सोमवार, 24 मई 2021

घनानन्द की तेरह कविताएं

 

निसि द्यौस खरी उर माँझ अरीछबि रंगभरी मुरि चाहनि की।

तकि मोरनि त्यों चख ढोरि रहैंढरिगो हिय ढोरनि बाहनि की। 

चट दै कटि पै बट प्रान गएगति सों मति में अवगाहनि की।

घन आनंद जान लख्यो जब तेंजक लागियै मोहि कराहनि की।।

 

 

कान्ह परे बहुतायत मेंइकलैन की वेदन जानौ कहा तुम ?

हौ मनमोहनमोहे कहूँ नबिथा बिमनैन की मानौ कहा तुम ?

बौरे बियोगिन्ह आप सुजान ह्वैहाय कछू उर आनौ कहा तुम ?

आरतिवंत पपीहन कोघन आनंद जू ! पहिचानौ कहा तुम ?

 

 

मंतर में उर अंतर मैं सुलहै नहिं क्यों सुखरासि निरंतर,

दंतर हैं गहे आँगुरी ते जो वियोग के तेह तचे पर तंतर। 

जो दुख देखति हौं घन आनंद रैनि-दिना बिन जान सुतंतर,

जानैं बेई दिनराति बखाने ते जाय परै दिनराति कौ अंतर।

 

 

सावन आवन हेरि सखीमनभावन आवन चोप विसेखी।

छाए कहूँ घनआनंद जानसम्हारि की ठौर लै भूलनि लेखी।

बूंदैं लगैसब अंग दगैंउलटी गति आपने पापनि पेखी।

पौन सों जागत आगि सुनी हीपै पानी सों लागत आँखिन देखी॥

 

निसि द्यौस खरी उर माँझ अरीछबि रंगभरी मुरि चाहनि की।

तकि मोरनि त्यों चख ढोरि रहैंढरिगो हिय ढोरनि बाहनि की।

चट दै कटि पै बट प्रान गएगति सों मति में अवगाहनि की।

घनआनंद जान लख्यो जब तेंजक लागियै मोहि कराहनि की।।

 

 

वहै मुसक्यानिवहै मृदु बतरानिवहै

लड़कीली बानि आनि उर मैं अरति है।

वहै गति लैन औ बजावनि ललित बैन,

वहै हँसि दैनहियरा तें न टरति है।

वहै चतुराई सों चिताई चाहिबे की छबि,

वहै छैलताई न छिनक बिसरति है।

आनँदनिधान प्रानप्रीतम सुजानजू की

सुधि सब भाँतिन सों बेसुधि करति है।।

 

 

बहुत दिनान की अवधि-आस-पास परे,

खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान कौ।

कहि-कहि आवन सँदेसो मनभावन को,

गहि-गहि राखत हैं दै-दै सनमान कौ।

झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास ह्वै कै,

अब न घिरत घन आनंद निदान कौ।

अधर लगै हैं आनि करि कै पयान प्रान,

चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान कौ।।

 

 

छवि को सदन मोद मंडित बदन-चंद

तृषित चषनि लालकबधौ दिखाय हौ।

चटकीलौ भेष करें मटकीली भाँति सौही

मुरली अधर धरे लटकत आय हौ।

लोचन ढुराय कछु मृदु मुसिक्यायनेह

भीनी बतियानी लड़काय बतराय हौ।

बिरह जरत जिय जानिआनि प्रान प्यारे,

कृपानिधिआनंद को धन बरसाय हौ।।

 

 

घन आनंद जीवन मूल सुजान कीकौंधनि हू न कहूँ दरसैं।

सु न जानिये धौं कित छाय रहेदृग चातक प्रान तपै तरसैं।

बिन पावस तो इन्हें थ्यावस हो नसु क्यों करि ये अब सो परसैं।

बदरा बरसै रितु में घिरि कैनितहीं अँखियाँ उघरी बरसैं॥

 

१०

 

अति सूधो सनेह को मारग हैजहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।

तहाँ साँचे चलैं तजि आपनपौझिझकैं कपटी जे निसाँक नहीं।

घन आनंद प्यारे सुजान सुनौयहाँ एक ते दूसरो आँक नहीं।

तुम कौन धौं पाटी पढ़े हो कहौमन लेहु पै देहू छटाँक नहीं।।

 

