Sunday, September 14, 2014

छः दिन का छोटा बाबू..

छः दिन का यह छोटा बच्चा
हाथ है कच्चा पैर भी कच्चा
छिन पल खातिर खोले आँख
देखे यह संसार है सच्चा।
जब जब भूख लगे चिल्लाये
पीटे पैर अकड़ता जाए
हुलस के मम्मी नंदिनी जैसी
लेती छाती से चिपटाए।
पीता दूध मुकुलाता बाबू
हर्ष पुलक छलकाता बाबू।





श्रीमती जी, Reemakant Rai के उन दिनों में हम अक्सर इस बात को लेकर ढेर सारी उधेड़बुन में थे कि हमारी सन्तान हमें माँ-पिता बनने का सुख तो देगी, हमारे जीवन में बहुत सारे बदलाव भी लाएगी. हम इसको लेकर बहुत रोमांचित थे. जीवन बहुत सारे स्वप्न आदि से होकर ख्यालों में पकता जाता था. बस एक चिन्ता हम दोनों को परेशान करती थी कि डायपर बदलना एक कठिन काम होगा. हम सोचते थे, यह एक घिन पैदा करने वाला समय होगा. हम एक दूसरे से मजाक भी किया करते थे कि डायपर कौन कौन कैसे कैसे बदला करेगा.
फिर एक दिन यह फ़रिश्त आया, पेट में चीरा लगाकर! शुरूआती हफ्ता बहुत व्यस्त बीता. ज़च्चा-बच्चा दोनों की देखभाल करनी पड़ती थी. एक हफ्ते का समय बीमार की तीमारदारी में बीता. जब अस्पताल से घर आना हुआ और घर में साथ साथ रहना हुआ तो जाना कि डायपर बदलना एक कठिन काम तो है लेकिन यह घिनौना नहीं है. जब बच्चा रोता है, हममें से कोई एक उठकर पहले यह तजबीजता है कि गीला तो नहीं हुआ? अगर गीला हुआ है, तो उसे बदल दिया जाता है. यह इतना सामान्य सा है कि कभी भी किया जा सकता है. भोजन के थाली के आगे परोसने से ठीक पहले भी.
मैं इसमें यदा कदा आलस्य कर बैठता हूँ लेकिन श्रीमती जी, और उनकी माता जी बिना किसी आलस्य के यह सम्पन्न करती हैं. कभी कभी यह दसेक मिनट के अंतराल में ही घटता है लेकिन उसी तरह का धैर्य और संयम कायम रहता है.
पिता बनने के इस अवधि में महसूस कर रहा हूँ कि हमारी माँ हम सब को पालने के लिए कैसे कैसे जतन किया करती होंगी. पिता बनना एक पीढ़ी के दुःख दर्द को जानना है. हरबार डायपर बदलते हुए मैं अपनी माँ को याद करता हूँ. उनसे मिलकर उनकी गोद में अपना सर छुपाकर रहना चाहता हूँ.
(डायपर का अर्थ अस्थायी तौर की वह लंगोटी है, जो बच्चे के लिए उसकी माँ ने बहुत पहले पुराने कपड़ों को नए तरीके से सिलकर तैयार किया था.)

यह तुकबन्दी बस यूँ ही हो गयी थी..

