Friday, September 27, 2013

भिखारी ठाकुर के दो गीत.



     लोक और रंगकर्म से परिचित कौन है जो भिखारी ठाकुर को नहीं जानता? उनका जन्म १८ दिसम्बर, १८८७ को बिहार के सारण जिले (छपरा) के कुतुबपुर (दियारा) गाँव में एक नाई परिवार में हुआ था. जीविका के लिए वे खड़गपुर गए और वहां से उन्होंने बंगाल असम और अन्यान्य जगहों की यात्राएं कीं. वे एक रंगमंच की मण्डली से जुड़े और उसके सूत्रदार कहे गए. उन्होंने कई नाटक मंचन के लिए लिखे और उनका मंचन किया. उनकी एक कृति विदेसिया सबसे अधिक लोकप्रिय हुई. १० जुलाई, सन १९७१ को चौरासी वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
     वे सच्चे मायने में लोक के कलाकार थे. उनके यहाँ लोक अपने समूचे रूप में सांगीतिक तरीके से आता है. वह समूचा दुःख-सुख उनके यहाँ जिस खूबसूरती से व्यक्त हुआ है वह अप्रतिम है. यह हिन्दी की दरिद्रता है कि इस महान लोक कलाकार को भोजपुरी का शेक्सपीयर कहती है. इस पर चर्चा फिर कभी करेंगे.



    
      प्रस्तुत हैं, उनकी दो रचनाएं. एक बारहमासा है. जैसा कि सर्वविदित है कि बारहमासा विरह वर्णन की प्रविधि में आता है. हिन्दी में जायसी का बारहमासा बहुत प्रसिद्ध है. बीसलदेव रासो में आया नरपति नाल्ह का भी. भिखारी का यह बारहमासा किसी मायने में जायसी के बारहमासा से कम नहीं है. जायसी और नरपति के बारहमासा में जहाँ विस्तार ज्यादा है, भिखारी के यहाँ यह रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखा जाने के कारण छोटी किन्तु मार्मिक है. दूसरा एक विरह गीत है.
      आज भिखारी ठाकुर की रचनाओं को सहेजने वाले बहुतेरे लोग आगे आये हैं. प्रसिद्द उपन्यासकार संजीव ने 'सूत्रधार' नाम से एक बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास लिखा है. बलिया की 'संकल्प' की टीम भिखारी ठाकुर के कई नाटकों का मंचन कर चुकी है. मेरे मित्र अतुल कुमार राय इसी संस्था से जुड़े हैं. उन्होंने ही इन गीतों को मुझे उपलब्ध करवाया. अब आप इन्हें पढ़ें.
 
                                 (१)
                               बारहमासा

आवेला आसाढ़ मास, लागेला अधिक आस, बरखा में पिया रहितन पासवा बटोहिया।
पिया अइतन बुनिया में,राखि लिहतन दुनिया में,अखरेला अधिका सवनवाँ बटोहिया।
आई जब मास भादों, सभे खेली दही-कादो,  कृस्न के जनम बीती असहीं बटोहिया।
आसिन महीनवाँ के,  कड़ा घाम दिनवाँ के,  लूकवा समानवाँ बुझाला हो बटोहिया।
कातिक के मासवा में, पियऊ का फाँसवा में, हाड़ में से रसवा चुअत बा बटोहिया।
अगहन- पूस मासे,   दुख कहीं केकरा से?  बनवाँ सरिस बा भवनवाँ  बटोहिया।
मास आई बाघवा, कँपावे लागी माघवा,  त हाड़वा में जाड़वा समाई हो बटोहिया।
पलंग बा सूनवाँ,  का कइली अयगुनवाँ से,  भारी ह महिनवाँ फगुनवाँ बटोहिया।
अबीर के घोरि-घोरि,  सब लोग खेली होरी,  रँगवा में भँगवा परल हो बटोहिया।
कोइलि के मीठी बोली, लागेला करेजे गोली, पिया बिनु भावे ना चइतवा बटोहिया।
चढ़ी बइसाख जब,   लगन पहुँची तब,  जेठवा दबाई   हमें हेठवा    बटोहिया।
मंगल करी कलोल, घरे-घरे बाजी ढोल, कहत भिखारीखोजऽ पिया के बटोहिया।