११

 

भोर तें साँझ लौ कानन ओर निहारति बावरी नेकु न हारति।

साँझ तें भोर लौं तारनि ताकिबो तारनि सों इकतार न टारति।

जौ कहूँ भावतो दीठि परै घनआनँद आँसुनि औसर गारति।

मोहन-सोहन जोहन की लगियै रहै आँखिन के उर आरति।।

 

१२

 

प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ

कैसे रहै प्रान जौ अनखि अरसायहौ।

तुम तौ उदार दीन हीन आनि परयौ द्वार

सुनियै पुकार याहि कौ लौं तरसायहौ।

चातिक है रावरो अनोखो मोह आवरो

सुजान रूप-बावरोबदन दरसायहौ।

बिरह नसायदया हिय मैं बसायआय

हाय ! कब आनंद को घन बरसायहौ।।

 

१३

 

मीत सुजान अनीत करौ जिनहाहा न हूजियै मोहि अमोही!

डीठि कौ और कहूँ नहिं ठौर फिरी दृग रावरे रूप की दोही!

एक बिसास की टेक गहे लगि आस रहे बसि प्रान-बटोही!

हौं घनआनँद जीवनमूल दई कित प्यासनि मारत मोही !!

 

घनानंद

रविवार, 2 मई 2021

ईवीएम में गड़बड़ी कैसे और कब

 -डॉ रमाकान्त राय

हर चुनाव से पहले और बाद में यह प्रवाद चर्चा में आ ही जाता है कि ईवीएम में गड़बड़ी की जाती है अथवा की जा सकती है। यद्यपि ईवीएम से चुनाव प्रक्रिया बहुत पारदर्शी और निष्पक्ष होती है तथापि जब तब यह चर्चा ज़ोर पकड़ती है कि ईवीएम हैक हो गयी है। चुनाव प्रक्रिया के क्रम में कुछ ऐसे चरणों के बारे में जानना इस चर्चा में एक प्रभावी हस्तक्षेप हो सकता है। अगर ईवीएममें गड़बड़ी करना हो तो कितने स्तरों पर “मैनेज” करना पड़ेगा! यह एक जटिल प्रश्न बन जाता है। फिर भी यह सोचें कि इसमें गड़बड़ी की गयी तो एक ऐसा मौका ढूँढना पड़ेगा कि कब और कैसे यह हो सकेगा।

#EVM

   ईवीएम में गड़बड़ी करने के लिए सबसे पहले तो जनपद के जिलाधिकारी को अपने विश्वास में लेना पड़ेगा। यदि जिलाधिकारी, जो जिला निर्वाचन अधिकारी होता है, चाह ले कि ईवीएम में गड़बड़ी करना है तो उसे क्या क्या करना पड़ेगा? आइये, इसे समझने का प्रयास करते हैं।

ईवीएम में गड़बड़ी करने के लिए जिला निर्वाचन अधिकारी को जिले भर की मशीनों को "सेट" करना पड़ेगा। अब ईवीएम में विविपैट भी जुड़ गया है। यह उपकरण ईवीएम से जुड़ा रहता है और प्रत्येक मत के बाद एक पर्ची उगलता है। इस पर्ची का मिलान अंतिम गणना से कर सकते हैं। तो इस तरह तीनों उपकरणों को “सेट” लिए जिला निर्वाचन अधिकारी को सभी तकनीकी समूहों के ईवीएम सेट करनेवाले लोगों को राजी करना पड़ेगा। कहना न होगा कि यह बहुत सूक्ष्म स्तरीय तैयारी से संभव हो सकेगा। जो अगले स्तर पर ही निष्क्रिय हो जाएगा। जिला निर्वाचन अधिकारी रिटर्निंग अधिकारी को इसके लिए राजी करेगा, जो उसी का आदमी हो। रिटर्निंग अधिकारी, सहायक रिटर्निंग अधिकारी को विश्वास में लेगा। जिलाधिकारी को सीडीओ, एसपी, डीवाईएसपी, बीएसए, डीआईओएस आदि सभी अधिकारियों को इसके लिए मनाना पड़ेगा। यह सभी अधिकारी उस चुनाव प्रक्रिया के कोर टीम का अंग रहते हैं।