Wednesday, April 9, 2014

ज्यादा चालाक लोग तीन जगह चपोरते हैं

यह कहानी ज्यादा चालाक लोगों के लिए है.
शीर्षक है- ज्यादा चालाक लोग तीन जगह चपोरते हैं.
तीन दोस्त थे. एक सामान्य समझ का था, एक थोड़ा चालाक और एक ज्यादा चालाक. राह चलते तीनों का पैर आग पर पड़ गया. मैं जब आग कह रहा हूँ तो उम्मीद करता हूँ कि आप इसके दूसरे अर्थ को जरूर जानते होंगे. आग पर पैर पड़ने के बाद तीनों विचलित हो गए. मन घिना गया.
सामान्य समझ वाले ने वहीँ घास देखी और पैर पोंछ कर आगे बढ़ चला.
थोड़ा चालाक जो था, उसने सोचा कि देखें आखिर क्या है जो पैरों तले आया है. उसने पैर में लगी ...गन्दगी को हाथ में लेकर देखा. फिर पोंछ कर आगे बढ़ लिया.
जो ज्यादा चालाक था, उसने भी यह जानने के लिए कि क्या था, हाथ में लिया और ठीक से जानने के लिए जीभ पर रखा. चखा और तब जाना कि ओह! यह तो मैला है.
तीन जगह चपोरने वाली बात यहीं ख़तम हुई.
कल देश के आम चुनाव का पहला बड़ा और महत्त्वपूर्ण चरण शुरू हो रहा है. हम सब आगामी पाँच साल के लिए एक सरकार चुनने जा रहे हैं. एक निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं. ऐसे में निर्णय लेने की घड़ी आ गयी है.
चुनाव आयोग ने ईवीएम में नोटा का एक बटन रखा है. यह बटन इनमें से किसी भी नहीं के लिए है. यह बटन महज हमारी असहमति के लिए है. इससे चुनाव परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ेगा चाहे अस्सी फ़ीसदी लोग क्यों न नोटा बटन चुनें.
ढेर सारे उत्साही लोग इस बटन का प्रयोग करना चाहेंगे. इसलिए कि बता सकें कि उन्हें देश की संसदीय प्रणाली पर भरोसा नहीं है. ऐसे लोगों को आप किस कोटि में रखेंगे, आप स्वयं तय कर लें.
बाकी, कहानी का यह है कि कहानी वन में जाने के बाद भी आपके मन में बनी रहती है. सोचिये. सोचिये. सोचिये.
फिर निर्णय कीजिये.
शुक्रिया.

Thursday, March 27, 2014

आत्मसाक्षात्कार कराती फिल्म- अ थाउजेंड वर्ड्स


क्या हो अगर आपको अचानक एक दिन पता चले कि आपके पास बोलने या लिखने के लिए महज एक हजार शब्द हैं। आप एक तथाकथित सेलिब्रेटी हैं। या कि सेलिब्रेटी नहीं हैं और रोजमर्रा के जीवन के लंद-फंद में उलझे हैं। जीवन के ऐसे लंद-फंद में जहाँ अपने लिए, अपने परिवार के लिए समय न हो। सवाल थोडा मुश्किल है। इसलिए ज्यादा मुश्किल है कि यह अप्रत्याशित सा प्रश्न है। बेतुका लगने वाला। लेकिन सोचें, सोचें कि अगर ऐसा हो जाए तो.....

ब्रायन रॉबिन्स की फिल्म अ थाउजेंड वर्ड्स (2012) इसी को आधारभूमि बनाती है। वैसे तो यह फिल्म एक कॉमेडी है लेकिन थोड़े समय के लिए हम फिल्म से बाहर निकल आयें और सोचें कि काश हमारे जीवन में ऐसा क्षण आ जाये तो। तो यही कि ऐसे समय में हमारा बोलना, लिखना कम, बेहद कम हो जायेगा। हम हमेशा सचेत रहेंगे कि हमें क्या कहना है और क्या नहीं कहना है। तब कम बोलते हुए और ज्यादातर चुप रहकर हम आत्मसाक्षात्कार करते हैं। इस आत्मसाक्षात्कार में हम निखालिस खुद को पाते हैं। इस स्व की तलाश एक बड़ा अन्वेषण है, जिसे भारतीय दर्शन हमेशा से गोहराता रहा है। भारतीय दर्शन के इस थीम पर पश्चिम में फ़िल्में बन रही हैं।

फिल्म में एक वृक्ष को प्रतीक के तौर पर रखा गया है। अभिनेता जैक यानि एडी मर्फी एक बहुत बड़ी प्रकाशक संस्था में सफल एजेंट है जो अपनी शर्तों पर डील करने में माहिर है। वह बेहद वाचाल है और वाक्पटु भी। अपनी वाकपटुता और स्किल से वह बेहद सफल भी है। लेकिन इस चक्कर में वह लगातार अपने परिवार की उपेक्षा करता है अथवा महज रस्म-अदायगी करता है। डील करने का उसका तरीका भी बेहद दिलचस्प है। वह किताब को एक फार्मूले के तहत जज करता है। बहरहाल, वह सफल एजेंट है। वह इसी तरह की डील करने एक आध्यात्म गुरु के पास पहुँच जाता है, जहाँ वह डील करने में तो सक्षम हो जाता है लेकिन प्रकाशन के लिहाज से यह अटपटा सा लगने वाला होता है। उसे बहुत छोटी महज पाँच पृष्ठ की एक किताब मिलती है। और उसके आंगन में एक पेड़ उग आता है, जिसमें कुल एक हजार पत्तियां हैं। अब ताजा हालात यह है कि वह जब भी कुछ बोलता या लिखता है, प्रत्येक शब्द पर एक पत्ती गिर जाती है। आध्यात्मिक गुरु उसे इसका राज बताते हैं।


आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कितना हैरानी भरा वाकया होगा, जब एक महाबातूनी व्यक्ति के समक्ष यह संकट खड़ा हो जाए। क्रमशः उसकी नौकरी, परिवार सब उससे बिछड़ जाते हैं। वह बताने की कोशिश करना चाहता है लेकिन बताने के एवज में उसे पत्ते खोने पड़ते हैं। पत्ते खोना एक तरह से जीवन खोना है। तब वह चुप रहने की कोशिश के तहत अपने आप को जीता है। आत्मसाक्षात्कार करता है। इस आत्मसाक्षात्कार में उसे अपनी यादाश्त खो चुकी माँ मिल जाती है जो जैक के मिलने पर बार बार उसके पिता के नाम से संबोधित करती रहती थी। वह भी अपने बेटे में अपने पति की परछाई देखा करती थी लेकिन आत्मसाक्षात्कार करने के अनन्तर वह अपने बेटे के पृथक व्यक्तित्व को पहचान लेती है। वह अपनी पत्नी को भी वास्तविकता बताने के चक्कर में शब्द खरचता है। फिर उसे बोध होता है कि प्यार को वह बिना कहे भी जता सकता है। क्या जरूरी है कि हम शब्द का इस्तेमाल करें ही। आखिर में जब जैक को पता चलता है कि उसके पास बहुत कम शब्द बचे हैं तो वह बेहद समझदारी से अपने शब्दों को व्यक्त करता है और खरचता है। यह हमारे लिए भी एक सन्देश की तरह होता है।
एडी मर्फी एक जाने माने हास्य कलाकार हैं। हॉलीवुड में उनका सिक्का बोलता है। इस फिल्म में भी उनका काम लाजवाब है।

अरसा बाद एक बढ़िया फिल्म देखते हुए आँखें भर आईं। न जाने कितने उलजलूल शब्द हम दिन भर बकते और नष्ट करते रहते हैं। बिना सोचे समझे कि इनका क्या महत्त्व है। हमारे यहाँ बहुत शुरू से ही शब्द की महत्ता ब्रह्म के समकक्ष रखकर समझाई गयी है। यह सुखद और दुखद दोनों है कि शब्द के महत्त्व पर इस तरह चर्चा हो रही है। सुखद इसलिए कि पश्चिम का सिनेमा कॉमेडी के नाम पर एक सार्थक और वैदिकीय अनुकरण कर रहा है और दुखद इसलिए कि हम अपनी परम्परा से कटते जा रहे हैं।

अगर न देखी हो तो जरूर देखें।

Tuesday, March 25, 2014

समाजवादी पार्टी -इस लोक सभा चुनाव में.


उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के पास दो साल कार्यकाल बीत जाने के बाद लोकसभा चुनाव में जाने के लिए वाकई कुछ उपलब्धियाँ हैं. क्रमवार इस तरह रखी जा सकती हैं-
१- समाजवादी स्वास्थ्य सेवा. यह सेवा १०८ नंबर पर डायल करने पर मुफ्त मिलती है. बीस म...िनट में एम्बुलेंस आपके घर पहुँच जाती है. खाली रहने पर कभी कभी यह सेवा सवारी भी ढोती है.
२- कन्या विद्या धन, लैपटॉप आदि द्वारा बारहवीं पास के विद्यार्थियों को लाभ पहुँचाना. टेबलेट के विषय में अभी संशय है.
३- बेरोजगारी भत्ता. बेरोजगारी भत्ता से ढेर सारे युवक अपना धंधा करते हुए प्रतिमाह एक हजार रुपया पा रहे हैं. यह आर्थिक सशक्तिकरण का बेजोड़ उदाहरण है. समाजवादी पेंशन योजना भी एक नया उपक्रम है.
४- समाजवादी शासन की शुरुआत के बाद सभी सरकारी दफ्तरों पर दूसरी भाषा के रूप में उर्दू को जगह मिली है. सभी थाने, जिला मुख्यालय, राजकीय दफ्तर अपने नाम पट्टिका में उर्दू को जगह दे रहे हैं. निज भाषा उन्नति अहै...
५- उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम ने बसों को लाल रंग में रंगवाना शुरू किया है. ठीक उस रंग में जैसी समाजवादी टोपी हुआ करती है. याद रहे कि मायावती ने इसे नीले रंग से रंगवाया था और सर्वजन हिताय सेवा नाम दिया था, जिसे सत्ता में आने के तुरंत बाद मिटवा दिया था.
६- सैफई महोत्सव के बहाने देश में सांस्कृतिक जागरण की अलख जगाई जा रही है.
७- समूचे प्रदेश में बोर्ड परीक्षाएं शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो रही हैं. कहीं से भी नक़ल आदि की कोई घटना नहीं सुनाई पड़ रही.
८- सरकार ने प्राथमिक शिक्षा में आमूलचूल बदलाव किये हैं. बच्चों को निःशुल्क दी जाने वाली ड्रेस का रंग खाकी कर दिया है. इस तरह से बच्चे स्वतः महसूस कर रहे हैं कि वे होमगार्ड्स जरूर बन जायेंगे.
९- सरकार ने जो सड़कें बनाई हैं, वे ट्रेक्टर के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं. किसानों का समुचित ध्यान ऐसे ही रखा जाता है. और 
१०- इस सरकार में अधिकारी सीधे रिश्वत नहीं लेते. यह बहुत बड़ी उपलब्धि है.
 