                               (२)

करिके गवनवा,  भवनवा में छोडि कर,    अपने परईलन पुरूबवा बलमुआ।
अंखिया से दिन भर, गिरे लोर ढर ढर,  बटिया जोहत दिन बितेला बलमुआ।
गुलमा के नतिया,  आवेला जब रतिया,  तिल भर कल नाही परेला बलमुआ।
का कईनी चूकवा,  कि छोडल मुलुकवा,  कहल ना दिलवा के हलिया बलमुआ।
सांवली सुरतिया,  सालत बाटे छतिया,  में एको नाही पतिया भेजवल बलमुआ।
घर में अकेले बानी,  ईश्वरजी राख पानी, चढ़ल जवानी माटी मिलेला बलमुआ।
ताक तानी चारू ओर, पिया आके कर सोर, लवटो अभागिन के भगिया बलमुआ।
कहत 'भिखारी' नाई, आस नइखे एको पाई, हमरा से होखे के दीदार हो बलमुआ।
                                                                                                


Monday, September 23, 2013

नया ज्ञानोदय : सितम्बर २०१३. एक अवलोकन


बाबू मोशाय! कहानी लम्बी नहीं, बड़ी होनी चाहिए।
बाबू मोशाय! कहानी लम्बी नहीं, बड़ी होनी चाहिए..Bharatiya Jnanpith की पत्रिका नया ज्ञानोदय में सितम्बर २०१३ के अंक में प्रकाशित सूरज प्रकाश की लम्बी कहानी'एक कमजोर लड़की की कहानी' खींचकर लम्बी बनाई गयी है। यह सुखद है कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया की भूमिका कहानियों में आ रही है। इससे पहले उपन्यासिका के तौर पर प्रकाशित शैलेन्द्र सागर की 'लम्बी कहानी' "यह इश्क नहीं आसां" में भी फेसबुक ने कथानक में जगह बनाई थी। उस कहानी में भी बड़े-बड़े लोचे थे। वह मुख्य कवर पेज पर उपन्यासिका और कहानी के शुरूआती पेज पर लम्बी कहानी के तौर पर परोसी गयी थी। प्रेमचंद सहजवाला की एक कहानी भी इन दिनों वर्तमान साहित्य में प्रकाशित हुई है जिसमें इस माध्यम का जिक्र हुआ है। लेकिन यहाँ विवेच्य एक कमजोर लड़की की कहानी में फेसबुक मुख्य भूमिका में है। वह कहानी को आगे भी बढ़ाता है और उसे ढोता भी है। अगर कहानी में लेखक और तथाकथित कमजोर लड़की के चैट संवादों को निकाल दिया जाए तो कहानी लम्बी नहीं रह जाती। हाँ, बड़ी होने के लिए जो शर्तें कही जा सकती हैं, वह लेखक और लड़की की मुलाकात और उसके आत्मकथ्य में देखी जा सकती है। लड़की का आत्मकथ्य इस कहानी को बड़ा बना सकता था, जो अन्य अनावश्यक विस्तार में ओझल हो जाता है। बाकी तो कहानी में चैटिंग के चोंचले हैं और कहानीकार के कहानियों की व्याख्या और परिचय। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि लेखिका कहानियों को तीस बार-पचास बार पढ़ने का धैर्य रखे हुए है। 
यह एक मनोवैज्ञानिक सचाई ही कही जाएगी कि लेखक आदि जब इस तरह के प्रसंग उठाते हैं तो विपरीत लिंगी को ही चुनते हैं। उनके लिए शायद वहां मसाला भी ज्यादा दीखता है और आकर्षण भी।
अब एक प्रश्न?
क्या लम्बी कहानी का मतलब आकार में लम्बा होना है? उपन्यास वह है जो मोटा हो? मुझे लगता है कि ऐसा नहीं होता होगा। साहित्य के सुधीजन यह बताएं कि लम्बा/ लम्बी कहानी होने के मायने क्या हैं? उपन्यासिका के भी।
इस अंक की एक उपलब्धि कुणाल सिंह का फिल्म आलेख है- ओसामा अगर पुरुष होता। फिल्म देखने के लिए मचल जाएँ, ऐसा आलेख। शशांक दुबे ने "दोस्त" फिल्म पर जो कहा है, वह बेहतरीन है। उनका यह कहना बड़ा सटीक है- 'जिन दर्शकों के नाम पर एक महत्वपूर्ण, संवेदनशील और हमेशा याद की जाने लायक फिल्म देखनी है, उनसे यह अनुरोध है कि एक बार उसकी डीवीडी लाकर एक घंटे जरूर देखें। लेकिन हाँ, उसके बाद डीवीडी बंद कर दें" क्यों बंद कर दें, यह आप खुद पढ़कर जानियेगा।