मान लीजिए कि यह सब सेट हो गए। सेट करके मनचाही मशीनों का वितरण कर दिया गया तो पीठासीन अधिकारी के हाथ जो मशीन आई है, उसे वह जब चाहे तब चेक करने के लिए स्वतंत्र रहता है। इससे पहले, लगभग 40 बूथ पर एक जोनल मजिस्ट्रेट की नियुक्ति होती है, जिसके अंतर्गत औसतन 5 सेक्टर मजिस्ट्रेट रहते हैं। चुनाव के दिन इन मजिस्ट्रेट साहिबान  को क्षेत्र में रहना रहता है। इस प्रक्रिया में सेक्टर मजिस्ट्रेट हर दो घंटे पर जोनल को सूचित करते रहते हैं। यह जोनल मजिस्ट्रेट क्लास वन गजटेड अधिकारी रहता है। जोनल मजिस्ट्रेट के नीचे सेक्टर मजिस्ट्रेट रहता है।वह भी उच्च पदाधिकारी रहता है। उसे वाहन मिलता है, उसकी सुरक्षा में एक दारोगा अलग वाहन में रहता है। दारोगा चार पांच पुलिस कर्मी के साथ रहता है। सेक्टर मजिस्ट्रेट के साथ दो पुलिसकर्मी या/और दो होमगार्ड रहते हैं। वह औसतन 10 बूथ का प्रभारी रहता है।

          सेक्टर मजिस्ट्रेट पीठासीन अधिकारी, प्रथम मतदान अधिकारी, द्वितीय मतदान अधिकारी और तृतीय मतदान अधिकारी के सीधे संपर्क में रहता है। इस तरह वह औसतन 40 मतदान कर्मियों से सीधे जुड़ा रहता है। चुनाव वाले दिन से ठीक पहले पोलिंग पार्टी के रवाना होने से लेकर उन्हें पहुंचाने तक सेक्टर मजिस्ट्रेट क्षेत्र में रहता है। शाम को वह सभी बूथ का निरीक्षण करता है और सबको पारिश्रमिक उपलब्ध कराता है। सुबह मतदान शुरू होने से पूर्व उसे एक बूथ पर रहना होता है। आशय यह है कि वह सभी बूथ का सीधा प्रभारी रहता है। प्रातःकाल मतदान शुरू होने से पूर्व सेक्टर मजिस्ट्रेट और जोनल मजिस्ट्रेट एक एक बूथ पर उपस्थित रहते हैं।

          मतदान प्रारंभ होने से पूर्व पीठासीन अधिकारी एजेंट नियुक्त करते हैं। यह एजेंट प्रत्याशी द्वारा अधिकृत होते हैं। उनकी उपस्थिति में मॉक पोल होता है। मॉक पोल एक विशिष्ट चरण है। इसकी चर्चा पीठासीन अधिकारी को अपनी डायरी में करना पड़ता है। मॉक पोल में सभी प्रत्याशियों के नाम के आगे का बटन दबाकर लगभग 50 मत डाले जाते हैं। मशीन बंद किया जाता है। वहीं एजेंट्स के समक्ष गणना की जाती है और दिखाया जाता है कि जिस प्रत्याशी को जितना मत दिया गया, उतना ही परिणाम में प्रदर्शित हो रहा है। सही हो तो एजेंट्स सम्मति देते हैं। गलत होने की बात बहुत कम बार दिखती है।एजेंट्स जब सम्मति देते हैं तो ईवीएम का डाटा शून्य किया जाता है। एजेंट्स को यह दिखाया जाता है। एक पर्ची इस तरह लगाकर सील की जाती है कि कोई उसे हटाने का प्रयास करे तो वह फट जाए। इस पर्ची पर एजेंट्स और पीठासीन अधिकारी के हस्ताक्षर रहते हैं। अब मतदान शुरू होता है। मतदान शुरू होने से पहले मशीन की स्थिति सबसे सामने स्पष्ट की जाती है। दिनभर पीठासीन अधिकारी बीस तरह के आगंतुकों को बताता रहता है कि इतना वोट पड़ गया। एजेंट्स वहीं नजर गड़ाए रहते हैं। डाले गए वोट और मशीन में दिखा रहे वोट बराबर हैं अथवा नहीं, इसकी जांच करते रहना पड़ता है। कोई भी आकर देख सकता है। एजेंट्स अलग नाक में दम किए रहते हैं। हर बूथ पर सुरक्षा कर्मी रहते ही हैं। उन्हें भी गड़बड़ी करने के लिए अपने पाले में करना पड़ेगा। पत्रकार, मीडियाकर्मी, पर्यवेक्षक आदि आदि का चक्रमण चलता रहता है। मतदान पूर्ण होने पर फिर एक पर्ची, एजेंट्स के हस्ताक्षर वाली सील की जाती है। अब ईवीएम बक्से में बंद होकर जमा हो गई। जमा करते समय पीठासीन अधिकारी अपने हस्ताक्षर से युक्त एक प्रमाणपत्र जारी करता है कि उस बूथ पर इतने मत डाले गए और मशीन इतने समय पर क्लोज़ की गयी।