 
समाजवाद ऐसे ही आता है..
 (जो लोग शासन व्यवस्था को बेपटरी मान रहे हैं, किसी भी भर्ती के न होने के पीछे असफलता मान रहे हैं, साढ़े चार मुख्यमंत्री की बात कर रहे हैं, यह कह रहे हैं कि हर तरफ गुंडाराज है, मुजफ्फरनगर के दंगों समेत कई दंगों की जिम्मेदारी ओढ़ा रहे हैं, वे लोग दरअसल प्रदेश की तरक्की से जलने वाले लोग हैं. जय समाजवाद.)

Sunday, March 16, 2014

मसाने में छानब भांग


 

'शिवप्रिया की काशी में बड़ी महिमा है। वह शिव का प्रिय पेय है। मैं भी इस चिन्मय-पेय का बचपन से ही अनुराग रहा हूं। मेरे दादाजी घर पर ही स्वनिर्मित भांग छानते रहे हैं। पिताजी जब काशी में होते तो यह जिम्मा वही बखूबी निभाते। सहयोग के साथ मेरा भी प्रशिक्षण चलता रहा। बादाम, केसरू, खरबूजा-तरबूज के बीज छीलने जैसे काम मुझे सौंपे जाते। भांग धोने से लगायत सिल-लोढ़ा तक पहुंचने में कुछेक वर्ष लगे। भांग पिसार्इ में लोढे़ के साथ चिपका सिल उठाने की कला में पारंगत होने के लिये काफी दंड पेलना पड़ा था। सिल-लोढ़ा से बना यह रिश्ता पत्रकारिता में भी काम आया। जब आपातकाल में जेल में रहा। तरल भांग तो वहां उपलब्ध था लेकिन 'कोफेपोशा' में बंद घड़ी तस्कर मित्र शशि अग्रवाल मुझे मनुक्के की गोली उपलब्ध करवा देते थे। उसी पीड़ा के दौर में मैंने सिल-लोढ़ा बनाने वाले कारीगरों पर एक फीचर लिखा। जेल में ही चंचलजी ने स्केच बनाये थे जो 'दिनमान में कवर स्टोरी के तौर पर छपा। (जिसे जेल से चोरी छिपे प्राप्त कर आशा भार्गव ने ही 'दिनमान तक पहुंचाया था) रघुवीर सहायजी का अतिशय प्रेम था, जोखम भरा। 'विजया से ही जुड़ा आपातकाल से पहले का एक प्रसंग कवि-संपादक रघुवीर सहायजी के साथ का है। उन्हें अपने छपास आकांक्षी मित्रों से बचाकर भांग की ठंडार्इ पिलाने के बाद बनारस के गोपाल मंदिर (जिसके तहखाने की काल कोठरी में गोस्वामी तुलसीदास ने रची थी विनय पत्रिका) के सामने पखंडु सरदार की रबड़ी खिलाने ले गया था। उसी शाम काशी पत्रकार संघ में कमलापति त्रिपाठी के लिये आयोजित समारोह में बिना तयशुदा कार्यक्रम में बोलने के बाद वापसी में एकांत में उन्होंने मुझसे पूछा था कि, 'बेतुका तो नहीं बोल गया। उनका आशय भांग के असर से रहा था। मेरे प्रति अतिशय स्नेहवश मेरी नालाकियों में भी वे रस लेते थे। एक बार भारतेन्दु भवन से बहुत निकट रंगीलदास फाटक वाले पंडित लस्सी वाले के अनूठेपन का जिक्र किया तो तुरन्त तैयार हो गये। पंडित लस्सीवाले की खासियत यह थी कि उकड़ु बैठकर मथनी से आधे घंटे में एक मटकी तैयार करते थे। मजाल था कि क्रम से पहले कोर्इ लस्सी पा जाये, चाहे कितना बड़ा तुर्रम-खां हो। धैर्य