सावित्रीबाई फुले के साथ फातिमा शेख की कल्पना करके प्रो दिलीप मंडल ने इतना बड़ा फ्रॉड किया था कि ज्ञान जगत चकरा कर रह गया। भारतीय इतिहास में ऐसी असंख्य बातें चल पड़ी हैं। इसी में यह मिथ्या वचन भी चल गया कि वह पहली शिक्षिका हैं। उनसे पहले स्त्री शिक्षा का प्रचार नहीं था। यह भी एक मिथ्या धारणा है कि शूद्र पढ़ नहीं सकते थे।
सच्चाई यह है कि ऐसा नहीं है। भारत में विदुषी महिलाएं बहुत प्राचीन काल से ही मिलती हैं। मैं रानी लक्ष्मीबाई के जीवन चरित्र को देखता हूं तो सोचता हूं कि घुड़सवारी और युद्ध कला उन्होंने कैसे सीखी होगी? झलकारी बाई, अवंतीबाई, अहिल्याबाई आदि को किसने लड़ना सिखाया? माताएं अपने बच्चों को अक्षर ज्ञान कराती थीं और वह पुराण, सुखसागर आदि का सहज अध्ययन कर लेती थीं।
प्राचीन काल में गुरुकुल में लड़कियों को शिक्षा देने वाली ऋषि पत्नियां थीं। महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधती का नाम ही मुझे बहुत अच्छा लगता है। वह शिक्षा देने वाली ही तो हैं। महाभारत में आरुणि के गुरु महर्षि आयोदधौम्य और उनकी पत्नी सुजाता का कितना नाम है। असंख्य महिलाओं का नाम प्राचीन वांग्मय में मिलता है।
जब मैकाले भारत आया तो वह इस सब से चिंतित हुआ। उसने गुरुकुलों को मिलने वाली सहायता बंद करवा दी। दुष्प्रचार करवाया।
कहते हैं कि दलित और शूद्र पढ़ नहीं सकते थे। भक्ति काल में एक पूरा संप्रदाय ऐसे कवियों का था जिन्हें सामाजिक दृष्टि से शूद्र माना जाता था लेकिन उन सबने बड़ी गद्दियाँ बनवाईं। कबीर, रैदास, दादू, नानक, सेन आदि कितने बड़े मठाधीश हुए। सब पढ़े लिखे थे।
बीसवीं शताब्दी के आधे हिस्से तक देश में नौकरी को निकृष्ट काम माना जाता था। लोग अपने घर में रहना चाहते थे। उनकी अपनी सामाजिक पहचान थी। जो व्यक्ति अपने गांव से कहीं और चला जाता था वह अकेलापन और निर्वासन जैसा संत्रास भोगता था। वह, जिन्हें हिब्बा मिल जाता था, वह भी बहुत लालचवश ही अपना ठीहा छोड़ते थे। यहां सुरक्षा थी, सम्मान था और सार्थकता थी।
तब शिक्षा वेदांग की एक कड़ी भर थी। बहुत से लोग इसे कठिन और दुर्गम, दुर्लभ मानते थे। जिन संतों ने निर्गुण का उपदेश किया है, उन सब ने और ज्ञान मार्गियों ने इसे कठिन साधना कहा है। ऐसे में, लोग इस पथ को नहीं के बराबर चुनते थे। सब विधि अगम अगोचर जानकर ही सूरदास सगुण पद गाते हैं।
तब शक्ति का अर्थ बाहुबल था।
फिर शक्ति का अर्थ धनबल हुआ। और क्रमशः ज्ञान की महिमा प्रकाश में आई। यद्यपि ज्ञान का बल सर्वोच्च था किंतु उसकी उपादेयता लोकहित में थी।
ऐसे में शिक्षा न सब प्राप्त करना चाहते थे और न यह सुलभ थी। किंतु जो चाहते थे, उन्हें सहज ही मिल जाती थी। यह अलभ्य थी इसलिए कठिनाई थी।
स्त्रियों को घर में ही रहना था इसलिए उनका दायरा सीमित था। उन्हें शिक्षा की और कम आवश्यकता थी। भजन, कीर्तन और पुराणादि समझने भर शिक्षा उन्हें प्रदान की जाती थी।
जब तक ऐतिहासिक संदर्भ नहीं समझा जाएगा, भारत में स्त्री शिक्षा और शूद्र जीवन को नहीं जाना जा सकता।
भारत, यूरोप अथवा अरब से पृथक देश है। हिन्दू अब्राहमिक कल्चर से अलग हैं। हमारे यहां स्त्रियां दोयम दर्जे की नहीं हैं। अब्राहमिक कल्चर में वह हव्वाजात हैं और शापित हैं। उनके यहां औरतों को यह सब नहीं मालूम था। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अपना कैनन भारत के सामाजिक क्षेत्र पर रखा और कुछ निष्कर्ष प्रतिपादित कर दिए।
इन चीजों को बदलना आवश्यक है।
सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन पर यह मुझे कहना था।
मैं अभी तो प्रो दिलीप मंडल @Profdilipmandal से अपील करता हूं कि वह फिर से वह उदघाटन करें कि फातिमा शेख उनकी कल्पना प्रसूता हैं।
सावित्री बाई फुले की जयंती जनचेतना का अवसर बने, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ!

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