          जहां ईवीएम जमा होती है, वह स्ट्रॉन्ग रूम कहा जाता है। जमा होने के बाद वह घर भी सील कर दिया जाता है। कड़ा पहरा लगा दिया जाता है। उस कक्ष को बीच में नहीं खोला जा सकता। खोलने के लिए कोई प्रावधान नहीं है। अगर टेम्पर करने के लिए खोला गया तो सुरक्षाकर्मियों को जोड़ना होगा। मतगणना के दिन स्ट्रॉन्ग रूम को वैसा ही सीलबंद मिलना चाहिए, जैसा ईवीएम रखते समय था। जब मशीन गणना के लिए लाई जाती है, तो मतगणना अधिकारी एजेंट को दिखाता है कि डिब्बा सीलबंद है। वह सील हटाकर पर्ची निकालता है और दिखाता है। एजेंट देखता है कि पर्ची पर उसका ही हस्ताक्षर है। मशीन में वही समय दर्ज है, जो उसके समक्ष बंद करते समय बताया गया था।

          मतदान समाप्त होने पर हर एजेंट को वह संख्या उपलब्ध कराई जाती है, जितना मतपेटी में रहती है। एजेंट मिलान करता है कि मतगणना शुरू होने से पहले ईवीएम में उतने ही मत प्रदर्शित हो रहे हैं। तब मतगणना शुरू होती है। इस क्रम में मतगणना अधिकारी, जो पृथक व्यक्ति होता है, कागज मिलाता है।

          इस प्रक्रिया में अन्य कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष व्यक्ति जुड़े रहते हैं। यह प्रक्रिया बहुस्तरीय होती है और इसमें कहीं भी चूक, त्रुटि अथवा गड़बड़ी की जाए तो उसी दम उद्घाटित हो जाती है। सबको साध लेने पर भी सील, पर्ची आदि के प्रमाण नहीं बदले जा सकते। यह व्यवस्था फुलप्रूफ है। अगर कोई इतनी व्यवस्था के बाद भी अड़ियल रवैया अपनाता है तो उससे पूछा जाना चाहिए कि ईवीएम मशीन में गड़बड़ी किस चरण में हो सकती है! गड़बड़ी का आरोप लगाने वाले इस प्रश्न पर बगलें झांकते हैं। और तब भी कोई नहीं मानता तो उसे कहिए कि आप पप्पू हैं!



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असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी

राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय,

इटावा, उत्तर प्रदेश

पिन 206001

मोबाइल नंबर 983895242- royramakantrk@gmail.com

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

मुल्ला नसीरुद्दीन की दो कहानियाँ

१.

 

मुल्ला भीख मांगने गया। एक सम्पन्न घर देखकर उसने गुहार लगाई। घर में बहू थी। उसने मुल्ला को भीख देने से इन्कार कर दिया और भगा दिया। मुल्ला निराश होकर अपना मुँह और झोला लटकाए चल पड़ाकुछ दूर जाकर ही उस घर की मालकिन, सास आते हुए दिखी। उसने पूछा- क्या हुआ मुल्ला? 

मुल्ला बोला- तुम्हारी बहू ने भीख भी नहीं दी। 

सास ने कहा- अच्छा! उसकी यह मजाल। घर चलो। 

मुल्ला लौटा। घर आकर सास ने कुर्सी निकाली। कुछ पल बैठी रही। फिर दरवाजे पर जाकर मुल्ला से कहा- जाओ, भीख नहीं मिलेगी? मेरे रहते बहू कौन होती है मना करने वाली।

 

२.

