Thursday, January 7, 2016

शिक्षण के माध्यम के रूप में भाषा

यह अंडा है, जो बच्चे को चूं चूं न करने की सलाह देता है.-- वसु


‘अंडा सिखावे बच्चा के कि चूं-चूं मत कर’। बाबूजी जब कभी मेरे झूठे और नादान तर्कों से खफा होते थे तो यह कहावत अक्सर दुहराया करते थे। अंडा बच्चे को सिखाने की कोशिश करता है। यह कथन अपने आप में ही नादानी भरा है। बात आई-गई हो जाती थी। अब जब इस विषय पर विचार करने के लिए पंख फैला रहा हूँ तो अदबदा कर वहीँ टिक जाता हूँ। अंडा बच्चे को किस प्रकार समझा रहा है? जाहिर है कि यह सारा प्रकरण मनुष्य का गढ़ा हुआ है लेकिन स्वतः आये या कहिये कि परंपरा से चले आ रहे इस कहावत के मानी क्या हैं? अंडा बच्चे को उसी की भाषा में सीख दे रहा है कि चूं-चूं मत कर। चूं-चूं करना बच्चे की भाषा है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी को सिखाना हो, खासकर बच्चे को तो उसे उसी की भाषा में बात करनी होगी। यह तो बहुत सीधा सा उत्तर हो गया।
प्रश्न यह है कि इस तरह के सवाल उठते कैसे हैं? शिक्षण के माध्यम के रूप में भाषा कौन सी होनी चाहिए? यह सवाल १८३७ई० में कचहरियों की भाषा के हिन्दुस्तानी उर्दू किये जाने के बाद से ज्यादा जोर पकड़ता दीखता है। दरअसल, शिक्षण का माध्यम शुरू से ही वह व्याकरणसम्मत भाषा रही है, जिसमें भारतीय साहित्य मौजूद रहा हो। इस तरह पहले संस्कृत और फिर अरबी-फारसी को बच्चों को सिखाया जाता था। शिक्षण की भाषा बहुत कुछ धर्म आधारित रहती थी। हिन्दू है तो संस्कृत और मुसलमान है तो उर्दू यानी अरबी-फारसी। बाद में भाखा यानी भारतीय भाषाओँ को भी पढ़ाया–सिखाया जाने लगा। अंग्रेजों के आने से पहले देश में शिक्षा का मतलब कुछ धार्मिक ग्रंथों का पारायण करना था या साहित्य समझना। मध्यकाल में विज्ञान आदि के कुंद पड़ने का एक विशेष कारण यह भी था। पूरी तरह से धार्मिक शिक्षा किसी भी तरह से अन्य अनुशासनों को लेकर नहीं चल सकती थी। तो, ऐसे में शिक्षण का माध्यम कौन सी भाषा हो, यह प्रश्न ही नहीं था।
अंग्रेजों के आने और प्रतिष्ठित हो जाने के बाद इस सवाल ने सर उठाना शुरू कर दिया कि क्या पढ़ा जाए, कैसे पढ़ा जाए और किस भाषा में पढ़ा जाए। १८३७ में कचहरियों की भाषा के उर्दू किये जाने का सीधा सा परिणाम आर्थिक स्तर पर दिखने वाला था। नौकरियाँ अब तक एक प्रमुख भूमिका में आ गयी थीं। बड़े-बड़े जमींदार भी यह महसूस करने लगे थे कि अंग्रेज बहादुर से संपर्क बनाए रखना है और रियाया पर अपना रोब गाँठना है तो उर्दूदाँ होना पड़ेगा। आम लोग तो, जैसा जमींदार का हुकुम वैसा करने को मजबूर थे। लिहाजा शिक्षण में उर्दू शामिल हो गया। लेकिन यह समय अंग्रेजी साम्राज्य का था। अपने अहर्निशी चमकते सूरज को बचाए रखने के लिए जरूरी था कि अंग्रेजी सरकार साम्प्रदायिकता का बीजवपन करती। शासन ने ऐसा किया भी। भाषा