श्रीराम ताम्रकर का बेगम अख्तर पर लिखा भी ठीक है। कुसुम अंसल ने "चेतना का कोलंबस' शीर्षक से जो संस्मरण लिखा है, वह फ़िल्मी दुनिया की गलीजता को उघाड़ता है। बासु भट्टाचार्य के विषय में कई अनजाने पहलुओं को भी खोलता है।
कविताओं में दिनेश कुशवाह की कवितायेँ बेहतरीन हैं। खासकर "हरिजन देखि" बोलो मिट्ठू प्राण-प्राण उनकी शैली की विशेष याद दिलाता है। निशांत और प्रेम शंकर रघुवंशी की कवितायें भी पढ़ी जा सकती हैं।
भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' कहानियों के लिए विशेष तौर पर याद की जाती है। इस माह (सितम्बर २०१३) की बड़ी उपलब्धि Harnot Sr Harnot की कहानी "हक्वाई" कही जा सकती है। हक्वाई मोची के उस लोहे के तिकोने स्टैंड को कहते हैं, जिसपर रखकर वह जूते की मरम्मत करता है। यह कहानी पढ़ते हुए मुझे धूमिल की कविता 'मोचीराम' और प्रो। तुलसीराम की आत्मकथा "मुर्दहिया" दोनों याद आये। धूमिल की कविता यह कि- "न कोई छोटा है/ न कोई बड़ा है/ मेरे आगे हर आदमी/ एक जोड़ी जूता है/ जो मरम्मत के लिए खड़ा है।" और कहानी में भागीराम के आगे सब मरम्मत के लिए खड़े हैं। तुलसीराम की आत्मकथा इसलिए कि कमाई करने यानि चमड़े का काम करने का इतना प्रामाणिक वर्णन वहीँ दिखा मुझे। और फिर यहाँ, उनकी प्रक्रिया का वर्णन भी।
हक्वाई भागीराम की कहानी है। भागीराम का कसूर यह है कि (उनका कसूर तो यह भी है कि वे निम्न कुल में जन्मे और उसकी कीमत भी बहुत कुछ खोकर गवांया। यह सब भी तफसील से कहानी में आया है लेकिन यहाँ बात दूसरी ही की जाए।) वे नगर निगम के नए अधिकारी से जूता पॉलिश करने का मेहनताना मांग लेते हैं। उसका खामियाजा यह है कि उन्हें फिर से विस्थापित होना पड़ता है। कई तरह के कष्ट झेलने पड़ते हैं लेकिन विस्थापन के इस पड़ाव में वे एक नए अभियान पर निकल पड़ते हैं। गाँधी बाबा का रास्ता। आमरण अनशन।
कहानी अपने बेहतर ट्रीटमेंट और लेखकीय दृष्टि के लिए याद रखी जाएगी। लेखक की पक्षधरता भागीराम के साथ है। वे उनके श्रम और जुझारू जीवन का पूरा सम्मान करते हुए दीखते हैं। कोई काम छोटा नहीं होता। भागीराम तो अपने काम को पूजने की हद तक पसंद करते हैं। वे हक्वाई को अपना देवता मानते हैं।
कहानी में जिस तरह से भागीराम का चित्रण किया गया है, वह काबिल-ए-तारीफ है। मुझे पसंद आया कि लेखक का शब्द चयन पर विशेष ध्यान है। कहीं भी भागीराम के लिए किसी असंसदीय शब्द का प्रयोग नहीं किया है। यह बताना इस लिए ख़ास है कि यथार्थ का चित्रण करने के बहाने भाई लोग अपनी सामंती मानसिकता का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते। कहानी इसलिए भी बहुत ख़ास बन गयी है।
ख़ास बात यह है कि लेखक को इस बात में सिद्धि मिल गयी है कि भागीराम जैसा सरल। सहज आदमी बोलेगा तो उसके वाक्य छोटे और भाषा सहज होगी। यह सफाई बहुत कम दिखती है।
अब आप कहानी पढ़ें और बताएं कि "मैं क्या झूठ बोल्याँ"।
हरनोट जी को बधाई। बहुत-बहुत बधाइयाँ। लम्बी टीप हो गयी क्या? आखिर में भगवान सिंह का "कुछ और पहेलियाँ और उलटवासियाँ" जरूर पढ़िएगा।
अब आपकी टिप्पणियों पर बातें होंगी। :)

