सोमवार, 16 सितंबर 2019

कथावार्ता : पारिजात-दिव्य पुष्प की भव्य कथा

पारिजात।


यह पुष्प बेहद आकर्षक है। रूप-गन्ध और पौराणिक दृष्टि से। इसे शेफाली या हरसिंगार भी कहते हैं। आख्यान से पता चलता है कि यह पुष्प समुद्र मंथन में मिला था। इन्द्र इसे अपने साथ स्वर्गलोक ले गये जहाँ उर्वशी इसका सानिध्य लाभ कर नृत्य की थकान मिटाया करती थीं।

कथा है कि एक बार रुक्मिणी अपने एक व्रत का उद्यापन करने श्रीकृष्ण सहित रैवतक पर्वत पर पहुंचीं। उस समय देवऋषि नारद वहां से गुजर रहे थे। उनके हाथ में पारिजात वृक्ष का पुष्प था। कृष्ण और रुक्मिणी के साहचर्य से मुदित होकर पुष्प उन्होंने रुक्मिणी को दे दिया। रुक्मिणी ने इस फूल को अपने बालों में लगा लिया।

द्वारका लौटने पर इस दिव्य पुष्प को देखकर श्रीकृष्ण की पट्टमहिषी  सत्यभामा ने कहा कि मुझे यह फूल चाहिए। फिर उन्होंने कहा कि फूल तो एक दो दिन में मुरझा जायेगा, इसलिये आप उस वृक्ष को ही ले आयें। जब चाहे फूलों का गजरा बना लिया जायेगा। कृष्ण ने बहुत समझाया लेकिन सत्यभामा न मानीं। तो हारकर कृष्ण को स्वर्ग जाना पड़ा। इन्द्र इस असमय आगमन से घबरा गए। आने का कारण पूछा और जानकर संतुष्ट हुए कि यह साम्राज्यवादी अभियान नहीं है। उन्होंने पारिजात का वृक्ष कृष्ण को दे दिया। धूमधाम से वृक्ष का स्वागत हुआ। लेकिन सत्यभामा ने अगले दिन हंगामा कर दिया- 'यह पेड़ तो मुरझा रहा है।'

सारे यदुकुल में यह समाचार फैल चुका था कि पारिजात नामक दिव्य वृक्ष द्वारका आ चुका है। अब किसी को थकान न होगी। लेकिन जब उन्हें पता चला कि इन्द्र ने एक नकली पौधा देकर यादवों को मूर्ख बनाया है तो वह सब भी भड़क गए। सारे रथी-महारथी लाठी, बल्लम, मुगदर लेकर द्वारकाधीश के दरवाजे पर आ गये। कृष्ण ने सभी वीरों को देखा। बलराम जी एक तरफ हल की मूठ पकड़े फुँफ़कार रहे थे। साम्ब हल हाँकने वाला पैना लेकर आया था। प्रद्युम्न की गोद में अनिरुद्ध भी उपस्थित था और सब कोलाहल कर रहे थे। एक ने कहा कि इन्द्र की इतनी हिम्मत कैसे पड़ी कि वह हम सबको धोखा दे। इसबार उसकी ईंट से ईंट बजा देंगे। कृष्ण को माजरा समझने में थोड़ी देर हुई लेकिन जब उनको बात समझ में आई तब तक सत्यभामा कोपभवन में जा चुकी थीं। 

उधर इन्द्र को समाचार मिला कि यदुवंशी नाराज हैं और किसी भी क्षण हमला कर सकते हैं तो वह नारद के पास गये। सबकी जड़ यही देवर्षि थे। पारिजात से परिचय कराने की क्या दरकार थी।
नारद तत्क्षण द्वारका पहुँचे। सबको समझाया कि देवलोक की बात दूसरी है। वह भोग का लोक है। धरती कर्मभूमि है। यहाँ पारिजात दूसरे ढंग से पुष्पित पल्लवित होगा। उसको रोपना पड़ेगा, आल बाल बनाकर सींचना पड़ेगा। कर्मभूमि में बैठे-बिठाये खाने का कोई तुक नहीं है। सत्यभामा को बात समझ में आई। पारिजात रोपा गया। सींचा गया। उसमें खाद डाला गया। समय पर वह पुष्पित पल्लवित हुआ। हर तरफ उसकी सुगंध फैली। सत्यभामा ने उसके फूलों की सेज बनाई। रुक्मिणी ने उससे शृंगार किया। जाम्बवती ने इसे पूजा के लिए सहेजा। सारे यादवों ने हर्षध्वनि की। इन्द्र ने चैन की साँस ली।

पारिजात धरती पर आया तो रात में खिलने लगा और सुबह उसके पुष्प स्वत: झरने लगे। यह एकमात्र ऐसा पुष्प बना जो झरकर भी पवित्र बना रहता है। दैवीय गुणों से युक्त है। नासिरा शर्मा ने इस नाम से एक उपन्यास लिखा है। बंगाल ने इसे राजकीय पुष्प का दर्जा दिया है।

मुझे बहुत प्रिय है।

सद्य: आलोकित!

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