के साथ सहायजी लस्सी की प्रतिक्षा में खड़े रहे। मैं उन्हें बताना भूल गया था कि पुरवा (कुल्हड़) चांटकर या पानी से धोकर पीने के बाद ही फैंकना होता है। नतीजन लस्सी पीने के बाद सहायजी ने पुरवा कचरे में फेंक दिया। नियम के नेमी पंडित 'गोरस की इस दुर्गति से पगला गये। छिनरो-भोसड़ी से प्रारम्भ होकर मतारी-बहिन तक पहुंचते ही मैंने पकड़ लिऐ पैर कि, 'गलती हमार हौ, इनके नाही बतउले रहली। त$ बहुत बड़का संपादक हउवन दिल्ली वाला। पंडितवा मुझे पहचानता था, इसलिए मुझे दो-तीन करारा झापड़ और भरपूर गाली देने के बाद शांत हुए थे। हतप्रभ सहायजी ने पूरी बात सुनने के बाद पंडितवा को सराहा और मुझे मीठी-लताड़ लगार्इ। मैं बकचोद-सा खड़ा चुपचाप सुनता रहा था। सातवें दशक के उसी दौर में दैनिक 'शांती मार्ग से श्रीप्रकाश शर्मा को अगवा कर दैनिक 'सन्मार्ग में लिवाने के बाद से ही दोपहर को भी 'शिवप्रिया सेवन का सिलसिला प्रारम्भ हुआ था। अन्यथा मैं सांयकाल ही भारत रत्न रविशंकर के बनारसी पीए मिश्राजी के 'मिश्राम्बु पर ही 'विजया ग्रहण करता था। श्रीप्रकशवा के लिये समय-काल का कोर्इ मायने नहीं था। 'मिश्राम्बु पर जुटने वालों में अशोक मिसिर, मंजीत चुतुर्वेदी, अजय मिश्रा, गोपाल ठाकुर, वीरेन्द्र शुक्ल, नचिकेता देसार्इ जैसे भंगेड़ी धुरंधर तो स्थायी सदस्य सरीखे थे। छायाकार एस. अतिबल, निरंकार सिंह, योगेन्द्र नारायण शर्मा जैसे 'कुजात सूफी भी थे, जो बिना भांगवाली ठंडार्इ पीकर पैसा बर्बाद करते-करवाते थे। मेरी और श्रीप्रकाश की लाख जतन के बावजूद निरंकरवा अंत तक बिदकता ही रहा। अतिबलजी असमय संसार छोड़ गये लेकिन अब बुढ़ौती में योगेन्द्र शर्मा 'विजया-पंथी' हुए हैं। आपातकाल से चौतरफा मुकाबला मैंने और नचिकेतवा ने भांग छानकर ही किया था। उन्हीं दिनों जब प्रशासन ने तरल भांग पर रोक लगाने की कोशिश की थी तब संभवत: सिर्फ मैंने ही दैनिक 'सन्मार्ग में संपादकीय टिप्पणी लिखकर विरोध प्रकट किया था। आपातकाल में किए गये इस कारनामे के लिये मुझे 'भंग-भूषण' की उपाधि दी जानी चाहिए। काशी से छोटी काशी (जयपुर) पहुंचने पर औघड़ स्वभाव वाले नेता माणकचंद कागदी ने पहले-पहल तरल भांग छनवाया, जो मुझे नहीं पचा था। मैं साफ-सुथरी शुद्ध घरेलू या मिश्राम्बु की तासीर का आदी था। जबकि कागदीजी ने जौहरी बाजार स्थित गोपालजी के रास्ते के मुहाने पर स्थित ठेले वाली छनवा दी। मिजाज उखड़ गया। हालाकि बनारस से श्रीप्रकाश शर्मा के जयपुर आने से पहले मैंने बड़ी चौपड़ पर मेंहदी वाले चौक की आधी बनारसी ठाठ वाली भांग की दुकान तलाश ली थी। उस दुकान पर ठंडार्इ नदारद , सिर्फ सूखी बर्फी की विविधता थी। मेरी