रामकथा विस्तार से सुनकर गरुड़ का संशय जाता रहा। उन्होंने काक भुसुंडी का आभार प्रकट किया तो उन्होंने कहा कि यह भी विधि के विधान का अंग ही समझना चाहिए। यह मेरा सौभाग्य है कि आप यहां कथा सुनने आए। वह कहते हैं कि कौन ऐसा है जिसे मोह ने फांस न लिया हो, जिसे काम वेग ने नचाया न हो, जिसे तृष्णा ने पागल न बना दिया हो, जिसके हृदय को क्रोध ने दग्ध न किया हो!
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| को जग काम नचाव न जेही॥ |
आप अकेले नहीं हैं! इससे नारद, सारद सभी प्रभावित हुए हैं। मोह, तृष्णा, काम और क्रोध से लिप्त हो जाना कोई अपराध नहीं है। यदि इसमें निमग्न हो गए तो चाहिए सत्संग!
हनुमानजी इस सत्संग का आधार हैं। उनका नाम स्मरण सत्संग का प्रारंभिक बिंदु है।
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चौपाई
बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।
सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे।।
तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया।।
पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही।।
तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं।।
नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी।।
मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही।।
तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा।।
दोहा
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।
केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार।।
श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि।।

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