 

मुल्ला एकबार अपने दोस्त के घर गया। दोस्त ने उसे शराब परोसी। मुल्ला ने कहा कि मैं शराब नहीं पीऊँगा। 

एक तो मैं मुसलमान हूँ और हमलोगों में शराब हराम है।

दूसरी बात, मैंने अपनी मरती बीवी को वादा किया था कि कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाऊंगा।

और तीसरी बात यह कि मैं घर से पीकर आया हूँ

 

-कथावार्ता की प्रस्तुति!


(मुल्ला नसीरुद्दीन, mulla nasiruddin, kathavarta, kathavarta1, डॉ रमाकान्त राय,  ramakant roy)

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

घुमक्कड़ी के शीर्ष पुरुष : राहुल सांकृत्यायन

-डॉ रमाकान्त राय

मेरे स्कूल के दिनों में ही यह धारणा बनी थी और खूब आतंकित करती थी कि राहुल सांकृत्यायन संस्कृत, अङ्ग्रेज़ी, तिब्बती, ल्हासा, चीनी आदि 84 भाषाओं के जानकार थे। उनकी किताब "तुम्हारी क्षय" में उन्हें 26 भाषाओं का ज्ञाता कहा गया है। उनका यात्रावृत्त "अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा" पाठ के रूप में था। उसमें एक शेर था-

          सैर कर दुनिया की गाफिल, ज़िंदगानी फिर कहाँ।

           ज़िंदगानी फिर मिली तो, नौजवानी फिर कहाँ॥

और यह शेर जैसे मंत्र की तरह याद हो गया था। कतई रोमांटिक था यह। कालांतर में राहुल सांकृत्यायन की कई कृतियों से परिचित होने का मौका मिला। इसमें "वोल्गा से गंगा" की अनेकश: चर्चा सुनता था। "वोल्गा से गंगा" नाम ऐसा था कि यात्रावृत्त की छवि बनती थी

यह जानना आवश्यक है कि "वोल्गा से गंगा" यात्रावृत्त नहीं है। यह काल्पनिक कहानियों का संग्रह है, जिसमें आर्यों के विषय में कई मनगढ़ंत बातें, उलजलूल स्थापनाएं हैं। राहुल सांकृत्यायन का असली नाम केदारनाथ पाण्डेय था। मुझे कुछ वर्ष पूर्व उनके गांव जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। यह आजमगढ़, उत्तर प्रदेश में अवस्थित है।  उत्तर प्रदेश सरकार उनके सम्मान में उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की एक बस का परिचालन उनके गांव से दिल्ली के लिए करती है। यह बस प्रतिदिन प्रातःकाल इसी गांव से खुलती है और दिल्ली जाती है। एक बस दिल्ली से चलकर देर शाम इस गांव में पहुंचती है।

राहुल सांकृत्यायन ने विपुल साहित्य सृजन किया है। बौद्ध धर्मग्रंथों के खोज और उनका हिन्दी रूपान्तरण कर उन्होंने साहित्य की खूब सेवा की है। तिब्बत और नेपाल आदि से अनेकों बौद्ध ग्रन्थों को प्रकाश दिया। उन्होंने हिन्दी साहित्य में आदिकाल को सिद्ध सामंत काल कहा है और यह एक मजबूत स्थापना है। उन्होंने त्रिपिटक का हिन्दी अनुवाद किया। शास्त्रज्ञ होने के साथ-साथ निःसंदेह वह घुमक्कड़ी के बहुत बड़े आइकन हैं। उन्होंने खूब विदेश यात्रा भी की। श्रीलंका, तिब्बत और रूस की कई बार। आखिरी दिनों में रूस गए। लौटे। उनका निधन दार्जिलिंग में हुआ। उन्होंने अपने घुमक्कड़ी को खूब प्रचारित किया। बौद्ध बन गए और मार्क्सवादी कम्यून के लिए समर्पित हुए।

राहुल सांकृत्यायन का समूचा लेखन पश्चिमी सभ्यता के रंग से अनुप्राणित है। इसलिए उसपर मिशनरीज की छाप है। उनका विपुल लेखन और कम्यून उन्हें खूब चर्चित करता है।