उसके लिए अहम् माध्यम थी। जिस सरकार ने उर्दू को कचहरियों की भाषा बनाया था उसी शासन ने १८०० ईस्वी में फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना करके खड़ीबोली के विकास, प्रचार और प्रसार के लिए भाषा अध्यापकों की नियुक्ति की थी। वह उनसे शिक्षण के लिए पाठ्य-पुस्तकें तैयार करवा रही थी। यह दोतरफ़ा चाल थी। इसे ऐसे भी समझना चाहिए कि लगभग एक ही समय में राजा शिवप्रसाद सिंह ‘सितारेहिंद’ और राजा लक्ष्मण सिंह दोनों खड़ीबोली में लिख रहे थे और उनमें एक अरबी-फारसी मिश्रित भाषा का पक्षधर था और दूसरा संस्कृतनिष्ठ भाषा का। दोनों को राजा की उपाधि प्राप्त थी और दोनों तल्ख़ होने तक के स्तर तक अपने अपने भाषाई स्वरुप के पक्ष में खड़े थे। तब ऐसे समय में भी कचहरियों की भाषा उर्दू कर दी गयी। इसे क्यों किया गया, यह समझने में ज्यादा परिश्रम नहीं करना पड़ता। बहरहाल।
अंग्रेजों के प्रभुत्व और बड़े वर्ग के संपर्क में आने के बाद एक नई भाषा अंग्रेजी ने भारत में अपना विस्तार किया। यह ध्यान देने की बात है कि स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले और नई भूमिका निभाने वाले अधिकांश नेता वकील थे। उन्होंने लन्दन से बैरिस्टरी पढ़ी थी। वे अंग्रेजों से बुरी तरह प्रभावित थे। यह प्रभाव सकारात्मक भी था और गांधीजी जैसे लोगों पर नकारात्मक भी। उन्होंने दूसरी सहायक भाषा के रूप में अंग्रेजी सीखी थी। उर्दू तो वे जानते ही थे और हिन्दी उनके परिवार की अनिवार्य भाषा थी। हिंदी जानना इसलिए भी जरूरी था कि यह देश में बहुसंख्यक लोगों की भाषा थी। देवनागरी लिपि में लिखी जाती थी और इसी लिपि में हिन्दुओं के तमाम ग्रन्थ आदि लिखे गए थे। फिर ज्ञान-विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए एक तरीका भी यही था कि अंग्रेजी सीखी जाए। उनमें से कुछ ने यह सोचा जरूर कि ऐसा ही कुछ भारतीय भाषाओँ में भी हो जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग लाभान्वित हो सकें। लेकिन यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी। और फिर इसकी अपनी सीमायें थीं। तो यह हुआ कि देश में एक नई भाषा ने अपनी जरूरत जताई। तारीफ की बात यह थी कि साम्प्रदायिकता के इस सूक्ष्म पहलू से हिन्दू और मुसलमान दोनों पक्ष या तो उदासीन थे या जानबूझकर उलझना नहीं चाहते थे। दोनों ही को अंग्रेजी पसंद थी या कहिये कि अनिवार्य समझ में आती थी। इसमें उन क्षेत्रीय भाषाओँ के लोग भी शामिल थे, जहाँ न हिंदी थी और न उर्दू। बल्कि वहाँ एक अन्य ही स्थानीय भाषा प्रभावी थी। यह अंग्रेजों के तथाकथित सभ्य और विकसित होने तथा उच्च मानसिकता के आतंक के कारण था। नतीजा यह हुआ कि देश के आजाद होने के बाद भी हम किसी एक भाषा का चयन नहीं कर सके जो अनिवार्य रूप से देश भर में लागू हो जाती और सबको स्वीकार्य होती। हमने देश के लिए