खोज वाले 'काना-मामा की धज में साफ-सफार्इ-स्वाद से लेकर पहरावे तक बनारसीपन की झलक पाकर मन चंगा हो गया था। लेकिन जौहरी बाजार के ग्रह बनारसवालों से सदा वक्री रहे हैं। तभी एक बनारसी संत संपूर्णानन्दजी पर 'गोली कांड़ का दाग लगा था और मुझ निरीह पर 'मदन-कांड का धब्बा लगा था। हुआ यूं था कि आज के 'पत्रकारों के थानेदार आनन्द जोशी उन दिनों जौहरी बाजार की एक गली में और मैं सुभाष चौक पर रहता था। एक होली के दिन बड़ी चौपड़ पर मिलना तय हुआ। बर्फी खाकर बम-बम भोले किया। अंतत: मेरे लाख मना करने के बावजूद आनंदजी ने भांग की पकौड़ी खा-खिलाकर 'मदन-कांड की नीवं रख ही दी थी। परिक्रमा के बाद आंनद के उनके पांच बत्ती सिथत 'दाक्षयानी-गृह' छोड़कर घर पहुंचा ही था। नहाने की तैयारी कर ही रहा था कि 'भैरवी चक्र के रसिया ओम थानवी और वारूणी - प्रेमी आनंद जोशी के इकलौते साले मदन पुरोहित 'परशुराम की मुद्रा में अवतरित हुए जबकि कंठी-टीकाधारी मदनजी वैष्णव परम्परा के आकंठ ध्वजावाहक रहे हैं। मेरी नालायकी के कारण ही आनंदजी ने 'दाक्षायानी' में उत्पात मचा रखा है। मैं स्वयं असंतुलित स्थिति में था फिर भी 'कोप से बचने के लिए जाना ही पड़ा। जाता तो मदनजी पिटार्इ भी कर सकते थे। जब पहुंचा तो आनंदजी एक चक्र तांड़व पूरा कर दूसरे चक्र पर आमादा थे। इमली-गुड़ पानी, नींबू, अचार का घरेलू इलाज एक तरफ, मदनजी के शब्द बाणों की बौछार से बचता-बचता घर पहुंचा था कैसे याद नहीं। भांग कफशामक, पित्त कोपक दवा है। संतुलित सेवन आनंद प्रदान करता है असंतुलित निरानंद। 'सन्मार्ग' कालीन दौर का एक किस्सा अब तक याद है। पत्रकारिता में भाषा के प्रति चौकन्ना-पहरेदार बनारसी कमर वहीद नकवी, ओम थानवी, राहुलदेव विशेष ध्यान से पढे़। एक दिन अस्पताली संवाददाता को एक खास खबर का शीर्षक नहीं सूझ रहा था। खबर थी कि कबीर चौरा अस्पताल में एक मरीज ऐसा भर्ती हुआ है जिसका 'कामायुध केलिक्रिया की कर्इ चक्रीय दौर के बाद भी पूर्व स्थिति पर नहीं रहा है। हमें 'ज्ञान वल्लिका’ (वकौल अशोक चतुर्वेदी) सेवन के बाद भी छापने लायक शीर्षक नहीं सूझा। तब श्रीप्रकाश के साथ दैनिक 'गांडीव’ में कार्यरत 'वारुणि-संत’ गरिष्ठ पत्रकार रमेश दूबे की शरण में जा पहुंचे। उन्होंने शीर्षक सुझाया - 'सतत ध्वजोत्थान से पीड़ित अस्पताल में भर्ती’।
और अंत में सालों पहले अशोक शास्त्री से 'साढे़ छह की चरचा करने वाले कलम-कूंची के सिद्धात्मा विनोद भरद्वाज यदि मेरी खांटी सलाह मानकर 'वारुणी के बजाय 'विजया का सेवन करने लगें तो अब भी 'पौने सात की संभावना है। महादेव! अब तो मसाने के खेलब होली और छानव भांग, गुरु! बम-बम भोले!