अपने एक लेख में राहुल सांकृत्यायन ने स्वामी सहजानंद सरस्वती को बहुत सम्मान से याद किया है। भारत में किसान आंदोलन को उठाने और आगे बढ़ाने में स्वामी सहजानन्द सरस्वती के योगदान को उन्होंने बहुत उदारमन से स्वीकार किया है।

घुमक्कड़ी के लिए हिंदी में जब कुछेक रचनाकारों का उल्लेख किया जाता है तो राहुल सांकृत्यायन अग्रगणित किए जाते हैं। मेरी तिब्बत यात्रा, यूरोप यात्रा और एशिया के दुर्गम भूखंडों में उनकी ठीक ठाक कृतियां हैं।

आज जन्मदिन पर आजमगढ़ के इस केदारनाथ पाण्डेय का भावपूर्ण  स्मरण!

 

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असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी

राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय,

इटावा, उत्तर प्रदेश

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रविवार, 4 अप्रैल 2021

नए कालिदास का उदय

-डॉ रमाकान्त राय

जब विद्योत्तमा ने सभी पंडितों को हरा दिया तो अपमानित पंडितों ने निश्चित किया कि इस विदुषी का अहंकार टूटना चाहिए। विद्वान को पराजित करने के लिए सभी विद्वानों ने मंत्रणा की। परिणामस्वरूप उचित व्यक्ति की तलाश शुरू हुई। विद्वान को मूर्ख ही हरा सकता है - यह निश्चित है।

उन्हें सहज ही उचित व्यक्ति मिल गया। वह आलू से सोना बना सकने की तकनीक जानता था और जिस डाल पर बैठा था, उसे ही कुल्हाड़ी से काट रहा था। डाल कटती तो वह भी निश्चित ही धराशायी होता। इससे उपयुक्त व्यक्ति कौन होगा? पंडितों ने निश्चित किया। बताया कि यह अज्ञात राजपरिवार का स्वाभाविक कुमार है।  यह कालिदास थे।

नई दुनिया, दैनिक समाचार पत्र (04 अप्रैल 2021) का संपादकीय पृष्ठ, स्तम्भ- अधबीच  

समझा बुझाकर सबने कालिदास को विद्योत्तमा के सम्मुख शास्त्रार्थ हेतु प्रस्तुत किया। "मौन भी अभिव्यंजना है!" यह उक्ति तो परवर्ती है। विद्वानों ने मौन की, संकेत की अभिव्यक्ति अपने तरीके से करने का निश्चय किया। कालिदास को रटा रटाया उत्तर संकेतों में ही देने के लिए मना लिया।

विद्योत्तमा ने मौन के, संकेत आधारित शास्त्रार्थ को स्वीकार कर लिया और पहली शास्त्रोक्ति की- "ईश्वर एक है!" इसके लिए उन्होंने एक ऊंगली उठाई। कहते हैं कि कालिदास को समझ में आया कि यह लड़की मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है। प्रत्युत्तर में हिंसक होते हुए कालिदास ने दो ऊंगली उठाई- "मैं तुम्हारी दोनों आंखें फोड़ दूंगा।" सभा में हड़कंप मच गया।

विद्वानों ने व्याख्या की- "ईश्वर आत्मा और परमात्मा का द्वैत है। बिना इस द्वैत को जाने तत्त्व की मीमांसा कैसे हो सकती है!" फिर आउटरेज शुरू हो गया। ट्वीट-रिट्वीट हुए। विद्योत्तमा सहित सभी वामी-कामी, विद्वत समाज ने इस व्याख्या को स्वीकार किया। उस शोरगुल में और सभी विषय इतर हो गए। सभा डीरेल हो गई। विषय से इतर कूदने-फांदने में मान्यता प्राप्त विद्वानों को कौन हरा सकता है।

नतीजा यह हुआ कि Abs, समुद्री स्नान, आलू ही आलू, मेड इन मदुरै, उत्तर-दक्षिण, तीन कानून, आसमानी किताब, हम दो हमारे दो आदि की चहुंओर अनुगूंज होने लगी। एक ने तो कहा कि राजा को पदच्युत कर कालिदास का अभिषेक होना चाहिए। अविलम्ब। ईवीएम पर भरोसा कौन करता है। लोकतंत्र नष्ट नहीं करना है, न ही होने देना है। विद्वानों, पंडितों, क्रोनी-गठजोड़, हावर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर, कौवा-तीतर, काली पहाड़ी सबने कालिदास के लिए बहुत माहौल बनाया।