एक राजभाषा, १८ भारतीय भाषाएँ (अब २२ को संविधान में अनुसूचित कर दिया गया है) निर्धारित कीं और अंग्रेजी को सबसे ऊपर रखकर यह कहा कि जब तक (यह १५ वर्ष का दिया गया समय था जिसे अनगिनत बार बढ़ाया गया है और अनगिनत बार बढ़ाया जाता रहेगा) हिन्दी इस काबिल नहीं हो जाती कि वह राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त कर सके, अंग्रेजी भारत में कामकाज की भाषा बनी रहेगी। यह सबसे बड़ा दाँव था। इस दाँव ने कई नए पेंच पैदा किये। सबसे पहला तो यही था कि शासन आमजन से दूर हो गया।
इस निर्णय ने दूरगामी प्रभाव डाला। आज हम इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं कि शिक्षण की भाषा क्या हो? जाहिर है, यह नए परिप्रेक्ष्य में उभरता हुआ प्रश्न है। अंग्रेजीदां लोगों ने इस प्रश्न को अपने-अपने स्वार्थ से वशीभूत होकर उठाया है और यह उस प्रश्न की सार्थकता है कि इस पर एक विमर्श की तरह विचार होने लगा है। आज शिक्षण की भाषा के सन्दर्भ में भारतीय परिप्रेक्ष्य में जब यह बात उठती है तो स्वतः ही ख़याल आता है कि यह प्रश्न अंग्रेजी बनाम अन्य भारतीय भाषाओँ के लिए उठा है। तर्क यह है कि अंग्रेजी एक सार्वभौमिक यानि यूनिवर्सल भाषा है और इस नश्वर जगत में आगे बढ़ना है तो अंग्रेजी ही एक मात्र तरीका है। आप चौंकें नहीं, यह मैंने जो शब्द ‘नश्वर जगत’ का प्रयोग किया है, वह जान-बूझकर किया है। मेरा आशय यह भी है कि जिस धार्मिकता के चक्कर में भारतीय भाषाएँ विकसित नहीं हो पाई, उसी धार्मिकता ने भी यह माहौल बनाया है कि अंग्रेजी सबसे आवश्यक भाषा है। तो नश्वर संसार का जिक्र करके उसकी तरफ संकेत किया जाना जरूरी है।
अब जबकि अंग्रेजी को एक सार्वभौमिक भाषा मानकर विमर्श की शुरुआत होती है तो बहस आरम्भ में ही पटरी से उतरती दिखाई देती है। यद्यपि नए तथ्यों के आलोक में और नई सूचनाओं के प्रकाश में यह तथ्य स्पष्ट हो गया है कि अंग्रेजी उतनी आवश्यक भाषा नहीं है जितनी कि इसे बताया जाता है। हम तो अब यह भी जान गए हैं कि यह भाषा गरीब-मजदूरों की भाषा रही है और मूल इंग्लैण्डवासी भी कुछ साल पहले तक फ्रेंच बोलना पसंद करते थे और अंग्रेजी बोलना-पढ़ना उन्हें नागवार गुजरता था। लेकिन बाद में उन्होंने इसके विकास के लिए गौरव भाव विकसित किया।  हमने यह देखा है कि इजराइल जैसे छोटे देश ने भी अपनी प्राचीन भाषा हिब्रू का कैसे पुनरुत्थान किया है। चीन, जर्मनी, जापान जैसे देश किस तरह अपनी भाषा के प्रति गौरव बोध से भरे रहते हैं। प्रसिद्ध रुसी कवि और चिन्तक रसूल हमजातोव अपनी प्रसिद्द किताब ‘मेरा दागिस्तान’ में यह कहता है कि उसके जीवन में और समाज में, देश में उसकी भाषा का कैसा महत्त्व है! तो हमें यह समझना चाहिए कि तकरीबन सवा अरब की जनसँख्या वाले देश में शिक्षण का माध्यम कौन सी भाषा हो, जैसे प्रश्न से हम क्यों जूझ रहे हैं?