Friday, September 20, 2013

हक्वाई : हरनोट जी की कहानी पर एक त्वरित टीप

भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' कहानियों के लिए विशेष तौर पर याद की जाती है। इस माह (सितम्बर २०१३) की बड़ी उपलब्धि Harnot Sr Harnot की कहानी "हक्वाई" कही जा सकती है। हक्वाई मोची के उस लोहे के तिकोने स्टैंड को कहते हैं, जिसपर रखकर वह जूते की मरम्मत करता है। यह कहानी पढ़ते हुए मुझे धूमिल की कविता 'मोचीराम' और प्रो। तुलसीराम की आत्मकथा "मुर्दहिया" दोनों याद आये। धूमिल की कविता यह कि- "न कोई छोटा है/ न कोई बड़ा है/ मेरे आगे हर आदमी/ एक जोड़ी जूता है/ जो मरम्मत के लिए खड़ा है।" और कहानी में भागीराम के आगे सब मरम्मत के लिए खड़े हैं। तुलसीराम की आत्मकथा इसलिए कि कमाई करने यानि चमड़े का काम करने का इतना प्रामाणिक वर्णन वहीँ दिखा मुझे। और फिर यहाँ, उनकी प्रक्रिया का वर्णन भी।
हक्वाई भागीराम की कहानी है। भागीराम का कसूर यह है कि (उनका कसूर तो यह भी है कि वे निम्न कुल में जन्मे और उसकी कीमत भी बहुत कुछ खोकर गवांया। यह सब भी तफसील से कहानी में आया है लेकिन यहाँ बात दूसरी ही की जाए।) वे नगर निगम के नए अधिकारी से जूता पॉलिश करने का मेहनताना मांग लेते हैं। उसका खामियाजा यह है कि उन्हें फिर से विस्थापित होना पड़ता है। कई तरह के कष्ट झेलने पड़ते हैं लेकिन विस्थापन के इस पड़ाव में वे एक नए अभियान पर निकल पड़ते हैं। गाँधी बाबा का रास्ता। आमरण अनशन।
कहानी अपने बेहतर ट्रीटमेंट और लेखकीय दृष्टि के लिए याद रखी जाएगी। लेखक की पक्षधरता भागीराम के साथ है। वे उनके श्रम और जुझारू जीवन का पूरा सम्मान करते हुए दीखते हैं। कोई काम छोटा नहीं होता। भागीराम तो अपने काम को पूजने की हद तक पसंद करते हैं। वे हक्वाई को अपना देवता मानते हैं।
कहानी में जिस तरह से भागीराम का चित्रण किया गया है, वह काबिल-ए-तारीफ है। मुझे पसंद आया कि लेखक का शब्द चयन पर विशेष ध्यान है। कहीं भी भागीराम के लिए किसी असंसदीय शब्द का प्रयोग नहीं किया है। यह बताना इस लिए ख़ास है कि यथार्थ का चित्रण करने के बहाने भाई लोग अपनी सामंती मानसिकता का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते। कहानी इसलिए भी बहुत ख़ास बन गयी है।
ख़ास बात यह है कि लेखक को इस बात में सिद्धि मिल गयी है कि भागीराम जैसा सरल। सहज आदमी बोलेगा तो उसके वाक्य छोटे और भाषा सहज होगी। यह सफाई बहुत कम दिखती है।
अब आप कहानी पढ़ें और बताएं कि "मैं क्या झूठ बोल्याँ"।
हरनोट जी को बधाई। बहुत-बहुत बधाइयाँ।