारी रसोई का अनिवार्य ईंधन था और सब गाय/भैंस के गोबर से बनता था। एलपीजी ने इसे भी हतोत्साहित किया है।
स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत बनाए जाने वाले शौचालयों ने ऊपरी तौर पर भले हमें एक साफ-सुथरी दुनिया उपलब्ध कराई है लेकिन उसने एक स्वाभाविक चेन को तोड़ दिया है। यह अच्छा है कि इन शौचालयों में एकत्रित मल वहीं बनाए एक टंकी में एकत्रित होता रहता है और भविष्य में उसका उपयोग कर लिया जाएगा लेकिन तब भी वह जो एक इकोसिस्टम बना था, वह इस क्रम में टूट जाएगा। हम जानते हैं कि माला का एक भी मोती अगर अपनी जगह से हटता है तो वह समूची संरचना को प्रभावित कर तहस नहस कर देता है। शौचालय, तो एकबारगी हमें ठीक भी लगेगा लेकिन जिस तरह हम गोबर और पशुओं के उत्सर्जित अपशिष्टों से घृणास्पद व्यवहार कर रहे हैं, वह हमें एक दूसरी ही दुनिया में धकेल रहा है।
हमारा इकोसिस्टम : एक समावेशी चेन

दरअसल
, हमने अपनी जीवनशैली ऐसी बदल ली है, हम ऐसे उपभोक्ता में परिणत हो गए हैं कि हम परम्परागत समावेशी प्रणाली से दूर हो गए हैं। हम भारी मात्रा में कूड़ा उत्पादक जीव बने हैं। ऐसे में हमने "घृणा" की एक सर्वथा नवीन चीज डेवलप की है। इससे हमने एक नए तरीके का स्वच्छता वाला माहौल भी बनाया है। इसमें उपयोगिता वाला तत्त्व विलुप्त हो गया है। हमने कूड़ा का एक अद्भुत संसार बनाया है। महज तीस साल पहले यह कूड़ा उपयोगी था। आवश्यक हिस्सा था। अब वह घृणा की वस्तु में परिवर्तित हो चुकी है।
          हमारी उपभोक्ता वाली जीवन प्रणाली सबसे घातक प्रणाली है। हम चीजों का उपभोग कर रहे हैं। यही मानसिकता हमें समावेशी विकास पद्धति से दूर करती है। याद कीजिये, बीस पच्चीस साल पहले कितना कम कचरा हमारे आसपास होता था और हम घूरा को एक संपत्ति की तरह देखते थे। दीपावली पर तो हम एक दिन पहले यम का दिया निकालते थे और घूरा को प्रकाशित करते थे। वह खेत की मिट्टी की संरचना ही बदलने में सक्षम था।  आज हमारा घूरा एक घृणास्पद स्थल है। यह सब हमने नयी शिक्षा पद्धति में सीखा और आत्मसात किया है। इनसे घृणा सीखाने वाले उस शिक्षा पद्धति के सबसे उज्ज्वल मोती हैं।
         

1 टिप्पणी:

कविता रावत ने कहा…

गौमूत्र और गोबर तमाम बिमारियों को हमसे दूर भगाने का काम करती हैं, लेकिन सच आज शहर क्या अब तो गांव में भी उससे दूरी बनाने लगे हैं लोग, तभी तो विभिन्न प्रकार के रोग जन्म ले रहे हैं और हम अग्रेजी दवा खाकर खुशफहमी में जी रहे हैं

सद्य: आलोकित!

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