दरअसल हममें उस आत्मविश्वास और गौरव बोध का अभाव है। वह आत्मविश्वास और गौरव बोध जो सभी सभ्य समाजों और स्वतंत्र देशों की मूल शर्त हुआ करता है। हम कुछ गिने-चुने अंग्रेजीदां लोगों के हाथों की कठपुतलियां बने हुए आत्मसंघर्ष कर रहे हैं और स्वयं के अस्तित्व से जूझ रहे हैं। भाषा का मामला भी उसी आत्म सम्मान और गौरव बोध से जुडा मामला है। भारत जैसे देश में यह बहुत दुर्भाग्य पूर्ण है कि राजनीती सेवा नहीं सत्तालोभ और लोलुपता का माध्यम भर है। यह अपनी सत्ता को बचाए रखने का माध्यम भर है। शासन में उच्च पदों पर बैठे लोग यह नहीं समझते कि वे वहां सेवा के निमित्त हैं न कि मलाई काटने के। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी और लोगों में आत्मगौरव का बोध नहीं आएगा तब तक यह संभव नहीं है। हम ऐसे प्रश्नों से जूझते रहेंगे।
इतिहास और साहित्य दोनों साक्षी हैं कि जब भाषा के प्रति सम्मान नहीं था तो कैसे हेय भावना घर कर गयी थी। हिंदी के कवि केशवदास की यह उक्ति सब जानते हैं- ‘भाखा बोली न जानहिं, जिनके कुल के दास। भाखा कवि भो मंदमति, तेहि कुल केशवदास’।। ऐसे केशवदास का साहित्य कितना ही पांडित्यपूर्ण क्यों न रहे, वे हिंदी संसार में ‘कठिन काव्य के प्रेत’ के तौर पर ही जाने जाते हैं। ‘निज भाषा उन्नति अहै’ का शंखनाद जितना तीव्र भारतेंदु बाबू के समय में गूंजा और द्विवेदी जी के समय में परवान चढ़ा, उतना कालांतर में नहीं। क्या समय था कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यास ‘चंद्रकांता’ को पढने के लिए न जाने कितने लोगों ने हिंदी सीखी।
हमारे लिए यह बताना बहुत आसान है कि शिक्षण की भाषा तो अपनी मातृभाषा ही है। वह भाषा जिसमें हम अपनी पहली आवाज सुनते हैं। क्या यह सच नहीं है कि हम अपने जीवन में सीखे गए किसी भी भाषा के तीन-चौथाई से ज्यादा शब्द शुरूआती नौ-दस सालों में सीख लेते हैं। यह शब्दज्ञान शिक्षण मात्र से नहीं आता। यह आता है अनुशीलन से। अनुकरण से। यह अनुकरण हम अपने घर, परिवार, समाज और मित्रों-दोस्तों के साहचर्य में करते हैं। विद्यालय में भी करते हैं ऐसे में अपनी भाषा से इतर कोई अन्य भाषा कैसे हमारे लिए शिक्षण का सही माध्यम हो सकती है।
यह अलग बात है कि अपनी भाषा में वह सम्पन्नता नहीं है, जो विज्ञान-प्राद्यौगिकी और तकनीक के लिए सर्वाधिक उपयुक्त हो। लेकिन उसे समृद्ध बनाने का जिम्मा भी अपना ही है। ढेरों भाषाप्रेमी इसे कर भी रहे हैं। कंप्यूटर, तकनीक आदि के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हमें एक सुखद भविष्य की तरफ संकेत करती है। दुनिया का बेहतर साहित्य भारतीय भाषाओं में लिखा जा रहा है। दुनिया का बाजार भी हमारी भाषा और उसके बोलनेवालों की संख्या और क्षेत्र देखकर लगातार उन तक पहुँचने की कोशिशें कर रहा है। अब तो प्रबंधन और तकनीकी दुनिया में भी भारतीय भाषाओँ में पाठ्यक्रम शुरू हो गए हैं। ऐसे में, आवश्यकता है अपनी मातृभूमि औए मातृभाषा के प्रति गौरवबोध जागृत करने की। हम इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते! हमें बारहा इस सवाल से जूझना न पड़े कि शिक्षण का माध्यम क्या होना चाहिए, हमें चाहिए कि हम वह आत्मगौरव का भाव विकसित करें और अपनी भाषा को उस काबिल बनाएं।


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डॉ रमाकान्त राय
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी
भाऊ राव देवरस राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
दुद्धी, सोनभद्र

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