मसल है कि वीरता की नकल नहीं हो सकती। इतिहास को दुहराया नहीं जा सकता। लेकिन देश-दुनिया में प्रयास जारी हैं। दूसरे कालिदास का कभी भी उदय हो सकता है! यद्यपि कई प्रयास विफल हो गए हैं, तथापि लोगों ने आशा का त्याग नहीं किया है।

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असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी

राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालयइटावा, उत्तर प्रदेश

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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

Kathavarta : कथावार्ता में बोधकथा

ब्याज दरों में कटौती प्रस्ताव के "ओवरसाइट" पर एक कहानी याद आ गई।

एक व्यक्ति अपना मुंह और झोला लटकाए जा रहा था। उसकी कमर झुककर दोहरी हो गई थी। उसे देखकर ही अनुमान होता था कि उसपर कई अदृश्य बोझ हैं। रास्ते में उसका हमराही हुआ मुल्ला नसरुद्दीन और उसका शागिर्द।

राह चलते मित्रता बढ़ी तो मुल्ला ने पूछा- भाई, झोला जैसा मुंह क्यों लटकाए हो?’ उस व्यक्ति ने व्यथा कथा सुनाई। उसका घर परिवार उजड़ चुका था। बचत आदि लूट ली गई थी। फसल आवारा सांड बरबाद कर चुके थे। रोजगार चौपट हो गया था। वह बहुत दुखी था। उसका दुख उसके मुंह और झोले से छलक रहा था।

          उस व्यक्ति ने कहा कि उसके जीवन में खुशी का एक क्षण भी नहीं है। यह सुनकर मुल्ला नसरुद्दीन बहुत दुखी हुआ। उसने सांत्वना दी। सब्जबाग दिखाए। किन्तु उस व्यक्ति का मुंह लटका रहा। तब मुल्ला ने कहा कि वह उसका दुख दूर कर सकता है, बशर्ते वह अपना झोला उसे दे दे।

          व्यक्ति ने कहा कि झोले में उसकी शेष जमापूंजी है। वह ऐसा कैसे कर सकता है। संकेत पाकर, एक लापरवाही भरे क्षण में मुल्ला के शागिर्द ने एक झटके में उससे झोला झटक लिया और यह गया वह गया, हो गया। व्यक्ति ने पीछा किया। मुल्ला भी पकड़ने भागा। व्यक्ति  बहुत चीखा, चिल्लाया। अंततः थककर बैठ गया। सांझ ढल रही थी। 'जीवन में और न जाने कितने कष्ट देखने को हैं', - वह सोचने लगा। अचानक उसने देखा कि उसका झोला उसके सामने वाले वृक्ष पर लटका है। वह सोत्साह आगे बढ़ा। अरे! यह तो उसी का झोला है। वह खिल गया। आगे बढ़कर झोला उतारा। देखा, सभी वस्तुएं सही सलामत थीं। उसके हर्ष का पारावार न रहा।

          तब उसके समक्ष मुल्ला नसरुद्दीन प्रकट हुआ। आदमी ने अपना झोला छिपा लिया।

          मुल्ला ने कहा – “तुम तो बहुत खुश दिख रहे हो!

          उसने कहा - "हां। आज मैं बहुत प्रसन्न हूं।"

          मुल्ला बोला - "किंतु अभी कुछ देर पहले तो तुम कह रहे थे कि तुम्हारे जीवन में खुशी का एक क्षण भी नहीं है!"

          मुझे नहीं लगता कि कहानी में और कुछ कहने को शेष रह जाता है!

          कहनी गई वन में, सोचो अपने मन में।

          कहने वाला झूठा, सुनने वाला सच्चा।।

 

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-डॉ रमाकान्त राय

https://twitter.com/RamaKantRoy_

सद्य: आलोकित!

आर्तिहर : मानस शब्द संस्कृति

करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।। आर्तिहर : मानस शब्द संस्कृति  जब भगवान श्रीराम अयोध्या जी लौटे तो सबसे प्रेमपूर्वक मिल...

आपने जब देखा, तब की संख्या.