Saturday, February 15, 2014

बया का अक्टूबर-दिसम्बर, २०१३

कोई बताएगा कि यह 'उपन्यासिका' क्या होती है? क्या यह लम्बी कहानी और उपन्यास के बीच की कोई विधा है या कुछ और?
‘बया’ के नवीनतम अंक अक्टूबर-दिसम्बर, २०१३ में मनाली चक्रवर्ती की उपन्यासिका 'सवेरा होने वाला है' बड़ी मेहनत से पढ़ गया. यह खासा उलझाऊ था. स्त्री मुद्दे को लेकर लिखे गए इस उपन्यासिका में विमर्श के कई पहलू छूने की कोशिश हुई है. थोड़ा अनाड़ीपन के साथ और थोड़ा अति उत्साह में. बहरहाल कुछ खास बना नहीं. हाँ, रेल के पटरियों के किनारे रहने वाले लोगों का जीवन बहुत खूबसूरती से उकेरा गया है.
अंक में आशिमा की पहली कहानी 'चूड़े वाली भाभी' प्रभावित करती है, यद्यपि उसकी थीम जानी पहचानी है लेकिन कसाव ऐसा है कि कहानी पढ़ने के बाद देर तक प्रभाव बनाये रहती है. चूड़ेवाली भाभी के मर जाने के बाद सब के मन में उपजी सहानुभूति का अंकन बहुत अच्छे से हुआ है.
बया का यह अंक एक तरह से श्रद्धांजलि अंक है. सुरेश सलिल ने विजय सोनी, गोविन्द पुरुषोत्तम देशपांडे और परमानन्द जी के विषय में बहुत आत्मीयता से लिखा है. अंक में मशहूर कलाकार अशोक भौमिक के बारे में रोचक सामग्री है. 
अंक की कवितायेँ निराश करने वाली हैं, सिवाय रविशंकर उपाध्याय, अस्मुरारी नन्दन मिश्र और सुरेश सेन निशांत की कविताओं के. अशोक भौमिक ने शताब्दी राय की कविता का जो अनुवाद किया है वह जल्दीबाजी में किया गया लगता है. या यह भी हो सकता है कि शताब्दी राय ने यह कविता एक पुरुष होकर लिखी है. आखिरी हिस्से का अनुवाद आप खुद देखें-
ए लड़की तेरा धरम क्या है रे?
- औरतों का भी कोई धर्म होता है, जी
सब कुछ तो शरीर का मामला है
सलमा कहती धरम ही समाज को बनाता है
जब शाम को वह खड़ी होती है, कोई नहीं पूछता उससे 'क्या तू हिन्दू है'
बस यही पूछते हैं, 'कितने में चलेगी'
बिस्तर ही धर्म को मिलाता है
शरीर जब शरीर से खेलता है
इसलिए सोचता हूँ
अबसे शरीर और बिस्तर को ही धर्म कहूँगा..
....
"सोचता हूँ" और "धर्म कहूँगा", यह शताब्दी राय तो नहीं ही कहेंगी. अशोक भौमिक जरूर कह सकते हैं. यह अनुवाद की गड़बड़ी ही है.


अंक में जैसा कि मैंने बताया, सुरेश सेन निशांत की कवितायेँ बहुत मार्मिक हैं, पहाड़ का जीवन उनकी इन कविताओं में स्पंदित सा है. निर्मला को संबोधित करते हुए यह आठ कवितायेँ बेहद संजीदा तस्वीर पेश करती हैं और बहुत प्रभावित करती हैं. एक आप भी पढ़ें-
निर्मला!
कभी-कभी लगता है
तुम एक पहाड़ हो हरा-भरा
और मैं एक छोटा-सा
घर हूँ उसपर बना हुआ
अपने होने की ख़ुशी में
डोलता हुआ.
तुम्हारी देह में
गहरे तक धँसी हुई है
मेरी जीवन जड़ें.
.
कभी-कभी लगता है
तुम धूप हो सर्द दिनों की
हमें जीने की तपिश भेंटती हुई
तुम्हारे बिना जीना
बहुत मुश्किल है
इन पहाड़ों पर .
.
कभी-कभी लगता है
मैं गहरी नींद में हूँ
तुम एक सुन्दर स्वप्न हो
मेरी नींद में विचरता हुआ.
.
मैं चाहता हूँ
मैं सोया रहूँ सदियों तक
गहरी नींद
ये स्वप्न चलता रहे
यूँ ही....
बया Antika Prakashan से छपती है और गौरीनाथ जी इसके संपादक हैं.

No comments:

Post a Comment